Friday, August 15, 2014

कम मेक इन इंडिया

आपने कहा कि कम मेक इन इंडिया
विदेशी कंपनियों आओ अपना माल भारत में बनाओ
यह काम तो अमीर देशों की कंपनियां दसियों सालों से कर रही हैं
यह मुनाफाखोर कंपनियां उन्ही देशों में अपने कारखाने खोलती हैं जहां उन्हें सस्ते मजदूर मिल सकें ,और पर्यावरण बिगाड़ने पर सरकारें उन्हें रोक न सकें
सब इस खेल को जानते हैं
जब यह विदेशी कंपनियां मजदूरों से बारह घंटे काम कराती हैं
तब कोई भी सरकार इन कंपनियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करती
बताइये आज तक भारत में आपने किसी विदेशी कम्पनी पर इसलिए कार्यवाही करी है कि उसने मजदूरों को कम मजदूरी दी है
नहीं आपने आज तक कोई कार्यवाही नहीं करी
आपमें दम ही नहीं है इन विदेशी कंपनियों की बदमाशियों को रोकने का और अपने देश के गरीब नागरिकों और मजदूरों की हिफाज़त का
आप पूछते हैं उदारहण दूं
उदाहरण लाखों हैं
लीजिए एक उदहारण
छत्तीसगढ़ में स्विस सीमेंट कंपनी हालिसिम सीमेंट कम्पनी के द्वारा मजदूरों को कम मजदूरी दी गयी
जबकि वहाँ का विदेशी डिरेक्टर दस करोड़ तनख्वाह लेता है
श्रम अदालत ने मजदूरों के हक में फैसला दे दिया
कम्पनी ने अदालत का फैसला मानने से मना कर दिया
मजदूर धरने पर बैठे
छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने छह मजदूर नेताओं पर डकैती का मामला बना दिया
वो भारतीय मजदूर आज भी छतीसगढ़ की जेलों में पड़े हुए हैं
ये आपकी भाजपा सरकार ने किया है प्रधानमंत्री जी
कम मेक इन इण्डिया का नारा देने से पहले अमित जेठवा को याद कर लीजिए
जिसे पर्यावरण को बचाने के लिए आवाज़ उठाने के कारण आपके ही शासन में आपकी ही पार्टी के सांसद के इशारे पर गुजरात में गोली से उड़ा दिया गया
जीरो डिफेक्ट और जीरो इफेक्ट की बातें लाल किले से ही अच्छी लगती हैं
लेकिन जब भी सोनी सोरी उस जंगल की हिफाज़त के लिए आवाज़ उठाती है तो
आपकी ही सरकार उसे थाने में ले जाकर
सोनी सोरी को बिजली के झटके देती है और उसके जिस्म में पत्थर भर देती है
बातें बहुत सुनी हैं हमने
जाइए इस देश की एक भी सोनी सोरी के हक़ में एक कदम उठा कर दिखाइए
आपमें दम ही नहीं है मोदी जी
जिस दिन आप किसी सोनी सोरी के पक्ष में आवाज़ उठाएंगे मोदी जी
उसी दिन आपके मालिक ये पूंजीपति आपको रद्दी की टोकरी में फेंक देंगे
असल में तो आपका मुखौटा लगा कर लाल किले से आप नहीं ये पूंजीपति दहाड़ रहे हैं
आप कहते हैं आप प्लानिंग कमीशन को समाप्त कर देंगे
सही है अब जब सारे भारत को लूटने की सारी प्लानिंग अम्बानी के घर में ही होनी है
तो देश को प्लानिंग कमीशन की ज़रूरत भी क्या है
आप सफाई की बातें करते हैं ?
इस देश में सफाई मजदूरों की हालात क्या हैं कभी जानने की जहमत करी है आपने ?
पूछियेगा कि गंदगी फैलाने वाले ही संघ के नेता क्यों बने और सफाई करने वाला कभी संघ का नेता क्यों नहीं बन सका ?
आपके नागपुर के संघ के ब्राह्मण नेताओं से ये भी पूछियेगा
कि भंवर मेघवंशी के घर का खाना वो क्यों नहीं खा सके और उस खाने को उन्होंने सड़क पर क्यों फेंक दिया था ?
आप सोचते हैं कि आपकी कथनी से हम बहल जायेंगे ?
नहीं इस देश की लाखों सोनी सोरियों ,आरती मांझी , भंवरी बाई के हक के लिए कदम उठाने के लिए हम लड़ते रहेंगे , जेल जाते रहेंगे ,गोली खाते रहेंगे
आप हमें आतंकवादी ,नक्सलवादी ,देशद्रोही जो मन में आये कहिये
लेकिन इतिहास बताएगा
कि असल में देशभक्त कौन था और आतंकवादी कौन ?

Wednesday, August 13, 2014

आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था

आपका जन्म एक अमीर और बड़ी ज़ात वाले के घर में हुआ
इसलिए आपको पढ़ने की सहूलियत मिली
आप को अपने जन्म की जगह की वजह से पैदाइशी राजनैतिक ताकत मिली
आपको जन्म की जगह की वजह से पैदाइशी सामाजिक रुतबा मिल गया
एक बच्चा एक गरीब छोटी ज़ात वाले के झोंपड़ी में पैदा हुआ
उसे गरीबी की वजह से काम पर जाना पड़ा
वह स्कूल में नहीं पढ़ पाता
वह मेहनत के बावजूद मजदूर ही बना रहता है
उसकी कोई राजनैतिक ताकत भी नहीं है
वह सामाजिक तौर पर भी छोटा माना जाता है
आपका जन्म अगर अमीर घर में हुआ है
तो आप अब गरीब का घर सरकारी बुलडोजर लगवा कर तोड़ सकते हैं
आप उस के घर को जब चाहे अवैध कह सकते हैं
राष्ट्र के विकास के नाम पर उसकी ज़मीन अमीर उद्योगपति छीन कर ले सकते हैं
आपका धर्म इस सब के विरुद्ध नहीं है
आपकी राजनीति इसे उचित मानती है
आपकी सभ्यता इसे सही मानती है
आपका धर्म आपकी राजनीति और और आपकी सभ्यता अमीर की तरफदारी में बनी है
इसे बनाया ही ताकतवर तबके ने है
इसलिए यह धर्म ,राजनीति और सभ्यता इस अन्याय को चुनौती देती ही नहीं हैं
आपका यह धर्म ,यह राजनैतिक व्यवस्था और सभ्यता बिलकुल अवैज्ञानिक और क्रूर है
इसलिए आपका धर्म ,राजनीति और सभ्यता हथियारों के दम पर ही टिकाया गया है
जिस दिन इस धर्म ,राजनीति और सभ्यता के पास
पुलिस और सेना की हिंसक ताकत नहीं होगी
उस दिन मेहनत करने वाला खायेगा
मेहनत करने वाला ही मकान बना पायेगा
मेहनत करने वाले की ही इज्ज़त होगी
बिना इस राजनैतिक आर्थिक और सामजिक व्यवस्था की मदद के आप बैठे ठाले
बड़े मकानों वाले
ठूंस ठूंस कर पीज़ा खा खा कर मोटे होने वाले
इज्ज़तदार अमीर बन ही नहीं सकते
इसलिए हमारी सारी बेचैनी यही है कि इस राजनैतिक
आर्थिक
और सामजिक
धार्मिक
सभ्यता
वाली व्यवस्था को कैसे बदल डालें
इस धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था के रहते
दुनिया में
न्याय
प्रेम
और शांति
आ ही नहीं सकती

Friday, August 8, 2014

भाषा

हर जगह के लोगों को अपने प्राकृतिक संसाधनों को अपनी ज़रूरतों के हिसाब से इस्तेमाल करते हुए अपनी जिंदगी बिताने का हक है .

हर जगह के लोगों खेती करने , व्यापार करने या उद्योग धंधे करने का हक भी है .

हर जगह के लोगों को अपने ये सारे काम अपनी ही ज़ुबान में करने का भी हक है .

हाँ अगर लोग चाहें तो दूसरी ज़ुबान के लोगों के साथ व्यापार की ज़रूरतों के हिसाब से दूसरी ज़ुबानें सीख सकते हैं .

पुराने व्यापारी भी कई ज़ुबानें बोलते थे .

लेकिन आप किसी देश में डंडे के जोर पर लोगों से यह नहीं कह सकते कि वो अपने मुल्क का सारा काम काज किसी सात समन्दर पार की ज़ुबान में चलायें .

अगर आप अपने मुल्क के लोगों पर इसलिए बंदूकों से गोलियाँ दागें क्योंकि वो लोग अपनी ज़ुबान में अपने देश का काम काज करने की मांग कर रहे हैं तो ये तो आपकी ज़हनी गुलामी की तरफ इशारा कर रहा है .

या फिर सात संदर पार बैठे आपके अमीर व्यापारी आपको ऐसा करने से रोक रहे हैं . क्योंकि उन अँगरेज़ व्यापारियों को डर हो सकता है कि फिर वो इस मुल्क में अपना लूट का धंधा एक दूसरी ज़ुबान में कैसे चला पायेंगे ?

मुखर्जी नगर दिल्ली में युवाओं के सत्याग्रह पर सरकार ने जिस तरह से क्रूरता पूर्वक हमला किया है वो किसी भी तर्क से समझ में नहीं आता .

भारत के लोगों को भारत की जुबानों में अपना काम काज करने देने में मोदी को क्या दिक्कत है ?

कमाल है ये लोग चुनावों से पहले तो मातृभाषा की दुहाइयां देते हैं लेकिन बाद में ठीक उसके उलट आचरण करते हैं .

इस मुद्दे पर चल रहे सत्यग्रह स्थल पर सीमा सुरक्षा बल की तैनाती हमें एक भयानक हालत की तरफ ले जा सकता है .

धरम

धरम दाढ़ी में है 
धरम चोटी में है 

धरम टोपी में है 
धरम पगड़ी में है

धरम सलवार में है 
धरम धोती में है

धरम बुरखे में है 
धरम घूंघट में है

धरम मंदिर में है
धरम मस्जिद में है

धरम नमाज़ में है
धरम पूजा में है

धरम दफनाने में है
धरम जलाने में है

धरम हलाल में है
धरम झटके में है

धरम इंसान के नाम में है

धरम प्यार में नहीं है
धरम सच जानने में नहीं है
धरम सबके साथ जुड़ने में नहीं है

धरम लड़ने में है
धरम नफ़रत में है
धरम घमंड में है
धरम मूढ़ता में है
धरम ज़हालत में है

धर्म औ मजहब जिंदाबाद
सारे सेक्युलर मुर्दाबाद

दी टैंक मैन

कल रात दी टैंक मैन फिल्म देखी .

चीन में सन नवासी में लाखों लोग मुल्क के हालात बदलने की मांगों के साथ सड़कों पर आ गये थे .

यह आन्दोलन छात्रों ने शुरू किया लेकिन इसमें डाक्टर , नर्सें , कारखानों के मजदूर , पुलिस और कुछ फौज़ी भी शामिल हो गए . वर्षों के दमन के खिलाफ जनता ने ज़ोरदार आवाज़ बुलंद कर दी .

सरकार में खलबली मच गयी . सरकार में इस स्तिथी से निबटने के लिए दो मत हो गए . सरकार का एक धड़ा आंदोलनकारियों से बातचीत करना चाहता था जबकि दूसरा हिस्सा दमन के पक्ष में था .

उदारवादी धड़े के एक नेता आंदोलनकारियों से बात करने उनके बीच गए लेकिन अगले दिन उन्हें सरकार ने गायब करवा दिया और फिर उनका कभी कुछ पता नहीं चला .

सरकार ने दमन का फैसला लिया . सेना के लाख से ज़्यादा सैनिक आंदोलनकारियों को थियानमेन चौक से खदेड़ने के लिए आ गए .

लेकिन जनता ने सैनिकों का रास्ता रोक दिया .औरतों ने रो रो कर कहा कि आप हमारे ही भाई और बेटे हैं ,आपको जनता की रक्षा के लिए सैनिक बनाया गया है . आप हमारे खिलाफ क्यों हो . कई दिनों तक जनता ने सैनिकों को भोजन और पानी दिया . सेना वापिस चली गयी .

चीन सरकार के अस्तित्व पर ही खतरा खड़ा हो गया . सरकार ने दुबारा भयानक दमन की योजना बनायी . इस बार टैंकों और ऑटोमेटिक हथियारों से लैस टुकडियां निहत्थी जनता पर हमला करने के लिए भेजी गयी .

छात्र और जनता सड़क पर बैठे हुए थे . सेना ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ दो हज़ार छह सौ लोग मार डाले गए . अगले दिन सुबह जब मारे गए छात्रों के माता पिता अपने बच्चों के बारे में पता करने के लिए वहाँ आये तो सेना ने उन लोगों पर भी गोली चलाई जिसमे लगभग चालीस लोग मारे गए . डाक्टरों और एम्बुलेंस पर भी गोली चलाई गयी . घायलों की मदद की कोशिश कर रहे डाक्टरों को भी मार डाला गया .

दमन ने काम किया चीन की साम्यवादी सरकार ने थियानमेन चौक खाली करा लिया .

अगले दिन सरकारी टैंकों के काफिले के सामने एक नौजवान आकर खड़ा हो गया . उसे पकड़ कर वहाँ से हटा लिया गया . आज तक पता नहीं चल पाया कि उस नौजवान का क्या हुआ .

इसके बाद चीनी सरकार ने मुक्त अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई . विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोल दिए .

इसके बाद चीन में शहरी माध्यम वर्ग का उदय हुआ . एक ऐसी युवा पीढ़ी सामने आयी जिसे मोबाइल, जूते ,जींस और कारों के सिवाय किसी और बात से कोई मतलब ही नहीं था .

लेकिन इसकी कीमत देश के करोड़ों किसानों और गरीबों ने चुकाई .

सरकार ने मुफ्त सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च कम कर दिया . अब अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए किसानों को शहरों में पलायन करना पड़ा .

चीन में गाँव से शहरों में पलायन की दर दुनिया में सब से ज़्यादा है .

चीनी सरकार ने पूंजीपतियों और बड़ी कंपनियों के दबाव में श्रम कानूनों में पूरी तरह से छूट दे दी . अब मजदूरों से चौदह घंटे सातों दिन काम लिया जाने लगा .

जगह जगह मजदूरों के विरोध प्रदर्शन होने लगे . इन मजदूर आंदोलनों की संख्या अस्सी हज़ार साल तक पहुँच गयी .

सरकार ने मीडिया और सोशल मीडिया पर भयानक अंकुश लगाया हुआ है .

स्पेशल एकनामिक ज़ोन बनाने के लिए किसानों की ज़मीनों को हडप गया . ज़मीने छीनने के लिए गुंडे और पुलिस दोनों का इस्तेमाल किया गया . एक किसान ने एक स्मगलिंग के कैमरे से ऐसे ही एक ज़मीन अधिग्रहण की वीडियो बनाए जिससे इन सरकारी दमन के तौर तरीकों का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है .

आज भी दो चीन है . एक वो जो चमचमाता हुआ चीन है . जो शहरी है . जो विकास का हितग्राही है .जो सरकार की तरफ है .

दूसरा बड़ा चीन वो है जो गरीब है बदहाल और बेजुबान और दुनिया की नज़रों से गायब है .

सोचें कि अगर साम्यवादी देश को साम्यवादी बने रहने के लिए इतना दमन करना पड़ा तो किस मुंह से हम फासीवाद और पूंजीवाद के खिलाफ गला फाड़ सकते हैं .

सोचें कि अगर दुनिया की सारी हवा , सारा पानी , सारी ज़मीन सारे इंसानों को खुश रख सकती है तो फिर इतना दुःख क्यों है ?.

आइये विचारधारों के सम्प्रदाय से भी निकल कर सिर्फ इंसान बन कर सोचें .

Saturday, August 2, 2014

इस पर सवाल उठाइये

आप जो सोचते हैं क्या वो वाकई में आप सोचते हैं 
या आपकी परम्परा सोचती है 

आप मुस्लिम परिवार में पैदा हुए तो आप मुस्लिम की तरह सोचते हैं 
आप ईसाई परिवार में पैदा होते हैं तो ईसाई की तरह 
हिंदू परिवार में पैदा होते हैं तो हिंदू की तरह ही सोचते हैं 
तो आप नहीं सोच रहे दरअसल आप सोच की परम्परा का बस एक पुर्जा ही हैं 

आप अगर दस हज़ार साल पहले पैदा हुए होते तो आप आज जैसे नहीं सोच सकते थे 
मतलब आप सोचने की परम्परा की अगली कड़ी मात्र हैं 

विचार धारा पीढ़ी दर पीढ़ी सफर करती हुई आप तक आई है 
अब ये विचारधारा आप में से गुज़र कर अगली पीढ़ी में पहुँच जायेगी 

आपके माध्यम से 
अब तक की विज्ञान की सारी तरक्की 
लोकतान्त्रिक विचारधारा का सारा विकास 
सभी अच्छी बातें अगली पीढ़ी तक पहुँच ही जायेंगी 

लेकिन अगर आपका जनम धार्मिक कट्टरता से भरे 
अलोकतांत्रिक ,अंधविश्वासी , जाहिल  माहौल में हुआ है 
तो आपकी अगली पीढ़ी तक वही सब कट्टरता और ज़हालत पहुँचेगी 

इसलिए आप मानव इतिहास के विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं 

अब सवाल यह है कि क्या मनुष्य हजारों साल के ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहा है 

या मुनाफे के लिए मनुष्यों को सारे परम्परागत ज्ञान से काट कर 
सिर्फ पूंजीपति की चाकरी के मतलब की जानकारियाँ ही नए बच्चों के दिमागों में डाली जा रही हैं 

क्या हमारी शिक्षा 
मनुष्यता के हजारों साल के संगृहीत ज्ञान को आगे बढ़ाने वाली है या 
यह शिक्षा हजारों साल के उस ज्ञान को महत्वहीन मानने वाली है 

यह शिक्षा मुनाफाखोर पूंजीपतियों के लिए हमारे बच्चों को तैयार करने के लिए बनाई गयी है 

प्रतियोगिता इस शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण लक्षण है 

क्या यह शिक्षा यह सिखा रही है कि मनुष्य के लिए समाज ज़रूरी है 

या यह शिक्षा हमारे बच्चों के दिमाग में यह डाल रही है कि असल में समाज तुम्हारा प्रतियोगी है 

क्या यह शिक्षा हमारे बच्चों को समाज को दुश्मन की तरह देखने के लिए प्रेरित नहीं कर रही है 

यह शिक्षा बताती है कि तुम्हारा लक्ष्य दुनिया का ज़्यादा से ज़्यादा सामान अपने घर में जमा कर लेना है 

यही तुम्हारे विकसित और सुखी होने का एक मात्र रास्ता है 

अब हमारे बच्चे 
आदिवासियों के जंगल , गाँव वालों की ज़मीनों की लूट 
इसके लिए आदिवासियों की हत्याएं 
औरतों से बलात्कार 
को अपने विकास के लिए अनिवार्य मानने लगते है 

अब आपके व्यक्तित्व के भीतर का सबसे बुरा हिस्सा 
इस मुनाफे की व्यवस्था ने सबसे महत्वपूर्ण बना दिया है 

इस पर सवाल उठाइये 

आपका सही सोचना मनुष्यता के विकास का एक महत्वपूर्ण क्षण है  

 


 

Friday, August 1, 2014

वर्तमान

वर्तमान ही रुका हुआ है 
हमेशा से 

हम वर्तमान में ही पैदा हुए 
वर्तमान में ही बड़े हुए 
वर्तमान में ही मर जायेंगे 

वर्तमान में जीते जीते 
सूरज और तारे 
बारी बारी 
अपनी छांव डालते हैं हम पर 

कोई अतीत नहीं होता 
बस स्मृतियाँ होती हैं 
इन्ही स्मृतियों के आधार पर 
करते हैं हम कल्पनाएँ 
उसे हम भविष्य कहते हैं 

समय नहीं चलता 
ध्यान से देखिये 
वर्तमान रुका हुआ है हमेशा से 

इसलिए हर बदलाव वर्तमान में होता है 
धर्म वर्तमान में होता है 
क्रांति वर्तमान में होती है 

Monday, July 28, 2014

मैं तैयार हूँ

सुना है छत्तीसगढ़ सरकार ने मेरे छत्तीसगढ़ से निकलने के बाद मेरे नक्सलवादी होने के बहुत सारे मुकदमे बना दिए हैं . 

अभी हाल में ही एक सामाजिक कार्यकर्ता जब एक अदालत में छत्तीसगढ़ पुलिस के खिलाफ बयान दर्ज करवा रहे थे और जब उन्होंने अदालत को बताया कि पुलिस की बदमाशियों की जानकारी उन्हें हिमांशु कुमार से मिली थी ,और जब वो उन घटनाओं की जांच करने और पीड़ित आदिवासियों से मिलने गए तो पुलिस ने ही उन पर हमला कर दिया .

इस पर सरकारी वकील ने अदालत में कहा कि हिमांशु कुमार तो फरार अपराधी है .

सरकार द्वारा आदिवासियों के गाँव जलाने , आदिवासी बूढों और बच्चों की हत्याओं ,आदिवासी लड़कियों के साथ पुलिस द्वारा बलात्कार के अनेकों मामले मैंने अदालत में दायर किये हुए हैं .

मुझे डराने के लिए सरकार ने मेरे अनेकों आदिवासी कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया . सोनी सोरी को प्रताड़ित कर के मेरे नक्सलवादी होने के कबूलनामे पर हस्ताक्षर करवाने की कोशिश करी , लेकिन जब सोनी नहीं मानी तो उसे बिजली के झटके दिए और सज़ा के तौर पर उसके गुप्तांगों में पत्थर भर दिए .

छत्तीसगढ़ से निकलने के बाद से आज तक मैं एक दिन के लिए भी कहीं छिपा नहीं . टीवी की चर्चाओं में आता हूँ . सर्वोच्च न्यायालय में छत्तीसगढ़ पुलिस के सामने मौजूद रहता हूँ . पत्र पत्रिकाओं में लिखता हूँ . सभाओं और रैलियों में शामिल होता हूँ . 

फिर भी छत्तीसगढ़ सरकार का यह कहना कि मैं फरार हूँ . यह सरकार की बदमाशी के अलावा कुछ नहीं है .

मैं चाहता हूँ कि सरकार जब चाहे मुझे गिरफ्तार करे , मुझे भी अन्य आदिवासियों की तरह जेल में सताए . चाहे तो जेल में मुझे मार डाले .

सत्य के इस रास्ते पर चलना शुरू करने से पहले मुझे अपने इस तरह के अंत  की उम्मीद थी .

मैं तैयार हूँ .

Thursday, July 24, 2014

भूले से भी इस गलतफहमी में न रहना कि ये बेईज्ज़ती मुसलमान की है

मेरे दोस्त तुम्हारी बनायी हुई रोटी को उसने तुम्हारे मुंह में ठूंस दिया 
उसका इरादा तुम्हारा पेट भरना नहीं बल्कि तुम्हे तुम्हारी औकात बताने का था 

मायूस ना होना साथी 
इस मुल्क में तुम जैसे मेहनत कशों के साथ 
सदियों से यही सब तो हो रहा है 

ये वो मुल्क है जहां औरतों के मुंह में डायन बता कर 
इंसान की टट्टी भर दी जाती है 

ये वो मुल्क है जहां बड़ी ज़ात वालों के घर के सामने से
निकलते समय मेहनतकश जात के लोगों को अपने जूते अपने सर पर रख कर गुज़रना पड़ता है

असल में तुम्हारे मुंह में बेईज्ज़ती की ये रोटी सत्ता ने भरी है
तुम्हारी लड़ाई इस सत्ता से है मेरे मेहनतकश दोस्त

तुम्हारी बेईज्ज़ती का बदला बेशक लिया जाएगा साथी ,तैयारी शुरू करो ,
हर बेईज्ज़ती का बदला लिया जाएगा
सदियों की बेईज्ज़ती का बदला अभी बाकी है दोस्त

भूले से भी इस गलतफहमी में न रहना कि ये बेईज्ज़ती मुसलमान की है
इस गलतफहमी से तो ये लड़ाई रास्ता भटक जायेगी
ये लड़ाई करोड़ों मेहनत कशों की है

मेहनत की लूट में हिंदू भी शामिल हैं और मुसलमान भी
लेकिन हम मेहनत कशों की बस एक ही ज़ात है
वो है हमारा मेहनत करने के बाद भी गरीब होना

हम इस सत्ता और पैसे की ताकत के इस किले को जल्द ही गिराएंगे दोस्त
फिर हर मुंह में इज्ज़त का निवाला होगा बेईज्ज़ती की रोटी नहीं

Wednesday, July 23, 2014

पिछले जनम के पापों का फल भुगतो

पिछले जनम में मैंने ज़रूर पुण्य करे होंगे 
कि मेरा जनम फिलिस्तीन में नहीं हुआ 
और मुझ पर कोई बम नहीं गिराया गया 

मेरे पूर्व जनम के पुण्यों के कारण ही 
मेरा जनम दंतेवाड़ा में नहीं हुआ 
और मैं इस जनम में सोनी सोरी नहीं बना

अपने पूर्व जन्म के सद्कर्मों के कारण ही इस जनम में
मेरा जनम किसी नीच जात में नहीं हुआ
इस लिए काम से मना करने पर मेरा हाथ भी नहीं काटा गया

मैं खुस नसीब हूँ कि मेरा जनम किसी गंदी बस्ती
की किसी दलित माँ के पेट से नहीं हुआ
और मैं शीतल साठे बनने से बच गया
वरना मुझे भी परिवर्तन के गीत गाने के
अपराध में गर्भावस्था में जेल में डाल दिया जाता .

मेरे पिछले जन्मों के पुण्यों का ही परताप है
कि मैं इस जनम में मैं आरती मांझी नहीं बना ,
वरना किसी और के धोखे में मुझे थाने ले जाते
समय पुलिस वाले रास्ते में मेरे साथ करते
सामूहिक बलात्कार और फिर तीन साल के लिए
फेंक दिया जाता मुझे जेल की सलाखों के पीछे ,
अंत में जहां से मुझे भगा दिया जाता यह कह कर
तीन साल बाद कि अब घर जा तुझे तो गलती से पकड़ लिया गया था .

मैंने पिछले जनम में पुन्य करे होंगे तभी
मेरा जनम आमिर की माँ के पेट से नहीं हुआ ,
वरना मुझे भी आमिर की तरह चौदह साल
तक जेल में रखने के बाद कह दिया
जाता कि जाओ तुम तो बेगुनाह हो .

मेरे पूर्व जनम के पुण्यों के कारण इस जनम में पुरुष हूँ
भारत में रहता हूँ और बहुसंख्यक हूँ
मैं बड़ी ज़ात का हूँ .
मैं शहर में रहता हूँ
मेरा देश अमरीका का दोस्त है
मेरे पास कम्प्युटर है
और फेसबुक के लिए इंटरनेट के पैसे भी हैं .
ये सब मेरे पिछले जनम के पुण्यों का फल है .

तो जाओ सब लोग पुन्य करो
पंडतों को जिमाओ
रोज़ मंदिर जाओ
मंदिर में दान करो
धर्म पर तर्क मत करो
आँख बंद कर धर्म को मानों
गाय की सेवा करो
निर्मल बाबा के दरबार में जाया करो

इससे अगले जनम में तुम्हारा जनम भी एक
धनवान सवर्ण भारतीय शहरी बहुसंख्यक पुरुष के रूप में होगा .

तब तक अपने पिछले जनम के पापों का फल भुगतो

Saturday, July 19, 2014

अंत में आपके पास जलाने के लिए कुछ नहीं बचेगा

साहेब ,महात्मा गांधी की हत्या आपके गुरु ने करी 

इस पाप को छुपाने के लिए आपने सबूत की फाइलें जलवा दी हैं 

लेकिन अभी तो बहुत कुछ ऐसा है जिसे आप को जलाना पड़ेगा 

वो चिट्ठियाँ भी जलवा दीजिए जो आपके संघ के गुरुओं ने अंग्रेजों को माफी नामे के तौर पर भेजी थीं .

क्योंकि इससे आपकी गद्दारी की परम्परा की पोल खुल जाने का भय है

आपको वो बयान भी जलाने हैं जो आपके दल के अटल साहब ने अंग्रेजों के सामने दिए थे ,जिसमे उन्होंने उस दौर के क्रांतिकारियों के खिलाफ मुखबिरी करी थी .

आपको वो इतिहास भी जलाना पड़ेगा जिसमे बताया गया है कि किन बौद्ध मठों को तोड़ कर मंदिर बनाये गए .

आपको इतिहास की वो सारी किताबें जलानी पड़ेंगी जिनमे दलितों की बस्तियों को जलाने की तफसीलें दर्ज़ हैं .

अट्ठारह सौ सत्तावन में हिंदुओं और मुसलमानों की एकता और मिल कर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का पूरा विवरण भी तो अभी जलाना बाकी है .

आज़ादी की लड़ाई में जहां जहां भी मुसलमानों के नाम दर्ज़ है उन सब किताबों को जलाना भी बाकी है .

इसके बाद जलाने का हुक्म दीजियेगा उन सभी बस्तियों को जहां मुसलमान और ईसाई रहते हैं .

फिर इस देश की सांझी संस्कृति को जला दीजियेगा .

फिर इस देश को जला दीजियेगा .

आग कम पड़े तो कुछ अपने आदर्श हिटलर से और कुछ इस्राईल से ले लीजियेगा .

अंत में आपके पास जलाने के लिए कुछ नहीं बचेगा .

तब आप आराम करियेगा .

अपने विरोधी के स्थान पर

आप का जनम हिंदू घर में हुआ 
तो आप हिंदू हित की बात करेंगे 

आपका जनम मुस्लिम घर में हो गया 
तो आप मुसलमानों के मुद्दों पर बोलेंगे 

आप ऊंची जात वाले घर में पैदा हुए तो आप 
दलितों के मुद्दों पर अविचलित रहेंगे 

अगर आपका जनम दलित परिवार में हुआ तो आप 
दलित समस्याओं पर बोलेंगे

आपका जनम किसी बड़े शहर में हुआ तो आप दंतेवाड़ा के आदिवासियों की ज़मीनें छीने जाने को विकास के लिए ज़रूरी बताएँगे

और अगर आपका जनम दंतेवाड़ा के आदिवासी के घर में हुआ तो आप नक्सलवादी कहलायेंगे .

किसी खास जगह पैदा होने की वजह से आप एक खास तरीके से सोचते हैं

आपका चिंतन स्थान सापेक्ष है
स्थान बदलते ही आपके विचार बदल जायेंगे

लेकिन सत्य तो स्थान बदलने से नहीं बदलता

सत्य हिंदू या मुसलमान ,सवर्ण या दलित के, घर में या भारत या पाकिस्तान में भी नहीं बदलता

अब देखिये आपके विचार अपने जनम के स्थान के कारण बने हैं या उन विचारों में हर स्थान में सही सिद्ध होने का गुण है .

कभी अपने ही मन में अपना स्थान बदल कर फिर सोचिये .

कल्पना में खुद को अपने विरोधी के स्थान पर रख कर सोचने की कोशिश कीजिये .

क्या आप हर जगह के सत्य को देख पा रहे हैं ?

क्या अब भी आपको लगता है आप सही थे ?

देखिये आपका कट्टर नजरिया अब हल्का होने लगा है .

यही मुक्ति है .

यही आपके जानवरपन से मनुष्त्व की यात्रा की शुरुआत है .

अब आप जीवन का आनंद लेने के लिए तैयार हैं .

आपके प्रतिद्वंदी धरम वाला भी यही सब चाहता

क्या चाहता है दिल आपका 
यही ना कि आपके धरम के अलावा दूसरे धरम वाले या तो खत्म हो जाएँ या 
फिर आपके पैरों में गिर कर गिडगिडायें 
और मान लें कि आप ही सबसे श्रेष्ठ हैं 
और अब तक के अपने घमंड के लिए आपसे माफी मांगें 

आपका दिल यह भी चाहता है ना 
कि आप ही हों दुनिया के सबसे अमीर आदमी 
और बाकी के सब आपके मुकाबले गरीब हों 
और सब आपके सामने बेचारे दिखाई दें 

आप यह भी चाहते हैं कि आप ही माने जाएँ
सबसे अधिक सम्माननीय
सब आपको बैठाएं मंच पर
और सब नीचे बैठें
और मुग्ध होकर सुनें
आपकी बातों को

आप यह भी चाहते हैं कि
युगों युगों तक आपको याद रखे दुनिया
सबके दिमागों में छाये रहें आप ही
सदैव

लेकिन मुश्किल यह है कि आपके प्रतिद्वंदी धरम वाला भी यही सब चाहता है

इसलिए आप और वो न चैन से खुद जी पाते हैं

न दूसरे को जीने देते हैं

आपके लिए भी दुनिया में पर्याप्त जगह और सम्मान है
आपके विरोधी के लिए भी पर्याप्त जगह और सम्मान है

अगर आप चैन से रहें तो आप और आपका विरोधी दोनों आराम से बिना लड़े जी सकते हैं .

चेतन भगत

चेतन भगत नामक यह लेखक कह रहा है कि गाज़ा में जो हो रहा है वह सही नही है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि आतंकवादीयों और उनके समर्थकों को सही सबक सिखाने का यही तरीका है 

यह तो इस्राइली हमलों का समर्थन ही हुआ .

क्या चेतन भगत को मालूम है कि किसी की ज़मीन पर हथियारों के दम पर कब्ज़ा करना आतंकवाद है जो कि इस्राईल ने किया है .

क्या इस लेखक को पता है कि अपने जिंदा रहने के लिए अपनी ज़मीन को आज़ाद कराने के लिए इस तरह के कब्ज़े का विरोध करना लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार और कर्तव्य भी है ?

क्या इस लेखक को पता है कि इन निहत्थे लोगों के के जीवन पर होने वाले इस्राइली हमलों से इन फिलिस्तीनियों को बचाने के लिए अमरीकी और यूरोपीय नौजवान लड़के लडकियां आकर मानव कवच के रूप में इन निहत्थे लोगों के साथ रहते हैं ?

क्या इस लेखक को मालूम है कि इस तरह के अहिंसक सत्याग्रह करने वाले दसियों आदर्शवादी नौजवानों की हत्या इस्राईल कर चुका है ?

क्या यह लेखक यह जानता है कि किसी दूसरे की गलती की सज़ा किसी दूसरे को नही दी जा सकती . इसलिए हमास के लड़ाकों का बदला लेने के लिए इस्राईल फिलीस्तीनी बच्चों की हत्या नही कर सकता ,और इस तरह निर्दोषों को किसी दूसरे के अपराधों की सज़ा देने को किसी भी तर्क द्वारा सही सिद्ध नही किया जा सकता .

यह तो बिलकुल ऐसा ही होगा जैसे कि नक्सलियों से बदला लेने के लिए भारतीय सिपाही सोनी सोरी के शरीर में पत्थर भर देते हैं , आरती मांझी के साथ बलात्कार करते हैं , मणिपुर में मनोरमा के गुप्तांगों में छत्तीस गोलियाँ दाग देते हैं कश्मीर में लड़कियों से बलात्कार करते हैं और फिर इस लेखक जैसे लोग इन बलात्कारों का समर्थन करते हैं और कहते हैं कि नक्सलवाद से निपटने के लिए तो हमें ऐसा करना ही पड़ेगा .

क्योंकि इस तरह के मूर्खता पूर्ण क्रूर तरीकों से आप कभी भी सहमति, शांति और सामान्य अवस्था तक नही पहुँच सकते .

विकास का माडल शैतानी माडल

किसे किसे वो सब साथी याद हैं जिन्हें हमारे ही दौर में इसलिए जेलों में डाल दिया गया है क्योंकि उन्होंने गरीबों की ज़मीन जंगल और पानी की लूट के खिलाफ आवाज़ उठाई .

प्रशांत राही , हेम मिश्रा और सैंकडों दलित और आदिवासी परिचित और अनाम साथी आज भी जेलों में पड़े हैं .

सत्ता पर पैसे वाले लुटेरों का कब्ज़ा है . इन लुटेरों की लूट का विरोध करने वालों को जेल में डाला जा रहा है .

जो काम ईस्ट इण्डिया करती थी , व्यापार का संरक्षण और जनता पर हमला , वही काम अब हमारी सरकार खुले आम कर रही है .

आप जानते हैं आज हमारे ज्यादातर सिपाही कहाँ हैं ?

हमारे सिपाही आदिवासी इलाकों में भेज दिए गए हैं .

क्या हमारे सिपाही जंगलों में आदिवासियों की रक्षा करने के लिए गए हैं ?

नहीं सिपाही अमीरों की कंपनियों के लिए जंगल की खदानों , पहाड़ों , नदियों पर कब्ज़ा करने गए हैं .

और ये सिपाही जंगल में रहने वालों के साथ क्या कर रहे हैं उसका नमूना बीच बीच में आप सोनी सोरी ,आरती मांझी और सरकेगुडा में बच्चों के संहार के रूप में देख ही लेते हैं .

हमें बताया गया है कि विकास के लिए यह दमन ज़रूरी है .

गांधी ने कहा था कि अगर भारत अंग्रेजों का विकास का माडल अपनाएगा तो भारत को एक दिन अपनी ही जनता से युद्ध करना पड़ेगा .

कहा जाता है कि अंग्रेज़ी राज में कभी सूरज नही डूबता था .

लेकिन एक अँगरेज़ ने ही लिखा था कि अंग्रेज़ी राज में कभी खून भी नही सूखता .

अँगरेज़ सारी दुनिया के संसाधन लूटते थे और उसके लिए अपने सिपाहियों का प्रयोग करते थे .

गांधी ने कहा कि अंग्रेजों ने तो अपने इस तरह के विकास के लिए सारी दुनिया पर हमला किया .

गांधी ने कहा अंग्रेजों का यह विकास का माडल शैतानी माडल है .

यह विकास का माडल ज़्यादा उपभोग और दूसरे के संसाधनों को छीनने पर आधारित है .

लेकिन अगर भारत भी अंग्रेजों के विकास का माडल अपनाएगा तो भारत किसके संसाधन छीनेगा ,और भारत किस पर हमला करेगा .

गांधी ने कहा कि एक दिन आप अपने ही गरीब देशवासियों पर हमला कर बैठेंगे .

गांधी ने कहा इस विकास के माडल में से सिर्फ युद्ध निकलेगा .

आज हमारी सेना आदिवासी इलाकों में पहुँच चुकी है .

भारत के अमीर लोग भारत के गरीब इलाकों में सेना भेज रहे हैं और आपको अभी भी नही लगता कि हम गृह युद्ध की तरफ बढ़ रहे हैं ?

सोचिये आज ही सोचिये कि क्या भारत को अपने विकास की दिशा के बारे में फिर से नही सोचना चाहिए ?

जो विकास देश में हिंसा बढाए हमें वैसा विकास चाहिए या जो शांति बढाए वो विकास अपनाना चाहिए ?

Monday, July 14, 2014

कुछ लोग मारे गए


कुछ लोग मारे गए क्योंकि उनकी दाढ़ियाँ लंबी थीं .

और दूसरे कुछ इसलिए मारे गए क्योंकि उनकी खाल का रंग हमारी खाल के रंग से ज़रा ज़्यादा काला था .

कुछ लोगों की हत्या की वाजिब वजह यह थी कि वो एक ऐसी किताब पढते थे जिसके कुछ पन्नों में हमारी किताब के कुछ पन्नों से अलग बातें लिखी हुई थीं .

कुछ लोग इसलिए मारे गए क्योंकि वो हमारी भाषा नहीं बोलते थे .

कुछ को इसलिए मरना पड़ा क्योंकि वो हमारे देश में नहीं पैदा हुए थे .

कुछ लोगों की हत्या की वजह ये थी कि उनके कुर्ते लंबे थे .

कुछ को अपने पजामे ऊंचे होने के कारण मरना पड़ा .

कुछ के प्रार्थना का तरीका हमारे प्रार्थना के तरीके से अलग था इसलिए उन्हें भी मार डाला गया .

कुछ दूसरों की कल्पना ईश्वर के बारे में हमसे बिकुल अलग थी इसलिए उन्हें भी जिंदा नहीं रहने दिया गया .

लेकिन हमारे द्वारा करी गयी सारी हत्याएं दुनिया की भलाई के लिए थीं .

हमारे पास सभी हत्याओं के वाजिब कारण हैं .

आखिर हम इन सब को ना मारते तो हमारा राष्ट्र, संस्कृति और धर्म कैसे बचता ?

Friday, July 11, 2014

फिलीस्तीनी बच्चों की लाशें



हैरान हो क्या फिलीस्तीनी बच्चों की लाशें देख कर 
लेकिन तुम्हारा राष्ट्र नायक समर्थन करता है इन बच्चों की हत्याओं का 
और तुम अपने राष्ट्र नायक का समर्थन करते हो 

तुम सभी हत्याओं का समर्थन करते हो 
चाहे वो 
अतीत में दानव संहार के नाम पर हुई हों या वर्तमान में 
देश की आंतरिक सुरक्षा के फर्ज़ी आवरण में 

आपने हमेशा हत्याओं की हिमायत की है 

एक युद्ध जारी है
आप भी एक पक्ष हैं उस युद्ध में
आप जिंदा है क्यों कि आप अभी मारने वाले के पक्ष में हैं

लेकिन मैं जानता था मर जाने वालों को करीब से
इसलिए हत्यारों द्वारा धर्म भ्रष्ट घोषित कर दिया गया हूँ

Saturday, July 5, 2014

दीदी कांट्रेक्टर




दीदी कांट्रेक्टर की उम्र अब लगभग पिच्चासी साल है . वो हिमाचल में सिद्धबाड़ी नामके गाँव में एक मिट्टी के छोटे घर में रहती हैं .
दीदी के पिता जर्मन और माँ अमेरिकी थीं . दीदी की शादी एक गुजराती कांट्रेक्टर से हुई .
दीदी ने हिमाचल में आकर अपने मिट्टी के मकान का नक्शा खुद ही बनाया . उसके बाद अनेकों लोगों ने अपने घर का नक्शा भी दीदी से बनवाया .
दीदी के मकान प्रसिद्ध होने लगे .
आज दीदी के पास अनेकों वास्तुशिल्प विश्वविद्यालय अपने छात्रों को काम सीखने के लिए भेजते हैं .
लेकिन दीदी के पास खुद वास्तुशिप की डिग्री नहीं है .
दीदी अपने मकान में सिर्फ स्थानीय सामान ही इस्तेमाल करती है .
उनके बनाए मकानों में मिट्टी , बांस ,पत्थर और स्थानीय मिलने वाली लकड़ी का ही इस्तेमाल होता है .
अगर आप उनसे एक बड़ा मकान बनवाने के लिए नक्शा बना कर देने के लिए कहेंगे तो वो आपसे आपके परिवार के सदस्यों के बारे में पूछेंगी और फिर सिर्फ ज़रूरी आकार का नक्शा बना कर देंगी .
दीदी गांधीवादी हैं .उनके घर में सारे कपड़े खादी के हैं . उनका रहन सहन बिलकुल सादा है .
गांधी कहते थे हमारी सारी ज़रूरतें आस पास के पांच गाँव से ही पूरी होनी चाहियें .
इसे ही गांधी स्वदेशी कहते थे .
कंक्रीट के मकान में लगने वाली सामग्री को दूर से, डीज़ल जला कर ,सीमेंट और स्टील बनाने के लिए लोगों को विस्थापित कर के प्रदूषण फैला कर सारे देश में एक जैसे मकान बनाए जा रहे हैं .
मकान की सामग्री दूर से लेकर आने और सारे देश में एक जैसे कांक्रीट के मकान बनाना मुनाफे की अर्थव्यवस्था और उसे समर्थन देने वाली राजनीति का प्रतीक है .
अभी आप जो मकान बनाते है उसमे से अस्सी प्रतिशत पैसा पूंजीपति की जेब में जाता है .लेकिन मिट्टी के मकान में अस्सी प्रतिशत पैसा मजदूर के घर में जाता है .
दीदी कहती हैं कि मकान मेरे लिए मेरा राजनैतिक वक्तव्य है .
दीदी के मिट्टी के मकान इसके विरुद्ध ज़मीन पर मिट्टी से लिखा गया एक राजनैतिक वक्तव्य है .

Saturday, June 14, 2014

विकास का माडल



विकास का मतलब ?

और भी अमीर हो जाना ?

अमीर हो जाना मतलब ? 

मतलब हमारे पास हर चीज़ का ज़्यादा हो जाना ? 

मतलब पैसा ज़्यादा ,ज़मीन ज़्यादा, मकान ज़्यादा हो जाना ? 

हाँ जी ? 

आपका विकास हो जाएगा तो आपके पास ज़्यादा पैसा आ जाएगा जिससे आप ज़्यादा गेहूं , सब्जियां , ज़मीन वगैरह खरीद सकते हैं .

हाँ जी . 

क्या आपके लिए प्रकृति ने ज़्यादा ज़मीन बनाई है ?

नहीं जी सबके लिए बराबर बनाई है ? 

आप ज़्यादा ज़मीन लेंगे तो वो ज़मीन तो किसी दूसरे के हिस्से की होगी ना ?

हाँ बिलकुल .

यानी आपका विकास दूसरे के हिस्से का सामान हड़प कर ही हो सकता है .

हाँ जी . 

तो आपका विकास प्रकृति के नियम के विरुद्ध हुआ ना ?

हाँ बिलकुल ?

जो लोग बहुत मेहनत करते हैं जैसे किसान मजदूर क्या वो भी अमीर बन जाते हैं ?

नहीं वो अमीर नहीं बन पाते .

यानी अमीर बनने के लिए मेहनती होना ज़रूरी नहीं है ?

हाँ उसके लिए दिमाग की ज़रूरत होती है .

आप मानते हैं कि खेती और मजदूरी के लिए बुद्धि  की ज़रूरत नहीं है ?

हाँ नहीं है .

आपने कभी खेती या मजदूरी करी है .

नहीं करी .

फिर आपको कैसे मालूम कि खेती और मजदूरी के लिए बुद्धि की ज़रूरत नहीं है ?

वो मजदूर किसान लोग पढ़े हुए नहीं होते ना .

अच्छा वो क्यों नहीं पढ़े हुए होते ?

क्योंकि उनके गाँव में अच्छे स्कूल नहीं होते और उन्हें काम करना पड़ता है इसलिए वो स्कूल नहीं जा पाते .

यानि उनका ना पढ़ पाना अपने स्थान और जनम के कारण होता है ?

हाँ जी .

तो इसमें उन किसान मजदूरों का दोष है क्या ?

नहीं उनका दोष नहीं है .

अगर उनका दोष नहीं है तो उनका आप जैसा विकास क्यों नहीं होना चाहिए ?

क्योंकि वो मेरे जैसा काम ही नहीं कर सकते .

आप क्या काम कर सकते हैं जो किसान मजदूर नहीं कर सकता ?

मैं कम्प्युटर पर काम कर सकता हूँ .

आप घर पर कम्प्यूटर पर काम करेंगे तो आप अमीर हो जायेंगे ?

नहीं घर पर अपना काम करने से अमीर नहीं होंगे उसके लिए हमें कहीं कम्पनी वगैरह में काम करना पड़ेगा .

अच्छा तो कम्पनी आपको पैसा देगी तब आप अमीर बनेंगे ?

हाँ  कम्पनी के पैसे से मेरा विकास होगा ?

कम्पनी के पास पैसा कहाँ से आता है ? 

कम्पनी माल का उत्पादन करती है उसमे से पैसा हमें देती है .

कम्पनी माल बनाती है तो उसके लिए ज़मीन पानी वगैरह कहाँ से आता है .

ज़मीन पानी तो कम्पनी को सरकार देती है .

सरकार ने ज़मीन पानी बनाया है क्या ? 

नहीं सरकार लोगों से ज़मीन पानी ले कर कम्पनी को देती है .

क्या सरकार को लोग प्रेम से अपनी ज़मीन और पानी दे देते हैं ?

नहीं लोग प्यार से सरकार को ज़मीन और पानी नहीं देते सरकार पुलिस भेज कर लोगों से ज़मीन और पानी छीन लेती है ?

अच्छा जिनकी ज़मीन और पानी सरकार छीन कर कम्पनी को देती है वो बहुत अमीर लोग होते होंगे ?

अरे नहीं सरकार तो गरीबों का पानी और ज़मीन छीन कर कम्पनी को देती है .

अच्छा मतलब आपका विकास तब होता है जब गरीबों की ज़मीन छीनी जाय ?

हाँ जी बिलकुल .

मतलब आपके विकास के लिए आपको गरीब की ज़मीन चाहिए ?

हाँ जी .

ज़मीन छीनने के लिए पुलिस भी चाहिए ?

हां जी पुलिस तो चाहिए .

निहत्थी पुलिस या हथियारबंद पुलिस ?

निहत्थी पुलिस किस काम की हथियारबंद पुलिस चाहिए .

यानी आपके विकास के लिए बंदूकें भी चाहियें ?

हाँ जी बंदूकें भी चाहियें .

मतलब आप सरकारी हिंसा के बिना विकास नहीं कर सकते ?

हाँ जी नहीं कर सकते ?

यानी आपका ये विकास हिंसा के बिना नहीं हो सकता ? 

हाँ नहीं हो सकता .

तो आप इस सरकारी हिंसा का समर्थन करते हैं ? 

हाँ विकास करना है तो हिंसा तो होगी .

अच्छा अगर आपकी इस हिंसा के कारण अगर गरीब लोग भी आप की पुलिस से लड़ने लगें तो आप क्या करेंगे .

हम और भी ज़्यादा पुलिस भेजेंगे .

अगर गरीब और भी ज्यादा जोर से लड़ने लगें तो ?

तो हम सेना भेज देंगे .

यानी आप अपने ही देश के गरीबों के खिलाफ देश की सेना का इस्तेमाल करेंगे ?

क्यों नहीं करेंगे . विकास के लिए हम सेना का इस्तेमाल ज़रूर करेंगे .

देश की सेना देश के गरीबों को ही मारेगी तो क्या उसे गृह युद्ध नहीं माना जाएगा ?

हाँ हम विकास के लिए कोई भी युद्ध लड़ सकते हैं . 
हमारे प्रधानमंत्री ने कहा है कि  जो हमारे विकास में बाधा पहुंचाता है वह आतंकवादी है .

ओह तो आप अपने विकास के लिए देशवासियों के विरुद्ध सेना का उपयोग करेंगे ?

हाँ ज़रूर करेंगे .

क्या इस दिन के लिए देश आज़ाद हुआ था की एक दिन इस देश के विकसित लोग अपने देश के गरीबों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल करेंगे ?

हाँ विकास के लिए हम कुछ भी करेंगे .

गरीब जनता के विरुद्ध सेना का इस्तेमाल करेंगे ?

हाँ ज़रूर करेंगे .

(तो दोस्तों यही है विकास का हमारा माडल .
बधाई हो )

Wednesday, June 11, 2014

भीड़ का न्याय



गांधी नीचे ज़मीन पर गिर चुका है

मारने वाला अभी भी गर्व से तना खड़ा है 
लगता है गांधी हार गया 

राजा के सिपाहियों ने 
जीसस के कंधे पर सलीब रख दिया है 
और काँटों का घेरा उसके सर पर लपेट दिया है 
जिन सूदखोरों को जीसस ने कोड़े मार कर मंदिर के अहाते से भगाया था 
वो सारे सूदखोर हँसते हुए राजा के साथ खड़े हैं 
भीड़ तालियाँ बजा रही है 
यह भीड़ का न्याय है 

राजा ने सुकरात को ज़हर पीने की सज़ा दी है 
जो पाखंडी पुरोहित सुकरात की सच्ची बातों से घबराए हुए थे 
उस सड़ चुके पुराने धर्म के पुरोहित आज हंस रहे हैं 
सुकरात अकेला है 
भीड़ राजा के साथ हैं 
यह भीड़ का न्याय है 

गैलीलियो के सच से 
पादरी घबराए हुए हैं 
उनका धर्मग्रंथ अब सवालों के घेरे में है 
इसलिए गैलीलियो पर धर्मग्रंथ के विरुद्ध बोलने का 
फतवा दे दिया गया है 
गैलीलियो सही होते हुए भी खामोश है 
भीड़ उन्माद से चिल्ला रही है 

भीड़ कभी न्याय नहीं करती 
कुछ लोग अपने समय में हारते हैं 
लेकिन इतिहास अपना काम चुपचाप करता है 
उस समय के हारे हुए लोग बाद में विजेता के रूप में चमकते हैं 
तत्कालीन सत्ताधीश कूड़ेदान में जा चुके होते हैं 
उन्हें कोई याद नहीं करता ,
वो विस्मृत कर दिए जाते हैं 

इसलिए मेरी बच्ची सोनी सोरी तुम ज़रा भी निराश ना होना 
भीड़ का साथ न मिला ना सही 
तुमने ढहा दिया उनके ज़ुल्म का किला 
उनके ज़िल्ले इलाही होने का मुलम्मा 
उतारा है तुमने 

चाटुकार कलम घसीटू 
मलाई चाटते हैं 
सत्य की हंसी उड़ाते हैं 
पर वो भीड़ का ही हिस्सा होते हैं 
बेकार भीड़ का 
तुमने उस दौर में आवाज़ उठाई जब हार रही थी तुम्हारी पूरी कौम 
ज़ुल्मतों के सामने कलम घसीटू लोग 
मलाई के दोने के लिए सत्ता के सामने सर झुकाए बैठे थे 

अभी हैं मुकाम कई 
अभी है रास्ता बहुत लंबा 
फिर लड़ेंगे 
फिर जीतेंगे 
हम अभी हारे नहीं हैं