Thursday, April 2, 2015

आयता का इंतज़ार

आयता एक आदिवासी युवक है .
आयता अपने इलाके में बहुत लोकप्रिय है .
आयता छत्तीसगढ़ में रहता है .
छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासियों की ज़मीन छीनना चाहती है .
सरकार लोकप्रिय आदिवासियों से डरती है .
सरकार को लगता है कि जो लोकप्रिय आदिवासी है है वह आदिवासियों को संगठित कर सकता है
सरकार मानती है कि लोकप्रिय आदिवासी सरकार द्वारा ज़मीन छीनने का विरोध कर सकता है .
इसलिए सरकार लगातार लोकप्रिय आदिवासी नेताओं को जेलों में ठूंसने का काम करने में लगी हुई है .
इसी तरह बस्तर के आई जी कल्लूरी ने आयता को बुला कर कहा कि तुम बहुत आगे बढ़ रहे हो , तुम ज़रूर नक्सलियों से मिले हुए हो तो तुम हमारे सामने सरेंडर कर दो .
आयता ने कहा मैं तो अपनी खेती करता हूँ . और साहब मेरे खिलाफ़ पुलिस के पास कहीं कोई शिकायत है क्या ?
आई जी ने कहा बहुत बोल रहा है . तुझे एक हफ्ते का टाइम दे रहा हूँ . मेरे सामने सरेंडर कर देना .
एक हफ्ते बाद पुलिस का दल एक बोलेरो और दो मोटर साइकिलों पर सवार होकर आयता के घर उसे पकड़ने पहुँच गए .
आयता घर पर नहीं था . पुलिस ने आयता की पत्नी सुकड़ी को उठाया गाड़ी में डाला और चल दिए .
गाँव वालों ने पुलिस को आयता की पत्नी सुकड़ी का अपहरण करते हुए देख लिया .
आदिवासियों को इस घटना से अपना बहुत अपमान लगा .
अगले दिन आदिवासी जमा हुए और आदिवासियों ने सुकड़ी को छुड़ा कर लाने का फैसला किया .
पन्द्रह हज़ार आदिवासियों ने पुलिस थाने को घेर लिया .
घबरा कर पुलिस झूठ बोलने पर उतर आयी .
पुलिस ने कहा कि हमने सुकड़ी को नहीं उठाया . हो सकता है नक्सलवादियों ने सुकड़ी का अपहरण किया हो .
लेकिन आदिवासियों ने तो अपनी आँखों से पुलिस को सुकड़ी का अपहरण करते हुए देखा था .
आदिवासी थाने के सामने ही जमे रहे तीन दिन तीन रातों तक आदिवसियों ने थाने को घेरे रखा .
अब सरकार घबराने लगी .
तीसरे दिन सोनी सोरी ने जाकर प्रशासन से कहा कि अगर आज रात पुलिस ने सुकड़ी को वापिस नहीं किया तो कल से मैं और मेरे साथ आदिवासी उपवास शुरू करेंगे .
इस पत्र के दो घंटे बाद ही सरकार ने कहा कि हमें सुकड़ी मिल गयी है ,
सरकार ने झूठ बोलते हुए कहा कि उन्हें सुकड़ी एक गाँव में मिली है .
हांलाकि सुकड़ी ने बाद में बताया कि सुकड़ी को पुलिस ने थानों में और सुरक्षा बलों के कैम्पों में रखा था .
लेकिन सुकड़ी की अपहरण की रिपोर्ट पुलिस ने आज तक नहीं लिखी है .
आदिवासियों ने अपनी जीत की खुशी मनाई और सुकड़ी को निर्विरोध रूप से अपने गाँव का सरपंच चुन लिया .
पुलिस ने आदिवासियों को उनकी हिम्मत की सज़ा देने के लिए तीन दिन बाद गाँव पर हमला किया और आदिवासी बुजर्ग महिलानों तक को इतना मारा कि उनकी हड्डियां टूट गयीं .
पन्द्रह आदिवसियों को नक्सली कह कर जेल में डाल दिया .
सोनी सोरी आयता और सुकड़ी को लेकर प्रदेश की राजधानी रायपुर पहुँच गयी .
आयता और सुकड़ी ने पत्रकारों को सब कुछ बताया .
आयता सोनी सोरी के साथ छत्तीसगढ़ के डीजीपी से मिलने गए .
लेकिन डीजीपी आयता से नहीं मिले .
कुछ हफ़्तों बाद पुलिस ने एक और आदिवासी युवक को घर से उठा लिया .
फिर दस हज़ार आदिवासियों ने फिर से थाने का घेराव किया .
आदिवासियों की हिम्मत देख कर गुस्से में पुलिस और सुरक्षा बलों ने आदिवासियों पर वहशी हमला किया .
इस हमले के विरोध में आदिवासियों ने जिला मुख्यालय सुकमा तक अस्सी किलोमीटर तक पदयात्रा करने का फैसला किया .
इस बार सोनी सोरी के साथ आयता भी इस पदयात्रा में आगे आगे थे .
आदिवासी राजनैतिक नेताओं के आश्वासन के बाद सभी आदिवासी रैली स्थगित कर अपने अपने घर जा रहे थे .
गाँव के रास्ते में पुलिस ने आयता को घेर लिया और और थाने में ले आये .
पुलिस ने बयान दिया कि उन्होंने एक 'फरार नक्सली ' को पकड़ा है .
आयता को जेल में डाल दिया गया .
अब आयता जगदलपुर जेल में है .
आयता पर चार फर्ज़ी मुकदमे लगा दिए गए हैं .
आज़ादी की लड़ाई में भी जेल यात्रा से लोग आज़ादी की लड़ाई के नेता बनते थे
आज बस्तर में भी जेल से निकल कर अनेकों आदिवासी अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता बन रहे हैं .
आयता बस्तर के लोग बाहर तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं .

आयता का इंतज़ार

आयता एक आदिवासी युवक है .
आयता अपने इलाके में बहुत लोकप्रिय है .
आयता छत्तीसगढ़ में रहता है .
छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासियों की ज़मीन छीनना चाहती है .
सरकार लोकप्रिय आदिवासियों से डरती है .
सरकार को लगता है कि जो लोकप्रिय आदिवासी है है वह आदिवासियों को संगठित कर सकता है
सरकार मानती है कि लोकप्रिय आदिवासी सरकार द्वारा ज़मीन छीनने का विरोध कर सकता है .
इसलिए सरकार लगातार लोकप्रिय आदिवासी नेताओं को जेलों में ठूंसने का काम करने में लगी हुई है .
इसी तरह बस्तर के आई जी कल्लूरी ने आयता को बुला कर कहा कि तुम बहुत आगे बढ़ रहे हो , तुम ज़रूर नक्सलियों से मिले हुए हो तो तुम हमारे सामने सरेंडर कर दो .
आयता ने कहा मैं तो अपनी खेती करता हूँ . और साहब मेरे खिलाफ़ पुलिस के पास कहीं कोई शिकायत है क्या ?
आई जी ने कहा बहुत बोल रहा है . तुझे एक हफ्ते का टाइम दे रहा हूँ . मेरे सामने सरेंडर कर देना .
एक हफ्ते बाद पुलिस का दल एक बोलेरो और दो मोटर साइकिलों पर सवार होकर आयता के घर उसे पकड़ने पहुँच गए .
आयता घर पर नहीं था . पुलिस ने आयता की पत्नी सुकड़ी को उठाया गाड़ी में डाला और चल दिए .
गाँव वालों ने पुलिस को आयता की पत्नी सुकड़ी का अपहरण करते हुए देख लिया .
आदिवासियों को इस घटना से अपना बहुत अपमान लगा .
अगले दिन आदिवासी जमा हुए और आदिवासियों ने सुकड़ी को छुड़ा कर लाने का फैसला किया .
पन्द्रह हज़ार आदिवासियों ने पुलिस थाने को घेर लिया .
घबरा कर पुलिस झूठ बोलने पर उतर आयी .
पुलिस ने कहा कि हमने सुकड़ी को नहीं उठाया . हो सकता है नक्सलवादियों ने सुकड़ी का अपहरण किया हो .
लेकिन आदिवासियों ने तो अपनी आँखों से पुलिस को सुकड़ी का अपहरण करते हुए देखा था .
आदिवासी थाने के सामने ही जमे रहे तीन दिन तीन रातों तक आदिवसियों ने थाने को घेरे रखा .
अब सरकार घबराने लगी .
तीसरे दिन सोनी सोरी ने जाकर प्रशासन से कहा कि अगर आज रात पुलिस ने सुकड़ी को वापिस नहीं किया तो कल से मैं और मेरे साथ आदिवासी उपवास शुरू करेंगे .
इस पत्र के दो घंटे बाद ही सरकार ने कहा कि हमें सुकड़ी मिल गयी है ,
सरकार ने झूठ बोलते हुए कहा कि उन्हें सुकड़ी एक गाँव में मिली है .
हांलाकि सुकड़ी ने बाद में बताया कि सुकड़ी को पुलिस ने थानों में और सुरक्षा बलों के कैम्पों में रखा था .
लेकिन सुकड़ी की अपहरण की रिपोर्ट पुलिस ने आज तक नहीं लिखी है .
आदिवासियों ने अपनी जीत की खुशी मनाई और सुकड़ी को निर्विरोध रूप से अपने गाँव का सरपंच चुन लिया .
पुलिस ने आदिवासियों को उनकी हिम्मत की सज़ा देने के लिए तीन दिन बाद गाँव पर हमला किया और आदिवासी बुजर्ग महिलानों तक को इतना मारा कि उनकी हड्डियां टूट गयीं .
पन्द्रह आदिवसियों को नक्सली कह कर जेल में डाल दिया .
सोनी सोरी आयता और सुकड़ी को लेकर प्रदेश की राजधानी रायपुर पहुँच गयी .
आयता और सुकड़ी ने पत्रकारों को सब कुछ बताया .
आयता सोनी सोरी के साथ छत्तीसगढ़ के डीजीपी से मिलने गए .
लेकिन डीजीपी आयता से नहीं मिले .
कुछ हफ़्तों बाद पुलिस ने एक और आदिवासी युवक को घर से उठा लिया .
फिर दस हज़ार आदिवासियों ने फिर से थाने का घेराव किया .
आदिवासियों की हिम्मत देख कर गुस्से में पुलिस और सुरक्षा बलों ने आदिवासियों पर वहशी हमला किया .
इस हमले के विरोध में आदिवासियों ने जिला मुख्यालय सुकमा तक अस्सी किलोमीटर तक पदयात्रा करने का फैसला किया .
इस बार सोनी सोरी के साथ आयता भी इस पदयात्रा में आगे आगे थे .
आदिवासी राजनैतिक नेताओं के आश्वासन के बाद सभी आदिवासी रैली स्थगित कर अपने अपने घर जा रहे थे .
गाँव के रास्ते में पुलिस ने आयता को घेर लिया और और थाने में ले आये .
पुलिस ने बयान दिया कि उन्होंने एक 'फरार नक्सली ' को पकड़ा है .
आयता को जेल में डाल दिया गया .
अब आयता जगदलपुर जेल में है .
आयता पर चार फर्ज़ी मुकदमे लगा दिए गए हैं .
आज़ादी की लड़ाई में भी जेल यात्रा से लोग आज़ादी की लड़ाई के नेता बनते थे
आज बस्तर में भी जेल से निकल कर अनेकों आदिवासी अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता बन रहे हैं .
आयता बस्तर के लोग बाहर तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं 

Saturday, March 28, 2015

हिड़मे

कुछ देर पहले छत्तीसगढ़ के शहर जगदलपुर से सोनी सोरी का फोन आया कि गुरूजी हमने हिड़मे को जेल से ले लिया है , पुलिस के एसपी और आईजी वहाँ मौजूद थे . मुझे लगता है पुलिस कुछ और करने की योजना बना रही है . 

मैंने धड़कते दिल से सोनी को दिलासा दिया कि जाओ बेटी आराम से उसे अपने घर ले जाओ , जो होगा देखा जाएगा .

कौन है ये हिड़मे ? पुलिस क्यों इसकी रिहाई से इतनी चिंतित है ? 

आइये समय की रेखा पर कुछ पीछे को चलते हैं .

हिड़मे एक आदिवासी लड़की है . उस समय हिड़मे की उम्र उस समय करीब सोलह साल की थी . जिला सुकमा राज्य छत्तीसगढ़ के एक गाँव की रहने वाली . हिड़मे के माता पिता बीमारी से चल बसे . हिड़मे मौसी के घर में रहती थी . 

थोडी सी ज़मीन थी जिस पर हिड़मे और उसकी मौसी खेती करते थे . खाने के लिए चावल खेत से पूरा हो जाता था . मौसीऔर हिड़मे महुआ के मौसम में महुआ के फूल बेच कर पास के बाज़ार में बेच देती थीं उससे साल भर के लिए कपड़े साबुन आदि का खर्चा निकल आता था . 

सन दो हज़ार आठ की बात है .धान की फसल कट चुकी थी . अभी महुआ गिरने में थोडा और समय था . जनवरी का महीना था . हिड़मे के गाँव के पास के गाँव रामराम में मेला लगा था . हिड़मे भी अपनी मौसी और मौसेरी बहनों के साथ रामराम के मेले में पहुँच गयी .

मेले में हिड़मे ने रिबिन और चूड़ियाँ खरीदीं . इसके बाद आस पास से आये हुए लड़के लडकियां गोल घेरा बना कर नाच रहे थे . ढोल बज रहा था . हिड़मे ने भी घेरे में नाचने लगी . सभी लोग साथ में गा भी रहे थे . 

नाचते नाचते हिड़मे का गला सूखने लगा . हिड़मे नाचना छोड़ कर थोड़ी दूर लगे हैंड पम्प से पानी पीने के लिए चल दी . पानी पीने के लिए हिड़मे ने जैसे ही हैंड पम्प का हत्था पकड़ा किसी ने हिड़मे का हाथ जोर से पकड़ लिया .

हिड़मे ने गुस्से से नजर उठा कर अपना हाथ पकड़ने वाले की तरफ देखा . अरे ये तो पुलिस वाले थे . कई पुलिस वालों ने हिड़मे को चारों तरफ से पकड़ कर घसीट कर मेले से बाहर खींच लिया . बाहर पुलिस का ट्रक खड़ा था . पुलिस वालों ने हिड़मे के हाथ पैर बाँध दिए और हिड़मे को ट्रक में फर्श पर फेंक दिया .

ट्रक चल पड़ा . 

ट्रक जहां रुका वह पुलिस थाना था . 

इसके बाद हिड़मे के साथ दरिंदगी शुरू हुई . एक थाने वालों का जी भर जाने के बाद हिड़मे को दूसरे थाने भेज दिया गया . वहाँ से जी भर जाने पर हिड़मे को तीसरे थाने में भेज दिया गया .

भयानक यातनाओं से हिड़मे की हालत मरने जैसी हो गयी थी . पुलिस वालों ने कहा यह थाने में ही ना मर जाय इसलिए अब इसे भी जेल में डाल दो . इस इलाके में आदिवासी लड़कियों को महीनों इस तरह रौंद कर नक्सली कह कर जेल में डालने का धंधा जोर शोर से चल रहा था .

जेल में डालने से पहले हिड़मे को अदालत में पेश करने की औपचारिकता की भी ज़रूरत थी . 
लेकिन हिड़मे की हालत अदालत पहुँचने की नहीं थी . हिड़मे को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया . कुछ दिन बाद हिड़मे को अदालत में पेश किया गया . पुलिस ने कहा कि हिड़मे ने तेईस सीआरपीएफ के जवानों की हत्या करी है . अदालत ने हिड़मे को जेल में डालने का हुकुम दे दिया . हिड़मे को जगदलपुर जेल में डाल दिया गया . 

थाने में जो हिड़मे के साथ हुआ था वो हैवानियत की इन्तेहा थी . जेल पहुँचने पर हिड़मे का गर्भाशय बाहर निकल आया . हिड़मे जेल में किससे कहती ? उसे बस गोंडी भाषा आती थी . हिड़मे तो हिन्दी भी नहीं बोल सकती थी . 

हिड़मे ने अपने शरीर से बाहर निकले हुए उस मांस के लोथड़े को दांत भींच कर फिर से शरीर के भीतर धकेल दिया .

हिड़मे के शरीर से लगातार खून बहता रहता था . 

हिड़मे के शरीर से वो मांस का लोथड़ा बार बार बाहर आ जाता था . 

एक दिन हिड़मे ने जेल में एक लड़की से कहा कि उसे कहीं से एक ब्लेड का टुकड़ा मिल सकता है क्या ?

अगले दिन उस लड़की ने हिड़मे को एक ब्लेड लाकर दे दिया .

हिड़मे के शरीर से गर्भाशय फिर से बाहर निकल आया था . हिड़में ने मॉस के उस लोथड़े को अपने शरीर से अलग करने का फैसला किया . सभी लडकियां बैरक से बाहर जा चुकी थीं . हिड़मे ने ब्लेड से गर्भाशय को काटने की तैयारी करी . तभी एक लड़की बैरक के भीतर आ गयी और हिड़मे की हालत देख कर जोर से चिल्लाई . बाकी की महिलायें भी जमा हो गयीं . हिड़मे से ब्लेड ले लिया गया . कुछ महिलाओं ने शोर मचा कर जेलर को बुला लिया . जेलर ने सोचा मेरी जेल में कोई औरत मर जायेगी तो खामखाँ मीडिया वाले शोर मचाएंगे . हिड़मे को सरकारी अस्पताल भिजवा दिया गया .

हिड़मे का आपरेशन किया गया . हिड़मे को नौ टाँके आये .

आपरेशन के बाद हिड़मे को फिर से जेल भेज दिया गया .

इधर हिड़मे के खिलाफ़ पुलिस द्वारा बनाया गया फर्ज़ी मुकदमा आगे ही नहीं बढ़ रहा था .

पुलिस ने हिड़मे के खिलाफ़ दो औरतों और दो पुलिस वालों को गवाह बताया था . लेकिन वो दोनों औरतें कभी अदालत के सामने नहीं पेश करी गयीं . दोनों पुलिस वालों ने हिड़मे का किसी मामले में हाथ होने की जानकारी से इनकार कर दिया .

इसी बीच जेल में सोनी सोरी को भी डाल दिया गया था .

सोनी सोरी के साथ भी पुलिस वालों ने थाने में अत्याचार किया था .

खुद पुलिस अधीक्षक ने सोनी को बिजली के झटके दिए थे और सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर ठूंस दिए थे .

हिड़मे की हालत के बारे में सोनी सोरी ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को बताया .

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ओर वकीलों ने हिड़मे के लिए आवाज़ उठानी शुरू कर दी .

लेकिन सरकार और अदालत आदिवासियों के मामलों में तो बिलकुल बेपरवाह रहती है .

क्योंकि देश भर में सभी मानते हैं कि आदिवासियों को तो आधुनिक विकास के लिए मार ही डाला जाना है .

मानवाधिकार वकील ने कहा कि अब तो सारी गवाहियां भी पूरी हो चुकी हैं अब तो हिड़मे की रिहाई का हुक्म दे दीजिए मी लार्ड 

जज साहब ने कहा भी कि जहाँ सात साल जेल में रही है कुछ और महीने रह लेगी तो क्या हो जाएगा ? 

हिड़मे कई और महीने जेल में पड़ी रही .

अंत में हिड़मे को जेल से रिहा करने का आदेश देना ही पड़ा .

आज सुबह हिड़मे जगदलपुर जेल से रिहा हो गई .

सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी हिड़मे को लेने जगदलपुर जेल पहुंचे .

हिड़मे का कोई अपराध नहीं था . सिवाय इसके कि वह एक लड़की थी , और बस्तर में वहाँ पैदा हुई थी जहां की ज़मीनों को सरकार अमीर कंपनियों के लालच के लिए छीनना चाहती है . 

जब मैं यह सब लिख रहा हूँ और मैं हिड़मे का चेहरा अपनी आँखों के सामने लाने की कोशिश करता हूँ तो मेरे सामने मेरी अपनी बेटी का चेहरा आ जाता है .

और मैं घबरा कर बिना चेहरे वाली हिड़मे के बारे में लिखने लगता हूँ .

अभी इतना साहस हममे कहाँ है कि हम अपनी बेटी को हिड़मे की जगह रख कर सोच सकें ?

Friday, March 20, 2015

सरकार शांति और लोकतंत्र से ही डरती है

छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा जिला .
सरकार आदिवासियों की ज़मीनें छीनने के लिए भारी तादात में सैन्य बलों को तैनात कर रही है .
इन सैन्य बलों को आदिवासी गाँव में तैनात किया जाता है .
देश भर में जहां भी सरकार उद्योगपतियों के लिए ज़मीनें छीनती हैं वहाँ सरकार पहले सैन्य बलों को ही तैनात करती है .
चाहे उस इलाके में नक्सलवादी हों चाहे ना हों .
इस देश में आज़ादी के बाद से आज तक अमीर कंपनियों के लिए कोई भी ज़मीन बिना सरकारी बंदूकों के इस्तेमाल के हड़पी ही नहीं गयी है .
यहाँ तक की दिल्ली के पास नौएडा तक में भारी पुलिस बल तैनात करके गांव वालों को पीट कर औरतों को घसीट कर घरों में घुस कर तोड़ फोड करने के बाद ज़मीन छीनी गयी थी जबकि नौएडा में तो कोई भी नक्सलवादी नहीं था .
आदिवासी इलाकों में यह सैन्य बल आदिवासी महिलाओं से बलात्कार करते हैं . युवकों को फर्ज़ी मामलों में फंसा कर जेलों में डालते हैं .
सैन्य बलों के सिपाही आदिवासियों को पीटते हैं .
आदिवासियों के घरों में घुस कर लूटपाट करते हैं .
ताकि आदिवासी डर जाएँ और सरकार जब ज़मीन छीने तो कोई सरकार के विरुद्ध आवाज़ ना उठा सके
इस तरह की सैंकडों घटनाओं की सूचना हम सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दे चुके हैं .
अनेकों बार सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग सरकार को फटकार भी लगा चुका है .
आज दंतेवाड़ा में फिर से इसी तरह की एक नयी घटना घट रही है .
दंतेवाड़ा ज़िले के अनेकों आदिवासी गावों के सरपंचों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने परसों कलेक्टर से मिल कर कलेक्टर को एक ज्ञापन दिया .
इन जनप्रतिनिधियों ने कलेक्टर को सूचना दी कि हमारे गाँव में नए सीआरपीएफ कैम्प खोले जा रहे हैं जिनके बारे में इस इलाके के आदिवासियों से कोई राय मशविरा नहीं किया गया है ,
सरकार की इस मनमानी के विरोध में आदिवासी इक्कीस मार्च को एक शांतिपूर्ण रैली करेंगे जिसकी सूचना हम आपको दे रहे हैं .
इस पत्र में जिन सरपंचों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किये थे उन में से लगभग सभी को आज पुलिस ने घर में घुस कर उठा लिया है .
इन जनप्रतिनिधियों में बड़े बेडमा गाँव के सरपंच शंकर कुंजाम , फूलपाड़ गाँव के सरपंच राहुल वेट्टी, कोरीरास गाँव के सरपंच जोगा , पालनार गाँव के सरपंच सुकालू ,और जनपद पंचायत के सदस्य नंदलाल को पुलिस ने पकड़ लिया है .
सुनने में आया है कि सरकार मानती है कि यह रैली नक्सलियों के कहने से करी जा रही है .
अगर थोड़ी देर के लिए सरकार के दावे को सच मान भी लिया जाय तो भी सरकार का यह कदम मूर्खता से भरा हुआ है .
एक तरफ तो सरकार कहती है कि नक्सली बंदूक छोड़ें और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में शामिल हो जाएँ .
तो रैली करना तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया ही है .
अगर नक्सली रैली कर रहे हैं तो सरकार को तो खुश होना चाहिये कि चलो नक्सली लोकतान्त्रिक तरीकों में विश्वास कर रहे हैं और शांतिपूर्वक अपनी बात रख रहे हैं .
लेकिन अगर सरकार आदिवासियों को शांतिपूर्वक और लोकतान्त्रिक तरीकों से अपनी बात भी नहीं रखने देगी तो उसका क्या नतीजा होगा ?
सरकार को खुद ही सोचना चाहिये .
अगर आप आदिवासियों को शांतिपूर्ण तरीके से रैली नहीं करने देंगे तो उस इलाके में आपको शांति लाने में मदद मिलेगी या आप अशांती को और भड़का रहे हैं .
असली बात यही है .
सरकार कभी शांती नहीं चाहती .
सरकार शांति और लोकतंत्र से ही डरती है .
सरकार के पास तो सिर्फ बंदूक है ,लाठी है पुलिस है दमन है ताकत है .
सरकार बंदूक का सामना तो बहुत अच्छे से कर लेती है .
लेकिन जब आदिवासी लोकतान्त्रिक और शांतिपूर्ण विरोध करते हैं तो सरकार बेबस हो जाती है
आदिवासियों के शांतिपूर्ण विरोध से सरकार घबरा जाती है .
तब सरकार की सारी दुनिया के सामने पोल खुल जाती है .
इसलिए सरकार आदिवासियों के निहत्थे विद्रोह को कुचलने में लग गयी है .
तो सरकार बहादुर आप आदिवासियों का दमन कीजिये जितनी भी आपकी ताकत है .
आदिवासी उस दमन का जवाब अपनी हिम्मत और एकजुटता से देंगे .
सरकार बहदुर इस दुनिया में आपसे पहले भी बड़े बड़े ज़ालिम आये थे .
लेकिन उन जालिमों का नामो निशान मिट गया .
लेकिन जिन लोगों ने ज़ुल्म के मुखालिफ आवाज़ उठाई वो इतिहास में अमर हो गए .
सरकार बहदुर तुम करो दमन .
दुनिया तुम्हे देख रही है .
दंतेवाडा में दमन करोगे तो सारी दुनिया में उसके खिलाफ़ आवाज़ उठेगी .
देखते हैं इस लड़ाई में जीत किसकी होती है ?
दमन की या आदिवासियों की हिम्मत और न्याय की ?

Tuesday, March 17, 2015

पदमा

पदमा आंध्र प्रदेश में कम्प्युटर आपरेटर का काम करती थी .
उसका पति काम के सिलसिले में अक्सर बाहर ही रहता था . एक दिन सुबह सुबह दरवाजे पर दस्तक हुई पदमा ने दरवाजा खोला सामने छत्तीसगढ़ पुलिस वाले खड़े हुए थे . पदमा को छत्तीसगढ़ लाया गया .
पुलिस वालों ने थाने में पदमा से पूछा कि क्या तुम्हारे पति का नाम बालकिशन है? पदमा ने कहा हाँ है .
पुलिस ने कहा कि तुम्हारा पति नक्सलवादी है .
पदमा ने कहा तो अपने किस कानून के तहत मुझे पकड़ा है ? मेरा पति नक्सली है तो मेरे पति को पकडिये .
पदमा का कहना सही था भारत के कानून के मुताबिक किसी के अपराध के लिए किसी दूसरे को सज़ा नहीं दी जा सकती.
खुद को फंसता देख पुलिस ने पदमा के ऊपर हत्या के तीन फर्ज़ी मामले बना दिए और पदमा को 2007 में जगदलपुर जेल में डाल दिया .
पदमा पर जगदलपुर कोर्ट में मुकदमा चला . पदमा के खिलाफ़ कोई गवाह या कोई भी सबूत तो था ही नहीं . जगदलपुर की जिला अदालत ने पदमा को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
कोर्ट ने 10 अगस्त 2009 को पदमा को जेल से रिहा करने का आदेश दे दिया .
पदमा का वकील जेल के बाहर पदमा का इंतज़ार करता रहा कि पदमा जेल से बाहर आयेगी . लेकिन पदमा शाम तक जेल से बाहर नहीं आयी . पदमा अगले दिन भी जेल से बाहर नहीं आयी . पदमा तीसरे दिन भी जेल से बाहर नहीं आयी .
पदमा के वकील ने जेल अधिकारियों से पदमा के बारे में पूछा तो जेल अधिकारीयों ने बताया कि पदमा अब जेल में नहीं है . पदमा को तो दो दिन पहले ही पुलिस वाले कहीं ले गए .
पुलिस वालों ने कोर्ट का रिहाई आदेश मिलने के बाद पदमा को जेल से गायब कर दिया था
पदमा के वकील ने फिर से कोर्ट में पदमा को हाज़िर करने के लिए हेबियस कार्पस का मामला दायर किया .
पुलिस ने अदालत को बताया कि पदमा को पुलिस ने दो और मामलों में फिर से पकड़ लिया है .
लेकिन इस बार पदमा को पदमा पत्नी राजन के नाम पर पकड़ कर जेल में डाला गया था .
इस बार पुलिस ने पदमा पर दो हत्याओं का फर्ज़ी मुकदमा लगाया .
पदमा के वकील ने जब मुकदमे में पुलिस द्वारा अदालत में पेश किये गए कागज़ देखे तो पता चला कि बहुत साल पहले कभी पदमा नाम की कोई नक्सली नेता थी जो पुलिस रिकार्ड में भी सन दो हज़ार छह में मारी जा चुकी है .
इस बार उस मर चुकी पदमा के नाम पर इस पदमा को पुलिस ने बदमाशी पूर्वक जेल में बंद किया है .
पदमा के वकील ने मारी गयी पदमा पत्नी राजन के पति और उसके बेटे को अदालत के सामने पेश किया .
पदमा को अदालत ने फिर से रिहा करने का हुकुम दिया .
लेकिन तब तक पुलिस ने पदमा पर तीन और मामले बना दिए .
2014 में इस बार पुलिस ने होशियारी दिखाई इस बार पदमा के पति का नाम लिखा नामालूम और लिखा पता नामालूम .
तो अब पदमा तीन मामलों में पदमा पत्नी बालकिशन और दो मामलों में पदमा पत्नी राजन के रूप में जेल में बंद है .
अगर आपमें से किसी का यह दावा हो कि भारत में पुलिस सरकार न्याय सभी के लिए बराबर है तो वह जगदलपुर जेल में जाकर पदमा से मिल सकता है .
अगर मेरी एक भी बात झूठ पायी जाय तो सरकार मुझे बड़े शौक से तुरंत जेल में डाल दे .
इस कड़ी में कुछ और भी मामले देश के सामने रखूंगा .

Saturday, March 14, 2015

बजावें हाय पांडे जी सीटी


'थाने में बैठे आन ड्यूटी
बजावें हाय पांडे जी सीटी'
हमारे पैसे से चलने वाली आकशवाणी से यह गाना बजता है .
पुलिस वाला ताकतवर है .
पांडे जी बड़ी जात वाले हैं
पुरुष है
इसलिए यह स्तिथी भारतीय संस्कारों में मज़ा देने वाली हालत पैदा करती है
भारत के संस्कारों में अगर इस तरह की बात के लिए स्वीकार भाव ना होता तो इस तरह का गाना भारत में ना तो बन सकता था ना ही सरकारी रेडियो पर बज सकता था ना जनता द्वारा इसे स्वीकार किया जा सकता था .
इसी सोच वाले भारत में बड़ी जाति का एक पुलिस अधिकारी एक कमज़ोर सामाजिक वर्ग आदिवासी लड़की के गुप्तांगों में पत्थर ठूंसता है तो भारत का राष्ट्रपति खुश होकर बख्शीश में उस अधिकारी को वीरता का तमगा देता है और देश तालियाँ बजाता है .
हमारे समाज का जो सार्वजनिक स्थान है वह किसके द्वारा भरा गया है ?
आप खुद ही देखिये कि किसी भी सार्वजनिक स्कूल कालेज , आई आई टी , आई आई एम् , मेडिकल कालेज , पुलिस , प्रशासन , राजनीति में जो स्पेस है उसे किसके द्वारा भरा गया है ?
कभी अचानक ध्यान दीजियेगा .
उस सार्वजनिक स्पेस में
कितने पुरुष हैं ,और महिलायें कितनी हैं ?
बड़ी जाति के लोग कितने हैं और कमज़ोर आर्थिक समूहों के लोग कितने हैं ?
बहुसंख्यक धार्मिक समूह के लोग कितने हैं , अल्पसंख्यक कितने हैं ?
आप देख्नेगे कि ज्यादातर सार्वजानिक स्थान पर बहुसंख्य , उच्च जाति के पुरुषों का कब्ज़ा है .
इस तरह जागरूक होकर देखने से आप पता लगा सकते हैं कि समाज पर कब्ज़ा किसका है और बेदखल किसे किया गया है
अगर सार्वजनिक जीवन से महिलायें , दलित , आदिवासी अल्पसंख्यक गायब हैं तो आप निश्चित मानिए वह समाज पुरुषवादी सवर्ण मानसिकता के दमनकारी विचारों से ग्रस्त शासन प्रशासन राजनीति और न्याय व्यवस्था से ही पीड़ित रहेगा
तभी तो भारत का सर्वोच्च न्यायालय किसी को सिर्फ इसलिए फांसी पर चढ़ा देता है क्योंकि भारत के स्वर्ण पुरुषों के वर्चस्व वाली सामूहिक अन्तश्चेतना ऐसा चाहती है .
ये जो समाज का कामन स्पेस है
उसमे महिला
पीढ़ियों से दबाये गए दलित
जंगलों में रहने वाले आदिवासी
बराबर का स्पेस पा सकें इसकी जिम्मेदारी
किसकी है ?
हम सभी की है ना ?
लेकिन अगर हम इसकी तरफ ध्यान ही नहीं देंगे
तो समाज के इस कामन स्पेस में सभी की बराबर भागीदारी बनायेगे कैसे ?
समाज आज जहां है उसे वहाँ से आगे ले जाना
इसी पीढ़ी की जिम्मेदारी है
इसे ही असली विकास कहते हैं
नकली विकास नहीं असली विकास कीजिये
समाज में सभी के लिए जगह बनाइये .

Wednesday, March 11, 2015

आयता

आदिवासियों की ज़मीनें छीनने के लिए छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार बुरी तरह आदिवासियों के पीछे पड़ी हुई है .
आदिवासी सरकार के खिलाफ़ आवाज़ ना उठा सकें इसलिए आदिवासियों को डरा कर चुप रखने के लिए अपराधी किस्म के क्रूर पुलिस अधिकारियों को बस्तर में पदस्थ किया जाता है .
आजकल बस्तर का पुलिस आईजी कल्लूरी नामक पुलिस अधिकारी को बना दिया गया है
कल्लूरी पहले लेधा नामकी आदिवासी महिला के साथ महीना भर थाने में बलात्कार करवाने और अनेकों फर्ज़ी मुठभेड़ों में बदनाम है .
बस्तर में कल्लूरी ने तीन गावों में आग लगवाई थी .
लिंगा कोडोपी ने उन गावों का वीडियो बना कर यू ट्यूब पर डाल दिया तो लिंगा को फर्ज़ी मामलों में फंसा कर जेल में डाल दिया गया .
सोनी सोरी और उसके पति ने लिंगा की मदद करी ,
इससे चिढ़ कर कल्लूरी ने सोनी के पति को भी फर्ज़ी मामलों में फंसा कर जेल में डाल दिया
सोनी के पति को अदालत ने निर्दोष पाया लेकिन रिहाई से पहले जेल में सोनी के पति को इतना मारा गया कि जेल से बाहर आते ही सोनी सोरी के पति ने दम तोड़ दिया .
सोनी सोरी को भी अनेकों फर्ज़ी मामलों में फंसा कर पकड़ा गया और थाने में ले जाकर उसके गुप्तांगों में पत्थर भर दिए गए .
तीन गाँव को जलाने के बाद मैंने जब इस खबर को सार्वजनिक किया और उस पर देश भर में विवाद शुरू हुआ तो कल्लूरी को बस्तर से हटाना पड़ा था .
लेकिन कुछ महीने पहले सरकार ने कल्लूरी को फिर से बस्तर का चार्ज दे दिया .
पुलिस महानिरीक्षक कल्लूरी ने इस बार बस्तर पहुँचते ही आदिवासियों की आवाज़ दबाने के लिए मुखर आदिवासी युवाओं को नक्सली कह कर उन्हें जबरदस्ती आत्मसमर्पण करने और बात ना मानने पर मारे जाने के लिए तैयार हो जाने का फरमान दे दिया .
हजारों आदिवासियों का फर्ज़ी आत्म समर्पण करवाया गया .
आयता नामक एक आदिवासी युवा को भी महानिदेशक कल्लूरी ने नक्सली बन कर आत्म समर्पण करने के लिए मजबूर किया .
आयता ने कहा कि मैं नक्सली हूँ ही नहीं , यहाँ तक कि मेरे खिलाफ़ कोई फर्ज़ी रिपोर्ट तक नहीं है तो फिर मैं नकली नक्सली बन कर आत्म समर्पण क्यों करूँ ?
इस पर नाराज़ होकर कल्लूरी ने पुलिस भेज कर आयता कि पत्नी सुकड़ी का अपहरण करवा लिया .
पन्द्रह हज़ार आदिवासियों ने सोनी सोरी की अगुआई में थाने को घेर लिया .
पुलिस को हार कर आयता की पत्नी सुकड़ी को वापिस लौटाना पड़ा .
लेकिन पुलिस ने चिढ़ कर तीन दिन बाद बदला लेने के लिए आदिवासियों के गाँव पर फिर से हमला किया .
बूढ़ी आदिवासी औरतों तक को पीटा गया . आदिवासी महिलाओं की हड्डियां तोड़ डाली गयीं .
लेकिन आदिवासी नहीं डरे .
प्रदर्शनों का सिलसिला चलता रहा .
आदिवासियों ने पुलिस अपहरण से छुड़ाई गयी सुकड़ी को गाँव का सरपंच चुन लिया .
आयता ने अपने खिलाफ़ कल्लूरी के दमन के विरुद्ध राजधानी रायपुर में प्रेस कांफ्रेंस करी
आयता पुलिस महानिदेशक से मिलने पुलिस मुख्यालय गया .
पुलिस महानिदेशक आयता से नहीं मिले .
आयता अपने गाँव वापिस आ गया .
इसी बीच एक अन्य आदिवासी युवक को पुलिस ने पकड़ कर नक्सली कह कर जेल में डाल दिया
हज़ारों आदिवासियों ने फिर से थाने को घेर लिया .
इस बार आदिवासियों की अगुवाई सोनी सोरी के साथ आयता भी कर रहा था .
प्रदर्शन स्थगित होने के बाद आयता अपने गाँव वापिस लौट रहा था .
तभी पुलिस ने आयता को अकेला देख कर उसे पकड़ लिया .
सोनी थाने पहुँची और सोनी ने कहा कि कल्लूरी आयता से चिढा हुआ है और पुलिस ने कल्लूरी के घमंड की रक्षा के लिए कल्लूरी के कहने से ही आयता को पकड़ा है .
तभी कल्लूरी की गाड़ी वहाँ पहुँच गयी .
सोनी सोरी अड् गयी कि कि आप आयता को थाने में प्रताड़ित करना चाहते हैं कल्लूरी यहाँ इसीलिये आया है
आदिवासियों ने फिर थाने को घेर लिया .
इस सब से पुलिस आयता को प्रताड़ित नहीं कर पायी .
लेकिन पुलिस ने आयता पर अनेकों फर्ज़ी मामले बना कर आयता को जेल में डाल दिया है .
सोनी सोरी और उनके वकील आयता की ज़मानत की कोशिशों में लगे हुए हैं .
जब भारत का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमे आदिवासियों के खून के बहुत सारे धब्बे ज़रूर होंगे .
शायद कई पीढ़ियों बाद भारत का प्रधानमंत्री भी लालकिले से मरे हुए आदिवासियों से माफी मांगेगा जैसे आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने मारे गए लाखों आदिवासियों से अब माफी मांगी है .
हर विकसित सभ्यता में वहाँ के आदिवासियों की लाशें क्यों होती हैं ?
हम खुद को सभ्य और धार्मिक कैसे कह सकते हैं ?.

Wednesday, February 11, 2015

माँ के हाथ से बना खाना

हम सब अपनी माँ के हाथ से बने खाने के स्वाद को याद करते हैं .

मैंने इसकी खोज करने का विचार किया 

अपनी पत्नी को बेटियों के लिए खाना बनाते हुए ध्यान से देखा 

जब वह सब्जी खरीदती है तो ध्यान से खरीदती है कि मेरी बेटियों को कौन सी सब्जी पसंद है

अब इस बात में क्या ईर्षा करनी कि हमारी पसंद अब दोयम दर्जे पर रख दी गयी है

प्रकृति नयी पौध पर ज़्यादा ध्यान देने के लिए माँ को प्रेरित करती है

इसलिए माँ बच्चे की पसंद पर ज़्यादा ध्यान देने लगती है

जब सब्जी काटी जाती है तो माँ बच्चों की पसंद को ध्यान में रख कर सब्ज़ी काटती है ,

मुझ से अक्सर कहा जाता है कि आपने ये क्या सब्ज़ी काट दी है बच्चे इसे नहीं खायेंगे छोड़ देंगे

फिर जब सब्ज़ी बनने लगती है तो सारे मसाले बच्चों की पसंद को ख्याल में रख कर डाले जाते हैं ,

हर प्रक्रिया में माँ के मन में और हाथ में बच्चे की पसंद का ही ख्याल छाया हुआ था

अब जो खाना बनेगा वह बच्चों को तो पसंद आएगा ही

अब समझ में आ गया कि मेरी माँ के हाथ के खाने का स्वाद अब क्यों नहीं मिलता ?

वो तो सिर्फ माँ के हाथ के खाने में ही मिल सकता है .

इस पोस्ट को महिलाओं के अधिकारों से न जोड़ा जाय

क्योंकि इसके बाद बर्तन मांजने का काम मैं ही करता हूँ .

जनता की ताकत ज़िंदाबाद

छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार उद्योगपतियों के कहने से आदिवासियों को मार मार कर कर इतना डरा देना चाहती है की जब सरकार इन उद्योगपतियों के लिए आदिवासियों की ज़मीनें छीने तो आदिवासी सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत ना कर सके ,
इसके लिए गाँव गाँव में जाकर पुलिस डराने के लिए आदिवासियों को मार रही है घरों में घुस कर लूट- पाट करती है।
आदिवासियों ने इस सरकारी बदमाशी के लिए सरकार को सबक सिखाने का फैसला किया।
कल हज़ारों आदिवासी अपने अपने गाँव से निकल कर दंतेवाड़ा शहर की तरफ चल पड़े।
सोनी सोरी इन आदिवासियों के साथ थी।
सरकार के हाथ पाँव फूल गए।
रास्ते में हज़ारों पुलिस वाले और प्रशासनिक अधिकारियों ने आदिवासियों को शहर में घुसने से रोक दिया।
लेकिन आदिवासी डरे नहीं।
आदिवासियों ने कहा आप लाठी चलाइये गोली चलाइये लेकिन हम नहीं रुकेंगे।
आदिवासियों की दृढ़ता और गुस्सा देख कर पुलिस ने लिख कर माफीनामा दिया की अब से पुलिस आदिवासियों के घरों में घुस कर लूटपाट नहीं करेगी। अब से पुलिस किसी आदिवासी के साथ मारपीट नहीं करेगी।
प्रशासन ने लिख कर दिया की दस दिन के भीतर मारे गए निर्दोष आदिवासी के परिवार को मुआवज़ा दिया जाएगा और मामले की जांच करी जाएगी ।
अभी सबेरा दूर है लेकिन इसी तरह के काफिले इस अंधेरी रात को ख़त्म कर उजाला लाएंगे।
जनता की ताकत ज़िंदाबाद
सरकारी दमन मुर्दाबाद

अपने बच्चों के लिए एक बेहतर दुनिया बना कर जाइए

आपसे कहा गया कि लोकतंत्र का मतलब चुनाव में वोट डालना होता है
आपने मान लिया
जबकि असल में लोकतंत्र का मतलब होता है सबकी बराबरी
लेकिन आपने कभी यह जानने की जहमत नहीं की
आपसे कहा गया कि आपका धरम सबसे अच्छा है आपने मान लिया
आपने कभी पूछा नहीं कि आखिर ऐसा क्यों कि जिस धरम में मैंने जन्म लिया वही सबसे अच्छा क्यों माना जाय ?
आपसे कहा गया गरीब इसलिए गरीब होते हैं क्योंकि वे आलसी होते हैं आपने मान लिया
आपने यह नहीं पूछा कि कड़ी मेहनत करने वाले मजदूर और किसान इतने गरीब क्यों हैं ?
और आप कम मेहनत के बाद भी उनसे अमीर क्यों हैं ?
आपने यह नहीं पूछा कि आखिर हर विद्यार्थी यह क्यों चाहता है कि उसे कम मेहनत और
ज़्यादा तनख्वाह वाली नौकरी मिले ?
आपने यह जानने की कोशिश नहीं करी कि शिक्षा का मतलब दिमाग बंद कर के सिर्फ
अमीर आदमी की नौकरी करना आखिर किसके कहने से बना दिया गया है ?
पूछिए ये सारे सवाल पूछिए
गुलामी अँधेरे और तकलीफ का दौर अब खत्म होना चाहिये
इस दुनिया में सबके लिए काफी खाना ,कपड़ा और मकान है .
लेकिन आपका धरम आपकी राजनीति और आपकी शिक्षा
आपके दिमागों को कुंद बना रहे हैं
इसलिए आप
चंद स्वार्थी लोगों के गुलाम बन कर दुनिया में तकलीफ और हिंसा को बनाये रखे हुए हैं .
आँखे खोलिए
एक आज़ाद इंसान की तरह सोचना शुरू कीजिये
अपने बच्चों के लिए एक बेहतर दुनिया बना कर जाइए

सोनी ने प्रशासन को यह मुकदमा दर्ज़ करने के लिए धन्यवाद दिया है

सोनी सोरी पर छत्तीसगढ़ में नयी धाराओं में एक नया मामला दर्ज़ किया गया है .
पिछले दिनों पुलिस ने नदी में नहाते हुए एक निर्दोष आदिवासी की गोली मार कर हत्या कर दी थी .
पुलिस ने इस मामले में उल्टा नक्सलियों के खिलाफ़ रिपोर्ट लिख दी थी .
इस बात से नाराज़ मृतक के परिवार जन और ग्रामीण इस मामले की शिकायत करने कलेक्टर और एस पी के पास जाने के लिए निकले .
ग्रामीणों ने सोनी सोरी को साथ रहने के लिए कहा .
सोनी सोरी ने प्रशासन को आदिवासियों के इस पैदल मार्च की पहले से ही सूचना दे दी
आदिवासियों के इस पैदल मार्च में बड़ी संख्या में आदिवासियों को देख कर प्रशासन के हाथ पैर फूल गए और रास्ते में ही प्रशासन और पुलिस वालों ने लिखित आश्वासन देकर आदिवासियों के पैदल मार्च को वहीं रोक दिया .
लेकिन प्रशासन ने बाद में सोनी सोरी के ऊपर दंगा फसाद फैलाने और सरकारी आदेश के उलंघन करने की धाराओं में मामला दर्ज़ कर दिया .
सोनी पर धारा १४७, १४९,१८८ धारा लगाईं है
सोनी ने प्रशासन को यह मुकदमा दर्ज़ करने के लिए धन्यवाद दिया है .
इसका मतलब यह है कि सरकार आदिवासी की हत्या भी करेगी .
विरोध करने वालों पर भी मुकदमे करेगी .
किसी आदिवासी को मुंह भी नहीं खोलने देगी .
आदिवासियों की ज़मीने छीन कर अमीर उद्योगपतियों को देने के लिए यह सब करना बहुत ज़रूरी है

आइये इस अँधेरे से बाहर निकलने में पूरी मानवता की मदद करें

क्या मनुष्य मूल रूप से स्वार्थी और क्रूर है ?
कभी हम सब आदिवासी थे
और अगर आप आदिवासी समाज को देखें तो आप समझ जायेंगे कि मनुष्य मूल रूप से समाज के साथ मिल कर रहने वाला प्राणी है .
आदिवासी समाजों में सभी व्यक्ति समाज का ख्याल रखते हैं और समाज व्यक्तियों का ख्याल रखता है .
आदिवासी समाज में बूढ़े , बीमार , विकलांग सभी का ख्याल रखा जाता है .
आदिवासी समाजों में प्रकृति का कोई व्यक्ति मालिक नहीं माना जाता .
आदिवासी समाजों में जंगल नदी पहाड़ सबके सांझे होते हैं .
आदिवासी समाजों में कोई समाज को छोड़ कर अकेले अमीर बन जाने का सोचता भी नहीं है .
फिर ये विकसित समाज में मनुष्य ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है ?
विकसित समाज में क्यों मनुष्य सब को पीछे छोड़ कर सबसे आगे निकलना चाहता है ?
विकसित समाज में क्यों मनुष्य सारे संसाधनों का अकेले मालिक बन जाना चाहता है ?
विकसित समाज में क्यों आप सारी दुनिया के अकेले मालिक बन जाना चाहते हैं ?
याद कीजिये आप को स्कूल में क्या सिखाया जाता है ?
यही ना कि आपको सबसे ज़्यादा नम्बर लाने चाहिये
यही ना कि अपने बराबर में बैठे हुए बच्चे से बात मत करो
आपको समझाया गया कि आपका दोस्त असल में आपका प्रतिद्वंदी है
आपकी शिक्षा ने समझाया कि अच्छी तरह पढ़ाई करने का नतीजा यह होगा कि इस शिक्षा को पाने के बाद आप दूसरों से ज़्यादा अमीर बन सकोगे
आपको पढ़ाया गया कि मुनाफा कमाना अच्छी बात होती है
आपको पढ़ाया गया कि अमीर बनना ही जिंदगी का एक मात्र मकसद है
आपको समाज का दुश्मन बनाने का काम आपकी शिक्षा ने किया
आपको अपने दोस्त को अपना प्रतिद्वंदी समझने का काम आपकी शिक्षा ने किया
आपकी शिक्षा को कौन बनाता है ?
आप नौकरी के लिए पढते हैं ना ?
नौकरी उद्योगपति सेठ और अमीर के पास है ना
उद्योगपति सेठ और अमीर तय करते हैं कि उन्हें स्कूल कालेजों से कैसे लोग चाहियें
आपको वह पढ़ाया जाता है जो उद्योगपति सेठ और अमीर चाहते हैं ?
उद्योगपति सेठ और अमीर की बनाई हुई शिक्षा पाकर आप एक स्वार्थी लालची और आत्मकेंद्रित अकेले व्यक्ति बन जाते हैं .
अब आप सारे समाज से अलग अकेले खड़े हैं .
अब उद्योगपति सेठ और अमीर के लिए आपको गुलाम बनाना आसान है
अब जब उद्योगपति सेठ और अमीर आदिवासियों की ज़मीने छीनेगे तो आप अपने स्वार्थ के लिए चुप रहेंगे
आपको पता है कि जब ज़मीने छीने जायेंगी तभी तो कारखाने चलेंगे तभी तो आपको उद्योगपति सेठ और अमीर के यहाँ नौकरी मिलेगी.
अब आप समाज के खिलाफ़ काम करने वाले
एक स्वार्थी और क्रूर व्यक्ति बन जाते हैं
आपकी राजनीति
उसी उद्योगपति सेठ और अमीर के लिए काम करती है
आपकी पुलिस आपके अर्ध सैनिक बल आपकी सेना उसी उद्योगपति सेठ और अमीर के लिए काम करते है
आपकी पूरी अर्थ व्यवस्था अब उसी उद्योगपति सेठ और अमीर के मुताबिक़ चलती है
अब आप उस अर्थव्यवस्था
उस राजनीति
उस शिक्षा पद्धति के
एक उत्पादित माल हो
आपको अब उसी उद्योगपति सेठ और अमीर के लिए ही इस्तेमाल होना है
इस राजनीति
इस शिक्षा पद्धति
इस अर्थव्यवस्था
ने आपको क्रूर
स्वार्थी
मूर्ख बना दिया
इस पूरी व्यवस्था में मनुष्य के भीतर
छिपे हुए
सौंदर्य
प्रेम
कला
और उसके उज्जवल पक्ष के विकास की कोई संभावना नहीं है
इस व्यवस्था में पैदा होने वाले बच्चे
क्रूर और हत्यारों को अपना नेता और
भाग्य विधाता स्वीकार कर लेते हैं
आज़ादी के बाद भारत एक दिन इस मोड़ पर खड़ा होगा किसने कल्पना करी होगी ?
यह मानवता के विकास का अब तक का सबसे अन्धकार युक्त समय है .
लेकिन यह इस अँधेरे से बाहर निकलने के प्रयत्न का भी अवसर देता है
आइये इस अँधेरे से बाहर निकलने में पूरी मानवता की मदद करें .

आओ हमें भी जेल में डाल दो

मोदी सरकार सामाजिक संस्थाओं पर कार्यवाही करने की तैयारी कर रही है
कल हिन्दुस्तान टाइम्स के मुम्बई संस्करण में गृह मंत्रालय के दस्तावेजों के हवाले से खबर छापी गयी है
अखबार के पहले पन्ने पर छपी इस खबर में एमनेस्टी इंटरनेशनल , डाक्टर विदाउट बार्डर और हमारी दंतेवाड़ा की संस्था वनवासी चेतना आश्रम का भी इस सूची में नाम है .
अन्य नामों में पीयूसीएल , और ग्रीनपीस का भी नाम है .
मैं और मेरी पत्नी 1992 में जब दंतेवाड़ा गए थे तब हमने एक संस्था का गठन किया था . हमने अट्ठारह साल दंतेवाड़ा में काम किया .
आदिवासियों के मानवाधिकारों के लिए आवाज़ उठाने के कारण सरकार ने हमारे संस्था के आश्रम पर बुलडोजर चला दिया था .
हमने पांच सौ से ज़्यादा मानवाधिकार हनन के मामले सर्वोच्च न्यायालय को सौंपे .
लेकिन सरकार ने हमारे द्वारा अदालत में ले जाए जाने वाले आदिवासियों का अपहरण कर लिया और पुलिस ने बलात्कार पीड़ित लड़कियों का दोबार अपहरण कर के थाने में ले जाकर पांच दिन तक दुबारा बलात्कार किया था .
मेरी हत्या की तैयारी कर ली गयी थी . मेरे साथियों को जेल में डाल दिया गया .
आदिवासियों के मामलों को अदलत में लड़ने के लिए खुद को जिंदा रखने के लिए मैंने और मेरी पत्नी ने 2010 में छत्तीसगढ़ छोड़ दिया था और दिल्ली आ गए थे .
जब तक मैं दंतेवाड़ा में था तब तक मुझ पर नक्सलियों के साथ सम्बन्ध होने का कोई मामला सरकार ने नहीं बनाया था .
क्योंकि हमारा काम इतना खुला और शानदार था कि सरकार को हमारे खिलाफ़ फर्ज़ी केस बनाने के कारण मुंह की खानी पड़ती .
दंतेवाड़ा छोड़ने के बाद मेरा नक्सलियों से सम्बन्ध होने की कोई सम्भावना नहीं थी . क्योंकि उसके बाद मैं कभी छत्तीसगढ़ नहीं गया .
दंतेवाड़ा छोड़ने के छह साल बाद अब जाकर मोदी सरकार को याद आ रहा है कि हमारी संस्था का नक्सलियों से संपर्क है ?
लेकिन असली बात दूसरी है .
सरकार को सब पता है कि हिमांशु का नक्सलियों से कोई सम्बन्ध नहीं है .
सरकार की परेशानी यह है कि हिमांशु की नज़र छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के सरकारी दमन पर है .
सरकार आदिवासियों की ज़मीन छीनना चाहती है .
आदिवासी ज़मीन छोडना नहीं चाहता .
सरकार आदिवासी को डराने के लिए औरतों से बलात्कार करती है .
निर्दोष आदिवासियों की बड़ी संख्या में हत्या करती है .
तब हम बोलते हैं .
सरकार को कोर्ट में घसीट लेते हैं .
यही सरकार की नाराजगी की वजह है .
सरकार हमें डरा कर चुप करवाना चाहती है .
सरकार चाहती है कि जब सरकार किसी आदिवासी महिला की योनी में पत्थर भरे तो हम चुप रहें .
सरकार चाहती है कि सरकार अगर आदिवासी बच्चों की हत्या करे तो हम यह मान लें कि वे सब बच्चे नक्सलवादी थे .
सरकार चाहती है कि हम मान लें कि अंकित गर्ग और कल्लूरी जैसे विकृत मस्तिष्क के सेक्स मैनियाक अधिकारी असल में राष्ट्र की रक्षा कर रहे हैं .
सरकार को दंतेवाड़ा से सूचनाएं तो अंकित गर्ग और कल्लूरी जैसे पुलिस अधिकारी ही रिपोर्ट भेजते हैं ना ?
तो अंकित गर्ग और कल्लूरी जैसे अधिकारी हिमांशु के बारे में क्या खबर दिल्ली भेजेंगे ? यही ना कि इस आदमी को यहाँ से हटाओ तभी हम आदिवासी को मार पाएंगे .
लेकिन हम नहीं हटेंगे .
हम बहुत अच्छे लोगों की संगत में रहते हैं .
हमारे संगी साथी वो हैं जिन्हें कभी किसी सत्ता ने ज़हर पिलाया था .
हमारे संगी साथी वो हैं जिन्हें किसी सत्ता ने सूली पर चढ़ा दिया था .
हम उसके संगी हैं जिसे तुमने तीन गोलियाँ मारी थीं .
आओ हमें भी जेल में डाल दो .
अगर सोनी सोरी ,
लिंगा कोडोपी ,
आरती मांझी ,
दयामनी बारला ,
अपर्णा मरांडी नक्सलवादी हैं तो हम खुले आम कह रहे हैं कि हम इनके समर्थक हैं
आओ
आदिवासियों का समर्थन करने के जुर्म में हमें भी जेल में सड़ा दो .
इससे ज़्यादा तुम कुछ नहीं कर सकते .
लेकिन हम चुप नहीं होंगे .
हम जब तक जिंदा हैं और जेल से बाहर हैं .
हम इन सभी भारतीय नागरिकों के सामान अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते रहेंगे .
क्योंकि अगर हमने एक भी नागरिक के अधिकारों की हत्या स्वीकार कर ली तो इसका अर्थ होगा कि हमने हर नागरिक के अधिकारों की हत्या स्वीकार कर ली है .
आपको अम्बानी और अदाणी के लिए भारत के गरीबों के ज़मीनों ,जंगलों पहाड़ों पर कब्ज़ा करना है .
यह हम अपनी जान रहते होने नहीं देंगे .