Wednesday, September 17, 2014

हरिप्रिया की क्लास


सुबह सुबह हरिप्रिया ने कहा आज खड्ड (पहाड़ी नदी ) में घूमने चलें पापा ? 

मैंने कहा चलो चलते हैं . 

हरिप्रिया स्कूल नहीं जाती . 

हरिप्रिया ने चार महीने पहले स्कूल को विदा दे दी है .

मैं और हरिप्रिया नैण गाँव को पार करके एक पहाड़ी के बीच में बने हुए पथरीले रास्ते से नदी की तरफ बढ़ने लगे .

रास्ते में हरिप्रिया ने सीखा कि नदी के किस तरह के ऊंचे किनारे को अंग्रेज़ी में क्लिफ कहा जाता है ,किस तरह के नदी के तट को रिवर बैंक कहा जाता है .

हम क्लिफ से नीचे उतर कर नदी के किनारे पहुंचे . क्लिफ से पत्थरों से पानी के चश्मे से पानी रिस रहा था . हरिप्रिया को पानी का चश्मा , नेचुरल स्प्रिंग , प्राकृतिक जल स्रोत ,शब्द सीखने को मिले .

कुछ दिन पहले हरिप्रिया ने एक हाइकू लिखा था .

''हाथ में मिनरल वाटर
सामने बहे साफ़ पानी
क्या पियें ?''

आज हरिप्रिया का हाइकू जीवंत हो गया था .

हरिप्रिया ने झट से चश्मे का पानी पिया . और साथ में घर से लाइ हुई बोतल में से बचा खुचा पानी मुझे पीने के लिए दिया .

और फिर बोतल को चश्मे के पानी से भर लिया . हम दोनों ने घर के पानी और चश्मे के पानी की तुलना करी और हम दोनों इस बात पर सहमत हो गए कि चश्मे का पानी ज़्यादा मीठा और स्वादिष्ट है .

हरिप्रिया की राय थी कि इस पानी में बस्तर के पानी का स्वाद है .

मैं तो अब बस्तर के पानी का स्वाद भूल चूका था .

मैंने सम्भावना व्यक्त करी कि संभव है कि बस्तर और इस चश्मे के पानी में प्राकृतिक खनिज घुले हों इसलिए दोनों का स्वाद एक जैसा लग रहा हो .

हम दोनों जाकर नदी के बीच में एक बड़ी चट्टान पर बैठ गए . नदी में पहाड़ की तरफ से ग्लेशियर का पानी तेज आवाज़ के साथ आ रहा था . ऊपर चट्टानों से टकराने और ऊपर से गिरने की वजह से पानी सफ़ेद दिख रहा था .

लेकिन जहां हम बैठे थे वहाँ जगह गहरी होने की वजह से पानी हरा दिखाई दे रहा था . पानी के अलग अलग रंग के दिखाई देने पर हम लोगों ने चर्चा करी . हरिप्रिया को मैंने दिखाया कि देखो नदी के दूसरी तरफ क्लिफ की पूरी ढाल पर जो हरियाली है उस के कारण पानी का रंग हरा दिखाई दे रहा है . जबकि सूरज की किरणों के परावर्तन के कारण उछलता हुआ पानी सफ़ेद दिखाई दे रहा है .

इसके बाद हरिप्रिया ने जाना कि जैव विविधता का क्या मतलब है . इकोलोजिकल सिस्टम किसे कहते है , इको फ्रेंडली किसे कहते हैं . काई , छोटे पौधे , मझोले पौधे , बड़ी झाडियाँ मझोले पेड़ , बड़े पेड़ , लतायें ,,छोटे कीट , कीट को खाने वाले जीव , चिडियाँ , तितलियाँ , उन्हें खाने वाले बड़े जीव , शाकाहारी ,जानवर , उन्हें खाने वाले मांसाहारी जानवर आदि मिल कर पूरी जैव विविधता का निर्माण करते हैं .

फिर मैंने पूछा कि तुम्हारी राय में इस दुनिया पर सबसे ज़्यादा हक़ किसका है क्या इंसान का या इन सब जीवों का भी .

हरिप्रिया ने तुरंत कहा कि सबका बराबर हक़ है .

हरिप्रिया ने गुस्से से पूछा 'पापा क्या सारे जीव मिल कर दुनिया को बरबाद करने वाले इंसान को सबक नहीं सिखा सकते ?'

इस पर मैं काफी देर तक हँसता रहा .

मैंने कहा कि बेटी ये तो अब तुम्हे सोचना है कि इस लालची इंसान को सबक कैसे सिखाया जाय ?

फिर हमने नदी में ऊपर की तरफ क्लिफ पर बने मानशी के घर की तरफ जाने का फैसला किया .

लेकिन नदी में पानी काफी था और बहाव भी काफी तेज था .

रास्ते में श्मशान आया . हरप्रिया ने बताया कि गाँव वाले कहते हैं कि इस श्मशान में इस पेड़ पर बहुत सारे भूत रहते हैं .

हम दोनों काफी देर तक श्मशान में उस पेड़ की नीचे बैठे रहे .

कुछ देर बाद हमने ऊपर की तरफ बढ़ना शुरू किया . नदी में काफी पानी था . नदी के किनारे बड़ी बड़ी चट्टानें और तीखा ढाल था .

हमने उसी ढाल पर तिरछी दिशा में बढ़ना जारी रखा . काफी बड़ी बड़ी चट्टानों पर रेंग कर घिसटते हुए चढ़ते उतरते हुए करीब एक घंटे बाद हम एक किलोमीटर ऊपर पहुँच पाए .

मानशी के घर पहुँचते हुए हम काफी थक गए थे . वहाँ मानशी के तीन साल के बेटे अबीर , उनके दोनों कुत्तों ताशी और साकसी ने हमारा स्वागत किया , मानशी ने हमें बढ़िया नाश्ता खिलाया . बाद में हम करीब ग्यारह बजे घर पहुँच गए .

इस तरह हरिप्रिया की क्लास पूरी हुई .

Monday, September 15, 2014

टीवी

जब मेरठ में हमारे पड़ोस के मोहल्ले में टीवी आया . तब मैं दूसरी कक्षा में पढता था . 

मेरठ जैसे छोटे शहर में दूसरी कक्षा को सेकेण्ड क्लास कहने जितना विकास नहीं हुआ था .

 पिताजी का केबिनेट मंत्री का दर्ज़ा था लेकिन उन्होंने सरकारी वेतन नहीं लिया .

 गांधी आश्रम से मिलने वाले तीन सौ रूपये के मानदेय में माँ चार बच्चों को पालती थी . 

 दूसरे मुहल्ले के एक बड़े से घर में जो बनियों का था मैंने अपनी जिंदगी का पहला टीवी देखा था . 

अपने बैठने के लिए बोरी घर से लेकर जानी पड़ती थी . 

ज़्यादा कुछ समझ में नहीं आता था . लेकिन बड़ी बहनों के साथ जाना पड़ता था नहीं तो वो पीटती थीं . 

मैं टीवी देखते हुए अक्सर सो जाता था . और बाद में उंघते और रोते ठुनुकते वापिस आता था . 

मेरे पांचवीं पास करने तक पिताजी का गांधी आश्रम से मतभेद हो गया था . 

आश्रम वालों का कहना था कि जे पी के आन्दोलन का समर्थन कीजिये . 

लेकिन पिताजी और उनके साथियों का कहना था कि जे पी का आन्दोलन सम्पूर्ण क्रन्ति का आन्दोलन नहीं है . यह एक सत्ता को हटा कर दूसरी पार्टी की सत्ता मात्र लाने का आन्दोलन है . 

इसके बाद पिताजी को गांधी आश्रम छोडना पड़ा . परिवार मुज़फ्फर नगर वापिस आ गया .

मुज़फ्फर नगर में एक परिचित जिन्हें हम सत्यवती ताई जी कहते थे जिनके बेटे संतोष शर्मा जाने माने वकील हैं . उनके घर दो किलोमीटर दूर टीवी देखने जाया करते थे .

हम इतवार को आने वाली फीचर फिल्म और बुधवार के चित्रहार का इंतज़ार करते थे . 

बाद में हमारे ताऊ ब्रह्म प्रकाश जी ने भी टीवी खरीद लिया . 

अब तो हमारे मज़े आ गए . 

हम साढ़े पांच बजे ही टीवी शुरू होने से आधे घंटे पहले से ही टीवी खोल कर बैठ जाते थे .

 पहले तो स्क्रीन पर बिंदी बिंदी झिलमिलाती रहती थी . 

फिर स्क्रीन पर पट्टियां दिखाई देने लगती थीं . 

हम खुश हो जाते थे कि अब टीवी शुरू होने वाला है . 

उसके बाद रात ग्यारह बजे तक हम टीवी के आगे बैठे रहते थे .

लास्ट में टीवी का समय पूरा होने के बाद जब बिंदी बिंदी झिलमिलाने लगती थीं तब ही टीवी बंद होता था और हम सोने जाते थे .

जब कभी चुनाव के नतीजे आते थे तब कई फिल्मे दिखाई जाती थीं . तब तो त्यौहार का सा माहौल बन जाता था .

बाद में शनिवार की फिल्म शुरू हुई चित्रहार शुक्रवार को भी आने लगा .

सन बयासी में टीवी रंगीन हो गया . 

फिर हम बड़े होने लगे . टीवी देखना कम होता गया .

अब तो चौबीस घंटे के सैंकडों चैनल हैं लेकिन अब मेरे घर में टीवी है ही नहीं . 

टीवी का शौक़ीन वो बच्चा अब कहीं गुम हो गया है शायद .

Sunday, September 14, 2014

यही वह राजनैतिक व्यवस्था है

गरीब कौन है ?
जिसके पास खाने ,पहनने या रहने के लिए खाना ,कपड़ा या मकान न हो
तो क्या दुनिया में
खाना कम है ?
क्या दुनिया में सबकी ज़रूरत के लिहाज़ से कपड़े कम हैं ?
क्या दुनिया में सभी इंसानों के रहने के लिए ज़मीन कम है ?
नहीं असल में तो दुनिया में
खाना ज़रूरत से ज़्यादा है
कपड़े ज़रूरत से भी ज़्यादा हैं
ज़मीन सभी के घर बनने के लिए काफी से भी ज़्यादा है
फिर दुनिया के करोड़ों लोग
बिना खाना
बिना कपड़े
बिना मकान क्यों हैं
कहीं ऐसा तो नहीं हम बंटवारे में कोई गलती कर रहे हों ?
क्या कोई बच्चा गरीब ही पैदा होता है ?
क्या जो बच्चा पैदा हुआ है
उसके लिए ज़मीन
कपडा
मकान
इस दुनिया में
मौजूद नहीं है ?
या उस बच्चे के हिस्से की ज़मीन पर किसी और का कब्ज़ा है ?
उस बच्चे के कपड़ों पर किसी और का कब्ज़ा है
उस बच्चे के रहने की ज़मीन पर किसी और का कब्ज़ा है ?
ये बच्चे के ज़मीन पर जिसका कब्ज़ा है
क्या वही
दुनिया के हर बच्चे
की भूख
नंगापन
और बेघर होने के लिए ज़िम्मेदार हैं ?
क्या उस नए पैदा हुए बच्चे की ज़मीन पर कब्ज़ा
करने वाला
अमीर
कानून की मर्जी के बिना
बच्चे के
खाने
कपड़े और मकान पर कब्ज़ा कर के
बैठ सकता है ?
क्या कानून ही यह नहीं कहता
कि आपकी हज़ारों एकड़ ज़मीन में से
अभी अभी पैदा हुआ बच्चा अपना
खाने
कपड़े
और घर
के लिए ज़मीन का हिस्सा मांगेगा
तो सरकार
की पुलिस
आपकी हज़ारों एकड़
ज़मीन की रक्षा
करेगी .
इस तरह
सरकार की पुलिस की बंदूकें
गरीब बच्चे
के
खाना
कपड़ा
मकान
का हक़
छीन लेती है
आप
सोच रहे थे
कि सरकारें
गरीब की तरफ होती हैं
नहीं
बल्कि
सरकारों के कारण
करोड़ों लोगों की
गरीबी
इस दुनिया से जा नहीं रही है
जिसके पास
ज़्यादा
ज़मीन है क्या
उसके लिए प्रकृति ने ज़्यादा ज़मीन बनाई है ?
अगर आप कहते हैं कि यह ज़मीन उसकी मेहनत का नतीजा है तो क्या
क्या मेहनत का नतीजा यह होना चाहिए कि कोई व्यक्ति दूसरे की ज़रूरत
की ज़मीन
पर कब्ज़ा कर के बैठ जाए ?
क्या ज़्यादा
ज़मीन वाले के पास इसलिए ज़्यादा
ज़मीन नहीं है
क्योंकि
यह ज़मीन
उसके बाप की है
और इस अमीर ने इस ज़मीन के लिए कोई मेहनत नहीं की है ?
इस तरह आपने देखा
समस्या
गरीबी नहीं है
समस्या तो अमीरी है
समस्या
इस अमीरी
की रक्षा करने वाले कानून
और इस
अमीरी की रक्षा करने वाली
सरकार
है
यही वह राजनैतिक व्यवस्था है
जिसे बदले बिना
दुनिया से भूख
नंगापन
और बेघरी
नहीं जायेगी
आप
इस क्रूर व्यवस्था
को समझ न सकें
इसलिए आपके स्कूल
आपको इस व्यवस्था की तारीफ के गुण गाना
सिखाते हैं
आपका धर्म
इस पर सवाल नहीं खड़े करना सिखाता
और आप
इस दुनिया को
सुंदर बनाने के अपने धर्म से वंचित
रह कर ही अपनी उम्र पूरी कर के
इस दुनिया से चले जाते हैं
और यह क्रूर व्यवस्था यूं ही चलती रहती है
इसे समझिए
इस पर सवाल उठाइये
ताकि दुनिया को
बदलने की संभावना
मज़बूत हो सके
इस दुनिया को बदलने का वख्त अभी है

Wednesday, September 10, 2014

हम हर दौर में सत्ता से लड़े हैं

जब हम कहते थे कि तुमने आपने अर्ध सैनिक बल आदिवासी इलाकों में इस लिए भर दिए हैं 
ताकि तुम आदिवासी इलाकों के जंगलों 
पहाड़ों नदियों और खदानों पर कब्ज़ा कर सको 
और इन खदानों,पहाड़ों, जंगलों को अम्बानियों , टाटाओं जिन्दलों और वेदान्ता को सौंप सको 

और हमारे देश के 
आदिवासियों 
गाँव वालों 
करोड़ों लोगों को 
बेघर करने 
बेज़मीन करने 
और 
इन गाँव वालों और 
आदिवासियों को गरीब बनाने का काम  
हमारे अपने ही सिपाही   
इन अमीरों के लिए  
सरकारी हुकुम से 
करते हैं 

तो आप कहते थे 
कि हम तो विदेश एजेंट नक्सली और विकास विरोधी हैं  
इसलिए हिंसक सरकारी कार्यवाहियों का विरोध करते हैं 

लेकिन साबित हो गया है कि आप 
आदिवासियों को अपने अमीर आकाओं के लालच के लिए मार रहे थे 

लीजिए सबूत 
अब तो आपके मुंह से नकाब खिंच गया 
हुज़ूर 

आप की नज़र तो शुरू से ही आदिवासियों के जंगल और खदानों पर थी 
अब आप कानून की भी धज्जियां उड़ाने पर उतर आये हैं 

कानून कहता है कि आदिवासियों के इलाकों में जंगल काटने 
के लिए आदिवासियों की इजाज़त चाहिए 
लेकिन सरकार इस कानून में बदलाव कर रही है 
अब आदिवासियों के जंगल काटने के लिए आदिवासियों की ग्राम सभा से पूछने की कोई ज़रूरत नहीं रहेगी 

मोदी साहब को जिताने में पैंतीस हज़ार करोड़ रुपया किसने खर्च किया था ?
उनका नाम पूछिए 
आप ज़रा सी खोज कीजिये आप को पता चल जाएगा 
कि खदानों ,जंगलों और ज़मीनों पर उन्ही अमीरों को कब्ज़ा दिलाने के लिए 
कानूनों को बदला जा रहा है 

लेकिन हम  
इस देश के जंगलों 
नदियों पहाड़ों सागर तटों को अमीरों के लालच और मुनाफे की भेंट 
नहीं बनने देंगे 

इस देश के करोड़ों लोग इन जंगलों , नदियों 
सागर तटों पर ही जिंदा हैं 

हम अपने देश वासियों को 
आपके और आपके अमीर आकाओं के 
लालच के लिए 
बेघर , बेज़मीन 
और बर्बाद नहीं होने देंगे 

तुम शौक से हमें नक्सली कहो 
विदेशी एजेंट कहो 
विकास विरोधी कहो 
आपकी खुशी 

हम अपना युग धर्म ज़रूर निबाहेंगे 
मोदी साहब 
हम हर दौर में सत्ता से लड़े हैं 
ये लड़ाई जारी रहेगी 


http://epaper.business-standard.com/bsepaper/svww_zoomart.php?Artname=pdf/2014/09/09/20140909aK016101007&ileft=180&itop=924&zoomRatio=130&AN=20140909aK016101007&path=0

Sunday, September 7, 2014

ये स्कूल पूंजीपतियों की बनाई हुई शिक्षा प्रणाली को ही चला रहे हैं

बच्चों को स्कूलों में खिड़की से बाहर देखने के लिए मना किया जाता है 
बच्चों को स्कूल में दूसरे बच्चों से बात करने से मना किया जाता है 
बच्चों को स्कूल में दूसरे बच्चों को पीछे कर के आगे निकलने के लिए उकसाया जाता है 

अब बच्चे के दिमाग का स्विच आस पास से बंद हो जाता है .
अब बच्चे को आस पास की प्राकृतिक सुंदरता में कोई आनंद नहीं आता .
अब बच्चे को आस पास के लोगों के साथ के रिश्तों में कोई रुची नहीं बचती .

अब बच्चा एक ऊबा हुआ
आस पास के लोगों को अपना प्रतिस्पर्धी मानने वाला
समाज को दुश्मन समझने वाला
प्रकृति से कटा हुआ
बनावटी स्वभाव वाला व्यक्ति बन जाता है

बच्चे को इस हालत में आपकी यह शिक्षा ले जा रही है

अब बच्चे को मनोरंजन के लिए
वीडियो गेम
और बाद में शराब या ड्रग्स के नशे चाहिए

स्कूल बच्चे को सिखाता है कि तम्हारी पढ़ाई का उद्देश्य
सिर्फ किताबें याद करना
और उसे परीक्षा में जाकर लिख देना भर है

इस तरह हमारे स्कूल बच्चे को आस पास के जीवन से विज्ञान , साहित्य , कला , समाजशात्र
सीखने या समझने की सारी संभावना को पूरी तरह खत्म कर देते हैं

मेरी छोटी बेटी हरिप्रिया ने ने अब स्कूल जाना बंद कर दिया है

अब वो खुद ही गाँव वालों के साथ बकरियां चराने जाती है
गाँव वालों के साथ खेतों में काम करने जाती है
खुद ही लिखती पढ़ती रहती है
उपन्यास पढ़ती है
पेंटिंग बनाती है
कविताएँ लिखती है

इसके अलावा हम लोग आजकल आसपास के स्कूल जाने वाले बच्चों
के साथ भी काम कर रहे हैं

हम बच्चों को
जंगल में घूमने लेकर जाते हैं
बच्चों को चिड़ियों ,तितलियों
को देखने और
उन्हें देख कर आनंद लेने के लिए
प्रेरित करते हैं

इसके लिए हम बच्चों को उपदेश नहीं देते
बल्कि हम प्रकृति के बीच खुद ही खुश होते हैं
जिससे बच्चे भी
फूलों, चिड़ियों , तितलियों
बादलों को देख कर खुश होने लगते हैं

हम बच्चों को अपने दादा दादी , माँ
और आस पास के लोगों के बारे में लिखने
और उनके चित्र बनाने के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं

ताकि बच्चे अपने आस पास के लोगों को महत्व दें
और वो यह समझ पायें कि दुनिया में सब लोग
महत्वपूर्ण हैं

अगर हमने यह नहीं किया तो हमारे स्कूल बच्चों को यही सिखा देंगे
कि पैसा कमाना और चीज़ें खरीद कर जमा करना ही
सबसे महत्वपूर्ण है

ताकि हमारे बच्चे
पूंजीपतियों के गुलाम बन कर पैसा कमाने को ही महत्वपूर्ण माने और
देश के सारे सागर , जंगल , ज़मीने खनिज
उनके हवाले कर दें

ये स्कूल पूंजीपतियों की बनाई हुई
शिक्षा प्रणाली को ही चला रहे हैं
हमारी सरकारें इस बदमाशी
में शामिल हैं .

इसलिए भविष्य के समाज को ठीक दिशा में ले जाने का काम तो हमेशा वर्तमान पीढ़ी को ही करना होगा

इस तरह आप और आपके स्कूल बच्चों के दिमागों में मेहनत के प्रति नफ़रत के विचार डाल रहे हैं

हम अपने घर में और हमारे स्कूल बच्चों को क्या सिखा रहे हैं 
खूब पढ़ो जिससे तुम बड़े आदमी बनो 
बड़े आदमी बनो मतलब अमीर आदमी बनो 
यानी आप सिखा रहे हैं कि पैसे वाला आदमी ही बड़ा आदमी होता है 

आप यह भी सिखा रहे हैं कि किताबें पढ़ने वाले को ज़्यादा अमीर होने का अधिकार है
किताबें न पढ़ने वाले का गरीब रहना बिलकुल ठीक है
यानी आप अपने बच्चे को सिखा रहे हैं कि
शरीरिक श्रम हीन बात है
और दिमागी काम ज़्यादा इज्ज़तदार और कमाऊ होता है

इस तरह आप और आपके स्कूल
बच्चों के दिमागों में मेहनत के प्रति नफ़रत के विचार डाल रहे हैं

अब बच्चा मजदूरों से
बढ़ई से
नलसाज़ से
मोटर मेकेनिक से
अपने को ऊपर और
श्रेष्ठ मानने लगता है

आपका बच्चा मानता है कि किसी सेठ की कम्पनी के आफिस में नौकर होना ज़्यादा इज्ज़त की बात है
बजाय कि एक अच्छा बढ़ई , नलसाज़ या मेकेनिक होना .

इसी तरह आपका स्कूल और आप अपने बच्चे को
यह भी सिखाते हैं कि सफाई करने वाले लोग नीच होते हैं
यानी आप और आपका स्कूल बच्चे को ये भी सिखाते हैं कि
गंदगी करने वाले लोग श्रेष्ठ होते हैं

इस तरह आपका बच्चा सफाई करने को नीचा काम
और कचरा फैलाने को अमीरी का प्रतीक मानने लगता है

आप और आपका स्कूल बच्चों को यह भी सिखाते हैं कि
गरीब लोग इसलिए गरीब होते हैं क्योंकि वे लोग आलसी होते हैं

लेकिन दिल पर हाथ रख कर कहिये कि क्या यह सच बात है ?

क्या मजदूर और किसान आपसे कम मेहनत करता है ?

या उसकी मेहनत का मूल्य आपके काम से कम है क्या ?

क्या आपके आफिस का काम किसान और मजदूर के काम से ज़्यादा कीमती है ?

आप और आपका स्कूल बच्चों को सिखाते हैं कि जिस धर्म में हम पैदा हुए वही सर्व श्रेष्ठ है .

आप और आपका स्कूल बच्चे को यह भी सिखाते हैं कि जिस देश में हमने जन्म लिया है वही सबसे अच्छा देश है .

इस तरह आप और आपका स्कूल बच्चे में झूठ भर देते हैं

जबकि सच्चाई यह है कि दुनिया के सभी धर्म और सभी देश एक जैसे ही हैं

इसलिए खुद के देश और धर्म को सबसे बड़ा और बढ़िया मानना
आज के युग में मूर्खता के सिवाय कुछ भी नहीं है

यह झूठी श्रेष्ठता का भाव
बच्चों में दूसरे धर्मों और पड़ोसी देशों के बारे में नफ़रत पैदा करता है

ध्यान से देखिये
आप और आपके स्कूल
इस दुनिया में
बराबरी
सदभाव
और सभी मनुष्यों के बीच एकता लाने
में कितनी बड़ी बाधा हैं ?

इस सब को समझे बिना
आप गीता
कुरआन
बाइबिल
ग्रन्थ साहिब का
कितना भी पाठ करते रहिये
दुनिया
अच्छी बन ही नहीं सकती

इसलिए इस शिक्षा में
पूरे के पूरे
बदलाव की ज़रूरत है

Monday, August 25, 2014

शुभ्रदीप चक्रबर्ती




थोड़ी देर पहले शुभ्रदीप चक्रबर्ती के न रहने की खबर मिली. विश्वास करने में कुछ समय लगा .
अभी कुछ ही दिन पहले ही तो फोन पर शुभ्रदीप से लंबी बात हुई थी .
शुभ्रदीप की मौत ब्रेन हेमरेज से हुई . शुभ्रदीप से जब मेरी आखिरी बार बात हुई वो कुछ परेशान था .
अभी हाल ही में शुभ्रदीप और उसकी पत्नी मीरा ने बहुत मेहनत से मुज़फ्फर नगर के दंगों पर एक फिल्म ' इन दिनों मुज़फ्फर नगर ' बनायी थी .
इस फिल्म को सेंसर बोर्ड के प्रमाणपत्र के लिए शुभ्रदीप और मीरा ने फिल्म को सेंसर बोर्ड में जमा किया .
लेकिन सेंसर बोर्ड का भी अब मोदी करण हो गया है .
शुभ्रदीप और मीरा की फिल्म को सेंसर बोर्ड ने प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया .
शुभ्रदीप और मीरा ने इस फिल्म पर अपनी सारी जमा पूंजी लगा दी थी .
मैंने फिल्म देखी है . फिल्म बहुत ही असरदार है और भाजपा के साम्प्रदायिक मुखौटे को उतार सकती थी .
इस घटना के बाद से शुभ्रदीप कुछ परेशान सा था .
अभी मीरा से फोन पर बात हुई मीरा का कहना था कि कुछ समय से वो सर दर्द होने की बात कहते थे और सर दर्द की दवा खा लेते थे .
और आज अचानक यह हादसा हो गया .
जहां तक शुभ्रदीप का सवाल था .
शुभ्रदीप दिल से साम्प्रदायिकता के खिलाफ़ था .
शुभ्रदीप से मेरी पहली मुलाकात जयपुर में पीयूसीएल के सम्मलेन में हुई थी .
वहाँ शुभ्रदीप ने अपनी एक फिल्म दिखाई थी जिसमे निर्दोष मुस्लिम लड़कों को आतंकवादी कह कर जेलों में डाल दिया गया और बाद में वो सब निर्दोष पाए गए थे ,
उस फिल्म में शुभ्रदीप ने उन नौजवानों की जिंदगी तबाह होने की कहानियों का चित्रण किया था .
उसके बाद मुज़फ्फर नगर दंगों के बाद शुभ्रदीप और मीरा ने इन दंगों पर फिल्म बनाने के फैसला किया .
मीरा, शुभ्रदीप और मैं हफ़्तों तक पीड़ित मुस्लिमों के शिविरों में गाँव में जा कर उनसे मिलते रहे और फिल्म की शूटिंग करते रहे .
फिल्म बनी लेकिन उसे दिखाने से रोक दिया गया .
मीरा और शुभ्रदीप द्वारका में हमारे घर से कुछ दूर ही रहते थे .
अक्सर वे दोनों शाम को समोसे लेकर हमारे घर आ जाते थे और कहते थे कि चलो आज शाम की चाय इकट्ठे ही पीते हैं .
मेरी दोनों बेटियों को मीरा और शुभ्रदीप बहुत लाड़ करते थे .
अभी दिल्ली छोड़ कर जब हमारा परिवार हिमाचल आने लगा तो मीरा और शुभ्रदीप ने हम सब को घर पर साथ में शाम को बुलाया .
शुभ्रदीप और मीरा ने दोनों बेटियों को अपने किताबों के संग्रह में से अनेकों किताबों का उपहार दिया .
आज जब दोनों बेटियों को मैंने यह खबर सुनाई तो दोनों बहुत देर तक विश्वास ही नहीं कर सकीं कि मैं यह क्या कह रहा हूँ .
मीरा से मेरी पत्नी वीणा की अभी कुछ देर पहले बात हुई, मीरा कह रही थी कि देखिये भाभी एक पल में जिंदगी कैसे बदल गयी .
आज की शाम उदासी से भरी हुई है .
लेकिन शुभ्रदीप ने अपने छोटे से जीवन में जो किया है वह बहुत महत्वपूर्ण रहेगा .
हमेशा .
अलविदा दोस्त .


भारत का इतिहास एक कैसे हो सकता है ?

भारत का इतिहास एक कैसे हो सकता है ?

भारत के तो कई इतिहास होंगे .

राजाओं का एक इतिहास होगा 
उनके दासों का दूसरा इतिहास होगा 
.
महाजनों का एक इतिहास होगा .
मजदूरों का दूसरा इतिहास होगा .

एक ब्राह्मणों का इतिहास होगा .
दूसरा शूद्रों का इतिहास होगा .

आप जो कह देते हैं न कि ये भारतीय इतिहास है
और आप बस उसमे राजाओं की और ब्राह्मणों के लिखे ग्रंथों जैसे वेद या गीता
की ही बात कर के इतिहास पर पूरी बातचीत ही खतम कर देते हैं

ये एक ही इतिहास में सब को लपेटना असल में आपकी एक चालाक हरकत है

इसी तरह भारत की कोई एक परम्परा भी नहीं है
आप जो कहते हैं न कि यह हमारी भारतीय परम्परा है

ऐसी कोई एक परम्परा होती ही नहीं है

भारत में लाखों समुदायों की अपनी अपनी अलग परम्पराएं हैं

राजाओं और ब्राह्मणों की परम्परा को
भारतीय परम्परा मान लेने का मतलब है

भारत की आदिवासियों
मेहनतकश जातियों
किसानों की परम्पराओं को मिटा देना

और उन्हें आज भी महत्वहीन कर देना

ताकि वे आज की राजनीति और आज की नई आर्थिक
प्रक्रिया में शामिल न होने पायें .

इसलिए जब ये संघी
भारतीय परम्परा
भारतीय इतिहास
और भारतीय संस्कृति की
बड़ी बड़ी बातें बनाएँ
तो इनसे पूछना
कि आप किस भारत की बात कर रहे हैं
लूटेरे राजाओं और ब्राह्मणों के भारत की संस्कृति की

या
मेहनतकश आम आदमी के इतिहास और उस मेहनतकश की संस्कृति की ?

हमारे समय की महिलायें



मणिपुर में इरोम शर्मिला को फिर से गिरफ्तार कर लिया गया है . उन्हें रिहा करने का अदालत का फैसला सरकार ने नहीं माना . 

उड़ीसा में आरती मांझी जिसे पुलिस ने गिरफ्तार करके थाने में सामूहिक बलात्कार किया था और उस लड़की पर नक्सलवादी होने के पांच फर्ज़ी केस लगा दिए थे .

वो लड़की आरती मांझी सभी मामलों में निर्दोष पायी गयी है और उसने पुलिस वालों पर बलात्कार का जो केस किया था उस पर कोई सुनवाई नहीं करी जा रही है .

झारखंड में आदिवासी महिला और पत्रकार दयामनी बरला जेल से निकल आयी हैं लेकिन अभी भी उनके ऊपर कई फर्ज़ी मुकदमे लगे हुए हैं और उन्हें लगातार अदालत में हाज़िर होना पड़ता है .

आदिवासी महिला कार्यकर्ता अपर्णा मरांडी भी जेल से ज़मानत पर रिहा हैं परन्तु उन्हें भी अदालत के चक्कर काटने पड़ रहे हैं .

महाराष्ट्र में समानता के गीत गाने वाली दलितों के अधिकारों के लिए काम करने वाली शीतल साठे को भी जेल में डाल दिया गया .

अब वो ज़मानत पर जेल से बाहर हैं लेकिन उन्हें भी अदालत के चक्कर काटने पड रहे हैं

छत्तीसगढ़ में किसी भी पत्रकार के सोनी सोरी के पास पहुँचते ही दंतेवाड़ा में वहाँ की पुलिस सिपाहियों से भरी जीपें पुलिस सोनी के घर पर खड़ी कर देती है . ताकि सोनी डर जाए और पत्रकारों को लेकर किसी पीड़ित आदिवासी से मिलने न ले जा सके .

सोनी को हर हफ्ते थाने में अपनी हाजिरी लगानी पड़ती है .

सोनी ने अपने साथ हुई प्रतारणा का जो केस उस बदमाश अधिकारी पर लगाया था , पिछले दो साल से उस पर कोई सुनवाई नहीं हुई है

याद रखिये इन सभी महिलाओं को सरकार ने जेल में डाला है .

यह भी याद रखिये कि इन सभी महिलाओं को समाज में फैले अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने के कारण सरकार ने जेल में डाला है .

और यह भी याद रखिये कि ये महिलायें दूसरों के दुःख से पीड़ित होने वाली संघर्षशील महिलायें हैं

आज़ादी के बाद आखिर इस देश की आदिवासी, दलित और दूरस्थ इलाकों की महिलायें सरकार द्वारा भारतीय राज्य के लिए इतना बड़ा खतरा क्यों मानी जा रही हैं ?

क्या इसमें इन महिलाओं की कोई गलती है ?

आखिर क्यों आज़ादी मिलते ही ये बड़ी जाति के लोग ही राष्ट्रभक्त माने जाने लगे हैं ?

और कैसे इन बड़ी जाति के अमीर संभ्रात लोगों ने इस देश की आदिवसियों , दलितों अल्पसंख्यकों की बहुत बड़ी आबादी को भारत के लिए खतरा घोषित कर दिया है ?

कैसे भारत की सारी राजनैतिक ,आर्थिक और फौजी ताकत इन बड़ी जाति के अमीर पुरुषों के हाथ में आ गई है.

कैसे यह बड़ी जाति के अमीर पुरुष भारत की सरकारी बंदूकों के दम पर भारत के खनिजों , जंगलों , सागर तटों पर कब्ज़ा करके और भी दौलत इकठ्ठा करते जा रहे हैं .

इसके नतीजे में कैसे आदिवासी , गाँव के लोग , दलित और भी गरीब और भी बेआवाज़ और गरीब बनाये जा रहे हैं .

आपके द्वारा इसे समझना ही भारत की असली आज़ादी का रास्ता खोलेगा .

वरना आपकी आर्थिक ,राजनैतिक और सामाजिक आज़ादी पूंजीपतियों , और उनके सेवकों के पैरों तले कुचली जाती रहेगी .

अगर आपने यही मान लिया है कि आपके लिए इस देश का नागरिक होने का हासिल बस इतना ही है कि आप को सरकार या पूंजीपति की फैक्ट्री या आफिस में बस एक नौकरी मिल जाए .

तो आने वाली पीढियां आप को कभी सम्मान से याद नहीं करेंगी .

नागरिक होने का फ़र्ज़ निभाइए . इस सब पर कम से कम सवाल तो उठाइये .

Saturday, August 23, 2014

नारायण चौहान

उजड़े हुए जंगलों को फिर से हरा भरा करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार को सैंकडों करोड़ रूपये दिए गए .

छत्तीसगढ़ सरकार के नेताओं और अधिकारियों ने उस पैसे से सैंकडों सालों से अपने गाँव बसा कर रहने वाले आदिवासियों को उजाड़ा और 

सरकार ने नए जंगल काटे और उन आदिवासियों को वहाँ ला कर पटक दिया .

नए गाँव में न फसल होती है , घर गिर गए हैं ,न स्कूल न अस्पताल ,न रिश्तेदार , जिंदगी मुश्किल है

सरकार ने जंगल लगाने के लिए मिले पैसों से कारें खरीदी

बंगले बनवाए

जबकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाये गए नियमों में इन सब के लिए मनाही थी

इस पर महालेखाकार ने अपनी आपत्तियां भी उठाई

पर उसकी परवाह किसे है

रमन सिंह फिर चुनाव जीत गये है

और उनके गुरु मोदी अब प्रधान मंत्री है

नारायण चौहान साहब ने छत्तीसगढ़ के भयानक माहौल में रहते हुए भी सच की लड़ाई जारी रखी है .

नारायण चौहान साहब ने इस सब के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में सरकार के खिलाफ़ मुकदमा दायर कर दिया है .

नारायण चौहान साहब के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुके हैं .

वो कहीं छुपे हुए हैं .

राष्ट्र निर्माण जारी है


http://tehelkahindi.com/campa-funds-scam/

अरुण जेटली

अगर कोई नागरिक किसी को आत्म रक्षा करते हुए मार दे तो उसे सज़ा नहीं होगी.
इसी कानून के तहत पुलिस वाला भी आत्मरक्षा में किसी को मार दे तो उसे कोई सज़ा नहीं होती .
लेकिन कोई नागरिक जब किसी को आत्म रक्षा करते हुए मार डालता है तो इस बात का फैसला अदालत का जज करता है कि यह हत्या आत्म रक्षा के उद्देश्य से हुई थी या कहीं यह इरादतन हत्या तो नहीं थी ?
पुलिस को इस तरह के हर मामले को अदालत में ले जाना ही पड़ता है .
हत्या करने वाले व्यक्ति को अदालत ही निर्दोष घोषित कर सकती है पुलिस नहीं .
लेकिन इसी कानून के अंतर्गत जब पुलिस किसी नागरिक को जान से मार डालती है तो पुलिस खुद ही जज बन बैठती है .
पुलिस हत्या करने वाले अपने पुलिसवाले को आरोपी नहीं बनाती.
पुलिस मरने वाले नागरिक को ही आरोपी बना देती है .
फिर पुलिस कहती है ,
कि आरोपी तो मर गया.
इस लिए मामला खतम.
एक बार आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट ने एक फैसला दिया ,
कोर्ट ने कहा कि
जब पुलिस और नागरिक के अधिकार बराबर हैं तो पुलिस वाले द्वारा किसी भी नागरिक की हत्या के मामले में पुलिस खुद ही कैसे जज बन जाती है ?
कोर्ट ने फैसला दिया कि अब से पुलिस अगर किसी भी नागरिक को मारेगी तो उसे हत्या का मामला माना जाएगा .
और उस मामले को पुलिस बंद नहीं कर सकेगी
बल्कि उस मामले को अदालत में पेश किया जायेगा .
सिर्फ जज ही मुकदमा चलाने के बाद उस मामले को बंद करने का आदेश दे सकेगा .
अब आपको तो पता ही है पुलिस की गोली से सबसे ज़्यादा कौन लोग मरते हैं ?
सबसे ज़्यादा मरते हैं अपनी ज़मीन बचाने की कोशिश करने वाले आदिवासी .
अपनी झुग्गी झोंपड़ी बचाने की कोशिश करने वाले गरीब .
बराबरी की मांग करने वाले दलित .
अपने अपने अधिकार मांगने वाले मजदूर
और क्या आपको पता है कि पुलिस को इन्हें मार डालने का हुकुम देने वाले कौन लोग हैं ?
आदेश देना वाले होते हैं अमीर व्यपारी, उद्योगपति और विदेशी कंपनियों के एजेंट.
तो जैसे ही आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला आया .
पूंजीपति हडबड़ा गए .कि अब हमारे लिए आदिवासियों दलितों और मजदूरों पर गोली कौन चलाएगा ?
ऐसे तो हमारा मुनाफा कमाना मुश्किल हो जाएगा .
हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ़ इन अमीरों का गुलाम एक वकील इस शानदार आदेश को लागू होने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में खड़ा हो गया .
और सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ़ मुकदमा कर दिया कि माई बाप इससे तो पुलिस का मनोबल गिर जाएगा .
उस फैसले पर आज तक अमल नहीं होने दिया गया .
आप जानना चाहेंगे कि पूंजीपतियों का वो गुलाम वकील कौन था ?
उस वकील का नाम अरुण जेटली था .
विदेशी कंपनियों का वो एजेंट वकील आज भारत का रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री है .
और सबसे भयानक बात यह है कि इसे भारत की जनता ने कभी भी चुना ही नहीं .
यह शख्स कभी चुनाव ही नहीं जीता .
फिर भी विदेशी कंपनियों के कहने से मोदी ने इसे भारत का वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री बना दिया है
मतलब अब वित्त मंत्री बन कर विदेशी कंपनियों के लिए , भारत के विकास के नाम पर आदिवासियों की ज़मीन छीनो ,
और आदिवासी इसका विरोध करें तो आदिवासियों के खिलाफ़ भारत की सेना का इस्तेमाल करो और बंदूक के बल पर भारत की संपदा को लूटो और अमीरों और विदेशियों को सौंप दो.
पहले दस साल एक बिना चुनाव जीता हुआ प्रधानमंत्री भारत के सर पर बिठा दिया गया था ,
मनमोहन सिंह भी कभी चुनाव नहीं जीते थे .
अब एक बिना चुना वित्त और रक्षा मंत्री हमारे ऊपर बैठा दिया गया है .
विश्व बैंक और बहुराष्ट्रीय कंपनियां जिसे चाहती हैं वह भारत का वित्त मंत्री बनता है .
चाहे वह चुनाव जीते या न जीते .
यह सहन करने वाले हालात नहीं हैं ,
इस सब को चुनौती देनी ही पड़ेगी .

Friday, August 15, 2014

कम मेक इन इंडिया

आपने कहा कि कम मेक इन इंडिया
विदेशी कंपनियों आओ अपना माल भारत में बनाओ
यह काम तो अमीर देशों की कंपनियां दसियों सालों से कर रही हैं
यह मुनाफाखोर कंपनियां उन्ही देशों में अपने कारखाने खोलती हैं जहां उन्हें सस्ते मजदूर मिल सकें ,और पर्यावरण बिगाड़ने पर सरकारें उन्हें रोक न सकें
सब इस खेल को जानते हैं
जब यह विदेशी कंपनियां मजदूरों से बारह घंटे काम कराती हैं
तब कोई भी सरकार इन कंपनियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करती
बताइये आज तक भारत में आपने किसी विदेशी कम्पनी पर इसलिए कार्यवाही करी है कि उसने मजदूरों को कम मजदूरी दी है
नहीं आपने आज तक कोई कार्यवाही नहीं करी
आपमें दम ही नहीं है इन विदेशी कंपनियों की बदमाशियों को रोकने का और अपने देश के गरीब नागरिकों और मजदूरों की हिफाज़त का
आप पूछते हैं उदारहण दूं
उदाहरण लाखों हैं
लीजिए एक उदहारण
छत्तीसगढ़ में स्विस सीमेंट कंपनी हालिसिम सीमेंट कम्पनी के द्वारा मजदूरों को कम मजदूरी दी गयी
जबकि वहाँ का विदेशी डिरेक्टर दस करोड़ तनख्वाह लेता है
श्रम अदालत ने मजदूरों के हक में फैसला दे दिया
कम्पनी ने अदालत का फैसला मानने से मना कर दिया
मजदूर धरने पर बैठे
छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने छह मजदूर नेताओं पर डकैती का मामला बना दिया
वो भारतीय मजदूर आज भी छतीसगढ़ की जेलों में पड़े हुए हैं
ये आपकी भाजपा सरकार ने किया है प्रधानमंत्री जी
कम मेक इन इण्डिया का नारा देने से पहले अमित जेठवा को याद कर लीजिए
जिसे पर्यावरण को बचाने के लिए आवाज़ उठाने के कारण आपके ही शासन में आपकी ही पार्टी के सांसद के इशारे पर गुजरात में गोली से उड़ा दिया गया
जीरो डिफेक्ट और जीरो इफेक्ट की बातें लाल किले से ही अच्छी लगती हैं
लेकिन जब भी सोनी सोरी उस जंगल की हिफाज़त के लिए आवाज़ उठाती है तो
आपकी ही सरकार उसे थाने में ले जाकर
सोनी सोरी को बिजली के झटके देती है और उसके जिस्म में पत्थर भर देती है
बातें बहुत सुनी हैं हमने
जाइए इस देश की एक भी सोनी सोरी के हक़ में एक कदम उठा कर दिखाइए
आपमें दम ही नहीं है मोदी जी
जिस दिन आप किसी सोनी सोरी के पक्ष में आवाज़ उठाएंगे मोदी जी
उसी दिन आपके मालिक ये पूंजीपति आपको रद्दी की टोकरी में फेंक देंगे
असल में तो आपका मुखौटा लगा कर लाल किले से आप नहीं ये पूंजीपति दहाड़ रहे हैं
आप कहते हैं आप प्लानिंग कमीशन को समाप्त कर देंगे
सही है अब जब सारे भारत को लूटने की सारी प्लानिंग अम्बानी के घर में ही होनी है
तो देश को प्लानिंग कमीशन की ज़रूरत भी क्या है
आप सफाई की बातें करते हैं ?
इस देश में सफाई मजदूरों की हालात क्या हैं कभी जानने की जहमत करी है आपने ?
पूछियेगा कि गंदगी फैलाने वाले ही संघ के नेता क्यों बने और सफाई करने वाला कभी संघ का नेता क्यों नहीं बन सका ?
आपके नागपुर के संघ के ब्राह्मण नेताओं से ये भी पूछियेगा
कि भंवर मेघवंशी के घर का खाना वो क्यों नहीं खा सके और उस खाने को उन्होंने सड़क पर क्यों फेंक दिया था ?
आप सोचते हैं कि आपकी कथनी से हम बहल जायेंगे ?
नहीं इस देश की लाखों सोनी सोरियों ,आरती मांझी , भंवरी बाई के हक के लिए कदम उठाने के लिए हम लड़ते रहेंगे , जेल जाते रहेंगे ,गोली खाते रहेंगे
आप हमें आतंकवादी ,नक्सलवादी ,देशद्रोही जो मन में आये कहिये
लेकिन इतिहास बताएगा
कि असल में देशभक्त कौन था और आतंकवादी कौन ?

Wednesday, August 13, 2014

आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था

आपका जन्म एक अमीर और बड़ी ज़ात वाले के घर में हुआ
इसलिए आपको पढ़ने की सहूलियत मिली
आप को अपने जन्म की जगह की वजह से पैदाइशी राजनैतिक ताकत मिली
आपको जन्म की जगह की वजह से पैदाइशी सामाजिक रुतबा मिल गया
एक बच्चा एक गरीब छोटी ज़ात वाले के झोंपड़ी में पैदा हुआ
उसे गरीबी की वजह से काम पर जाना पड़ा
वह स्कूल में नहीं पढ़ पाता
वह मेहनत के बावजूद मजदूर ही बना रहता है
उसकी कोई राजनैतिक ताकत भी नहीं है
वह सामाजिक तौर पर भी छोटा माना जाता है
आपका जन्म अगर अमीर घर में हुआ है
तो आप अब गरीब का घर सरकारी बुलडोजर लगवा कर तोड़ सकते हैं
आप उस के घर को जब चाहे अवैध कह सकते हैं
राष्ट्र के विकास के नाम पर उसकी ज़मीन अमीर उद्योगपति छीन कर ले सकते हैं
आपका धर्म इस सब के विरुद्ध नहीं है
आपकी राजनीति इसे उचित मानती है
आपकी सभ्यता इसे सही मानती है
आपका धर्म आपकी राजनीति और और आपकी सभ्यता अमीर की तरफदारी में बनी है
इसे बनाया ही ताकतवर तबके ने है
इसलिए यह धर्म ,राजनीति और सभ्यता इस अन्याय को चुनौती देती ही नहीं हैं
आपका यह धर्म ,यह राजनैतिक व्यवस्था और सभ्यता बिलकुल अवैज्ञानिक और क्रूर है
इसलिए आपका धर्म ,राजनीति और सभ्यता हथियारों के दम पर ही टिकाया गया है
जिस दिन इस धर्म ,राजनीति और सभ्यता के पास
पुलिस और सेना की हिंसक ताकत नहीं होगी
उस दिन मेहनत करने वाला खायेगा
मेहनत करने वाला ही मकान बना पायेगा
मेहनत करने वाले की ही इज्ज़त होगी
बिना इस राजनैतिक आर्थिक और सामजिक व्यवस्था की मदद के आप बैठे ठाले
बड़े मकानों वाले
ठूंस ठूंस कर पीज़ा खा खा कर मोटे होने वाले
इज्ज़तदार अमीर बन ही नहीं सकते
इसलिए हमारी सारी बेचैनी यही है कि इस राजनैतिक
आर्थिक
और सामजिक
धार्मिक
सभ्यता
वाली व्यवस्था को कैसे बदल डालें
इस धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था के रहते
दुनिया में
न्याय
प्रेम
और शांति
आ ही नहीं सकती

Friday, August 8, 2014

भाषा

हर जगह के लोगों को अपने प्राकृतिक संसाधनों को अपनी ज़रूरतों के हिसाब से इस्तेमाल करते हुए अपनी जिंदगी बिताने का हक है .

हर जगह के लोगों खेती करने , व्यापार करने या उद्योग धंधे करने का हक भी है .

हर जगह के लोगों को अपने ये सारे काम अपनी ही ज़ुबान में करने का भी हक है .

हाँ अगर लोग चाहें तो दूसरी ज़ुबान के लोगों के साथ व्यापार की ज़रूरतों के हिसाब से दूसरी ज़ुबानें सीख सकते हैं .

पुराने व्यापारी भी कई ज़ुबानें बोलते थे .

लेकिन आप किसी देश में डंडे के जोर पर लोगों से यह नहीं कह सकते कि वो अपने मुल्क का सारा काम काज किसी सात समन्दर पार की ज़ुबान में चलायें .

अगर आप अपने मुल्क के लोगों पर इसलिए बंदूकों से गोलियाँ दागें क्योंकि वो लोग अपनी ज़ुबान में अपने देश का काम काज करने की मांग कर रहे हैं तो ये तो आपकी ज़हनी गुलामी की तरफ इशारा कर रहा है .

या फिर सात संदर पार बैठे आपके अमीर व्यापारी आपको ऐसा करने से रोक रहे हैं . क्योंकि उन अँगरेज़ व्यापारियों को डर हो सकता है कि फिर वो इस मुल्क में अपना लूट का धंधा एक दूसरी ज़ुबान में कैसे चला पायेंगे ?

मुखर्जी नगर दिल्ली में युवाओं के सत्याग्रह पर सरकार ने जिस तरह से क्रूरता पूर्वक हमला किया है वो किसी भी तर्क से समझ में नहीं आता .

भारत के लोगों को भारत की जुबानों में अपना काम काज करने देने में मोदी को क्या दिक्कत है ?

कमाल है ये लोग चुनावों से पहले तो मातृभाषा की दुहाइयां देते हैं लेकिन बाद में ठीक उसके उलट आचरण करते हैं .

इस मुद्दे पर चल रहे सत्यग्रह स्थल पर सीमा सुरक्षा बल की तैनाती हमें एक भयानक हालत की तरफ ले जा सकता है .

धरम

धरम दाढ़ी में है 
धरम चोटी में है 

धरम टोपी में है 
धरम पगड़ी में है

धरम सलवार में है 
धरम धोती में है

धरम बुरखे में है 
धरम घूंघट में है

धरम मंदिर में है
धरम मस्जिद में है

धरम नमाज़ में है
धरम पूजा में है

धरम दफनाने में है
धरम जलाने में है

धरम हलाल में है
धरम झटके में है

धरम इंसान के नाम में है

धरम प्यार में नहीं है
धरम सच जानने में नहीं है
धरम सबके साथ जुड़ने में नहीं है

धरम लड़ने में है
धरम नफ़रत में है
धरम घमंड में है
धरम मूढ़ता में है
धरम ज़हालत में है

धर्म औ मजहब जिंदाबाद
सारे सेक्युलर मुर्दाबाद

दी टैंक मैन

कल रात दी टैंक मैन फिल्म देखी .

चीन में सन नवासी में लाखों लोग मुल्क के हालात बदलने की मांगों के साथ सड़कों पर आ गये थे .

यह आन्दोलन छात्रों ने शुरू किया लेकिन इसमें डाक्टर , नर्सें , कारखानों के मजदूर , पुलिस और कुछ फौज़ी भी शामिल हो गए . वर्षों के दमन के खिलाफ जनता ने ज़ोरदार आवाज़ बुलंद कर दी .

सरकार में खलबली मच गयी . सरकार में इस स्तिथी से निबटने के लिए दो मत हो गए . सरकार का एक धड़ा आंदोलनकारियों से बातचीत करना चाहता था जबकि दूसरा हिस्सा दमन के पक्ष में था .

उदारवादी धड़े के एक नेता आंदोलनकारियों से बात करने उनके बीच गए लेकिन अगले दिन उन्हें सरकार ने गायब करवा दिया और फिर उनका कभी कुछ पता नहीं चला .

सरकार ने दमन का फैसला लिया . सेना के लाख से ज़्यादा सैनिक आंदोलनकारियों को थियानमेन चौक से खदेड़ने के लिए आ गए .

लेकिन जनता ने सैनिकों का रास्ता रोक दिया .औरतों ने रो रो कर कहा कि आप हमारे ही भाई और बेटे हैं ,आपको जनता की रक्षा के लिए सैनिक बनाया गया है . आप हमारे खिलाफ क्यों हो . कई दिनों तक जनता ने सैनिकों को भोजन और पानी दिया . सेना वापिस चली गयी .

चीन सरकार के अस्तित्व पर ही खतरा खड़ा हो गया . सरकार ने दुबारा भयानक दमन की योजना बनायी . इस बार टैंकों और ऑटोमेटिक हथियारों से लैस टुकडियां निहत्थी जनता पर हमला करने के लिए भेजी गयी .

छात्र और जनता सड़क पर बैठे हुए थे . सेना ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ दो हज़ार छह सौ लोग मार डाले गए . अगले दिन सुबह जब मारे गए छात्रों के माता पिता अपने बच्चों के बारे में पता करने के लिए वहाँ आये तो सेना ने उन लोगों पर भी गोली चलाई जिसमे लगभग चालीस लोग मारे गए . डाक्टरों और एम्बुलेंस पर भी गोली चलाई गयी . घायलों की मदद की कोशिश कर रहे डाक्टरों को भी मार डाला गया .

दमन ने काम किया चीन की साम्यवादी सरकार ने थियानमेन चौक खाली करा लिया .

अगले दिन सरकारी टैंकों के काफिले के सामने एक नौजवान आकर खड़ा हो गया . उसे पकड़ कर वहाँ से हटा लिया गया . आज तक पता नहीं चल पाया कि उस नौजवान का क्या हुआ .

इसके बाद चीनी सरकार ने मुक्त अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई . विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोल दिए .

इसके बाद चीन में शहरी माध्यम वर्ग का उदय हुआ . एक ऐसी युवा पीढ़ी सामने आयी जिसे मोबाइल, जूते ,जींस और कारों के सिवाय किसी और बात से कोई मतलब ही नहीं था .

लेकिन इसकी कीमत देश के करोड़ों किसानों और गरीबों ने चुकाई .

सरकार ने मुफ्त सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कम कर दिया . अब अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए किसानों को शहरों में पलायन करना पड़ा .

चीन में गाँव से शहरों में पलायन की दर दुनिया में सब से ज़्यादा है .

चीनी सरकार ने पूंजीपतियों और बड़ी कंपनियों के दबाव में श्रम कानूनों में पूरी तरह से छूट दे दी . अब मजदूरों से चौदह घंटे सातों दिन काम लिया जाने लगा .

जगह जगह मजदूरों के विरोध प्रदर्शन होने लगे . इन मजदूर आंदोलनों की संख्या अस्सी हज़ार साल तक पहुँच गयी .

सरकार ने मीडिया और सोशल मीडिया पर भयानक अंकुश लगाया हुआ है .

स्पेशल एकनामिक ज़ोन बनाने के लिए किसानों की ज़मीनों को हडप गया . ज़मीने छीनने के लिए गुंडे और पुलिस दोनों का इस्तेमाल किया गया . एक किसान ने एक स्मगलिंग के कैमरे से ऐसे ही एक ज़मीन अधिग्रहण की वीडियो बनाए जिससे इन सरकारी दमन के तौर तरीकों का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है .

आज भी दो चीन है . एक वो जो चमचमाता हुआ चीन है . जो शहरी है . जो विकास का हितग्राही है .जो सरकार की तरफ है .

दूसरा बड़ा चीन वो है जो गरीब है बदहाल और बेजुबान और दुनिया की नज़रों से गायब है .

सोचें कि अगर साम्यवादी देश को साम्यवादी बने रहने के लिए इतना दमन करना पड़ा तो किस मुंह से हम फासीवाद और पूंजीवाद के खिलाफ गला फाड़ सकते हैं .

सोचें कि अगर दुनिया की सारी हवा , सारा पानी , सारी ज़मीन सारे इंसानों को खुश रख सकती है तो फिर इतना दुःख क्यों है ?.

आइये विचारधारों के सम्प्रदाय से भी निकल कर सिर्फ इंसान बन कर सोचें .