Thursday, December 17, 2015

राक्षसों के सींग होते थे


आर्यों का मूल स्थान सेन्ट्रल एशिया था
आर्य पशु पालन का काम करते थे
आर्य जब भारतीय उप महाद्वीप में आये तो यहाँ घने जंगल थे
आर्यों को गायों के लिए घास के मैदानों की ज़रूरत थी
मैदान तैयार करने के लिए आर्यों नें जंगलों को आग लगानी शुरू करी
इसे आर्य यज्ञ कहते थे
लेकिन भारतीय मूल निवासी जंगल पर आधारित जीवन जीते थे
इसलिए मूलनिवासी जंगल में लगी हुई आग को बुझा देते थे
इसीलिये आर्य कहते थे कि ये राक्षस हमारे यज्ञ में बाधा डालते हैं
भारत के मूल निवासी चूंकि जंगल की रक्षा करते थे इसलिए उन्हें रक्षक या राक्षस कहा गया
आर्यों के धर्मग्रंथों में राक्षसों का वर्णन ध्यान से पढ़िए
उसमें लिखा गया है कि राक्षस काले रंग के होते थे
राक्षसों के घुंघराले बाल होते थे
राक्षसों के सींग होते थे
राक्षसों का यह वर्णन ठीक आदिवासियों का वर्णन है
भारत के मूल निवासी सांवले रंग के थे
घुंघराले काले बालों वाले थे
आज भी छत्तीसगढ़ के आदिवासी सींग लगा कर नाचते हैं
यज्ञ की अग्नि की रक्षा के लिए राजा का बेटा जंगल में जाता है
राजा का बेटा ताड़कासुर का वध करता है
ताड़कासुर यानी पेड़ से निकली ताड़ी पीने वाले असुर
यानी आदिवासी
यानी राजा का बेटा भारत के आदिवासियों की हत्या करता है
उसे आर्य ग्रन्थ वीरता की गाथा के रूप में दर्ज करते हैं
और उस राजा के बेटे को अपना राष्ट्रीय आदर्श घोषित करते हैं
और आज भी हर साल ताड़कासुर वध का उत्सव मनाते हैं
मैं आपको यह पुरानी कहानी इसलिए सुना रहा हूँ
ताकि आप यह समझ सकें
कि हमारे शासन द्वारा
आदिवासियों की आज जो हत्याएं करी जा रही हैं
आप उसे क्यों स्वीकार कर लेते हैं ?
असल में आदिवासियों को मार कर उनकी ज़मीनों पर कब्जा कर लेना
हमारी परम्परा है
इस परम्परा को हम अपना धर्म मानते हैं
उदहारण के लिए दो महीने पहले ही
छत्तीसगढ़ के पेद्दा गेलूर गाँव में
हमारे सुरक्षा बलों नें चालीस आदिवासी औरतों पर यौन हमला किया है
तीन महिलाओं नें सोनी सोरी के साथ आकर थाने में बलात्कार की रिपोर्ट लिखवाई है
इनमें एक चौदह साल की बच्ची भी है
लेकिन इस घटना के बाद आज किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है
लेकिन इस सब का भारत के सभ्य, शिष्ट, और महान संस्कृति के वाहकों के मन में ज़रा सा भी रोष नहीं है
सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर भरने पुलिस अधिकारी को भारत के राष्ट्रपति नें वीरता पुरस्कार दिया
उडीसा की आरती मांझी के साथ सुरक्षा बलों नें सामूहिक बलात्कार किया और उसे पांच फर्जी मामलों में फंसा कर जेल में डाल दिया
आरती मांझी पाँचों मामलों में निर्दोष पायी गयी
लेकिन आज तक उसके साथ बलात्कार करने वाले किसी सिपाही के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करी गयी
पन्द्रह साल की आदिवासी लडकी हिडमे के साथ थाने में बलात्कार कर के उसे सात साल तक जेल में रखा गया और फिर इसी साल उसे निर्दोष घोषित कर के घर भेज दिया
आदिवासी महिला लेधा के साथ पुलिस वालों नें एक महीने तक सामूहिक बलात्कार किया
ऐसा करने वाले पुलिस अधिकारी कल्लूरी को भी
भारत के राष्ट्रपति नें वीरता पुरस्कार दिया
आप कह सकते हैं कि मैं क्यों अतीत का रोना रोने बैठ गया हूँ
बेशक हम अपना वर्तमान बेहतर बना सकते हैं
लेकिन उसकी शुरुआत तो कीजिये
पिछली गलती स्वीकार कर लीजिये
सही रास्ते पर चलने के लिए सहमत हो जाइए
भारत में भी शांति और प्रेम का वातावरण बन सकता है
वरना हमारी नफरत और लालच हमें भयानक हालात में पहुंचा ही देगी
और उसके लिए ज़िम्मेदार कोई और नहीं हम खुद ही होंगे
( संदर्भ स्रोत - वोल्गा से गंगा - लेखक राहुल संकृत्यायन, वयं रक्षामः - लेखक आचार्य चतुरसेन, सामाजिक विज्ञान की छठवीं ,सातवीं और आठवीं की इतिहास की एनसीआरटी की पाठ्य पुस्तक )

Wednesday, December 16, 2015

यह अर्थव्यवस्था उत्पादक के पक्ष में काम ही नहीं करती

अमीरी कैसे बढ़ती है 
जापान से भारत ने बुलेट ट्रेन के लिए नब्बे लाख करोड़ रूपये क़र्ज़ लिए 
तो जापान किसी जहाज़ में भरकर नोट भारत थोड़े ही भेज देगा 
जापान अपने कम्प्यूटर के स्क्रीन पर एक लेटर लिख देगा जिसमें लिखा होगा कि जापान नें भारत को नब्बे लाख करोड़ रूपये का क़र्ज़ दिया है 
भारत सरकार अपने देश के रिजर्व बैंक को जापान का वह पत्र दे देगी 
रिजर्व बैंक एक पत्र लिख कर उस बैंक को देगा जिसमें भारत सरकार का खाता है
मान लीजिये स्टेट बैंक में भारत सरकार का खाता है
तो रिजर्व बैंक से स्टेट बैंक को एक पत्र आएगा कि भारत सरकार के खाते में नब्बे लाख करोड़ लिख दीजिये
तो भारत सरकार मानेगी कि उसके पास अब पैसा आ गया
अब भारत सरकार उस पैसे को
लोहा कंपनियों को देगी जिनसे उसे रेल पटरियां डालने के लिए लोहा खरीदना है
लोहा कंपनी उसे अपने कर्मचारी के खाते में डालेगी
कर्मचारी उस से कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और यातायात के साधन, खरीदेगा
कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और यातायात के साधन, तो देश में बढे नहीं
लेकिन नब्बे लाख रुपया बढ़ गया
जो बढ़ जाता है उसकी कीमत कम हो जाती है
रुपया बढ़ा तो रूपये की कीमत कम हो जायेगी
जो नहीं बढ़ा उसकी कीमत बढ़ जाती है
कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और यातायात के साधन, की कीमत बढ़ जायेगी
साथ में दाल सब्जी मछली दूध की कीमत भी बढ़ जायेगी
जिसे आप कहेंगे कि महंगाई बढ़ गयी
बिना उत्पादन बढ़ाये अगर आप
पैसा बढ़ाएंगे
तो उससे महंगाई बढ़ेगी
चलिए आगे चलते हैं
दाल सब्जी मछली दूध महंगा हो जाएगा तो जनता शोर मचाएगी
सरकार उस रूपये से विदेशों से
दाल सब्जी मछली दूध विदेशों से मंगवायेगी
उससे किसान द्वारा उगाये गए
दाल सब्जी मछली दूध की कीमत फिर से गिर जायेगी
लेकिन किसान के लिए कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और यातायात के साधन, की कीमत तो कम नहीं हुई
तो किसान के पास दाल सब्जी मछली दूध के उत्पादन से अब जो रुपया आएगा उससे उसका जीवन चलाना मुश्किल हो जाएगा
किसान अपने बच्चे को पढ़ा नहीं सकेगा, इलाज नहीं करा सकेगा
किसान इस सब के लिए क़र्ज़ लेगा
लेकिन उसका उत्पादन तो बढ़ा नहीं
महंगाई बढ़ने से खर्च तो बढ़ गया
लेकिन आमदनी बढ़ी नहीं
किसान घाटे में आ जाएगा
किसान क़र्ज़ चूका नहीं पायेगा
किसान फांसी लगा लेगा
यह अर्थव्यवस्था
उत्पादक के पक्ष में काम ही नहीं करती

बंदूक के बल पर गरीब

एक तरफ आप हैं जो दिन भर कुर्सी पर बैठ कर बहुत कम मेहनत करते हैं 
लेकिन आपके पास कार है अपना फ़्लैट है बीबी के पास ब्यूटी पार्लर जाने के लिए भी पैसे हैं .
दूसरी तरफ देश के करोड़ों लोग हैं जो दिन भर कड़ी मेहनत करते हैं लेकिन उनके पास घर नहीं है 
बीबी के इलाज की भी हैसियत नहीं है .
ये क्या जादू है कि मेहनत वाले गरीब और आरामदेह काम करने वाले अमीर हैं ?
अमीरी के लिए प्राकृतिक संसाधन जैसे ज़मीन , नदी ,जंगल की ज़रूरत होती है
और ज़रूरत होती है मेहनत की .
संविधान के मुताबिक तो प्रकृतिक संसाधन पर तो सभी नागरिकों का बराबर हक है
और किसी एक गरीब की मेहनत का फायदा किसी दूसरे अमीर को मिले यह भी संविधान के मुताबिक वर्जित है
यानी देश में जो लोग दूसरों के संसाधनों और दूसरों की मेहनत के दम पर अमीर बने हैं उन्होंने संविधान के खिलाफ़ काम किया है
संविधान में लिखा है कि सरकार देश में नागरिकों के बीच बराबरी लाने के लिए काम करेगी
लेकिन सरकार रोज़ गरीब आदिवासियों और गांव वालों की ज़मीने पुलिस और अर्ध सैनिक बलों की बंदूकों के दम पर छीन कर अमीर उद्योगपतियों को दे रही है .
सरकार रोज़ ही चंद अमीरों के फायदे के लिए करोड़ों नागरिकों को बंदूक के बल पर गरीब बना रही है
जो सरकार अमीरों का फायदा करती है उसे जीतने के लिए अमीर ही पैसा देते हैं
अमीर उद्योगपति ही तय करते हैं कि अब स्कूल कालेज में क्या पढ़ाया जाय . ताकि उनके उद्योग धंधे चलाने के लिए उन्हें कर्मचारी मिल सकें .
मध्यम वर्ग यही कर्मचारी वर्ग है .
यह मध्यम वर्ग चाहता है कि उद्योगपति का उद्योग चलता रहे ताकि मध्यम वर्ग का भी कार और ब्यूटी पार्लर वाला जीवन चलता रहे .
इसलिए यह मध्यम वर्ग कहता है कि सरकार विकास करती है
इसलिए आप कहते हैं कि पुलिस और अर्ध सैनिक बल देश भक्त होते हैं
आप इस तरह के बंदूक के दम पर चलने वाले विकास और इस हिंसक राजनीति के समर्थक बन जाते हैं .
आपका साहित्य कला राजनीति सब इस लुटेरी आर्थिक दुनिया में ही पनपती है .
इसलिए आपके साहित्य और कला में से करोड़ों मजदूर,आदिवासी और रोज़ मर रहे किसान गायब होते हैं.
अब सरकार आपको समझाती है कि देखो हमें विकास को बढ़ाना है तो हमें सुरक्षा बलों की संख्या बढानी पड़ेगी .
अपने ही देश के गरीबों को मारने के लिए आप सहमत हो जाते हैं .
हिंसक अर्थव्यवस्था , हिंसक राजनीति और हिंसक शिक्षा आपको एक जानवर में बदल देती है
आप देख ही नहीं पाते हैं कि आप कब हिंसक और संवेदना हीन बन गए
यही इस अर्थ व्यवस्था और इस राजनीति का जाना परखा पुराना तरीका है
यह मनुष्य को जानवर बना कर उसे गुलाम बना लेती है .
इस गुलामी और जानवर पने से मुक्ति भी संभव है .
लेकिन पहले ज़रूरी है कि आप अपनी गुलामी को समझ लें
वरना आप आज़ादी की बात करने वाले को ही मार डालेंगे

Tuesday, December 15, 2015

भारत के प्राचीन काल्पनिक चित्र

आज अगर आप किसी कालेज या महंगे इलीट इंस्टीट्युट में जाकर युवा से बात करेंगे
तो आप पायेंगे कि युवा संघ की भाषा बोल रहा है
एक तरफ युवा भारत के किसी शानदार अतीत की बात करता है
और मानता है कि प्राचीन भारत में सब कुछ शानदार था
युवा मानता है कि बाद में भारत में मुसलमान आये
इससे भारत का पतन हो गया
इसी के कारण भारत में जातपात, पर्दा प्रथा, बाल विवाह शुरू हुआ और भारत गरीब हो गया
युवा यह भी मानता है कि अब हमें फिर से भारत को पुराने गौरवशाली स्थान पर पहुंचाना है
जिसके लिए मोदी जी मेहनत कर रहे हैं
लेकिन ये कम्युनिस्ट, कांग्रेसी और विदेशी पैसे से पलने वाले एनजीओ मोदी जी के रास्ते में रोड़े अटका रहे हैं
आइये एक एक चीज़ पर बात करते हैं
क्या भारत में पहले सब कुछ शानदार था ?
क्या भारत के अतीत में बस राजा और ऋषी मुनी ही थे
क्या भारत के वेद में या किसी शास्त्र पुराण में किसानों , कारीगरों, दासों का कोई वर्णन मौजूद है ?
नहीं भारत के प्राचीन काल्पनिक चित्र में किसान , कारीगर , आदिवासी , गुलाम हैं ही नहीं .
जबकि सच्चाई यह है कि प्राचीन भारत में आर्य भारत के मूल निवासियों की हत्याएं कर रहे थे .
प्राचीन भारत में हम जिन असुरों, दानवों, राक्षसों को मार रहे थे वे सब भारत के आदिवासी थे .
हमने बड़े पैमाने पर मूल निवासियों पर हमला करके उन्हें गुलाम बना लिया और उन्हें मरे हुए जानवरों को घसीटने , सफाई करने और हीन कामों में लगा दिया
हमने इन गुलामों की अलग बस्तियां बनाईं
इसी लिए आप देखेंगे कि आज भी दलितों की बस्तियां अलग होती हैं
हमने मूल निवासियों की सारी ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया
इसलिए भारत के अस्सी प्रतिशत दलित आज भी भूमिहीन हैं
हमारे देश में आज भी मेहनत करने वाली सभी जातियां नीच जातियां मानी जाती हैं
इसलिए हमारी संस्कृति में काम करने वाले नीच माने जाते हैं
मुझे समझ नहीं आता
इस संस्कृति में गर्व करने वाली कौन सी बात है
मुझे यह भी समझ नहीं आता कि इसमें महान क्या है ?
इसलिए भारत के बच्चों को हम जब तक भारत का सच्चा इतिहास नहीं पढ़ाएंगे
तब तक बच्चे इस सोच से आज़ाद नहीं हो सकेंगे
और तब तक भारत के दलित , आदिवासी और मेहनतकश जातियों के साथ सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक न्याय नहीं किया जा सकता
इसलिए आजकल मैं युवाओं के बीच इन मुद्दों पर बात कर रहा हूँ

Friday, December 4, 2015

प्रिय करीना



प्रिय करीना ,
एक फोटो देख रहा हूँ . जिसमें आप एक मंच पर बैठी हैं और छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री रमन सिंह आपके साथ अपने फोन से सेल्फी खींच रहा है .
आप वहाँ बाल अधिकार समारोह के लिए गयी थीं .
आपको छत्तीसगढ़ में बच्चों की हालत और जिसके साथ आप बैठी थीं उस व्यक्ति के बारे में थोडा जान लेना चाहिये
छत्तीसगढ़ में इस मुख्यमंत्री के आदेश पर अमीर कंपनियों के लिए ज़मीनों पर कब्ज़ा करने के लिए साढ़े छह सौ आदिवासियों के गाँव जला दिए गए हैं
इन साढ़े छह सौ गाँव का राशन पानी दवा सब बंद कर दी गयी
ताकि आदिवासी गाँव खाली कर के भाग जाएँ
इस मुख्य मंत्री के लच और क्रूर आदेश के कारण इन गाँव में लाखों बच्चे बीमारी और भूख से पीड़ित हो गए हैं
आदिवासी बच्चों का इलाज करने के लिए गाँव में गए हुए बच्चों के डाक्टर बिनायक सेन को इस मुख्य मंत्री ने जेल में डाल दिया और फर्ज़ी बना कर उस डाक्टर को उम्र कैद की सज़ा दिलवा दी
इस मुख्य मंत्री के आदेश पर सोनी सोरी नामक एक आदिवासी महिला के गुप्तांगों मे पत्थर भरे गए
ताकि आगे से कोई इस मुख्य मंत्री के काले कारनामों के खिलाफ़ आवाज़ उठाने की जुर्रत ना कर सके
इस मुख्य मंत्री नें इन्द्रावती के पार बसे गाँव में छोटे छोटे आदिवासी बच्चों की पत्थरों पर पटक कर हत्या करवाई है
सारकेगुडा में बुजुर्गों से रात में कहानी सुनते बच्चों को इस मुख्यमंत्री नें गोलियों से भून डालने का हुक्म दिया
गोमपाड़ गाँव में डेढ़ साल के बच्चे की उंगलियां इस मुख्य मंत्री के आदेश पर काटी गयीं
जब मैंने इन सब के खिलाफ़ आवाज़ उठाई तो मेरे आश्रम पर इस मुख्य मंत्री ने बुलडोज़र चलवा दिया और मेरे खिलाफ़ करीब सौ फर्ज़ी मुकदमे बना दिए
यह मुख्य मंत्री बड़ी कंपनियों और उद्योगपतियों से पैसा खाता है और अपना पैसा विदेशों में भेजता है
अभी कुछ दिन पहले इसके विदेशी बैंक खातों का पता चला है
जिसमें इसका बेटा जाकर पैसा जमा करता है
पैसे के लालच में अपने ही प्रदेश के बच्चों की हत्या करवाने वाले इस आदमी के साथ आपका बैठना वो भी बाल अधिकार के नाम पर हम सब के लिए और प्रदेश के पीड़ित आदिवासियों के लिए बहुत सदमा देना वाला है
आपको चाहिये कि आप छत्तीसगढ़ में बच्चों के साथ होने वाली इस क्रूरता के विरुद्ध एक बयान ज़रूर दें
ताकि इस मुख्य मंत्री के लालच के करण बच्चों के ऊपर होने वाली सरकारी क्रूरता रुक सके
-हिमांशु कुमार



विकलांग दिवस




आज मोदी जी विकलांग दिवस मना रहे हैं . 
मुझे सोढी सम्भो याद आ रही है 
जिसे भाजपा राज में विकलांग बना दिया गया था 
जिस सोढी सम्भो को हम सर्वोच्च न्यायालय लेकर आये थे 
सोढी सम्भो की आँखों के सामने सीआरपीएफ नें सोलह आदिवासियों को तलवारों से काट दिया था 
सोढी सम्भो इस घटना की गवाह थी
सोढी सम्भो के पाँव में गोली मार दी गयी
मैं सोढी सम्भो को दिल्ली लेकर आया था और उसका अस्पताल में इलाज करवाया
जब मैं छत्तीसगढ़ वापिस आया तो
सोढी सम्भो का भाजपा सरकार नें अपहरण कर लिया
आज भी छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार नें सोढी सम्भो को कहीं छिपाया हुआ है
इसी दिन इस गाँव में एक और आदिवासी बच्चे की उंगलियां सीआरपीएफ नें काट दी थीं
भाजपा सरकार नें सोढी सम्भो नाम की इस महिला के अपहरण का मामला मुझ पर बनाया था
इन मारे गए सोलह लोगों के परिवार के बारह सदस्य मेरे साथ सुप्रीम कोर्ट में आये थे
हमने सुप्रीम कोर्ट में भाजपा सरकार के खिलाफ़ मुकदमा दायर किया था
सरकार नें इन सभी आदिवासियों का अपहरण कर लिया
अब इस मामले में अकेला मैं ही आवेदक बचा हूँ
मोदी जी अगर आप वाकई विकलांग दिवस मनाना चाहते हैं तो
अपनी पार्टी के राज में इरादे पूर्वक विकलांग बनाई गयी इस विकलांग महिला और हाथ काटे गए इस बच्चे को पुलिस के गैर कानूनी कब्ज़े से आज़ाद करवा दीजिए
और वादा करिये कि आपकी पार्टी अब किसी सही सलामत महिला और बच्चे को विकलांग नहीं बनायेगी
लेकिन ये काम मुश्किल लगता है
क्योंकि अम्बानी और अदाणी ने आपके चुनाव में जो खर्चा किया है उसका कर्जा चुकाने के लिए आप और भी आदिवासी महिलाओं और बच्चों को ज़रूर विकलांग बनाएंगे
हम भी देख रहे हैं आपके ज़ुल्मों को
हम लड़ेंगे ज़रूर

पेरिस में क्लाइमेट चेंज



सुना है मोदी जी पर्यावरण में बदलाव से चिंतित होकर पेरिस में क्लाइमेट चेंज पर होने वाली एक मीटिंग में भाग लेने गए हैं .
अभी कुछ ही दिन पहले तो मोदी जी बस्तर गए थे और वहाँ लोहे के एक कारखाने की आधारशिला रख कर आये हैं .
लोहे के कारखाने का विरोध करने के लिए डेढ़ लाख आदिवासियों ने एक रैली निकाली थी लेकिन किसी ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया .
लोहे के कारखाने देखे हैं आपने कभी ?
लोहा जब खोदा जाता है तो वहाँ से भयंकर लाल रंग की धूल उडती है
वो धूल अगर आपकी सांस के अंदर चली जाय तो आप खांस खांस कर मर जायेंगे दुनिया का कोई डाक्टर आपको ठीक नहीं कर सकता
लोहे को खोदने के बाद फैक्ट्री तक पहुंचाने के लिए ट्रक या ट्रेन में लादा जाता है
उससे पहले लोहे को धोया जाता है
धोने से जो धूल मिट्टी निकलती है उसे नदी में डाल दिया जाता है
नदी की तली में ये गाद जमा हो जाती है
जानवर नदी में पानी पीने जाते हैं तो वे उस गाद में फंस कर मर जाते हैं
नदी के किनारे रहने वाले उस पानी में नहा नहीं सकते उससे चमड़ी के रोग हो जाते हैं
इस लाल नदी के पानी से खेतों में सिंचाई भी नहीं करी जा सकती क्योंकि इसमें घुली हुई लोहे की मिट्टी से फसल मर जाती है .
यह लाल मिट्टी उड़ कर फसलों पर जमा हो जाती है
फसलें उगाना असम्भव हो जाता है
यानी जहां से लोहा निकाला जाता है वहाँ के लोगों की जिंदगी तबाह हो जाती है
तकलीफ देह बात यह है कि यह लोहा लोगों की ज़रूरत के हिसाब से नहीं निकाला जाता
यह विदेशी कंपनियों के लिए मुनाफा कमाने के लिए अंधाधुंध खनन कर के कच्चा लोहा बाहर भेजा जा रहा है
जापान को जो कच्चा लोहा भेजा जा रहा है जापान उसे समुन्द्र में जमा कर रहा है ताकि भविष्य में उसे बेच सके
भारत जापान के भविष्य के लिए अपने लोगों का जीवन क्यों बरबाद कर रहा है यह आप हमें समझाइये ?
क्या सारा लोहा इसी पीढ़ी के लिए है ?
क्या आने वाले बच्चों के लिए लोहा नहीं बचाना है ?
मुनाफे के लिए अपने देश की नदी मिट्टी पानी को बर्बाद करना ही तो समस्या है
तो समस्या की जड़ तो आप ही हो
आप समस्या पर चिंता व्यक्त करने के लिए पेरिस क्यों जा रहे हो ?
यह तो ढोंग है
आप ही समस्या पैदा करो और आप ही समाधान के लिए बड़ी बड़ी बातें बनाओ
जो लोग देश की हवा , नदियाँ , मिट्टी को बचाने के लिए काम कर रहे हैं
उन्हें रोज़ आपकी पुलिस पीटती है
हवा , नदियाँ , मिट्टी को बचाने वालों को आपकी ही सरकार जेलों में डालती है
हवा , नदियाँ , मिट्टी बचाने की कोशिश करने वाली आदिवासी महिलाओं से आपकी पुलिस बलात्कार करती है
हवा , नदियाँ , मिट्टी बचाने वाली आदिवासी महिलाओं के गुप्तांगों में आपकी ही पार्टी के राज में पत्थर ठूसे जाते हैं
हवा , नदियाँ , मिट्टी बचाने वाली संस्थाओं की लिस्ट आपकी ही आईबी तैयार करती है
आप सचमुच चितित हैं तो रिहा कर दीजिए सारे निर्दोष आदिवासियों को जेल के बाहर
सारे राजनैतिक कैदियों को रिहा कर दीजिए जिन्हें लोगों की ज़मीनों और देश के संसाधनों की लूट के विरुद्ध आवाज़ उठाई और जेल में ठूंस दिए गए हैं
अंकित गर्ग और कल्लूरी से राष्ट्रपति पदक वापिस ले लीजिए
सोनी सोरी को वीरता पुरस्कार दीजिए क्योंकि उसने आदिवासियों के साथ मिलकर देश के संसाधनों को बचाने की लड़ाई शुरू करी और सारा सरकारी अत्याचार बहादुरी के साथ अपने शरीर पर झेला
जाइए आदिवासियों से भाजपा सरकार की क्रूरता के बारे में माफी मांग लीजिए
आप चाहें तो ज़रूर इस देश की हवा पानी मिट्टी और नदियों को बचा सकते हैं
लेकिन आप ऐसा करेंगे नहीं
क्योंकि जिस अदाणी नें आपको चुनाव में मुल्क में घूम घूम कर जुमले फेंकने के लिए मुफत का हवाई जहाज़ दिया था
वह अपनी कीमत ज़रूर वसूलेगा
आप उसके अहसान उतारने के लिए उस अदाणी को समुन्द्र तट और पूरे के पूरे गाँव सौंप रहे हैं
अपने मुल्क में तबाही आप खुद ही फैलाएं
और पेरिस जाकर आंसू बहाएं
यह आप किसे बेवकूफ बना रहे हैं ?

Thursday, December 3, 2015

जहाँ अन्याय है वहाँ शांति संभव ही नहीं है

दो ज़िले हैं
एक ज़िले में बहुत सारे बड़े उद्योग हैं और दूसरे ज़िले में कोई भी भी बड़ा उद्योग नहीं है
तो आप कौन से ज़िले को विकसित जिला कहेंगे
बेशक आप उस ज़िले को ही विकसित कहेंगे जिसमें बहुत सारे बड़े उद्योग लगे हुए हैं
अच्छा ये बताइये कि बड़ा उद्योग कौन लगाता है गरीब आदमी या अमीर आदमी
आप कहेंगे कि अमीर आदमी ही बड़ा उद्योग लगाता है
अच्छा ये बताइये कि बड़ा उद्योग लगाने के लिए ज़मीन किसकी ली जाती है
अमीर आदमी की या गरीब आदमी की
आप कहेंगे कि बड़ा उद्योग लगाने के लिए ज़मीन तो गरीब की ही ली जाती है
तो आपके विकास का मतलब हुआ कि गरीब से ले लो और अमीर को दे दो
तो इसे आप कहते हैं विकास
अच्छा ये बताइये कि बड़ा उद्योग लगाने के लिए जब गरीब की ज़मीन ली जानी होती है
तो क्या गरीब प्रेम से अपनी ज़मीन दे देता है ?
नहीं गरीब प्रेम से अपनी ज़मीन नहीं देता है
गरीब अपनी ज़मीन छीनने का विरोध करता है
फिर क्या होता है ?
सरकार गरीब के विरोध को दबाने के लिए पुलिस को भेजती है
पुलिस जाकर गरीब को प्रेम से समझाती है क्या ?
नहीं पुलिस गरीब को पीटती है
पुलिस गरीब की झोंपड़ी तोड़ देती है
पुलिस गरीब को जेल में डाल देती है
पुलिस गरीब को गोली मार देती है
और ज़मीन छीन ली जाती है
और गरीब की वह ज़मीन अमीर को दे दी जाती है
तो अमीर को और भी अमीर बनाने के लिए गरीब को पीट कर उसके पास जो कुछ है उसे छीन लिया जाता है
और उसे अमीर को दे दिया जाता है
यानी बंदूक के दम पर गरीब से छीन लो और दांत दिखाते हुए उसे अमीर को सौंप दो
इसे आप कहते हैं
न्याय और लोकतंत्र
अच्छा ये भी बताइये हम सब गंदगी करते हैं
लेकिन खास जाति के लोग उस गंदगी को साफ़ करते हैं
तो गंदगी करने वाले बड़े या सफाई करने वाले बड़े
आप कहेंगे सफाई करने वाले बड़े
क्या हम सफाई करने वाली जाति के लोगों को बड़ा मानते हैं ?
नहीं जी सबसे नीचा मानते हैं
मतलब असल में आप गंदगी करने वाले को बड़ा मानते हैं और सफाई करने वाले को नीच मानते हैं
तो ये है आपकी संस्कृति
जिसे आप विश्व की सबसे महान संस्कृति भी कहते हैं
आप खुद ही ध्यान से देखिये इस तरह के विकास से
इस तरह के लोकतंत्र और न्याय से
और इस तरह की संस्कृति से
शांति और समानता संभव है क्या ?
जनाब आपके इस विकास, इस लोकतंत्र, आपके इस न्याय और आपकी इस संस्कृति में से सिर्फ असंतोष और अशांति ही निकल सकती है .
लेकिन आप सोचते हैं आप पुलिस के दम पर शांति ले आयेंगे
तो जनाब आप ऐसा कभी कर ही नहीं पायेंगे
आप करोड़ों कड़ी मेहनत करने वाले लोगों को गरीब बनाए हुए हैं
वो मेहनतकश जब भी आवाज़ उठाते हैं
आप पुलिस की बंदूक और जेलों के दम पर उनकी आवाज़ को कुचल देते हैं
इस लिए आप हमेशा पुलिस और फौज के गुण गाते हैं
इसी लिए आपकी जेलें गरीबों से भरी हुई हैं
असल में तो आपको पता है
आप आज अन्याय और दमन के दम पर ही मज़े में हैं
आप मेहनत नहीं करते लेकिन कार में घूमते हैं
जिस दिन गरीब की ज़मीन छीनने के लिए ये पुलिस गोली नहीं चलाएगी
उस दिन आपकी अमीरी खतम हो जायेगी
जिस दिन सफाई करने वाले को इज्ज़त मिलनी शुरू हो जायेगी
उस दिन गंदगी करने वाले आप अपने सम्मान के सिंहासन से नीचे लुढक जायेंगे
इसलिए ही आपके राष्ट्र का राष्ट्रपति अपनी ज़मीन बचाने की कोशिश करने वाली महिला सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर भरने वाले पुलिस अधिकारी को वीरता पुरस्कार देता है
लेकिन संविधान ने कहा था
कि राज्य का कर्तव्य होगा कि वह आर्थिक समानता लाएगा
यानी सरकार गरीब की ज़मीन छीन कर अमीर को नहीं दे सकती
संविधान ने कहा था सबका सम्मान बराबर होगा
यानी सफाई करने वाले को भी आपके बराबर सम्मानित माना जाएगा
लेकिन आप अभी भी संविधान की बात मानने को तैयार ही नहीं हैं
आप देश को मूर्ख बनाने के लिए कहते हैं कि हम संविधान में एक बार फिर से आस्था व्यक्त करते हैं
लेकिन आपने एक भी जगह संविधान की बात मानने की कोई कोशिश ही नहीं करी है
लोग इस ढोंग के कारण बहुत गुस्से में हैं
हम लोगों के गुस्से को और भी भड़कायेंगे
ताकि करोड़ों लोग संविधान को ज़मीन पर लागू कर लें
यह दमनकारी राज्य , यह ढोंगी न्याय व्यवस्था , यह संस्कृति ,
एक दिन के लिए भी बचाए जाने के योग्य नहीं है
इसका समूल नाश ही नए समाज को बनाने का रास्ता खोल सकता है
जहाँ अन्याय है वहाँ शांति संभव ही नहीं है

Sunday, November 29, 2015

ज़मीन का मालिक कौन है

आपने एक करोड रूपये के शेयर खरीदे .
एक सप्ताह बाद उसकी कीमत दो करोड हो गयी . तो अब आपके पास दो करोड की खरीद शक्ति जमा हो गयी .
आप इस दो करोड का गेहूं भी खरीद सकते हैं .
अब एक ही हफ्ते में आप दो करोड रूपये के गेहूं के मालिक हो गये .
आप ने कोई श्रम नहीं किया लेकिन आप बैठे बैठे एक हफ्ते में दुगने उत्पाद के मालिक हो जाते हैं . 
दूसरी तरफ मेहनत से गेहूं पैदा करने वाले की खरीद शक्ति कभी नहीं बढ़ती .
तो मेहनत करने वाला नुक्सान में और बैठ कर कमाने वाले मज़े में .
यही सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है .
इस पर सवाल उठाना ज़रूरी है .
इसे बदलना भी ज़रूरी है .
लेकिन बिना मेहनत किये मज़े करने वाले लोग इसे बदलने नहीं देंगे .
वो बदलाव की कोशिश करने वाले पर हमला कर देते हैं .
और इनके हमले का विरोध करने वालों को नक्सली और राजद्रोही कह्ते हैं .
यही पूंजीवाद है .
आप अपने बच्चों को इस लिए स्कूल भेजते हैं ताकि ताकि वो शिक्षित होकर पूंजीपति की कम्पनी में नौकरी कर सके और पूँजीवाद के गुण गाये ,
और सारी ज़मीने पूंजीपतियों की मिल्कियत बन जाएँ . याद रखियेगा , एक दिन ये पूंजीपति अपने मुनाफे के लिये नौकरियां कम करते जायेंगे , और आपके पास तब ना खेत बचेगा ना नौकरी , आप गुलाम होंगे ,
और पूंजीपति की कृपा पर जीने के लिये मजबूर होंगे , तब भयंकर भूख फैलेगी , ऐसा इतिहास में कई बार हुआ है जब भयंकर भूख फ़ैली है और लाखों लोग भूख से मर गये , भारत में बंगाल में अकाल से लाखों लोग मारे गये थे , सोमालिया अभी मर रहा है ,
भारत में लाखों लोग भूखे और कुपोषित हैं , इसलिये नहीं क्योंकि हमारे पास गेहूं नहीं है , बल्कि इसलिये कि हमने उनके हाथ से ज़मीने और काम करने के अवसर छीन कर पैसे वालों के हाथों में सौंप दिया है .
ये तो एक ही उदहारण है , आप शेयर की जगह मकान कर लें . एक हफ्ते को एक साल कर लें , क्या फर्क पड़ जायेगा ? बात अभी भी वही है . और इतिहास में कितने ही बिजिनेस दूसरों की सम्पत्ति पर शासन की और हिंसा की मदद से कब्जा करने का ही काम करने को कहा जाता था .
अमेरिका में आदिवासियों की ज़मीनों पर कब्ज़े और उनकी बिक्री का काम क्या था ? बिजिनेस या लूट?
आज भी भारत में आदिवासियों की ज़मीनों पर व्यापारियों द्वारा सरकारी बंदूकों की मदद से लूट क्या है ? व्यापार ? इन के शेयर के रेट तभी बढ़ेंगे जब आदिवासियों की ज़मीनों पर व्यापारियों का कब्ज़ा हो जायेगा .
अब सवाल है कि ज़मीन का मालिक कौन है . व्यापारी , और व्यापारियों की जेब में पड़ी हुई सरकार और उनकी नौकर पुलिस या आदिवासी ?

Tuesday, November 17, 2015

फासीवाद

फासीवादी कहेगा - गरीब आलसी होते हैं मेहनती लोग अमीर होते हैं
प्रगतिशील कहेगा - किसान मजदूर लोग तो बहुत मेहनत करने के बाद भी गरीब बने रहते हैं , यह असल में गलत राजनैतिक सिस्टम की वजह से होता है कि चालाक लोग दूसरे की मेहनत और दूसरे के संसाधनों का फायदा उठा कर अमीर बन जाते हैं . जैसे अदाणी आदिवासियों की ज़मीनों और मजदूरों की मेहनत का फायदा उठा कर अमीर बना है मेहनत के कारण नहीं .
फासीवादी कहेगा - झुग्गी झोंपड़ी मे रहने वाले नशेड़ी और अपराधी होते हैं , इनके ऊपर पुलिस को सख्त कार्यवाही करनी चाहिये .
प्रगतिशील कहेगा - झुग्गी झोंपडियां हमारे समाज की गलत नीतियों के कारण बनी हैं . हमें इन नीतियों को सुधारने की कोशिश करनी चाहिये , पुलिस को झोपडियों में रहने वाले लोगों के साथ सख्ती करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती . हमें इन जगहों पर रहने वाले लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए झुग्गी झोपडियों में काम करना चाहिये .
फासीवादी कहेगा - औरतें कमज़ोर होती हैं , उन्हें अपने पिता या भाई से पूछे बिना घर के बाहर नहीं जाना चाहिये , औरतों को ढंग के कपड़े पहनने चाहियें , अपने साथ होने वाली छेड़छाड़ के लिए औरतों के कपड़े ज़िम्मेदार होते हैं
प्रगतिशील कहेगा- आदमी और औरत एक बराबर होती हैं . समाज को ऐसा माहौल बनाना चाहिये जिसमें महिला रात को भी घूमने फिरने में डर महसूस ना करे . महिलाओं के साथ छेड़छाड करना पुरुषों की समस्या है इसलिए हमें लड़कों की शिक्षा पर ध्यान देना चाहिये कि वे महिलाओं के बारे में स्वस्थ ढंग से सोचें .
फासीवादी कहेगा- सेना अर्ध सैनिक बल और पुलिस सर्वोच्च होती है जो भी सेना अर्ध सैनिक बल और पुलिस के बर्ताव पर सवाल खड़े करता है वह देशद्रोही है
प्रगतिशील कहेगा- सेना अर्ध सैनिक बल और पुलिस सरकार के आदेश पर चलती है सरकार अमीरों की मुट्ठी में होती है इसलिए अक्सर सेना अर्ध सैनिक बल और पुलिस अमीरों के फायदे के लिए गरीबों के विरुद्ध क्रूर बर्ताव करते हैं इसलिए हम शासन को सेना अर्ध सैनिक बल और पुलिस के बल पर चलाये जाने को पसंद नहीं करते . लोकतंत्र में जनता से बातचीत के द्वारा कामकाज किया जाना चाहिये
फासीवादी कहेगा- राष्ट्र सर्वोपरी है . राष्ट्रभक्ति से बड़ा कोई कोई भाव नहीं है
प्रगतिशील कहेगा- राष्ट्र भक्ति प्रतीकों से नहीं होती . झंडा लिए एक औरत का चित्र या तिरंगा झंडा या भारत का नक्शा राष्ट्र नहीं होता बल्कि राष्ट्रभक्ति वास्तविक होनी चाहिये . राष्ट्र का मतलब इसमें रहने वाले सभी गरीब , अल्पसंख्यक , आदिवासी होते हैं . इनके मानवाधिकारों और इनकी बराबरी का ख्याल रखना ही सबसे बड़ा काम होना चाहिये . इनके अधिकारों को कुचल कर राष्ट्र की बात करना ढोंग है
फासीवादी कहेगा - पाकिस्तान आतंकवादी देश है . उसे कुचल देना चाहिये
प्रगतिशील कहेगा - पाकिस्तान हमारा पड़ोसी देश है . पाकिस्तान हमेशा हमारे पड़ोस में ही रहेगा . हमें पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध बना कर रखने चाहियें . हमारे बीच में जो भी झगड़े के मुद्दे हैं उनका हल कर लेना चाहिये . हम पाकिस्तान से इसलिए भी नफ़रत करते हैं क्योंकि हम अपने देश के मुसलमानों से ही नफ़रत करते हैं . अगर हम मुसलमानों से नफ़रत करना बंद कर दें तो हमारी पाकिस्तान के प्रति नफ़रत भी खत्म हो जायेगी . आतंकवादी हरकतें दोनों देशों की सरकारें करती हैं . दोनों मुल्कों के हथियारों के सौदागर दोनों मुल्कों के बीच डर का माहौल बनाते हैं ताकि जनता हथियार खरीदने को मंजूरी देती रहे . लेकिन वह पैसा तो असल में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च होना चाहिये .भारत और पाकिस्तान के सिर्फ दो सौ परिवार ऐसे हैं जो हथियार खरीदी से कमीशन खाते हैं और चुनावों मे चंदा देते हैं और दोनों मुल्कों की जनता को एक दूसरे से डराते रहते हैं ताकि उनका धंधा चलता रहे .
फासीवादी कहेगा - सेक्युलर लोग देशद्रोही हैं ,इन्हें पाकिस्तान भेज दो
प्रगतिशील कहेगा - लोकतंत्र का मतलब बहुसंख्य आबादी का अल्पसंख्यक आबादी पर शासन नहीं होता . उसे तो भीड़तंत्र कहा जाता है . लोकतंत्र का मतलब है सभी नागरिक सामान हैं सबकी इज्ज़त बराबर है , सबके अधिकार बराबर हैं , भारत में अल्पसंख्यक मुसलमानों की बराबरी की बात करने वाले लोगों को सिक्युलर और शेखुलर कह कर चिढाया जाता है इसी तरह पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं के बराबर अधिकार की बात करने वाले मुस्लिम लोगों को पाकिस्तान के कट्टरपन्थी लोग गाली देते हैं .
क्रमशः...

Thursday, November 12, 2015

आदिवासियों के पास अपना जीवन और सम्मान बचाने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा है

सुहाना दिन था सुबह के ग्यारह बजे थे .
दिल्ली के कनाट प्लेस में लडकियां घूम रही थीं . महिलायें शॉपिंग कर रही थीं . लोग अपने अपने काम में व्यस्त थे .
तभी सिपाहियों से भरी हुई एक ट्रक वहाँ पर आयी . उसमें से भारतीय अर्धसैनिक बल के सिपाही बाहर निकले .
सिपाही लड़कियों और औरतों पर टूट पड़े . चालीस औरतों के कपड़े फाड़ कर उन्हें निवस्त्र कर दिया . चारों तरफ भगदड़ मच गयी .
भारतीय सिपाही महिलाओं को पकड़ कर बलात्कार करने लगे . चौदह साल की एक स्कूली छात्रा सिपाहियों को देख कर एक बिजली के खम्बे के पीछे छिप गयी
कुछ सिपाहियों ने उस लड़की को देख लिया . सिपाहियों ने स्कूली छात्रा को बाहर निकाला और उसके कपड़े फाड़ दिए . सिपाहीयों नें बारी बारी से उस लड़की के साथ बलात्कार किया .
एक महिला नें सिपाहियों के सामने हाथ जोड़े और खुद के साथ बलात्कार ना करने के लिए प्रार्थना करी . उस महिला नें कहा कि मेरा छोटा बच्चा है . मुझे छोड़ दो . इस पर सिपाहियों ने उस महिला के स्तनों को निचोड़ कर दूध निकाला और तस्दीक करी कि यह सच बोल रही है कि नहीं .
इस घटना के दस दिन बीत जाने के बाद भी सरकार ने इस बारे में कोई कदम नहीं उठाया . कुछ महिला संगठनों नें इस घटना के बारे में जांच करी .
महिला संगठनों के शोर मचाने के बाद सरकार नें अज्ञात सिपाहियों के नाम एक रिपोर्ट दर्ज़ कर ली .
आज दस दिन बीत जाने के बाद भी एक भी सिपाही को गिरफ्तार नहीं किया गया है .
ऊपर का विवरण पढ़ कर आप घबरा गए . लेकिन सच में ऐसा ही हुआ है . फर्क सिर्फ इतना है कि यह घटना दिल्ली के कनाट प्लेस में नहीं हुई बल्कि छत्तीसगढ़ के बीजापुर के पेद्दा गेलूर गाँव में हुई है .
बाकी का विवरण पूरी तरह वही है . हाँ वह महिलायें शॉपिंग नहीं कर रही थीं . वह खेतों में काम कर रही थीं . लड़की स्कूली छात्रा नहीं थी बल्कि वह गाय चारा रही थी . और वह बिजली के खम्बे के पीछे नहीं एक महुआ के पेड़ के पीछे छिपी थी .
क्या कनाट प्लेस में हुआ बलात्कार गंभीर है और छत्तीसगढ़ में हुआ बलात्कार समान्य बात है ?
अगर दिल्ली में होने वाली कोई घटना असहनीय है तो छत्तीसगढ़ में वही घटना होने पर हम चुप क्यों हो जाते हैं ?
भारत का संविधान कहता है . भारत के नागरिकों के बीच धर्म , जाति , लिंग , आर्थिक स्थिति , जन्म के स्थान के आधार पर कोई भेद भाव नहीं किया जायेगा .
लेकिन दिल पर हाथ रख कर कहिये कि अगर दिल्ली में सचमुच सिपाहियों द्वारा दिल्ली की पढ़ी लिखी महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार की ऐसी घटना हो जाए तो क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसे ही चुपचाप बैठा रहेगा ?
फिर छत्तीसगढ़ की घटना पर कोर्ट चुप क्यों है ?
अगर आप पर कोई हमला करे तो आप पुलिस के पास जाते हैं . लेकिन अगर पुलिस ही आप पर हमला कर दे तो आप कहाँ जायेंगे ?
आप कहेंगे कोर्ट जायेंगे . कोर्ट भी नहीं सुनेगा तो कहाँ जायेंगे ?
सरकार को अमीर कंपनियों के लिए आदिवासियों की ज़मीनें चाहियें .
इस लिए आदिवासियों के जीवन और सम्मान पर सरकार की पुलिस रोज़ हमला कर रही है .
छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार नें आदिवासियों के पास अपना जीवन और सम्मान बचाने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा है .
ऐसे में आदिवासी क्या करे आप ही बताइये ?
अगर आपने इन प्रश्नों से मुंह चुराया तो इस समाज को मरने से कोई नहीं बचा सकता .
आज ही इसके बारे में कुछ फैसला करना पड़ेगा .

Tuesday, August 18, 2015

लक्खे के सपनों की मौत

लक्खे एक आदिवासी लड़की है

लक्खे छत्तीसगढ़ के एड्समेट्टा गाँव मे रहती थी

लक्खे की तेरह साल की उम्र मे लखमा से शादी हुई

पुलिस वाले इनाम और के लालच मे आदिवासियों को जेल मे डालते रहते हैं

लक्खे जंगल मे लकडियाँ लेने गयी थी

पुलिस पार्टी उधर से गुज़र रही थी

पुलिस वाले लक्खे को पकड़ कर थाने ले गए

लक्खे को थाने मे बहुत बुरी तरह मारा

उसके बाद लक्खे को जेल मे डाल दिया गया

लक्खे पर पुलिस ने नक्सलवादी होने के चार फर्ज़ी मामले बनाए

तीन मामलों मे लक्खे को अदालत ने निर्दोष घोषित कर के बरी कर दिया है

लेकिन इस सब मे दस साल गुज़र गए

लक्खे अभी भी जगदलपुर जेल मे बंद है

शुरू के कुछ साल तक तो लक्खे को उम्मीद थी

कि मैं जेल से जल्द ही निकल कर घर चली जाऊंगी

जेल मे आने के चार साल तक लक्खे का पति जेल मे लक्खे से मिलने आता रहा

लेकिन चार साल बाद लक्खे ने अपने पति लखमा से जेल की सलाखों के पीछे से कहा

लखमा अब शायद मैं कभी भी बाहर ना निकल सकूं

जा तू किसी दूसरी लड़की से शादी कर ले

जेल से अपने पति के वापिस जाने के बाद

उस रात लक्खे बहुत रोई

सोनी सोरी भी तब जेल मे ही थी

लक्खे का रोना सुन कर

जेल मे दूसरी महिलाओं को लगा शायद लक्खे के परिवार मे किसी की मौत हो गयी है

इसलिए लक्खे रो रही है

लेकिन असल मे उस रात लक्खे के सपनों और उम्मीदों की मौत हुई थी

लक्खे अभी भी जगदलपुर जेल मे है

पूरी उम्मीद है लक्खे आख़िरी मुकदमे मे भी बरी हो जायेगी

लेकिन लक्खे के जीवन के इतने साल कौन वापिस देगा ?

लक्खे के सपनों की मौत भारत के लोकतंत्र की मौत नहीं है क्या ?

Sunday, August 9, 2015

आज दो दिवस हैं


आज दो दिवस हैं
पहला भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू होने का अगस्त क्रांति दिवस
दूसरा विश्व आदिवासी दिवस
मेरा दोनों के साथ कुछ करीब का सा रिश्ता है
भारत छोड़ो आन्दोलन में मेरे पिता ने मुज़फ्फर नगर रेलवे स्टेशन में आग लगा दी थी
और फिर पुलिस की दबिश घर पर पड़ने के बाद फरार हो गए थे
बाद में गांधी जी ने मेरे पिताजी को अपने आश्रम में बुला लिया था
पिताजी ने उसके बाद सारा जीवन ग्राम स्वराज्य के लिए लगाया ,
दूसरा आज विश्व आदिवासी दिवस है
मैं और मेरी पत्नी शादी के एक महीने बाद दिल्ली छोड़ कर बस्तर चले गए थे
हम अट्ठारह साल आदिवासियों के साथ रहे
फिर सरकार ने आदिवासियों की ज़मीन उद्योगपतियों को देने के लिए
आदिवासियों के गाँव जलाने शुरू किये
तब हमने सरकार के इस कदम का विरोध किया
तो सरकार ने हमारे आश्रम पर बुलडोजर चला दिया
अब मेरे छत्तीसगढ़ में प्रवेश पर बंदिश है
सुना है वहाँ मेरे ऊपर करीब एक सौ के करीब नक्सली मामलों के वारंट हैं
मैं बस्तर में आदिवासियों पर होने वाले ज़ुल्मों के खिलाफ़ हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमे लड़ रहा हूँ
लेकिन वहाँ अब सुनवाइयां भी होनी बंद सी हो चुकी हैं
मैं इन मामलों पर बात करने संयुक्त राष्ट्र संघ भी गया
वहाँ उन्होंने कहा कि भारत सरकार किसी को भी आदिवासी नहीं मानती
भारत सरकार इन्हें कबीलाई मानती है .
दो शब्द हैं इंडीजनस और ट्राइबल
इंडीजनस का अर्थ है
मूल निवासी
ट्राइबल का अर्थ है किसी कबीले का सदस्य ,
भारत सरकार ने भारत के आदिवासियों के लिए इंडीजनस शब्द का इस्तेमाल जान बूझ कर नहीं किया
भारत सरकार आदिवासियों को आदिवासी मानती ही नहीं है
संविधान में ऐसा ही लिखा है

विश्व आदिवासी दिवस

विश्व आदिवासी दिवस की बधाई
आज विश्व आदिवासी दिवस पर आप मान लीजिए
कि भारत के ऋषि मुनी ही भारत के सबसे पुराने निवासी हैं
मान लीजिए कि वेद तब ही आ चुके थे जब मनुष्य का जन्म भी नहीं हुआ था
मान लीजिए वेद ईश्वर द्वारा रचित हैं
मान लीजिए कि प्राचीन भारत में ऋषी मुनी जब तप करते थे
तो आदिवासियों के पूर्वज उनके लिए जंगल से कंद मूल फल लाने का काम करते थे
मान लीजिए कि आपके पूर्वज राजा के नाव पार करते समय राजा के पाँव धो कर पीते थे
आप नहीं मानेगे ?
कोई बात नहीं आपकी आने वाली संतानें मानेगी
वो इतिहास लिखने वाली संस्थाओं में अपने लोगों को बिठा रहे हैं
वो यही इतिहास लिख देंगे
आपका बच्चा स्कूल कालेज में उनका लिखा हुआ इतिहास पढ़ेगा
वो ऐसी फ़िल्में बनायेगे जिसमे यही दिखाया जायेगा कि
आपके पूर्वज जंगली थे
और आर्यों ने आपको सभ्यता सिखाई
उन्होंने फिल्म बनाने वाली और फिल्मों को सेंसर प्रमाण पत्र देने वाली संस्थाओं में भी अपने लोगों को बैठा दिया है
हर साल वो आपकी बेईज्ज़ती करते हैं
ताड़ी पीने वाले असुर यानी
ताड़कासुर को सार्वजनिक रूप से मारते हैं
वो नाटक नहीं करते
आपके मन में उनकी संस्कृति
के लिए इज्ज़त
और आपकी अपनी संस्कृति
के लिए अपमान और हीन भाव
भरने का काम करते हैं
आने वाले समय में आपका बच्चा यह कहने में शर्मायेगा
कि वो इन जंगली लोगों के परिवार का सदस्य है
वो कहेगा कि नहीं मैं भी
आर्य राजा
राम का वंशज हूँ
ताड़ी पीने वाले असुरों
यानी ताड़कासुर का वंशज नहीं
वो आपको ट्राइबल यानि
कबीले वाला कहेंगे
लेकिन वो आपको इंडीजनस यानी मूल निवासी
कभी नहीं कहेंगे
वो संविधान में व्यवस्था करके
रखे हुए हैं कि
आप कभी खुद को
मूल निवासी ना कह सकें
भारत का इतिहास बदलने का काम जारी है

Saturday, August 1, 2015

राष्ट्रवाद

सोशल मीडिया पर भारतीय नागरिक इस समय दो खेमे में बंटे हुए दिखाई दे रहे हैं .
एक तरफ वो हैं जो याकूब की फांसी के विरोध में हैं
और दूसरे जो याकूब की फांसी के समर्थन में हैं .
जो याकूब की फांसी के समर्थन में हैं उनमे भी दो तरह के लोग हैं.
पहले वो लोग हैं जो कहते हैं कि याकूब को जो फांसी हुई है वह कोई साम्प्रदायिक निर्णय नहीं है
उनका कहना है की इसलिए इस फांसी को लेकर जो लोग हल्ला मचा रहे हैं वह गलत कर रहे हैं और साम्प्रदायिक आधार पर भारतीय न्याय व्यवस्था पर हमला कर रहे हैं .
फांसी के समर्थन में दूसरा तबका मोदी भक्त वर्ग का है जो इस फांसी के बहाने फिर से मुसलमानों को नीचा दिखाने की कोशिश में लगा हुआ है.
ये लोग अभद्र और भड़काऊ भाषा और जुमले इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि मुसलमानों को चिढ़ा सकें .
ये लोग हल्ला मचा रहे हैं कि जो भी फांसी का विरोध कर रहे हैं, वह सभी लोग आतंकवादियों के समर्थक हैं.
इसी तरह फांसी के विरोध में भी दो तरह के लोग हैं.
पहले वो लोग हैं जो किसी को भी फांसी देने के खिलाफ़ हैं.
ये लोग पहले से ही किसी भी मौत की सज़ा के खिलाफ़ लिखते रहे हैं.
लेकिन जब ये किसी भी मौत की सज़ा के खिलाफ़ लिखते हैं तो इन्हें भक्त जन तुरंत आतंकवादियों के एजेंट घोषित कर देते हैं .
फांसी के खिलाफ़ दूसरी तरह के जो लोग हैं जो मानते हैं कि याकूब को मुसलमान होने के कारण फांसी दी गयी है इसलिए हम इस बात का विरोध कर रहे हैं .
इनमे भी दो तरह के लोग हैं पहले वो लोग हैं, जो भारत में साम्प्रदायिक राजनीति, लोकतंत्र के नाम पर बहुसंख्यवाद, हिंदुत्व के नाम पर भारतीय जनता का साम्प्रदायिकरण और संघ कुनबे द्वारा जानबूझ कर मुसलमानों को नीचा दिखाने के विरोध में हैं .
फांसी का विरोध करने वाले बहुत सारे मुस्लिम भी हैं जो इस फांसी को मुसलमानों को डराने के कदम के रूप में देख रहे हैं .
ये लोग जो प्रतिक्रिया कर रहे हैं उसका आधार बस यही है कि अगर वह मुसलमान ना होता तो उसे फांसी ना होती और यह कदम मुसलमानों को डराने के लिए लिया गया है इसलिए हम इसके विरोध में हैं .
याकूब की फांसी के बाद मुसलमानों के मन में डर और गुस्सा बिलकुल स्वाभाविक बात है.
डर को ठीक से समझना ज़रूरी है.
डर याकूब के लिए नहीं है. याकूब तो मर गया उसके लिए अब क्या डर?
मुसलमानों का डर तो उनके खुद अपने लिए है.
मुसलमान डर कर सोच रहे हैं की क्या मुसलमान होने के कारण हमें भारत में अब डर कर रहना पड़ेगा?
इसलिए काफी सारे मुसलमान इस डर से निजात पाने के लिए इस फांसी के विरोध में आवाज़ उठा रहे हैं.
आपको खुद याद होगा कि आपने दिल्ली में दामिनी कांड के बाद किस तरह से बलात्कार के विरोध में प्रदर्शन किया था.
वह भी आपके अपने डर की ही परिणिति थी.
आप दामिनी के लिए नहीं बल्कि खुद अपनी या अपनी बहन बेटियों की सुरक्षा के लिए के लिए सड़कों पर उतरे थे.
इसी तरह भारतीय मुसलमान भी याकूब के लिए नहीं बल्कि खुद अपनी सुरक्षा के लिए आवाज़ उठा रहे हैं
और कह रहे हैं कि भारत में अगर किसी को मुसलमान होने के कारण फांसी दी जाती है तो वह गलत है .
इसलिए फांसी के विरोध में उठने वाली किसी भी तरह की आवाज़ को आतंकवादी समर्थक कहना गलत होगा .
पिछले दिनों मुझे युवा लड़के लड़कियों के एक प्रशिक्षण शिविर में बुलाया गया .
मुझे राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता पर बोलने के लिए कहा गया.
मैंने वहाँ मौजूद ग्रामीण शिक्षित युवाओं से पूछा कि बताइये कि दुनिया का सबसे अच्छा राष्ट्र कौन सा है ?
सबने एक स्वर में कहा कि भारत .
मैंने अगला सवाल पूछा कि अच्छा बताओ कि सबसे अच्छा धर्म कौन सा है ?
सबने कहा हिंदू धर्म,
मैंने पूछा कि अच्छा बताओ सबसे अच्छी भाषा कौन सी है ?
कुछ ने जवाब दिया की हिन्दी, कुछ युवाओं ने जवाब दिया कि संस्कृत सर्वश्रेष्ठ भाषा है .
मैंने उन युवाओं से अच्छा अब बताओ कि दुनिया का सबसे बुरा देश कौन सा है ?
सारे युवाओं ने कहा की पाकिस्तान,
मैंने पूछा सबसे बेकार धर्म कौन सा है ?
उन्होंने कहा इस्लाम ?
मैंने इन युवाओं से पूछा कि क्या उन्होंने जन्म लेने के लिए अपने माँ बाप का खुद चुने थे ?
सबने कहा नहीं .
मैंने पूछा कि क्या आपने जन्म के लिए भारत को या हिंदू धर्म को खुद चुना चुना था ?
सबने कहा नहीं .
मैंने कहा यानि आपका इस देश में या इस धर्म में या इस भाषा में जन्म महज़ एक इत्तिफाक है .
सबने कहा हाँ ये तो सच है .
मैंने अगला सवाल किया कि क्या आपका जन्म पाकिस्तान में किसी मुसलमान के घर में होता
और मैं आपसे यही वाले सवाल पूछता तो आप क्या जवाब देते ?
क्या आप तब भी हिंदू धर्म को सबसे अच्छा बताते ?
सभी युवाओं ने कहा नहीं इस्लाम को सबसे अच्छा बताते .
मैंने पूछा अगर पाकिस्तान में आपका जन्म होता और तब मैं आपसे पूछता कि सबसे अच्छा देश कौन सा है तब भी क्या आप भारत को सबसे अच्छा राष्ट्र कहते ?
सबने कहा नहीं तब तो हम पाकिस्तान को सबसे अच्छा देश कहते .
मैंने कहा इसका मतलब यह है कि हम ने जहां जन्म लिया है हम उसी धर्म और उसी देश को सबसे अच्छा मानते हैं .
लेकिन ज़रूरी नहीं है की वह असल में ही वो सबसे अच्छा हो.
सबने कहा हाँ ये तो सच है.
मैंने कहा तो अब हमारा फ़र्ज़ यह है कि हम ने जहां जन्म लिया है उस देश में और उस धर्म में जो बुराइयां हैं उन्हें खोजें और उन् बुराइयों को ठीक करने का काम करें .
सभी युवाओं ने कहा हाँ ये तो ठीक बात है .
इसके बाद मैंने उन्हें संघ द्वारा देश भर में फैलाए गए साम्प्रदायिक ज़हर और उसकी आड़ में भारत की सत्ता पर कब्ज़ा करने और फिर भारत के संसाधनों को अमीर उद्योगपतियों को सौपने की उनकी राजनीति के बारे में समझाया .
मैंने उन्हें राष्ट्रवाद के नाम पर भारत में अपने ही देशवासियों पर किये जा रहे अत्याचारों के बारे में बताया.
मैंने उन्हें आदिवासियों, पूर्वोत्तर के नागरिकों, कश्मीरियों पर किये जाने वाले हमारे अपने ही अत्याचारों के बारे में बताया.
मैंने उन्हें हिटलर द्वारा श्रेष्ठ नस्ल और राष्ट्रवाद के नाम पर किये गये लाखों कत्लों के बारे में बताया.
मैंने उन्हें यह भी बताया की किस तरह से संघ उस हत्यारे हिटलर को अपना आदर्श मानता है .
मैंने उन्हें बताया की असल में हमारी राजनीति का लक्ष्य सबको न्याय और समता हासिल करवाना होना चाहिए .
हमने भारत के संविधान की भी चर्चा करी .
इन युवाओं में काफी सारे मोदी के भक्त भी थे .
लेकिन इस प्रशिक्षण के बाद वे मेरे पास आये और उन्होंने कहा कि आज आपकी बातें सुनने के बाद हमारी आँखें खुल गयी हैं.
असल हमें इस तरह से सोचने के लिए ना तो हमारे घर में सिखाया गया था ना ही हमारे स्कूल या कालेज में इस तरह की बातें बताई गयी थीं.
मुझे लगता है की हमें युवाओं के बीच उनका दिमाग साफ़ करने का काम बड़े पैमाने पर करना चाहिए. क्योंकि उनका दिमाग खराब करने का काम भी बड़े पैमाने पर चल रहा है .

Saturday, May 2, 2015

इसे अपने मुल्क की कहानी मत समझना





ये वो समय था जब 
कंपनियों के लिए ज़मीनों पर कब्ज़े के सिलसिले में 
हज़ारों आदिवासी लडकियां बलात्कार के बाद जेलों में डाल दी गयी थीं 
आदिवासी लड़की के गुप्तांगों में पत्थर डालने का आदेश देने वाले 
एक बार फिर से फूल मालाएं पहन ढोल धमाके के साथ हुक्म देने वाली कुर्सी पर विराजमान हो गए थे . 

अमीर कंपनियों की लूट का विरोध करने वाले 
देशभक्तों को जेल में डालने और उनका क़त्ल करने के लिए उनकी सूचियाँ तैयार करने का काम 
अब सरकारी ख़ुफ़िया एजेंसियां कर रही थीं 
लोक तन्त्र का मतलब चुनाव में वोट डालना भर बताया जा रहा था 
अब चाय की पत्ती बेचने वाली टाटा नाम की एक कम्पनी नौजवानों को लोकतंत्र का असली मतलब बताती थी 
बराबरी और न्याय अब लोकतंत्र के ज़रूरी हिस्से नहीं माने जाते थे 

गाँव के ज़मीनों पर कंपनियों के गुर्गों के ज़ुल्मों की कहानियों से अब नौजवानों 
का खून नहीं खौलता था .
नौजवानों के पास बहुत ज़रूरी काम थे 
नौजवान नस्ल क्रिकेट देखती थी 
और वो उन्ही अमीरों ज़ालिम कंपनियों में नौकरियों के लिए 
बेसब्रे थे 

इसे अपने मुल्क की कहानी मत समझना 
ये कहानी तो दूर बसे किसी अफ्रीकी देश की है 

हम तो महान देश के सर्वश्रेष्ठ नागरिक हैं 



Thursday, April 2, 2015

आयता का इंतज़ार

आयता एक आदिवासी युवक है .
आयता अपने इलाके में बहुत लोकप्रिय है .
आयता छत्तीसगढ़ में रहता है .
छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासियों की ज़मीन छीनना चाहती है .
सरकार लोकप्रिय आदिवासियों से डरती है .
सरकार को लगता है कि जो लोकप्रिय आदिवासी है है वह आदिवासियों को संगठित कर सकता है
सरकार मानती है कि लोकप्रिय आदिवासी सरकार द्वारा ज़मीन छीनने का विरोध कर सकता है .
इसलिए सरकार लगातार लोकप्रिय आदिवासी नेताओं को जेलों में ठूंसने का काम करने में लगी हुई है .
इसी तरह बस्तर के आई जी कल्लूरी ने आयता को बुला कर कहा कि तुम बहुत आगे बढ़ रहे हो , तुम ज़रूर नक्सलियों से मिले हुए हो तो तुम हमारे सामने सरेंडर कर दो .
आयता ने कहा मैं तो अपनी खेती करता हूँ . और साहब मेरे खिलाफ़ पुलिस के पास कहीं कोई शिकायत है क्या ?
आई जी ने कहा बहुत बोल रहा है . तुझे एक हफ्ते का टाइम दे रहा हूँ . मेरे सामने सरेंडर कर देना .
एक हफ्ते बाद पुलिस का दल एक बोलेरो और दो मोटर साइकिलों पर सवार होकर आयता के घर उसे पकड़ने पहुँच गए .
आयता घर पर नहीं था . पुलिस ने आयता की पत्नी सुकड़ी को उठाया गाड़ी में डाला और चल दिए .
गाँव वालों ने पुलिस को आयता की पत्नी सुकड़ी का अपहरण करते हुए देख लिया .
आदिवासियों को इस घटना से अपना बहुत अपमान लगा .
अगले दिन आदिवासी जमा हुए और आदिवासियों ने सुकड़ी को छुड़ा कर लाने का फैसला किया .
पन्द्रह हज़ार आदिवासियों ने पुलिस थाने को घेर लिया .
घबरा कर पुलिस झूठ बोलने पर उतर आयी .
पुलिस ने कहा कि हमने सुकड़ी को नहीं उठाया . हो सकता है नक्सलवादियों ने सुकड़ी का अपहरण किया हो .
लेकिन आदिवासियों ने तो अपनी आँखों से पुलिस को सुकड़ी का अपहरण करते हुए देखा था .
आदिवासी थाने के सामने ही जमे रहे तीन दिन तीन रातों तक आदिवसियों ने थाने को घेरे रखा .
अब सरकार घबराने लगी .
तीसरे दिन सोनी सोरी ने जाकर प्रशासन से कहा कि अगर आज रात पुलिस ने सुकड़ी को वापिस नहीं किया तो कल से मैं और मेरे साथ आदिवासी उपवास शुरू करेंगे .
इस पत्र के दो घंटे बाद ही सरकार ने कहा कि हमें सुकड़ी मिल गयी है ,
सरकार ने झूठ बोलते हुए कहा कि उन्हें सुकड़ी एक गाँव में मिली है .
हांलाकि सुकड़ी ने बाद में बताया कि सुकड़ी को पुलिस ने थानों में और सुरक्षा बलों के कैम्पों में रखा था .
लेकिन सुकड़ी की अपहरण की रिपोर्ट पुलिस ने आज तक नहीं लिखी है .
आदिवासियों ने अपनी जीत की खुशी मनाई और सुकड़ी को निर्विरोध रूप से अपने गाँव का सरपंच चुन लिया .
पुलिस ने आदिवासियों को उनकी हिम्मत की सज़ा देने के लिए तीन दिन बाद गाँव पर हमला किया और आदिवासी बुजर्ग महिलानों तक को इतना मारा कि उनकी हड्डियां टूट गयीं .
पन्द्रह आदिवसियों को नक्सली कह कर जेल में डाल दिया .
सोनी सोरी आयता और सुकड़ी को लेकर प्रदेश की राजधानी रायपुर पहुँच गयी .
आयता और सुकड़ी ने पत्रकारों को सब कुछ बताया .
आयता सोनी सोरी के साथ छत्तीसगढ़ के डीजीपी से मिलने गए .
लेकिन डीजीपी आयता से नहीं मिले .
कुछ हफ़्तों बाद पुलिस ने एक और आदिवासी युवक को घर से उठा लिया .
फिर दस हज़ार आदिवासियों ने फिर से थाने का घेराव किया .
आदिवासियों की हिम्मत देख कर गुस्से में पुलिस और सुरक्षा बलों ने आदिवासियों पर वहशी हमला किया .
इस हमले के विरोध में आदिवासियों ने जिला मुख्यालय सुकमा तक अस्सी किलोमीटर तक पदयात्रा करने का फैसला किया .
इस बार सोनी सोरी के साथ आयता भी इस पदयात्रा में आगे आगे थे .
आदिवासी राजनैतिक नेताओं के आश्वासन के बाद सभी आदिवासी रैली स्थगित कर अपने अपने घर जा रहे थे .
गाँव के रास्ते में पुलिस ने आयता को घेर लिया और और थाने में ले आये .
पुलिस ने बयान दिया कि उन्होंने एक 'फरार नक्सली ' को पकड़ा है .
आयता को जेल में डाल दिया गया .
अब आयता जगदलपुर जेल में है .
आयता पर चार फर्ज़ी मुकदमे लगा दिए गए हैं .
आज़ादी की लड़ाई में भी जेल यात्रा से लोग आज़ादी की लड़ाई के नेता बनते थे
आज बस्तर में भी जेल से निकल कर अनेकों आदिवासी अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता बन रहे हैं .
आयता बस्तर के लोग बाहर तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं .

आयता का इंतज़ार

आयता एक आदिवासी युवक है .
आयता अपने इलाके में बहुत लोकप्रिय है .
आयता छत्तीसगढ़ में रहता है .
छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासियों की ज़मीन छीनना चाहती है .
सरकार लोकप्रिय आदिवासियों से डरती है .
सरकार को लगता है कि जो लोकप्रिय आदिवासी है है वह आदिवासियों को संगठित कर सकता है
सरकार मानती है कि लोकप्रिय आदिवासी सरकार द्वारा ज़मीन छीनने का विरोध कर सकता है .
इसलिए सरकार लगातार लोकप्रिय आदिवासी नेताओं को जेलों में ठूंसने का काम करने में लगी हुई है .
इसी तरह बस्तर के आई जी कल्लूरी ने आयता को बुला कर कहा कि तुम बहुत आगे बढ़ रहे हो , तुम ज़रूर नक्सलियों से मिले हुए हो तो तुम हमारे सामने सरेंडर कर दो .
आयता ने कहा मैं तो अपनी खेती करता हूँ . और साहब मेरे खिलाफ़ पुलिस के पास कहीं कोई शिकायत है क्या ?
आई जी ने कहा बहुत बोल रहा है . तुझे एक हफ्ते का टाइम दे रहा हूँ . मेरे सामने सरेंडर कर देना .
एक हफ्ते बाद पुलिस का दल एक बोलेरो और दो मोटर साइकिलों पर सवार होकर आयता के घर उसे पकड़ने पहुँच गए .
आयता घर पर नहीं था . पुलिस ने आयता की पत्नी सुकड़ी को उठाया गाड़ी में डाला और चल दिए .
गाँव वालों ने पुलिस को आयता की पत्नी सुकड़ी का अपहरण करते हुए देख लिया .
आदिवासियों को इस घटना से अपना बहुत अपमान लगा .
अगले दिन आदिवासी जमा हुए और आदिवासियों ने सुकड़ी को छुड़ा कर लाने का फैसला किया .
पन्द्रह हज़ार आदिवासियों ने पुलिस थाने को घेर लिया .
घबरा कर पुलिस झूठ बोलने पर उतर आयी .
पुलिस ने कहा कि हमने सुकड़ी को नहीं उठाया . हो सकता है नक्सलवादियों ने सुकड़ी का अपहरण किया हो .
लेकिन आदिवासियों ने तो अपनी आँखों से पुलिस को सुकड़ी का अपहरण करते हुए देखा था .
आदिवासी थाने के सामने ही जमे रहे तीन दिन तीन रातों तक आदिवसियों ने थाने को घेरे रखा .
अब सरकार घबराने लगी .
तीसरे दिन सोनी सोरी ने जाकर प्रशासन से कहा कि अगर आज रात पुलिस ने सुकड़ी को वापिस नहीं किया तो कल से मैं और मेरे साथ आदिवासी उपवास शुरू करेंगे .
इस पत्र के दो घंटे बाद ही सरकार ने कहा कि हमें सुकड़ी मिल गयी है ,
सरकार ने झूठ बोलते हुए कहा कि उन्हें सुकड़ी एक गाँव में मिली है .
हांलाकि सुकड़ी ने बाद में बताया कि सुकड़ी को पुलिस ने थानों में और सुरक्षा बलों के कैम्पों में रखा था .
लेकिन सुकड़ी की अपहरण की रिपोर्ट पुलिस ने आज तक नहीं लिखी है .
आदिवासियों ने अपनी जीत की खुशी मनाई और सुकड़ी को निर्विरोध रूप से अपने गाँव का सरपंच चुन लिया .
पुलिस ने आदिवासियों को उनकी हिम्मत की सज़ा देने के लिए तीन दिन बाद गाँव पर हमला किया और आदिवासी बुजर्ग महिलानों तक को इतना मारा कि उनकी हड्डियां टूट गयीं .
पन्द्रह आदिवसियों को नक्सली कह कर जेल में डाल दिया .
सोनी सोरी आयता और सुकड़ी को लेकर प्रदेश की राजधानी रायपुर पहुँच गयी .
आयता और सुकड़ी ने पत्रकारों को सब कुछ बताया .
आयता सोनी सोरी के साथ छत्तीसगढ़ के डीजीपी से मिलने गए .
लेकिन डीजीपी आयता से नहीं मिले .
कुछ हफ़्तों बाद पुलिस ने एक और आदिवासी युवक को घर से उठा लिया .
फिर दस हज़ार आदिवासियों ने फिर से थाने का घेराव किया .
आदिवासियों की हिम्मत देख कर गुस्से में पुलिस और सुरक्षा बलों ने आदिवासियों पर वहशी हमला किया .
इस हमले के विरोध में आदिवासियों ने जिला मुख्यालय सुकमा तक अस्सी किलोमीटर तक पदयात्रा करने का फैसला किया .
इस बार सोनी सोरी के साथ आयता भी इस पदयात्रा में आगे आगे थे .
आदिवासी राजनैतिक नेताओं के आश्वासन के बाद सभी आदिवासी रैली स्थगित कर अपने अपने घर जा रहे थे .
गाँव के रास्ते में पुलिस ने आयता को घेर लिया और और थाने में ले आये .
पुलिस ने बयान दिया कि उन्होंने एक 'फरार नक्सली ' को पकड़ा है .
आयता को जेल में डाल दिया गया .
अब आयता जगदलपुर जेल में है .
आयता पर चार फर्ज़ी मुकदमे लगा दिए गए हैं .
आज़ादी की लड़ाई में भी जेल यात्रा से लोग आज़ादी की लड़ाई के नेता बनते थे
आज बस्तर में भी जेल से निकल कर अनेकों आदिवासी अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता बन रहे हैं .
आयता बस्तर के लोग बाहर तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं