Monday, August 25, 2014

शुभ्रदीप चक्रबर्ती




थोड़ी देर पहले शुभ्रदीप चक्रबर्ती के न रहने की खबर मिली. विश्वास करने में कुछ समय लगा .
अभी कुछ ही दिन पहले ही तो फोन पर शुभ्रदीप से लंबी बात हुई थी .
शुभ्रदीप की मौत ब्रेन हेमरेज से हुई . शुभ्रदीप से जब मेरी आखिरी बार बात हुई वो कुछ परेशान था .
अभी हाल ही में शुभ्रदीप और उसकी पत्नी मीरा ने बहुत मेहनत से मुज़फ्फर नगर के दंगों पर एक फिल्म ' इन दिनों मुज़फ्फर नगर ' बनायी थी .
इस फिल्म को सेंसर बोर्ड के प्रमाणपत्र के लिए शुभ्रदीप और मीरा ने फिल्म को सेंसर बोर्ड में जमा किया .
लेकिन सेंसर बोर्ड का भी अब मोदी करण हो गया है .
शुभ्रदीप और मीरा की फिल्म को सेंसर बोर्ड ने प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया .
शुभ्रदीप और मीरा ने इस फिल्म पर अपनी सारी जमा पूंजी लगा दी थी .
मैंने फिल्म देखी है . फिल्म बहुत ही असरदार है और भाजपा के साम्प्रदायिक मुखौटे को उतार सकती थी .
इस घटना के बाद से शुभ्रदीप कुछ परेशान सा था .
अभी मीरा से फोन पर बात हुई मीरा का कहना था कि कुछ समय से वो सर दर्द होने की बात कहते थे और सर दर्द की दवा खा लेते थे .
और आज अचानक यह हादसा हो गया .
जहां तक शुभ्रदीप का सवाल था .
शुभ्रदीप दिल से साम्प्रदायिकता के खिलाफ़ था .
शुभ्रदीप से मेरी पहली मुलाकात जयपुर में पीयूसीएल के सम्मलेन में हुई थी .
वहाँ शुभ्रदीप ने अपनी एक फिल्म दिखाई थी जिसमे निर्दोष मुस्लिम लड़कों को आतंकवादी कह कर जेलों में डाल दिया गया और बाद में वो सब निर्दोष पाए गए थे ,
उस फिल्म में शुभ्रदीप ने उन नौजवानों की जिंदगी तबाह होने की कहानियों का चित्रण किया था .
उसके बाद मुज़फ्फर नगर दंगों के बाद शुभ्रदीप और मीरा ने इन दंगों पर फिल्म बनाने के फैसला किया .
मीरा, शुभ्रदीप और मैं हफ़्तों तक पीड़ित मुस्लिमों के शिविरों में गाँव में जा कर उनसे मिलते रहे और फिल्म की शूटिंग करते रहे .
फिल्म बनी लेकिन उसे दिखाने से रोक दिया गया .
मीरा और शुभ्रदीप द्वारका में हमारे घर से कुछ दूर ही रहते थे .
अक्सर वे दोनों शाम को समोसे लेकर हमारे घर आ जाते थे और कहते थे कि चलो आज शाम की चाय इकट्ठे ही पीते हैं .
मेरी दोनों बेटियों को मीरा और शुभ्रदीप बहुत लाड़ करते थे .
अभी दिल्ली छोड़ कर जब हमारा परिवार हिमाचल आने लगा तो मीरा और शुभ्रदीप ने हम सब को घर पर साथ में शाम को बुलाया .
शुभ्रदीप और मीरा ने दोनों बेटियों को अपने किताबों के संग्रह में से अनेकों किताबों का उपहार दिया .
आज जब दोनों बेटियों को मैंने यह खबर सुनाई तो दोनों बहुत देर तक विश्वास ही नहीं कर सकीं कि मैं यह क्या कह रहा हूँ .
मीरा से मेरी पत्नी वीणा की अभी कुछ देर पहले बात हुई, मीरा कह रही थी कि देखिये भाभी एक पल में जिंदगी कैसे बदल गयी .
आज की शाम उदासी से भरी हुई है .
लेकिन शुभ्रदीप ने अपने छोटे से जीवन में जो किया है वह बहुत महत्वपूर्ण रहेगा .
हमेशा .
अलविदा दोस्त .


भारत का इतिहास एक कैसे हो सकता है ?

भारत का इतिहास एक कैसे हो सकता है ?

भारत के तो कई इतिहास होंगे .

राजाओं का एक इतिहास होगा 
उनके दासों का दूसरा इतिहास होगा 
.
महाजनों का एक इतिहास होगा .
मजदूरों का दूसरा इतिहास होगा .

एक ब्राह्मणों का इतिहास होगा .
दूसरा शूद्रों का इतिहास होगा .

आप जो कह देते हैं न कि ये भारतीय इतिहास है
और आप बस उसमे राजाओं की और ब्राह्मणों के लिखे ग्रंथों जैसे वेद या गीता
की ही बात कर के इतिहास पर पूरी बातचीत ही खतम कर देते हैं

ये एक ही इतिहास में सब को लपेटना असल में आपकी एक चालाक हरकत है

इसी तरह भारत की कोई एक परम्परा भी नहीं है
आप जो कहते हैं न कि यह हमारी भारतीय परम्परा है

ऐसी कोई एक परम्परा होती ही नहीं है

भारत में लाखों समुदायों की अपनी अपनी अलग परम्पराएं हैं

राजाओं और ब्राह्मणों की परम्परा को
भारतीय परम्परा मान लेने का मतलब है

भारत की आदिवासियों
मेहनतकश जातियों
किसानों की परम्पराओं को मिटा देना

और उन्हें आज भी महत्वहीन कर देना

ताकि वे आज की राजनीति और आज की नई आर्थिक
प्रक्रिया में शामिल न होने पायें .

इसलिए जब ये संघी
भारतीय परम्परा
भारतीय इतिहास
और भारतीय संस्कृति की
बड़ी बड़ी बातें बनाएँ
तो इनसे पूछना
कि आप किस भारत की बात कर रहे हैं
लूटेरे राजाओं और ब्राह्मणों के भारत की संस्कृति की

या
मेहनतकश आम आदमी के इतिहास और उस मेहनतकश की संस्कृति की ?

हमारे समय की महिलायें



मणिपुर में इरोम शर्मिला को फिर से गिरफ्तार कर लिया गया है . उन्हें रिहा करने का अदालत का फैसला सरकार ने नहीं माना . 

उड़ीसा में आरती मांझी जिसे पुलिस ने गिरफ्तार करके थाने में सामूहिक बलात्कार किया था और उस लड़की पर नक्सलवादी होने के पांच फर्ज़ी केस लगा दिए थे .

वो लड़की आरती मांझी सभी मामलों में निर्दोष पायी गयी है और उसने पुलिस वालों पर बलात्कार का जो केस किया था उस पर कोई सुनवाई नहीं करी जा रही है .

झारखंड में आदिवासी महिला और पत्रकार दयामनी बरला जेल से निकल आयी हैं लेकिन अभी भी उनके ऊपर कई फर्ज़ी मुकदमे लगे हुए हैं और उन्हें लगातार अदालत में हाज़िर होना पड़ता है .

आदिवासी महिला कार्यकर्ता अपर्णा मरांडी भी जेल से ज़मानत पर रिहा हैं परन्तु उन्हें भी अदालत के चक्कर काटने पड़ रहे हैं .

महाराष्ट्र में समानता के गीत गाने वाली दलितों के अधिकारों के लिए काम करने वाली शीतल साठे को भी जेल में डाल दिया गया .

अब वो ज़मानत पर जेल से बाहर हैं लेकिन उन्हें भी अदालत के चक्कर काटने पड रहे हैं

छत्तीसगढ़ में किसी भी पत्रकार के सोनी सोरी के पास पहुँचते ही दंतेवाड़ा में वहाँ की पुलिस सिपाहियों से भरी जीपें पुलिस सोनी के घर पर खड़ी कर देती है . ताकि सोनी डर जाए और पत्रकारों को लेकर किसी पीड़ित आदिवासी से मिलने न ले जा सके .

सोनी को हर हफ्ते थाने में अपनी हाजिरी लगानी पड़ती है .

सोनी ने अपने साथ हुई प्रतारणा का जो केस उस बदमाश अधिकारी पर लगाया था , पिछले दो साल से उस पर कोई सुनवाई नहीं हुई है

याद रखिये इन सभी महिलाओं को सरकार ने जेल में डाला है .

यह भी याद रखिये कि इन सभी महिलाओं को समाज में फैले अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने के कारण सरकार ने जेल में डाला है .

और यह भी याद रखिये कि ये महिलायें दूसरों के दुःख से पीड़ित होने वाली संघर्षशील महिलायें हैं

आज़ादी के बाद आखिर इस देश की आदिवासी, दलित और दूरस्थ इलाकों की महिलायें सरकार द्वारा भारतीय राज्य के लिए इतना बड़ा खतरा क्यों मानी जा रही हैं ?

क्या इसमें इन महिलाओं की कोई गलती है ?

आखिर क्यों आज़ादी मिलते ही ये बड़ी जाति के लोग ही राष्ट्रभक्त माने जाने लगे हैं ?

और कैसे इन बड़ी जाति के अमीर संभ्रात लोगों ने इस देश की आदिवसियों , दलितों अल्पसंख्यकों की बहुत बड़ी आबादी को भारत के लिए खतरा घोषित कर दिया है ?

कैसे भारत की सारी राजनैतिक ,आर्थिक और फौजी ताकत इन बड़ी जाति के अमीर पुरुषों के हाथ में आ गई है.

कैसे यह बड़ी जाति के अमीर पुरुष भारत की सरकारी बंदूकों के दम पर भारत के खनिजों , जंगलों , सागर तटों पर कब्ज़ा करके और भी दौलत इकठ्ठा करते जा रहे हैं .

इसके नतीजे में कैसे आदिवासी , गाँव के लोग , दलित और भी गरीब और भी बेआवाज़ और गरीब बनाये जा रहे हैं .

आपके द्वारा इसे समझना ही भारत की असली आज़ादी का रास्ता खोलेगा .

वरना आपकी आर्थिक ,राजनैतिक और सामाजिक आज़ादी पूंजीपतियों , और उनके सेवकों के पैरों तले कुचली जाती रहेगी .

अगर आपने यही मान लिया है कि आपके लिए इस देश का नागरिक होने का हासिल बस इतना ही है कि आप को सरकार या पूंजीपति की फैक्ट्री या आफिस में बस एक नौकरी मिल जाए .

तो आने वाली पीढियां आप को कभी सम्मान से याद नहीं करेंगी .

नागरिक होने का फ़र्ज़ निभाइए . इस सब पर कम से कम सवाल तो उठाइये .

Saturday, August 23, 2014

नारायण चौहान

उजड़े हुए जंगलों को फिर से हरा भरा करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार को सैंकडों करोड़ रूपये दिए गए .

छत्तीसगढ़ सरकार के नेताओं और अधिकारियों ने उस पैसे से सैंकडों सालों से अपने गाँव बसा कर रहने वाले आदिवासियों को उजाड़ा और 

सरकार ने नए जंगल काटे और उन आदिवासियों को वहाँ ला कर पटक दिया .

नए गाँव में न फसल होती है , घर गिर गए हैं ,न स्कूल न अस्पताल ,न रिश्तेदार , जिंदगी मुश्किल है

सरकार ने जंगल लगाने के लिए मिले पैसों से कारें खरीदी

बंगले बनवाए

जबकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाये गए नियमों में इन सब के लिए मनाही थी

इस पर महालेखाकार ने अपनी आपत्तियां भी उठाई

पर उसकी परवाह किसे है

रमन सिंह फिर चुनाव जीत गये है

और उनके गुरु मोदी अब प्रधान मंत्री है

नारायण चौहान साहब ने छत्तीसगढ़ के भयानक माहौल में रहते हुए भी सच की लड़ाई जारी रखी है .

नारायण चौहान साहब ने इस सब के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में सरकार के खिलाफ़ मुकदमा दायर कर दिया है .

नारायण चौहान साहब के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुके हैं .

वो कहीं छुपे हुए हैं .

राष्ट्र निर्माण जारी है


http://tehelkahindi.com/campa-funds-scam/

अरुण जेटली

अगर कोई नागरिक किसी को आत्म रक्षा करते हुए मार दे तो उसे सज़ा नहीं होगी.
इसी कानून के तहत पुलिस वाला भी आत्मरक्षा में किसी को मार दे तो उसे कोई सज़ा नहीं होती .
लेकिन कोई नागरिक जब किसी को आत्म रक्षा करते हुए मार डालता है तो इस बात का फैसला अदालत का जज करता है कि यह हत्या आत्म रक्षा के उद्देश्य से हुई थी या कहीं यह इरादतन हत्या तो नहीं थी ?
पुलिस को इस तरह के हर मामले को अदालत में ले जाना ही पड़ता है .
हत्या करने वाले व्यक्ति को अदालत ही निर्दोष घोषित कर सकती है पुलिस नहीं .
लेकिन इसी कानून के अंतर्गत जब पुलिस किसी नागरिक को जान से मार डालती है तो पुलिस खुद ही जज बन बैठती है .
पुलिस हत्या करने वाले अपने पुलिसवाले को आरोपी नहीं बनाती.
पुलिस मरने वाले नागरिक को ही आरोपी बना देती है .
फिर पुलिस कहती है ,
कि आरोपी तो मर गया.
इस लिए मामला खतम.
एक बार आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट ने एक फैसला दिया ,
कोर्ट ने कहा कि
जब पुलिस और नागरिक के अधिकार बराबर हैं तो पुलिस वाले द्वारा किसी भी नागरिक की हत्या के मामले में पुलिस खुद ही कैसे जज बन जाती है ?
कोर्ट ने फैसला दिया कि अब से पुलिस अगर किसी भी नागरिक को मारेगी तो उसे हत्या का मामला माना जाएगा .
और उस मामले को पुलिस बंद नहीं कर सकेगी
बल्कि उस मामले को अदालत में पेश किया जायेगा .
सिर्फ जज ही मुकदमा चलाने के बाद उस मामले को बंद करने का आदेश दे सकेगा .
अब आपको तो पता ही है पुलिस की गोली से सबसे ज़्यादा कौन लोग मरते हैं ?
सबसे ज़्यादा मरते हैं अपनी ज़मीन बचाने की कोशिश करने वाले आदिवासी .
अपनी झुग्गी झोंपड़ी बचाने की कोशिश करने वाले गरीब .
बराबरी की मांग करने वाले दलित .
अपने अपने अधिकार मांगने वाले मजदूर
और क्या आपको पता है कि पुलिस को इन्हें मार डालने का हुकुम देने वाले कौन लोग हैं ?
आदेश देना वाले होते हैं अमीर व्यपारी, उद्योगपति और विदेशी कंपनियों के एजेंट.
तो जैसे ही आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला आया .
पूंजीपति हडबड़ा गए .कि अब हमारे लिए आदिवासियों दलितों और मजदूरों पर गोली कौन चलाएगा ?
ऐसे तो हमारा मुनाफा कमाना मुश्किल हो जाएगा .
हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ़ इन अमीरों का गुलाम एक वकील इस शानदार आदेश को लागू होने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में खड़ा हो गया .
और सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ़ मुकदमा कर दिया कि माई बाप इससे तो पुलिस का मनोबल गिर जाएगा .
उस फैसले पर आज तक अमल नहीं होने दिया गया .
आप जानना चाहेंगे कि पूंजीपतियों का वो गुलाम वकील कौन था ?
उस वकील का नाम अरुण जेटली था .
विदेशी कंपनियों का वो एजेंट वकील आज भारत का रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री है .
और सबसे भयानक बात यह है कि इसे भारत की जनता ने कभी भी चुना ही नहीं .
यह शख्स कभी चुनाव ही नहीं जीता .
फिर भी विदेशी कंपनियों के कहने से मोदी ने इसे भारत का वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री बना दिया है
मतलब अब वित्त मंत्री बन कर विदेशी कंपनियों के लिए , भारत के विकास के नाम पर आदिवासियों की ज़मीन छीनो ,
और आदिवासी इसका विरोध करें तो आदिवासियों के खिलाफ़ भारत की सेना का इस्तेमाल करो और बंदूक के बल पर भारत की संपदा को लूटो और अमीरों और विदेशियों को सौंप दो.
पहले दस साल एक बिना चुनाव जीता हुआ प्रधानमंत्री भारत के सर पर बिठा दिया गया था ,
मनमोहन सिंह भी कभी चुनाव नहीं जीते थे .
अब एक बिना चुना वित्त और रक्षा मंत्री हमारे ऊपर बैठा दिया गया है .
विश्व बैंक और बहुराष्ट्रीय कंपनियां जिसे चाहती हैं वह भारत का वित्त मंत्री बनता है .
चाहे वह चुनाव जीते या न जीते .
यह सहन करने वाले हालात नहीं हैं ,
इस सब को चुनौती देनी ही पड़ेगी .

Friday, August 15, 2014

कम मेक इन इंडिया

आपने कहा कि कम मेक इन इंडिया
विदेशी कंपनियों आओ अपना माल भारत में बनाओ
यह काम तो अमीर देशों की कंपनियां दसियों सालों से कर रही हैं
यह मुनाफाखोर कंपनियां उन्ही देशों में अपने कारखाने खोलती हैं जहां उन्हें सस्ते मजदूर मिल सकें ,और पर्यावरण बिगाड़ने पर सरकारें उन्हें रोक न सकें
सब इस खेल को जानते हैं
जब यह विदेशी कंपनियां मजदूरों से बारह घंटे काम कराती हैं
तब कोई भी सरकार इन कंपनियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करती
बताइये आज तक भारत में आपने किसी विदेशी कम्पनी पर इसलिए कार्यवाही करी है कि उसने मजदूरों को कम मजदूरी दी है
नहीं आपने आज तक कोई कार्यवाही नहीं करी
आपमें दम ही नहीं है इन विदेशी कंपनियों की बदमाशियों को रोकने का और अपने देश के गरीब नागरिकों और मजदूरों की हिफाज़त का
आप पूछते हैं उदारहण दूं
उदाहरण लाखों हैं
लीजिए एक उदहारण
छत्तीसगढ़ में स्विस सीमेंट कंपनी हालिसिम सीमेंट कम्पनी के द्वारा मजदूरों को कम मजदूरी दी गयी
जबकि वहाँ का विदेशी डिरेक्टर दस करोड़ तनख्वाह लेता है
श्रम अदालत ने मजदूरों के हक में फैसला दे दिया
कम्पनी ने अदालत का फैसला मानने से मना कर दिया
मजदूर धरने पर बैठे
छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने छह मजदूर नेताओं पर डकैती का मामला बना दिया
वो भारतीय मजदूर आज भी छतीसगढ़ की जेलों में पड़े हुए हैं
ये आपकी भाजपा सरकार ने किया है प्रधानमंत्री जी
कम मेक इन इण्डिया का नारा देने से पहले अमित जेठवा को याद कर लीजिए
जिसे पर्यावरण को बचाने के लिए आवाज़ उठाने के कारण आपके ही शासन में आपकी ही पार्टी के सांसद के इशारे पर गुजरात में गोली से उड़ा दिया गया
जीरो डिफेक्ट और जीरो इफेक्ट की बातें लाल किले से ही अच्छी लगती हैं
लेकिन जब भी सोनी सोरी उस जंगल की हिफाज़त के लिए आवाज़ उठाती है तो
आपकी ही सरकार उसे थाने में ले जाकर
सोनी सोरी को बिजली के झटके देती है और उसके जिस्म में पत्थर भर देती है
बातें बहुत सुनी हैं हमने
जाइए इस देश की एक भी सोनी सोरी के हक़ में एक कदम उठा कर दिखाइए
आपमें दम ही नहीं है मोदी जी
जिस दिन आप किसी सोनी सोरी के पक्ष में आवाज़ उठाएंगे मोदी जी
उसी दिन आपके मालिक ये पूंजीपति आपको रद्दी की टोकरी में फेंक देंगे
असल में तो आपका मुखौटा लगा कर लाल किले से आप नहीं ये पूंजीपति दहाड़ रहे हैं
आप कहते हैं आप प्लानिंग कमीशन को समाप्त कर देंगे
सही है अब जब सारे भारत को लूटने की सारी प्लानिंग अम्बानी के घर में ही होनी है
तो देश को प्लानिंग कमीशन की ज़रूरत भी क्या है
आप सफाई की बातें करते हैं ?
इस देश में सफाई मजदूरों की हालात क्या हैं कभी जानने की जहमत करी है आपने ?
पूछियेगा कि गंदगी फैलाने वाले ही संघ के नेता क्यों बने और सफाई करने वाला कभी संघ का नेता क्यों नहीं बन सका ?
आपके नागपुर के संघ के ब्राह्मण नेताओं से ये भी पूछियेगा
कि भंवर मेघवंशी के घर का खाना वो क्यों नहीं खा सके और उस खाने को उन्होंने सड़क पर क्यों फेंक दिया था ?
आप सोचते हैं कि आपकी कथनी से हम बहल जायेंगे ?
नहीं इस देश की लाखों सोनी सोरियों ,आरती मांझी , भंवरी बाई के हक के लिए कदम उठाने के लिए हम लड़ते रहेंगे , जेल जाते रहेंगे ,गोली खाते रहेंगे
आप हमें आतंकवादी ,नक्सलवादी ,देशद्रोही जो मन में आये कहिये
लेकिन इतिहास बताएगा
कि असल में देशभक्त कौन था और आतंकवादी कौन ?

Wednesday, August 13, 2014

आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था

आपका जन्म एक अमीर और बड़ी ज़ात वाले के घर में हुआ
इसलिए आपको पढ़ने की सहूलियत मिली
आप को अपने जन्म की जगह की वजह से पैदाइशी राजनैतिक ताकत मिली
आपको जन्म की जगह की वजह से पैदाइशी सामाजिक रुतबा मिल गया
एक बच्चा एक गरीब छोटी ज़ात वाले के झोंपड़ी में पैदा हुआ
उसे गरीबी की वजह से काम पर जाना पड़ा
वह स्कूल में नहीं पढ़ पाता
वह मेहनत के बावजूद मजदूर ही बना रहता है
उसकी कोई राजनैतिक ताकत भी नहीं है
वह सामाजिक तौर पर भी छोटा माना जाता है
आपका जन्म अगर अमीर घर में हुआ है
तो आप अब गरीब का घर सरकारी बुलडोजर लगवा कर तोड़ सकते हैं
आप उस के घर को जब चाहे अवैध कह सकते हैं
राष्ट्र के विकास के नाम पर उसकी ज़मीन अमीर उद्योगपति छीन कर ले सकते हैं
आपका धर्म इस सब के विरुद्ध नहीं है
आपकी राजनीति इसे उचित मानती है
आपकी सभ्यता इसे सही मानती है
आपका धर्म आपकी राजनीति और और आपकी सभ्यता अमीर की तरफदारी में बनी है
इसे बनाया ही ताकतवर तबके ने है
इसलिए यह धर्म ,राजनीति और सभ्यता इस अन्याय को चुनौती देती ही नहीं हैं
आपका यह धर्म ,यह राजनैतिक व्यवस्था और सभ्यता बिलकुल अवैज्ञानिक और क्रूर है
इसलिए आपका धर्म ,राजनीति और सभ्यता हथियारों के दम पर ही टिकाया गया है
जिस दिन इस धर्म ,राजनीति और सभ्यता के पास
पुलिस और सेना की हिंसक ताकत नहीं होगी
उस दिन मेहनत करने वाला खायेगा
मेहनत करने वाला ही मकान बना पायेगा
मेहनत करने वाले की ही इज्ज़त होगी
बिना इस राजनैतिक आर्थिक और सामजिक व्यवस्था की मदद के आप बैठे ठाले
बड़े मकानों वाले
ठूंस ठूंस कर पीज़ा खा खा कर मोटे होने वाले
इज्ज़तदार अमीर बन ही नहीं सकते
इसलिए हमारी सारी बेचैनी यही है कि इस राजनैतिक
आर्थिक
और सामजिक
धार्मिक
सभ्यता
वाली व्यवस्था को कैसे बदल डालें
इस धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था के रहते
दुनिया में
न्याय
प्रेम
और शांति
आ ही नहीं सकती

Friday, August 8, 2014

भाषा

हर जगह के लोगों को अपने प्राकृतिक संसाधनों को अपनी ज़रूरतों के हिसाब से इस्तेमाल करते हुए अपनी जिंदगी बिताने का हक है .

हर जगह के लोगों खेती करने , व्यापार करने या उद्योग धंधे करने का हक भी है .

हर जगह के लोगों को अपने ये सारे काम अपनी ही ज़ुबान में करने का भी हक है .

हाँ अगर लोग चाहें तो दूसरी ज़ुबान के लोगों के साथ व्यापार की ज़रूरतों के हिसाब से दूसरी ज़ुबानें सीख सकते हैं .

पुराने व्यापारी भी कई ज़ुबानें बोलते थे .

लेकिन आप किसी देश में डंडे के जोर पर लोगों से यह नहीं कह सकते कि वो अपने मुल्क का सारा काम काज किसी सात समन्दर पार की ज़ुबान में चलायें .

अगर आप अपने मुल्क के लोगों पर इसलिए बंदूकों से गोलियाँ दागें क्योंकि वो लोग अपनी ज़ुबान में अपने देश का काम काज करने की मांग कर रहे हैं तो ये तो आपकी ज़हनी गुलामी की तरफ इशारा कर रहा है .

या फिर सात संदर पार बैठे आपके अमीर व्यापारी आपको ऐसा करने से रोक रहे हैं . क्योंकि उन अँगरेज़ व्यापारियों को डर हो सकता है कि फिर वो इस मुल्क में अपना लूट का धंधा एक दूसरी ज़ुबान में कैसे चला पायेंगे ?

मुखर्जी नगर दिल्ली में युवाओं के सत्याग्रह पर सरकार ने जिस तरह से क्रूरता पूर्वक हमला किया है वो किसी भी तर्क से समझ में नहीं आता .

भारत के लोगों को भारत की जुबानों में अपना काम काज करने देने में मोदी को क्या दिक्कत है ?

कमाल है ये लोग चुनावों से पहले तो मातृभाषा की दुहाइयां देते हैं लेकिन बाद में ठीक उसके उलट आचरण करते हैं .

इस मुद्दे पर चल रहे सत्यग्रह स्थल पर सीमा सुरक्षा बल की तैनाती हमें एक भयानक हालत की तरफ ले जा सकता है .

धरम

धरम दाढ़ी में है 
धरम चोटी में है 

धरम टोपी में है 
धरम पगड़ी में है

धरम सलवार में है 
धरम धोती में है

धरम बुरखे में है 
धरम घूंघट में है

धरम मंदिर में है
धरम मस्जिद में है

धरम नमाज़ में है
धरम पूजा में है

धरम दफनाने में है
धरम जलाने में है

धरम हलाल में है
धरम झटके में है

धरम इंसान के नाम में है

धरम प्यार में नहीं है
धरम सच जानने में नहीं है
धरम सबके साथ जुड़ने में नहीं है

धरम लड़ने में है
धरम नफ़रत में है
धरम घमंड में है
धरम मूढ़ता में है
धरम ज़हालत में है

धर्म औ मजहब जिंदाबाद
सारे सेक्युलर मुर्दाबाद

दी टैंक मैन

कल रात दी टैंक मैन फिल्म देखी .

चीन में सन नवासी में लाखों लोग मुल्क के हालात बदलने की मांगों के साथ सड़कों पर आ गये थे .

यह आन्दोलन छात्रों ने शुरू किया लेकिन इसमें डाक्टर , नर्सें , कारखानों के मजदूर , पुलिस और कुछ फौज़ी भी शामिल हो गए . वर्षों के दमन के खिलाफ जनता ने ज़ोरदार आवाज़ बुलंद कर दी .

सरकार में खलबली मच गयी . सरकार में इस स्तिथी से निबटने के लिए दो मत हो गए . सरकार का एक धड़ा आंदोलनकारियों से बातचीत करना चाहता था जबकि दूसरा हिस्सा दमन के पक्ष में था .

उदारवादी धड़े के एक नेता आंदोलनकारियों से बात करने उनके बीच गए लेकिन अगले दिन उन्हें सरकार ने गायब करवा दिया और फिर उनका कभी कुछ पता नहीं चला .

सरकार ने दमन का फैसला लिया . सेना के लाख से ज़्यादा सैनिक आंदोलनकारियों को थियानमेन चौक से खदेड़ने के लिए आ गए .

लेकिन जनता ने सैनिकों का रास्ता रोक दिया .औरतों ने रो रो कर कहा कि आप हमारे ही भाई और बेटे हैं ,आपको जनता की रक्षा के लिए सैनिक बनाया गया है . आप हमारे खिलाफ क्यों हो . कई दिनों तक जनता ने सैनिकों को भोजन और पानी दिया . सेना वापिस चली गयी .

चीन सरकार के अस्तित्व पर ही खतरा खड़ा हो गया . सरकार ने दुबारा भयानक दमन की योजना बनायी . इस बार टैंकों और ऑटोमेटिक हथियारों से लैस टुकडियां निहत्थी जनता पर हमला करने के लिए भेजी गयी .

छात्र और जनता सड़क पर बैठे हुए थे . सेना ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ दो हज़ार छह सौ लोग मार डाले गए . अगले दिन सुबह जब मारे गए छात्रों के माता पिता अपने बच्चों के बारे में पता करने के लिए वहाँ आये तो सेना ने उन लोगों पर भी गोली चलाई जिसमे लगभग चालीस लोग मारे गए . डाक्टरों और एम्बुलेंस पर भी गोली चलाई गयी . घायलों की मदद की कोशिश कर रहे डाक्टरों को भी मार डाला गया .

दमन ने काम किया चीन की साम्यवादी सरकार ने थियानमेन चौक खाली करा लिया .

अगले दिन सरकारी टैंकों के काफिले के सामने एक नौजवान आकर खड़ा हो गया . उसे पकड़ कर वहाँ से हटा लिया गया . आज तक पता नहीं चल पाया कि उस नौजवान का क्या हुआ .

इसके बाद चीनी सरकार ने मुक्त अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई . विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोल दिए .

इसके बाद चीन में शहरी माध्यम वर्ग का उदय हुआ . एक ऐसी युवा पीढ़ी सामने आयी जिसे मोबाइल, जूते ,जींस और कारों के सिवाय किसी और बात से कोई मतलब ही नहीं था .

लेकिन इसकी कीमत देश के करोड़ों किसानों और गरीबों ने चुकाई .

सरकार ने मुफ्त सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कम कर दिया . अब अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए किसानों को शहरों में पलायन करना पड़ा .

चीन में गाँव से शहरों में पलायन की दर दुनिया में सब से ज़्यादा है .

चीनी सरकार ने पूंजीपतियों और बड़ी कंपनियों के दबाव में श्रम कानूनों में पूरी तरह से छूट दे दी . अब मजदूरों से चौदह घंटे सातों दिन काम लिया जाने लगा .

जगह जगह मजदूरों के विरोध प्रदर्शन होने लगे . इन मजदूर आंदोलनों की संख्या अस्सी हज़ार साल तक पहुँच गयी .

सरकार ने मीडिया और सोशल मीडिया पर भयानक अंकुश लगाया हुआ है .

स्पेशल एकनामिक ज़ोन बनाने के लिए किसानों की ज़मीनों को हडप गया . ज़मीने छीनने के लिए गुंडे और पुलिस दोनों का इस्तेमाल किया गया . एक किसान ने एक स्मगलिंग के कैमरे से ऐसे ही एक ज़मीन अधिग्रहण की वीडियो बनाए जिससे इन सरकारी दमन के तौर तरीकों का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है .

आज भी दो चीन है . एक वो जो चमचमाता हुआ चीन है . जो शहरी है . जो विकास का हितग्राही है .जो सरकार की तरफ है .

दूसरा बड़ा चीन वो है जो गरीब है बदहाल और बेजुबान और दुनिया की नज़रों से गायब है .

सोचें कि अगर साम्यवादी देश को साम्यवादी बने रहने के लिए इतना दमन करना पड़ा तो किस मुंह से हम फासीवाद और पूंजीवाद के खिलाफ गला फाड़ सकते हैं .

सोचें कि अगर दुनिया की सारी हवा , सारा पानी , सारी ज़मीन सारे इंसानों को खुश रख सकती है तो फिर इतना दुःख क्यों है ?.

आइये विचारधारों के सम्प्रदाय से भी निकल कर सिर्फ इंसान बन कर सोचें .

Saturday, August 2, 2014

इस पर सवाल उठाइये

आप जो सोचते हैं क्या वो वाकई में आप सोचते हैं 
या आपकी परम्परा सोचती है 

आप मुस्लिम परिवार में पैदा हुए तो आप मुस्लिम की तरह सोचते हैं 
आप ईसाई परिवार में पैदा होते हैं तो ईसाई की तरह 
हिंदू परिवार में पैदा होते हैं तो हिंदू की तरह ही सोचते हैं 
तो आप नहीं सोच रहे दरअसल आप सोच की परम्परा का बस एक पुर्जा ही हैं 

आप अगर दस हज़ार साल पहले पैदा हुए होते तो आप आज जैसे नहीं सोच सकते थे 
मतलब आप सोचने की परम्परा की अगली कड़ी मात्र हैं 

विचार धारा पीढ़ी दर पीढ़ी सफर करती हुई आप तक आई है 
अब ये विचारधारा आप में से गुज़र कर अगली पीढ़ी में पहुँच जायेगी 

आपके माध्यम से 
अब तक की विज्ञान की सारी तरक्की 
लोकतान्त्रिक विचारधारा का सारा विकास 
सभी अच्छी बातें अगली पीढ़ी तक पहुँच ही जायेंगी 

लेकिन अगर आपका जनम धार्मिक कट्टरता से भरे 
अलोकतांत्रिक ,अंधविश्वासी , जाहिल  माहौल में हुआ है 
तो आपकी अगली पीढ़ी तक वही सब कट्टरता और ज़हालत पहुँचेगी 

इसलिए आप मानव इतिहास के विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं 

अब सवाल यह है कि क्या मनुष्य हजारों साल के ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहा है 

या मुनाफे के लिए मनुष्यों को सारे परम्परागत ज्ञान से काट कर 
सिर्फ पूंजीपति की चाकरी के मतलब की जानकारियाँ ही नए बच्चों के दिमागों में डाली जा रही हैं 

क्या हमारी शिक्षा 
मनुष्यता के हजारों साल के संगृहीत ज्ञान को आगे बढ़ाने वाली है या 
यह शिक्षा हजारों साल के उस ज्ञान को महत्वहीन मानने वाली है 

यह शिक्षा मुनाफाखोर पूंजीपतियों के लिए हमारे बच्चों को तैयार करने के लिए बनाई गयी है 

प्रतियोगिता इस शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण लक्षण है 

क्या यह शिक्षा यह सिखा रही है कि मनुष्य के लिए समाज ज़रूरी है 

या यह शिक्षा हमारे बच्चों के दिमाग में यह डाल रही है कि असल में समाज तुम्हारा प्रतियोगी है 

क्या यह शिक्षा हमारे बच्चों को समाज को दुश्मन की तरह देखने के लिए प्रेरित नहीं कर रही है 

यह शिक्षा बताती है कि तुम्हारा लक्ष्य दुनिया का ज़्यादा से ज़्यादा सामान अपने घर में जमा कर लेना है 

यही तुम्हारे विकसित और सुखी होने का एक मात्र रास्ता है 

अब हमारे बच्चे 
आदिवासियों के जंगल , गाँव वालों की ज़मीनों की लूट 
इसके लिए आदिवासियों की हत्याएं 
औरतों से बलात्कार 
को अपने विकास के लिए अनिवार्य मानने लगते है 

अब आपके व्यक्तित्व के भीतर का सबसे बुरा हिस्सा 
इस मुनाफे की व्यवस्था ने सबसे महत्वपूर्ण बना दिया है 

इस पर सवाल उठाइये 

आपका सही सोचना मनुष्यता के विकास का एक महत्वपूर्ण क्षण है  

 


 

Friday, August 1, 2014

वर्तमान

वर्तमान ही रुका हुआ है 
हमेशा से 

हम वर्तमान में ही पैदा हुए 
वर्तमान में ही बड़े हुए 
वर्तमान में ही मर जायेंगे 

वर्तमान में जीते जीते 
सूरज और तारे 
बारी बारी 
अपनी छांव डालते हैं हम पर 

कोई अतीत नहीं होता 
बस स्मृतियाँ होती हैं 
इन्ही स्मृतियों के आधार पर 
करते हैं हम कल्पनाएँ 
उसे हम भविष्य कहते हैं 

समय नहीं चलता 
ध्यान से देखिये 
वर्तमान रुका हुआ है हमेशा से 

इसलिए हर बदलाव वर्तमान में होता है 
धर्म वर्तमान में होता है 
क्रांति वर्तमान में होती है 

Monday, July 28, 2014

मैं तैयार हूँ

सुना है छत्तीसगढ़ सरकार ने मेरे छत्तीसगढ़ से निकलने के बाद मेरे नक्सलवादी होने के बहुत सारे मुकदमे बना दिए हैं . 

अभी हाल में ही एक सामाजिक कार्यकर्ता जब एक अदालत में छत्तीसगढ़ पुलिस के खिलाफ बयान दर्ज करवा रहे थे और जब उन्होंने अदालत को बताया कि पुलिस की बदमाशियों की जानकारी उन्हें हिमांशु कुमार से मिली थी ,और जब वो उन घटनाओं की जांच करने और पीड़ित आदिवासियों से मिलने गए तो पुलिस ने ही उन पर हमला कर दिया .

इस पर सरकारी वकील ने अदालत में कहा कि हिमांशु कुमार तो फरार अपराधी है .

सरकार द्वारा आदिवासियों के गाँव जलाने , आदिवासी बूढों और बच्चों की हत्याओं ,आदिवासी लड़कियों के साथ पुलिस द्वारा बलात्कार के अनेकों मामले मैंने अदालत में दायर किये हुए हैं .

मुझे डराने के लिए सरकार ने मेरे अनेकों आदिवासी कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया . सोनी सोरी को प्रताड़ित कर के मेरे नक्सलवादी होने के कबूलनामे पर हस्ताक्षर करवाने की कोशिश करी , लेकिन जब सोनी नहीं मानी तो उसे बिजली के झटके दिए और सज़ा के तौर पर उसके गुप्तांगों में पत्थर भर दिए .

छत्तीसगढ़ से निकलने के बाद से आज तक मैं एक दिन के लिए भी कहीं छिपा नहीं . टीवी की चर्चाओं में आता हूँ . सर्वोच्च न्यायालय में छत्तीसगढ़ पुलिस के सामने मौजूद रहता हूँ . पत्र पत्रिकाओं में लिखता हूँ . सभाओं और रैलियों में शामिल होता हूँ . 

फिर भी छत्तीसगढ़ सरकार का यह कहना कि मैं फरार हूँ . यह सरकार की बदमाशी के अलावा कुछ नहीं है .

मैं चाहता हूँ कि सरकार जब चाहे मुझे गिरफ्तार करे , मुझे भी अन्य आदिवासियों की तरह जेल में सताए . चाहे तो जेल में मुझे मार डाले .

सत्य के इस रास्ते पर चलना शुरू करने से पहले मुझे अपने इस तरह के अंत  की उम्मीद थी .

मैं तैयार हूँ .

Thursday, July 24, 2014

भूले से भी इस गलतफहमी में न रहना कि ये बेईज्ज़ती मुसलमान की है

मेरे दोस्त तुम्हारी बनायी हुई रोटी को उसने तुम्हारे मुंह में ठूंस दिया 
उसका इरादा तुम्हारा पेट भरना नहीं बल्कि तुम्हे तुम्हारी औकात बताने का था 

मायूस ना होना साथी 
इस मुल्क में तुम जैसे मेहनत कशों के साथ 
सदियों से यही सब तो हो रहा है 

ये वो मुल्क है जहां औरतों के मुंह में डायन बता कर 
इंसान की टट्टी भर दी जाती है 

ये वो मुल्क है जहां बड़ी ज़ात वालों के घर के सामने से
निकलते समय मेहनतकश जात के लोगों को अपने जूते अपने सर पर रख कर गुज़रना पड़ता है

असल में तुम्हारे मुंह में बेईज्ज़ती की ये रोटी सत्ता ने भरी है
तुम्हारी लड़ाई इस सत्ता से है मेरे मेहनतकश दोस्त

तुम्हारी बेईज्ज़ती का बदला बेशक लिया जाएगा साथी ,तैयारी शुरू करो ,
हर बेईज्ज़ती का बदला लिया जाएगा
सदियों की बेईज्ज़ती का बदला अभी बाकी है दोस्त

भूले से भी इस गलतफहमी में न रहना कि ये बेईज्ज़ती मुसलमान की है
इस गलतफहमी से तो ये लड़ाई रास्ता भटक जायेगी
ये लड़ाई करोड़ों मेहनत कशों की है

मेहनत की लूट में हिंदू भी शामिल हैं और मुसलमान भी
लेकिन हम मेहनत कशों की बस एक ही ज़ात है
वो है हमारा मेहनत करने के बाद भी गरीब होना

हम इस सत्ता और पैसे की ताकत के इस किले को जल्द ही गिराएंगे दोस्त
फिर हर मुंह में इज्ज़त का निवाला होगा बेईज्ज़ती की रोटी नहीं

Wednesday, July 23, 2014

पिछले जनम के पापों का फल भुगतो

पिछले जनम में मैंने ज़रूर पुण्य करे होंगे 
कि मेरा जनम फिलिस्तीन में नहीं हुआ 
और मुझ पर कोई बम नहीं गिराया गया 

मेरे पूर्व जनम के पुण्यों के कारण ही 
मेरा जनम दंतेवाड़ा में नहीं हुआ 
और मैं इस जनम में सोनी सोरी नहीं बना

अपने पूर्व जन्म के सद्कर्मों के कारण ही इस जनम में
मेरा जनम किसी नीच जात में नहीं हुआ
इस लिए काम से मना करने पर मेरा हाथ भी नहीं काटा गया

मैं खुस नसीब हूँ कि मेरा जनम किसी गंदी बस्ती
की किसी दलित माँ के पेट से नहीं हुआ
और मैं शीतल साठे बनने से बच गया
वरना मुझे भी परिवर्तन के गीत गाने के
अपराध में गर्भावस्था में जेल में डाल दिया जाता .

मेरे पिछले जन्मों के पुण्यों का ही परताप है
कि मैं इस जनम में मैं आरती मांझी नहीं बना ,
वरना किसी और के धोखे में मुझे थाने ले जाते
समय पुलिस वाले रास्ते में मेरे साथ करते
सामूहिक बलात्कार और फिर तीन साल के लिए
फेंक दिया जाता मुझे जेल की सलाखों के पीछे ,
अंत में जहां से मुझे भगा दिया जाता यह कह कर
तीन साल बाद कि अब घर जा तुझे तो गलती से पकड़ लिया गया था .

मैंने पिछले जनम में पुन्य करे होंगे तभी
मेरा जनम आमिर की माँ के पेट से नहीं हुआ ,
वरना मुझे भी आमिर की तरह चौदह साल
तक जेल में रखने के बाद कह दिया
जाता कि जाओ तुम तो बेगुनाह हो .

मेरे पूर्व जनम के पुण्यों के कारण इस जनम में पुरुष हूँ
भारत में रहता हूँ और बहुसंख्यक हूँ
मैं बड़ी ज़ात का हूँ .
मैं शहर में रहता हूँ
मेरा देश अमरीका का दोस्त है
मेरे पास कम्प्युटर है
और फेसबुक के लिए इंटरनेट के पैसे भी हैं .
ये सब मेरे पिछले जनम के पुण्यों का फल है .

तो जाओ सब लोग पुन्य करो
पंडतों को जिमाओ
रोज़ मंदिर जाओ
मंदिर में दान करो
धर्म पर तर्क मत करो
आँख बंद कर धर्म को मानों
गाय की सेवा करो
निर्मल बाबा के दरबार में जाया करो

इससे अगले जनम में तुम्हारा जनम भी एक
धनवान सवर्ण भारतीय शहरी बहुसंख्यक पुरुष के रूप में होगा .

तब तक अपने पिछले जनम के पापों का फल भुगतो

Saturday, July 19, 2014

अंत में आपके पास जलाने के लिए कुछ नहीं बचेगा

साहेब ,महात्मा गांधी की हत्या आपके गुरु ने करी 

इस पाप को छुपाने के लिए आपने सबूत की फाइलें जलवा दी हैं 

लेकिन अभी तो बहुत कुछ ऐसा है जिसे आप को जलाना पड़ेगा 

वो चिट्ठियाँ भी जलवा दीजिए जो आपके संघ के गुरुओं ने अंग्रेजों को माफी नामे के तौर पर भेजी थीं .

क्योंकि इससे आपकी गद्दारी की परम्परा की पोल खुल जाने का भय है

आपको वो बयान भी जलाने हैं जो आपके दल के अटल साहब ने अंग्रेजों के सामने दिए थे ,जिसमे उन्होंने उस दौर के क्रांतिकारियों के खिलाफ मुखबिरी करी थी .

आपको वो इतिहास भी जलाना पड़ेगा जिसमे बताया गया है कि किन बौद्ध मठों को तोड़ कर मंदिर बनाये गए .

आपको इतिहास की वो सारी किताबें जलानी पड़ेंगी जिनमे दलितों की बस्तियों को जलाने की तफसीलें दर्ज़ हैं .

अट्ठारह सौ सत्तावन में हिंदुओं और मुसलमानों की एकता और मिल कर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का पूरा विवरण भी तो अभी जलाना बाकी है .

आज़ादी की लड़ाई में जहां जहां भी मुसलमानों के नाम दर्ज़ है उन सब किताबों को जलाना भी बाकी है .

इसके बाद जलाने का हुक्म दीजियेगा उन सभी बस्तियों को जहां मुसलमान और ईसाई रहते हैं .

फिर इस देश की सांझी संस्कृति को जला दीजियेगा .

फिर इस देश को जला दीजियेगा .

आग कम पड़े तो कुछ अपने आदर्श हिटलर से और कुछ इस्राईल से ले लीजियेगा .

अंत में आपके पास जलाने के लिए कुछ नहीं बचेगा .

तब आप आराम करियेगा .

अपने विरोधी के स्थान पर

आप का जनम हिंदू घर में हुआ 
तो आप हिंदू हित की बात करेंगे 

आपका जनम मुस्लिम घर में हो गया 
तो आप मुसलमानों के मुद्दों पर बोलेंगे 

आप ऊंची जात वाले घर में पैदा हुए तो आप 
दलितों के मुद्दों पर अविचलित रहेंगे 

अगर आपका जनम दलित परिवार में हुआ तो आप 
दलित समस्याओं पर बोलेंगे

आपका जनम किसी बड़े शहर में हुआ तो आप दंतेवाड़ा के आदिवासियों की ज़मीनें छीने जाने को विकास के लिए ज़रूरी बताएँगे

और अगर आपका जनम दंतेवाड़ा के आदिवासी के घर में हुआ तो आप नक्सलवादी कहलायेंगे .

किसी खास जगह पैदा होने की वजह से आप एक खास तरीके से सोचते हैं

आपका चिंतन स्थान सापेक्ष है
स्थान बदलते ही आपके विचार बदल जायेंगे

लेकिन सत्य तो स्थान बदलने से नहीं बदलता

सत्य हिंदू या मुसलमान ,सवर्ण या दलित के, घर में या भारत या पाकिस्तान में भी नहीं बदलता

अब देखिये आपके विचार अपने जनम के स्थान के कारण बने हैं या उन विचारों में हर स्थान में सही सिद्ध होने का गुण है .

कभी अपने ही मन में अपना स्थान बदल कर फिर सोचिये .

कल्पना में खुद को अपने विरोधी के स्थान पर रख कर सोचने की कोशिश कीजिये .

क्या आप हर जगह के सत्य को देख पा रहे हैं ?

क्या अब भी आपको लगता है आप सही थे ?

देखिये आपका कट्टर नजरिया अब हल्का होने लगा है .

यही मुक्ति है .

यही आपके जानवरपन से मनुष्त्व की यात्रा की शुरुआत है .

अब आप जीवन का आनंद लेने के लिए तैयार हैं .

आपके प्रतिद्वंदी धरम वाला भी यही सब चाहता

क्या चाहता है दिल आपका 
यही ना कि आपके धरम के अलावा दूसरे धरम वाले या तो खत्म हो जाएँ या 
फिर आपके पैरों में गिर कर गिडगिडायें 
और मान लें कि आप ही सबसे श्रेष्ठ हैं 
और अब तक के अपने घमंड के लिए आपसे माफी मांगें 

आपका दिल यह भी चाहता है ना 
कि आप ही हों दुनिया के सबसे अमीर आदमी 
और बाकी के सब आपके मुकाबले गरीब हों 
और सब आपके सामने बेचारे दिखाई दें 

आप यह भी चाहते हैं कि आप ही माने जाएँ
सबसे अधिक सम्माननीय
सब आपको बैठाएं मंच पर
और सब नीचे बैठें
और मुग्ध होकर सुनें
आपकी बातों को

आप यह भी चाहते हैं कि
युगों युगों तक आपको याद रखे दुनिया
सबके दिमागों में छाये रहें आप ही
सदैव

लेकिन मुश्किल यह है कि आपके प्रतिद्वंदी धरम वाला भी यही सब चाहता है

इसलिए आप और वो न चैन से खुद जी पाते हैं

न दूसरे को जीने देते हैं

आपके लिए भी दुनिया में पर्याप्त जगह और सम्मान है
आपके विरोधी के लिए भी पर्याप्त जगह और सम्मान है

अगर आप चैन से रहें तो आप और आपका विरोधी दोनों आराम से बिना लड़े जी सकते हैं .

चेतन भगत

चेतन भगत नामक यह लेखक कह रहा है कि गाज़ा में जो हो रहा है वह सही नही है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि आतंकवादीयों और उनके समर्थकों को सही सबक सिखाने का यही तरीका है 

यह तो इस्राइली हमलों का समर्थन ही हुआ .

क्या चेतन भगत को मालूम है कि किसी की ज़मीन पर हथियारों के दम पर कब्ज़ा करना आतंकवाद है जो कि इस्राईल ने किया है .

क्या इस लेखक को पता है कि अपने जिंदा रहने के लिए अपनी ज़मीन को आज़ाद कराने के लिए इस तरह के कब्ज़े का विरोध करना लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार और कर्तव्य भी है ?

क्या इस लेखक को पता है कि इन निहत्थे लोगों के के जीवन पर होने वाले इस्राइली हमलों से इन फिलिस्तीनियों को बचाने के लिए अमरीकी और यूरोपीय नौजवान लड़के लडकियां आकर मानव कवच के रूप में इन निहत्थे लोगों के साथ रहते हैं ?

क्या इस लेखक को मालूम है कि इस तरह के अहिंसक सत्याग्रह करने वाले दसियों आदर्शवादी नौजवानों की हत्या इस्राईल कर चुका है ?

क्या यह लेखक यह जानता है कि किसी दूसरे की गलती की सज़ा किसी दूसरे को नही दी जा सकती . इसलिए हमास के लड़ाकों का बदला लेने के लिए इस्राईल फिलीस्तीनी बच्चों की हत्या नही कर सकता ,और इस तरह निर्दोषों को किसी दूसरे के अपराधों की सज़ा देने को किसी भी तर्क द्वारा सही सिद्ध नही किया जा सकता .

यह तो बिलकुल ऐसा ही होगा जैसे कि नक्सलियों से बदला लेने के लिए भारतीय सिपाही सोनी सोरी के शरीर में पत्थर भर देते हैं , आरती मांझी के साथ बलात्कार करते हैं , मणिपुर में मनोरमा के गुप्तांगों में छत्तीस गोलियाँ दाग देते हैं कश्मीर में लड़कियों से बलात्कार करते हैं और फिर इस लेखक जैसे लोग इन बलात्कारों का समर्थन करते हैं और कहते हैं कि नक्सलवाद से निपटने के लिए तो हमें ऐसा करना ही पड़ेगा .

क्योंकि इस तरह के मूर्खता पूर्ण क्रूर तरीकों से आप कभी भी सहमति, शांति और सामान्य अवस्था तक नही पहुँच सकते .

विकास का माडल शैतानी माडल

किसे किसे वो सब साथी याद हैं जिन्हें हमारे ही दौर में इसलिए जेलों में डाल दिया गया है क्योंकि उन्होंने गरीबों की ज़मीन जंगल और पानी की लूट के खिलाफ आवाज़ उठाई .

प्रशांत राही , हेम मिश्रा और सैंकडों दलित और आदिवासी परिचित और अनाम साथी आज भी जेलों में पड़े हैं .

सत्ता पर पैसे वाले लुटेरों का कब्ज़ा है . इन लुटेरों की लूट का विरोध करने वालों को जेल में डाला जा रहा है .

जो काम ईस्ट इण्डिया करती थी , व्यापार का संरक्षण और जनता पर हमला , वही काम अब हमारी सरकार खुले आम कर रही है .

आप जानते हैं आज हमारे ज्यादातर सिपाही कहाँ हैं ?

हमारे सिपाही आदिवासी इलाकों में भेज दिए गए हैं .

क्या हमारे सिपाही जंगलों में आदिवासियों की रक्षा करने के लिए गए हैं ?

नहीं सिपाही अमीरों की कंपनियों के लिए जंगल की खदानों , पहाड़ों , नदियों पर कब्ज़ा करने गए हैं .

और ये सिपाही जंगल में रहने वालों के साथ क्या कर रहे हैं उसका नमूना बीच बीच में आप सोनी सोरी ,आरती मांझी और सरकेगुडा में बच्चों के संहार के रूप में देख ही लेते हैं .

हमें बताया गया है कि विकास के लिए यह दमन ज़रूरी है .

गांधी ने कहा था कि अगर भारत अंग्रेजों का विकास का माडल अपनाएगा तो भारत को एक दिन अपनी ही जनता से युद्ध करना पड़ेगा .

कहा जाता है कि अंग्रेज़ी राज में कभी सूरज नही डूबता था .

लेकिन एक अँगरेज़ ने ही लिखा था कि अंग्रेज़ी राज में कभी खून भी नही सूखता .

अँगरेज़ सारी दुनिया के संसाधन लूटते थे और उसके लिए अपने सिपाहियों का प्रयोग करते थे .

गांधी ने कहा कि अंग्रेजों ने तो अपने इस तरह के विकास के लिए सारी दुनिया पर हमला किया .

गांधी ने कहा अंग्रेजों का यह विकास का माडल शैतानी माडल है .

यह विकास का माडल ज़्यादा उपभोग और दूसरे के संसाधनों को छीनने पर आधारित है .

लेकिन अगर भारत भी अंग्रेजों के विकास का माडल अपनाएगा तो भारत किसके संसाधन छीनेगा ,और भारत किस पर हमला करेगा .

गांधी ने कहा कि एक दिन आप अपने ही गरीब देशवासियों पर हमला कर बैठेंगे .

गांधी ने कहा इस विकास के माडल में से सिर्फ युद्ध निकलेगा .

आज हमारी सेना आदिवासी इलाकों में पहुँच चुकी है .

भारत के अमीर लोग भारत के गरीब इलाकों में सेना भेज रहे हैं और आपको अभी भी नही लगता कि हम गृह युद्ध की तरफ बढ़ रहे हैं ?

सोचिये आज ही सोचिये कि क्या भारत को अपने विकास की दिशा के बारे में फिर से नही सोचना चाहिए ?

जो विकास देश में हिंसा बढाए हमें वैसा विकास चाहिए या जो शांति बढाए वो विकास अपनाना चाहिए ?