Friday, March 20, 2015

सरकार शांति और लोकतंत्र से ही डरती है

छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा जिला .
सरकार आदिवासियों की ज़मीनें छीनने के लिए भारी तादात में सैन्य बलों को तैनात कर रही है .
इन सैन्य बलों को आदिवासी गाँव में तैनात किया जाता है .
देश भर में जहां भी सरकार उद्योगपतियों के लिए ज़मीनें छीनती हैं वहाँ सरकार पहले सैन्य बलों को ही तैनात करती है .
चाहे उस इलाके में नक्सलवादी हों चाहे ना हों .
इस देश में आज़ादी के बाद से आज तक अमीर कंपनियों के लिए कोई भी ज़मीन बिना सरकारी बंदूकों के इस्तेमाल के हड़पी ही नहीं गयी है .
यहाँ तक की दिल्ली के पास नौएडा तक में भारी पुलिस बल तैनात करके गांव वालों को पीट कर औरतों को घसीट कर घरों में घुस कर तोड़ फोड करने के बाद ज़मीन छीनी गयी थी जबकि नौएडा में तो कोई भी नक्सलवादी नहीं था .
आदिवासी इलाकों में यह सैन्य बल आदिवासी महिलाओं से बलात्कार करते हैं . युवकों को फर्ज़ी मामलों में फंसा कर जेलों में डालते हैं .
सैन्य बलों के सिपाही आदिवासियों को पीटते हैं .
आदिवासियों के घरों में घुस कर लूटपाट करते हैं .
ताकि आदिवासी डर जाएँ और सरकार जब ज़मीन छीने तो कोई सरकार के विरुद्ध आवाज़ ना उठा सके
इस तरह की सैंकडों घटनाओं की सूचना हम सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दे चुके हैं .
अनेकों बार सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग सरकार को फटकार भी लगा चुका है .
आज दंतेवाड़ा में फिर से इसी तरह की एक नयी घटना घट रही है .
दंतेवाड़ा ज़िले के अनेकों आदिवासी गावों के सरपंचों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने परसों कलेक्टर से मिल कर कलेक्टर को एक ज्ञापन दिया .
इन जनप्रतिनिधियों ने कलेक्टर को सूचना दी कि हमारे गाँव में नए सीआरपीएफ कैम्प खोले जा रहे हैं जिनके बारे में इस इलाके के आदिवासियों से कोई राय मशविरा नहीं किया गया है ,
सरकार की इस मनमानी के विरोध में आदिवासी इक्कीस मार्च को एक शांतिपूर्ण रैली करेंगे जिसकी सूचना हम आपको दे रहे हैं .
इस पत्र में जिन सरपंचों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किये थे उन में से लगभग सभी को आज पुलिस ने घर में घुस कर उठा लिया है .
इन जनप्रतिनिधियों में बड़े बेडमा गाँव के सरपंच शंकर कुंजाम , फूलपाड़ गाँव के सरपंच राहुल वेट्टी, कोरीरास गाँव के सरपंच जोगा , पालनार गाँव के सरपंच सुकालू ,और जनपद पंचायत के सदस्य नंदलाल को पुलिस ने पकड़ लिया है .
सुनने में आया है कि सरकार मानती है कि यह रैली नक्सलियों के कहने से करी जा रही है .
अगर थोड़ी देर के लिए सरकार के दावे को सच मान भी लिया जाय तो भी सरकार का यह कदम मूर्खता से भरा हुआ है .
एक तरफ तो सरकार कहती है कि नक्सली बंदूक छोड़ें और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में शामिल हो जाएँ .
तो रैली करना तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया ही है .
अगर नक्सली रैली कर रहे हैं तो सरकार को तो खुश होना चाहिये कि चलो नक्सली लोकतान्त्रिक तरीकों में विश्वास कर रहे हैं और शांतिपूर्वक अपनी बात रख रहे हैं .
लेकिन अगर सरकार आदिवासियों को शांतिपूर्वक और लोकतान्त्रिक तरीकों से अपनी बात भी नहीं रखने देगी तो उसका क्या नतीजा होगा ?
सरकार को खुद ही सोचना चाहिये .
अगर आप आदिवासियों को शांतिपूर्ण तरीके से रैली नहीं करने देंगे तो उस इलाके में आपको शांति लाने में मदद मिलेगी या आप अशांती को और भड़का रहे हैं .
असली बात यही है .
सरकार कभी शांती नहीं चाहती .
सरकार शांति और लोकतंत्र से ही डरती है .
सरकार के पास तो सिर्फ बंदूक है ,लाठी है पुलिस है दमन है ताकत है .
सरकार बंदूक का सामना तो बहुत अच्छे से कर लेती है .
लेकिन जब आदिवासी लोकतान्त्रिक और शांतिपूर्ण विरोध करते हैं तो सरकार बेबस हो जाती है
आदिवासियों के शांतिपूर्ण विरोध से सरकार घबरा जाती है .
तब सरकार की सारी दुनिया के सामने पोल खुल जाती है .
इसलिए सरकार आदिवासियों के निहत्थे विद्रोह को कुचलने में लग गयी है .
तो सरकार बहादुर आप आदिवासियों का दमन कीजिये जितनी भी आपकी ताकत है .
आदिवासी उस दमन का जवाब अपनी हिम्मत और एकजुटता से देंगे .
सरकार बहदुर इस दुनिया में आपसे पहले भी बड़े बड़े ज़ालिम आये थे .
लेकिन उन जालिमों का नामो निशान मिट गया .
लेकिन जिन लोगों ने ज़ुल्म के मुखालिफ आवाज़ उठाई वो इतिहास में अमर हो गए .
सरकार बहदुर तुम करो दमन .
दुनिया तुम्हे देख रही है .
दंतेवाडा में दमन करोगे तो सारी दुनिया में उसके खिलाफ़ आवाज़ उठेगी .
देखते हैं इस लड़ाई में जीत किसकी होती है ?
दमन की या आदिवासियों की हिम्मत और न्याय की ?

Tuesday, March 17, 2015

पदमा

पदमा आंध्र प्रदेश में कम्प्युटर आपरेटर का काम करती थी .
उसका पति काम के सिलसिले में अक्सर बाहर ही रहता था . एक दिन सुबह सुबह दरवाजे पर दस्तक हुई पदमा ने दरवाजा खोला सामने छत्तीसगढ़ पुलिस वाले खड़े हुए थे . पदमा को छत्तीसगढ़ लाया गया .
पुलिस वालों ने थाने में पदमा से पूछा कि क्या तुम्हारे पति का नाम बालकिशन है? पदमा ने कहा हाँ है .
पुलिस ने कहा कि तुम्हारा पति नक्सलवादी है .
पदमा ने कहा तो अपने किस कानून के तहत मुझे पकड़ा है ? मेरा पति नक्सली है तो मेरे पति को पकडिये .
पदमा का कहना सही था भारत के कानून के मुताबिक किसी के अपराध के लिए किसी दूसरे को सज़ा नहीं दी जा सकती.
खुद को फंसता देख पुलिस ने पदमा के ऊपर हत्या के तीन फर्ज़ी मामले बना दिए और पदमा को 2007 में जगदलपुर जेल में डाल दिया .
पदमा पर जगदलपुर कोर्ट में मुकदमा चला . पदमा के खिलाफ़ कोई गवाह या कोई भी सबूत तो था ही नहीं . जगदलपुर की जिला अदालत ने पदमा को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
कोर्ट ने 10 अगस्त 2009 को पदमा को जेल से रिहा करने का आदेश दे दिया .
पदमा का वकील जेल के बाहर पदमा का इंतज़ार करता रहा कि पदमा जेल से बाहर आयेगी . लेकिन पदमा शाम तक जेल से बाहर नहीं आयी . पदमा अगले दिन भी जेल से बाहर नहीं आयी . पदमा तीसरे दिन भी जेल से बाहर नहीं आयी .
पदमा के वकील ने जेल अधिकारियों से पदमा के बारे में पूछा तो जेल अधिकारीयों ने बताया कि पदमा अब जेल में नहीं है . पदमा को तो दो दिन पहले ही पुलिस वाले कहीं ले गए .
पुलिस वालों ने कोर्ट का रिहाई आदेश मिलने के बाद पदमा को जेल से गायब कर दिया था
पदमा के वकील ने फिर से कोर्ट में पदमा को हाज़िर करने के लिए हेबियस कार्पस का मामला दायर किया .
पुलिस ने अदालत को बताया कि पदमा को पुलिस ने दो और मामलों में फिर से पकड़ लिया है .
लेकिन इस बार पदमा को पदमा पत्नी राजन के नाम पर पकड़ कर जेल में डाला गया था .
इस बार पुलिस ने पदमा पर दो हत्याओं का फर्ज़ी मुकदमा लगाया .
पदमा के वकील ने जब मुकदमे में पुलिस द्वारा अदालत में पेश किये गए कागज़ देखे तो पता चला कि बहुत साल पहले कभी पदमा नाम की कोई नक्सली नेता थी जो पुलिस रिकार्ड में भी सन दो हज़ार छह में मारी जा चुकी है .
इस बार उस मर चुकी पदमा के नाम पर इस पदमा को पुलिस ने बदमाशी पूर्वक जेल में बंद किया है .
पदमा के वकील ने मारी गयी पदमा पत्नी राजन के पति और उसके बेटे को अदालत के सामने पेश किया .
पदमा को अदालत ने फिर से रिहा करने का हुकुम दिया .
लेकिन तब तक पुलिस ने पदमा पर तीन और मामले बना दिए .
2014 में इस बार पुलिस ने होशियारी दिखाई इस बार पदमा के पति का नाम लिखा नामालूम और लिखा पता नामालूम .
तो अब पदमा तीन मामलों में पदमा पत्नी बालकिशन और दो मामलों में पदमा पत्नी राजन के रूप में जेल में बंद है .
अगर आपमें से किसी का यह दावा हो कि भारत में पुलिस सरकार न्याय सभी के लिए बराबर है तो वह जगदलपुर जेल में जाकर पदमा से मिल सकता है .
अगर मेरी एक भी बात झूठ पायी जाय तो सरकार मुझे बड़े शौक से तुरंत जेल में डाल दे .
इस कड़ी में कुछ और भी मामले देश के सामने रखूंगा .

Saturday, March 14, 2015

बजावें हाय पांडे जी सीटी


'थाने में बैठे आन ड्यूटी
बजावें हाय पांडे जी सीटी'
हमारे पैसे से चलने वाली आकशवाणी से यह गाना बजता है .
पुलिस वाला ताकतवर है .
पांडे जी बड़ी जात वाले हैं
पुरुष है
इसलिए यह स्तिथी भारतीय संस्कारों में मज़ा देने वाली हालत पैदा करती है
भारत के संस्कारों में अगर इस तरह की बात के लिए स्वीकार भाव ना होता तो इस तरह का गाना भारत में ना तो बन सकता था ना ही सरकारी रेडियो पर बज सकता था ना जनता द्वारा इसे स्वीकार किया जा सकता था .
इसी सोच वाले भारत में बड़ी जाति का एक पुलिस अधिकारी एक कमज़ोर सामाजिक वर्ग आदिवासी लड़की के गुप्तांगों में पत्थर ठूंसता है तो भारत का राष्ट्रपति खुश होकर बख्शीश में उस अधिकारी को वीरता का तमगा देता है और देश तालियाँ बजाता है .
हमारे समाज का जो सार्वजनिक स्थान है वह किसके द्वारा भरा गया है ?
आप खुद ही देखिये कि किसी भी सार्वजनिक स्कूल कालेज , आई आई टी , आई आई एम् , मेडिकल कालेज , पुलिस , प्रशासन , राजनीति में जो स्पेस है उसे किसके द्वारा भरा गया है ?
कभी अचानक ध्यान दीजियेगा .
उस सार्वजनिक स्पेस में
कितने पुरुष हैं ,और महिलायें कितनी हैं ?
बड़ी जाति के लोग कितने हैं और कमज़ोर आर्थिक समूहों के लोग कितने हैं ?
बहुसंख्यक धार्मिक समूह के लोग कितने हैं , अल्पसंख्यक कितने हैं ?
आप देख्नेगे कि ज्यादातर सार्वजानिक स्थान पर बहुसंख्य , उच्च जाति के पुरुषों का कब्ज़ा है .
इस तरह जागरूक होकर देखने से आप पता लगा सकते हैं कि समाज पर कब्ज़ा किसका है और बेदखल किसे किया गया है
अगर सार्वजनिक जीवन से महिलायें , दलित , आदिवासी अल्पसंख्यक गायब हैं तो आप निश्चित मानिए वह समाज पुरुषवादी सवर्ण मानसिकता के दमनकारी विचारों से ग्रस्त शासन प्रशासन राजनीति और न्याय व्यवस्था से ही पीड़ित रहेगा
तभी तो भारत का सर्वोच्च न्यायालय किसी को सिर्फ इसलिए फांसी पर चढ़ा देता है क्योंकि भारत के स्वर्ण पुरुषों के वर्चस्व वाली सामूहिक अन्तश्चेतना ऐसा चाहती है .
ये जो समाज का कामन स्पेस है
उसमे महिला
पीढ़ियों से दबाये गए दलित
जंगलों में रहने वाले आदिवासी
बराबर का स्पेस पा सकें इसकी जिम्मेदारी
किसकी है ?
हम सभी की है ना ?
लेकिन अगर हम इसकी तरफ ध्यान ही नहीं देंगे
तो समाज के इस कामन स्पेस में सभी की बराबर भागीदारी बनायेगे कैसे ?
समाज आज जहां है उसे वहाँ से आगे ले जाना
इसी पीढ़ी की जिम्मेदारी है
इसे ही असली विकास कहते हैं
नकली विकास नहीं असली विकास कीजिये
समाज में सभी के लिए जगह बनाइये .

Wednesday, March 11, 2015

आयता

आदिवासियों की ज़मीनें छीनने के लिए छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार बुरी तरह आदिवासियों के पीछे पड़ी हुई है .
आदिवासी सरकार के खिलाफ़ आवाज़ ना उठा सकें इसलिए आदिवासियों को डरा कर चुप रखने के लिए अपराधी किस्म के क्रूर पुलिस अधिकारियों को बस्तर में पदस्थ किया जाता है .
आजकल बस्तर का पुलिस आईजी कल्लूरी नामक पुलिस अधिकारी को बना दिया गया है
कल्लूरी पहले लेधा नामकी आदिवासी महिला के साथ महीना भर थाने में बलात्कार करवाने और अनेकों फर्ज़ी मुठभेड़ों में बदनाम है .
बस्तर में कल्लूरी ने तीन गावों में आग लगवाई थी .
लिंगा कोडोपी ने उन गावों का वीडियो बना कर यू ट्यूब पर डाल दिया तो लिंगा को फर्ज़ी मामलों में फंसा कर जेल में डाल दिया गया .
सोनी सोरी और उसके पति ने लिंगा की मदद करी ,
इससे चिढ़ कर कल्लूरी ने सोनी के पति को भी फर्ज़ी मामलों में फंसा कर जेल में डाल दिया
सोनी के पति को अदालत ने निर्दोष पाया लेकिन रिहाई से पहले जेल में सोनी के पति को इतना मारा गया कि जेल से बाहर आते ही सोनी सोरी के पति ने दम तोड़ दिया .
सोनी सोरी को भी अनेकों फर्ज़ी मामलों में फंसा कर पकड़ा गया और थाने में ले जाकर उसके गुप्तांगों में पत्थर भर दिए गए .
तीन गाँव को जलाने के बाद मैंने जब इस खबर को सार्वजनिक किया और उस पर देश भर में विवाद शुरू हुआ तो कल्लूरी को बस्तर से हटाना पड़ा था .
लेकिन कुछ महीने पहले सरकार ने कल्लूरी को फिर से बस्तर का चार्ज दे दिया .
पुलिस महानिरीक्षक कल्लूरी ने इस बार बस्तर पहुँचते ही आदिवासियों की आवाज़ दबाने के लिए मुखर आदिवासी युवाओं को नक्सली कह कर उन्हें जबरदस्ती आत्मसमर्पण करने और बात ना मानने पर मारे जाने के लिए तैयार हो जाने का फरमान दे दिया .
हजारों आदिवासियों का फर्ज़ी आत्म समर्पण करवाया गया .
आयता नामक एक आदिवासी युवा को भी महानिदेशक कल्लूरी ने नक्सली बन कर आत्म समर्पण करने के लिए मजबूर किया .
आयता ने कहा कि मैं नक्सली हूँ ही नहीं , यहाँ तक कि मेरे खिलाफ़ कोई फर्ज़ी रिपोर्ट तक नहीं है तो फिर मैं नकली नक्सली बन कर आत्म समर्पण क्यों करूँ ?
इस पर नाराज़ होकर कल्लूरी ने पुलिस भेज कर आयता कि पत्नी सुकड़ी का अपहरण करवा लिया .
पन्द्रह हज़ार आदिवासियों ने सोनी सोरी की अगुआई में थाने को घेर लिया .
पुलिस को हार कर आयता की पत्नी सुकड़ी को वापिस लौटाना पड़ा .
लेकिन पुलिस ने चिढ़ कर तीन दिन बाद बदला लेने के लिए आदिवासियों के गाँव पर फिर से हमला किया .
बूढ़ी आदिवासी औरतों तक को पीटा गया . आदिवासी महिलाओं की हड्डियां तोड़ डाली गयीं .
लेकिन आदिवासी नहीं डरे .
प्रदर्शनों का सिलसिला चलता रहा .
आदिवासियों ने पुलिस अपहरण से छुड़ाई गयी सुकड़ी को गाँव का सरपंच चुन लिया .
आयता ने अपने खिलाफ़ कल्लूरी के दमन के विरुद्ध राजधानी रायपुर में प्रेस कांफ्रेंस करी
आयता पुलिस महानिदेशक से मिलने पुलिस मुख्यालय गया .
पुलिस महानिदेशक आयता से नहीं मिले .
आयता अपने गाँव वापिस आ गया .
इसी बीच एक अन्य आदिवासी युवक को पुलिस ने पकड़ कर नक्सली कह कर जेल में डाल दिया
हज़ारों आदिवासियों ने फिर से थाने को घेर लिया .
इस बार आदिवासियों की अगुवाई सोनी सोरी के साथ आयता भी कर रहा था .
प्रदर्शन स्थगित होने के बाद आयता अपने गाँव वापिस लौट रहा था .
तभी पुलिस ने आयता को अकेला देख कर उसे पकड़ लिया .
सोनी थाने पहुँची और सोनी ने कहा कि कल्लूरी आयता से चिढा हुआ है और पुलिस ने कल्लूरी के घमंड की रक्षा के लिए कल्लूरी के कहने से ही आयता को पकड़ा है .
तभी कल्लूरी की गाड़ी वहाँ पहुँच गयी .
सोनी सोरी अड् गयी कि कि आप आयता को थाने में प्रताड़ित करना चाहते हैं कल्लूरी यहाँ इसीलिये आया है
आदिवासियों ने फिर थाने को घेर लिया .
इस सब से पुलिस आयता को प्रताड़ित नहीं कर पायी .
लेकिन पुलिस ने आयता पर अनेकों फर्ज़ी मामले बना कर आयता को जेल में डाल दिया है .
सोनी सोरी और उनके वकील आयता की ज़मानत की कोशिशों में लगे हुए हैं .
जब भारत का इतिहास लिखा जाएगा तो उसमे आदिवासियों के खून के बहुत सारे धब्बे ज़रूर होंगे .
शायद कई पीढ़ियों बाद भारत का प्रधानमंत्री भी लालकिले से मरे हुए आदिवासियों से माफी मांगेगा जैसे आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने मारे गए लाखों आदिवासियों से अब माफी मांगी है .
हर विकसित सभ्यता में वहाँ के आदिवासियों की लाशें क्यों होती हैं ?
हम खुद को सभ्य और धार्मिक कैसे कह सकते हैं ?.

Wednesday, February 11, 2015

माँ के हाथ से बना खाना

हम सब अपनी माँ के हाथ से बने खाने के स्वाद को याद करते हैं .

मैंने इसकी खोज करने का विचार किया 

अपनी पत्नी को बेटियों के लिए खाना बनाते हुए ध्यान से देखा 

जब वह सब्जी खरीदती है तो ध्यान से खरीदती है कि मेरी बेटियों को कौन सी सब्जी पसंद है

अब इस बात में क्या ईर्षा करनी कि हमारी पसंद अब दोयम दर्जे पर रख दी गयी है

प्रकृति नयी पौध पर ज़्यादा ध्यान देने के लिए माँ को प्रेरित करती है

इसलिए माँ बच्चे की पसंद पर ज़्यादा ध्यान देने लगती है

जब सब्जी काटी जाती है तो माँ बच्चों की पसंद को ध्यान में रख कर सब्ज़ी काटती है ,

मुझ से अक्सर कहा जाता है कि आपने ये क्या सब्ज़ी काट दी है बच्चे इसे नहीं खायेंगे छोड़ देंगे

फिर जब सब्ज़ी बनने लगती है तो सारे मसाले बच्चों की पसंद को ख्याल में रख कर डाले जाते हैं ,

हर प्रक्रिया में माँ के मन में और हाथ में बच्चे की पसंद का ही ख्याल छाया हुआ था

अब जो खाना बनेगा वह बच्चों को तो पसंद आएगा ही

अब समझ में आ गया कि मेरी माँ के हाथ के खाने का स्वाद अब क्यों नहीं मिलता ?

वो तो सिर्फ माँ के हाथ के खाने में ही मिल सकता है .

इस पोस्ट को महिलाओं के अधिकारों से न जोड़ा जाय

क्योंकि इसके बाद बर्तन मांजने का काम मैं ही करता हूँ .

जनता की ताकत ज़िंदाबाद

छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार उद्योगपतियों के कहने से आदिवासियों को मार मार कर कर इतना डरा देना चाहती है की जब सरकार इन उद्योगपतियों के लिए आदिवासियों की ज़मीनें छीने तो आदिवासी सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत ना कर सके ,
इसके लिए गाँव गाँव में जाकर पुलिस डराने के लिए आदिवासियों को मार रही है घरों में घुस कर लूट- पाट करती है।
आदिवासियों ने इस सरकारी बदमाशी के लिए सरकार को सबक सिखाने का फैसला किया।
कल हज़ारों आदिवासी अपने अपने गाँव से निकल कर दंतेवाड़ा शहर की तरफ चल पड़े।
सोनी सोरी इन आदिवासियों के साथ थी।
सरकार के हाथ पाँव फूल गए।
रास्ते में हज़ारों पुलिस वाले और प्रशासनिक अधिकारियों ने आदिवासियों को शहर में घुसने से रोक दिया।
लेकिन आदिवासी डरे नहीं।
आदिवासियों ने कहा आप लाठी चलाइये गोली चलाइये लेकिन हम नहीं रुकेंगे।
आदिवासियों की दृढ़ता और गुस्सा देख कर पुलिस ने लिख कर माफीनामा दिया की अब से पुलिस आदिवासियों के घरों में घुस कर लूटपाट नहीं करेगी। अब से पुलिस किसी आदिवासी के साथ मारपीट नहीं करेगी।
प्रशासन ने लिख कर दिया की दस दिन के भीतर मारे गए निर्दोष आदिवासी के परिवार को मुआवज़ा दिया जाएगा और मामले की जांच करी जाएगी ।
अभी सबेरा दूर है लेकिन इसी तरह के काफिले इस अंधेरी रात को ख़त्म कर उजाला लाएंगे।
जनता की ताकत ज़िंदाबाद
सरकारी दमन मुर्दाबाद

अपने बच्चों के लिए एक बेहतर दुनिया बना कर जाइए

आपसे कहा गया कि लोकतंत्र का मतलब चुनाव में वोट डालना होता है
आपने मान लिया
जबकि असल में लोकतंत्र का मतलब होता है सबकी बराबरी
लेकिन आपने कभी यह जानने की जहमत नहीं की
आपसे कहा गया कि आपका धरम सबसे अच्छा है आपने मान लिया
आपने कभी पूछा नहीं कि आखिर ऐसा क्यों कि जिस धरम में मैंने जन्म लिया वही सबसे अच्छा क्यों माना जाय ?
आपसे कहा गया गरीब इसलिए गरीब होते हैं क्योंकि वे आलसी होते हैं आपने मान लिया
आपने यह नहीं पूछा कि कड़ी मेहनत करने वाले मजदूर और किसान इतने गरीब क्यों हैं ?
और आप कम मेहनत के बाद भी उनसे अमीर क्यों हैं ?
आपने यह नहीं पूछा कि आखिर हर विद्यार्थी यह क्यों चाहता है कि उसे कम मेहनत और
ज़्यादा तनख्वाह वाली नौकरी मिले ?
आपने यह जानने की कोशिश नहीं करी कि शिक्षा का मतलब दिमाग बंद कर के सिर्फ
अमीर आदमी की नौकरी करना आखिर किसके कहने से बना दिया गया है ?
पूछिए ये सारे सवाल पूछिए
गुलामी अँधेरे और तकलीफ का दौर अब खत्म होना चाहिये
इस दुनिया में सबके लिए काफी खाना ,कपड़ा और मकान है .
लेकिन आपका धरम आपकी राजनीति और आपकी शिक्षा
आपके दिमागों को कुंद बना रहे हैं
इसलिए आप
चंद स्वार्थी लोगों के गुलाम बन कर दुनिया में तकलीफ और हिंसा को बनाये रखे हुए हैं .
आँखे खोलिए
एक आज़ाद इंसान की तरह सोचना शुरू कीजिये
अपने बच्चों के लिए एक बेहतर दुनिया बना कर जाइए

सोनी ने प्रशासन को यह मुकदमा दर्ज़ करने के लिए धन्यवाद दिया है

सोनी सोरी पर छत्तीसगढ़ में नयी धाराओं में एक नया मामला दर्ज़ किया गया है .
पिछले दिनों पुलिस ने नदी में नहाते हुए एक निर्दोष आदिवासी की गोली मार कर हत्या कर दी थी .
पुलिस ने इस मामले में उल्टा नक्सलियों के खिलाफ़ रिपोर्ट लिख दी थी .
इस बात से नाराज़ मृतक के परिवार जन और ग्रामीण इस मामले की शिकायत करने कलेक्टर और एस पी के पास जाने के लिए निकले .
ग्रामीणों ने सोनी सोरी को साथ रहने के लिए कहा .
सोनी सोरी ने प्रशासन को आदिवासियों के इस पैदल मार्च की पहले से ही सूचना दे दी
आदिवासियों के इस पैदल मार्च में बड़ी संख्या में आदिवासियों को देख कर प्रशासन के हाथ पैर फूल गए और रास्ते में ही प्रशासन और पुलिस वालों ने लिखित आश्वासन देकर आदिवासियों के पैदल मार्च को वहीं रोक दिया .
लेकिन प्रशासन ने बाद में सोनी सोरी के ऊपर दंगा फसाद फैलाने और सरकारी आदेश के उलंघन करने की धाराओं में मामला दर्ज़ कर दिया .
सोनी पर धारा १४७, १४९,१८८ धारा लगाईं है
सोनी ने प्रशासन को यह मुकदमा दर्ज़ करने के लिए धन्यवाद दिया है .
इसका मतलब यह है कि सरकार आदिवासी की हत्या भी करेगी .
विरोध करने वालों पर भी मुकदमे करेगी .
किसी आदिवासी को मुंह भी नहीं खोलने देगी .
आदिवासियों की ज़मीने छीन कर अमीर उद्योगपतियों को देने के लिए यह सब करना बहुत ज़रूरी है

आइये इस अँधेरे से बाहर निकलने में पूरी मानवता की मदद करें

क्या मनुष्य मूल रूप से स्वार्थी और क्रूर है ?
कभी हम सब आदिवासी थे
और अगर आप आदिवासी समाज को देखें तो आप समझ जायेंगे कि मनुष्य मूल रूप से समाज के साथ मिल कर रहने वाला प्राणी है .
आदिवासी समाजों में सभी व्यक्ति समाज का ख्याल रखते हैं और समाज व्यक्तियों का ख्याल रखता है .
आदिवासी समाज में बूढ़े , बीमार , विकलांग सभी का ख्याल रखा जाता है .
आदिवासी समाजों में प्रकृति का कोई व्यक्ति मालिक नहीं माना जाता .
आदिवासी समाजों में जंगल नदी पहाड़ सबके सांझे होते हैं .
आदिवासी समाजों में कोई समाज को छोड़ कर अकेले अमीर बन जाने का सोचता भी नहीं है .
फिर ये विकसित समाज में मनुष्य ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है ?
विकसित समाज में क्यों मनुष्य सब को पीछे छोड़ कर सबसे आगे निकलना चाहता है ?
विकसित समाज में क्यों मनुष्य सारे संसाधनों का अकेले मालिक बन जाना चाहता है ?
विकसित समाज में क्यों आप सारी दुनिया के अकेले मालिक बन जाना चाहते हैं ?
याद कीजिये आप को स्कूल में क्या सिखाया जाता है ?
यही ना कि आपको सबसे ज़्यादा नम्बर लाने चाहिये
यही ना कि अपने बराबर में बैठे हुए बच्चे से बात मत करो
आपको समझाया गया कि आपका दोस्त असल में आपका प्रतिद्वंदी है
आपकी शिक्षा ने समझाया कि अच्छी तरह पढ़ाई करने का नतीजा यह होगा कि इस शिक्षा को पाने के बाद आप दूसरों से ज़्यादा अमीर बन सकोगे
आपको पढ़ाया गया कि मुनाफा कमाना अच्छी बात होती है
आपको पढ़ाया गया कि अमीर बनना ही जिंदगी का एक मात्र मकसद है
आपको समाज का दुश्मन बनाने का काम आपकी शिक्षा ने किया
आपको अपने दोस्त को अपना प्रतिद्वंदी समझने का काम आपकी शिक्षा ने किया
आपकी शिक्षा को कौन बनाता है ?
आप नौकरी के लिए पढते हैं ना ?
नौकरी उद्योगपति सेठ और अमीर के पास है ना
उद्योगपति सेठ और अमीर तय करते हैं कि उन्हें स्कूल कालेजों से कैसे लोग चाहियें
आपको वह पढ़ाया जाता है जो उद्योगपति सेठ और अमीर चाहते हैं ?
उद्योगपति सेठ और अमीर की बनाई हुई शिक्षा पाकर आप एक स्वार्थी लालची और आत्मकेंद्रित अकेले व्यक्ति बन जाते हैं .
अब आप सारे समाज से अलग अकेले खड़े हैं .
अब उद्योगपति सेठ और अमीर के लिए आपको गुलाम बनाना आसान है
अब जब उद्योगपति सेठ और अमीर आदिवासियों की ज़मीने छीनेगे तो आप अपने स्वार्थ के लिए चुप रहेंगे
आपको पता है कि जब ज़मीने छीने जायेंगी तभी तो कारखाने चलेंगे तभी तो आपको उद्योगपति सेठ और अमीर के यहाँ नौकरी मिलेगी.
अब आप समाज के खिलाफ़ काम करने वाले
एक स्वार्थी और क्रूर व्यक्ति बन जाते हैं
आपकी राजनीति
उसी उद्योगपति सेठ और अमीर के लिए काम करती है
आपकी पुलिस आपके अर्ध सैनिक बल आपकी सेना उसी उद्योगपति सेठ और अमीर के लिए काम करते है
आपकी पूरी अर्थ व्यवस्था अब उसी उद्योगपति सेठ और अमीर के मुताबिक़ चलती है
अब आप उस अर्थव्यवस्था
उस राजनीति
उस शिक्षा पद्धति के
एक उत्पादित माल हो
आपको अब उसी उद्योगपति सेठ और अमीर के लिए ही इस्तेमाल होना है
इस राजनीति
इस शिक्षा पद्धति
इस अर्थव्यवस्था
ने आपको क्रूर
स्वार्थी
मूर्ख बना दिया
इस पूरी व्यवस्था में मनुष्य के भीतर
छिपे हुए
सौंदर्य
प्रेम
कला
और उसके उज्जवल पक्ष के विकास की कोई संभावना नहीं है
इस व्यवस्था में पैदा होने वाले बच्चे
क्रूर और हत्यारों को अपना नेता और
भाग्य विधाता स्वीकार कर लेते हैं
आज़ादी के बाद भारत एक दिन इस मोड़ पर खड़ा होगा किसने कल्पना करी होगी ?
यह मानवता के विकास का अब तक का सबसे अन्धकार युक्त समय है .
लेकिन यह इस अँधेरे से बाहर निकलने के प्रयत्न का भी अवसर देता है
आइये इस अँधेरे से बाहर निकलने में पूरी मानवता की मदद करें .

आओ हमें भी जेल में डाल दो

मोदी सरकार सामाजिक संस्थाओं पर कार्यवाही करने की तैयारी कर रही है
कल हिन्दुस्तान टाइम्स के मुम्बई संस्करण में गृह मंत्रालय के दस्तावेजों के हवाले से खबर छापी गयी है
अखबार के पहले पन्ने पर छपी इस खबर में एमनेस्टी इंटरनेशनल , डाक्टर विदाउट बार्डर और हमारी दंतेवाड़ा की संस्था वनवासी चेतना आश्रम का भी इस सूची में नाम है .
अन्य नामों में पीयूसीएल , और ग्रीनपीस का भी नाम है .
मैं और मेरी पत्नी 1992 में जब दंतेवाड़ा गए थे तब हमने एक संस्था का गठन किया था . हमने अट्ठारह साल दंतेवाड़ा में काम किया .
आदिवासियों के मानवाधिकारों के लिए आवाज़ उठाने के कारण सरकार ने हमारे संस्था के आश्रम पर बुलडोजर चला दिया था .
हमने पांच सौ से ज़्यादा मानवाधिकार हनन के मामले सर्वोच्च न्यायालय को सौंपे .
लेकिन सरकार ने हमारे द्वारा अदालत में ले जाए जाने वाले आदिवासियों का अपहरण कर लिया और पुलिस ने बलात्कार पीड़ित लड़कियों का दोबार अपहरण कर के थाने में ले जाकर पांच दिन तक दुबारा बलात्कार किया था .
मेरी हत्या की तैयारी कर ली गयी थी . मेरे साथियों को जेल में डाल दिया गया .
आदिवासियों के मामलों को अदलत में लड़ने के लिए खुद को जिंदा रखने के लिए मैंने और मेरी पत्नी ने 2010 में छत्तीसगढ़ छोड़ दिया था और दिल्ली आ गए थे .
जब तक मैं दंतेवाड़ा में था तब तक मुझ पर नक्सलियों के साथ सम्बन्ध होने का कोई मामला सरकार ने नहीं बनाया था .
क्योंकि हमारा काम इतना खुला और शानदार था कि सरकार को हमारे खिलाफ़ फर्ज़ी केस बनाने के कारण मुंह की खानी पड़ती .
दंतेवाड़ा छोड़ने के बाद मेरा नक्सलियों से सम्बन्ध होने की कोई सम्भावना नहीं थी . क्योंकि उसके बाद मैं कभी छत्तीसगढ़ नहीं गया .
दंतेवाड़ा छोड़ने के छह साल बाद अब जाकर मोदी सरकार को याद आ रहा है कि हमारी संस्था का नक्सलियों से संपर्क है ?
लेकिन असली बात दूसरी है .
सरकार को सब पता है कि हिमांशु का नक्सलियों से कोई सम्बन्ध नहीं है .
सरकार की परेशानी यह है कि हिमांशु की नज़र छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के सरकारी दमन पर है .
सरकार आदिवासियों की ज़मीन छीनना चाहती है .
आदिवासी ज़मीन छोडना नहीं चाहता .
सरकार आदिवासी को डराने के लिए औरतों से बलात्कार करती है .
निर्दोष आदिवासियों की बड़ी संख्या में हत्या करती है .
तब हम बोलते हैं .
सरकार को कोर्ट में घसीट लेते हैं .
यही सरकार की नाराजगी की वजह है .
सरकार हमें डरा कर चुप करवाना चाहती है .
सरकार चाहती है कि जब सरकार किसी आदिवासी महिला की योनी में पत्थर भरे तो हम चुप रहें .
सरकार चाहती है कि सरकार अगर आदिवासी बच्चों की हत्या करे तो हम यह मान लें कि वे सब बच्चे नक्सलवादी थे .
सरकार चाहती है कि हम मान लें कि अंकित गर्ग और कल्लूरी जैसे विकृत मस्तिष्क के सेक्स मैनियाक अधिकारी असल में राष्ट्र की रक्षा कर रहे हैं .
सरकार को दंतेवाड़ा से सूचनाएं तो अंकित गर्ग और कल्लूरी जैसे पुलिस अधिकारी ही रिपोर्ट भेजते हैं ना ?
तो अंकित गर्ग और कल्लूरी जैसे अधिकारी हिमांशु के बारे में क्या खबर दिल्ली भेजेंगे ? यही ना कि इस आदमी को यहाँ से हटाओ तभी हम आदिवासी को मार पाएंगे .
लेकिन हम नहीं हटेंगे .
हम बहुत अच्छे लोगों की संगत में रहते हैं .
हमारे संगी साथी वो हैं जिन्हें कभी किसी सत्ता ने ज़हर पिलाया था .
हमारे संगी साथी वो हैं जिन्हें किसी सत्ता ने सूली पर चढ़ा दिया था .
हम उसके संगी हैं जिसे तुमने तीन गोलियाँ मारी थीं .
आओ हमें भी जेल में डाल दो .
अगर सोनी सोरी ,
लिंगा कोडोपी ,
आरती मांझी ,
दयामनी बारला ,
अपर्णा मरांडी नक्सलवादी हैं तो हम खुले आम कह रहे हैं कि हम इनके समर्थक हैं
आओ
आदिवासियों का समर्थन करने के जुर्म में हमें भी जेल में सड़ा दो .
इससे ज़्यादा तुम कुछ नहीं कर सकते .
लेकिन हम चुप नहीं होंगे .
हम जब तक जिंदा हैं और जेल से बाहर हैं .
हम इन सभी भारतीय नागरिकों के सामान अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते रहेंगे .
क्योंकि अगर हमने एक भी नागरिक के अधिकारों की हत्या स्वीकार कर ली तो इसका अर्थ होगा कि हमने हर नागरिक के अधिकारों की हत्या स्वीकार कर ली है .
आपको अम्बानी और अदाणी के लिए भारत के गरीबों के ज़मीनों ,जंगलों पहाड़ों पर कब्ज़ा करना है .
यह हम अपनी जान रहते होने नहीं देंगे .

आपको अमीर बनाने का झांसा देकर कोई भी हत्यारा आपके देश का शासक बन सकता है

अमरीका बहुत अमीर है 
अमरीका की सेना भी सबसे बड़ी है 
सेना और अमीरी का सीधा सीधा नाता है 
जब गरीबी और मंदी आती है तो अमरीकी सेना किसी ना किसी देश पर हमला कर देती है 
अमरीकी सरकार की नीतियों पर इन्ही अमीरों का कब्ज़ा है .
ये अमीर तय करते हैं कि अब हमें कहाँ सेना भेजनी है .
सेना अमीरों के मुनाफे के लिए युद्ध लड़ती है
जिसमे हजारों लोग मारे जाते हैं
भारत भी उसी रास्ते पर है
भारत के अमीरों पर जब गरीबी आती है तब वो उड़ीसा , छत्तीसगढ़ ,झारखंड के जंगलों में खदानों और नदियों पर कब्ज़े के लिए भारत के अर्ध सैनिक बलों को भेज देते हैं .
जैसे अमेरिकी सेना हमला करने के लिए उस देश के लोगों की आज़ादी , और लोकतंत्र की रक्षा का बहाना बनाता है
उसी तरह भारत की सरकारें देश की रक्षा , आंतरिक सुरक्षा का बहाना बनाती है
बंदूक और अमीरी का बड़ा पुराना नाता है
प्रकृति की सौगात सबके लिए है .
हवा सबके लिए है
पानी सबके लिए है
ज़मीन भी सबके लिए है
हर बच्चा जो पैदा होता है
उसका प्रकृति की इन नेमतों पर बराबर का ह्क़ है
लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है
दुनिया की सत्तर प्रतिशत दौलत एक प्रतिशत लोगों के हाथ में है
दौलत तब इकट्ठी होती है जब आपके साथ ताकत होती है
आज के अमीर सरकार की ताकत के दम पर ही अमीर बनते हैं
टाटा अदाणी और अम्बानी को अगर सरकार मदद ना करे तो ये लोग देश के खनिजों और ज़मीनों पर कभी कब्ज़ा नहीं कर पायेंगे , और ना ही दौलत कमा पाएंगे .
टाटा अदाणी और अम्बानी को दौलतमन्द बनाने के लिए भारत की पुलिस, अर्ध सैनिक बल और सेना की मदद ली जाती है
इन अमीरों को और भी अमीर बनाने के लिए पुलिस, अर्ध सैनिक बल और सेना गाँव वालों को , आदिवासियों को मार मार कर उनकी ज़मीनों से भगाती है , उनकी बस्तियां जलाती है , औरतों के साथ बलात्कार करती है .
लेकिन समस्या टाटा अदाणी और अम्बानी नहीं हैं
वह अपराध कर रहे हैं . खुले आम कर रहे हैं .
समस्या आप हैं .
आप अम्बानी , अदाणी टाटा , पुलिस , अर्ध सैनिक बलों और सेना के भक्त बने हुए हैं .
आप इन अमीरों की सेवा करने वाली राजनीतिक विचारधारा को मानने वाली पार्टियों के वोटर बने हुए हैं
आप मानते हैं कि अमीर अपनी मेहनत से अमीर बने हुए हैं
आप अपने बच्चों के सामने इन अमीरों को आदर्श की तरह पेश करते हैं और कहते हैं कि अच्छे से पढ़ाई करो तो तुम भी इनकी तरह अमीर बन जाओगे .
कोई भी अमीर दूसरे की मेहनत और दूसरे के हिस्से की प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा किये बिना अमीर नहीं बन सकता
फिर भी अमीरी आपका आदर्श है
आपको अमीर बनाने का झांसा देकर कोई भी हत्यारा आपके देश का शासक बन सकता है
हमें शिकायत उस हत्यारे शासक से नहीं है
शिकायत उस समाज से है जो हत्यारों को अपना आदर्श मानता है
ऐसा समाज हत्याओं में मज़े लेने लगता है
अभी एनडीटीवी के एक सर्वे में भारत के अधिकाँश युवाओं ने कहा है कि वे चाहते हैं कि भारत में सैनिक शासन लग जाए .
आपके बच्चे सिर्फ अपनी अमीरी के लिए लोकतंत्र , बराबरी , न्याय को छोड़ने के लिए तैयार हो गए हैं और सेना को अपना समाज चलाने देने के लिए तैयार हैं .
आप अपने ही समाज के लोगों को लूटने मारने के लिए सहमत हैं
आपको अपनी गलती का कोई अंदाज़ भी है ?

भारत का प्रधानमंत्री रिश्वत के पैसे से बनाए गए सूट का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं कर सकता

भारत में अंग्रेजों का शासन था 
अँगरेज़ मानते थे कि अच्छा इंसान वह होता है जो अच्छे कपड़े पहनता है 
उसे अँगरेज़ जेंटलमैन कहते थे 
अंग्रेज़ी राज के खिलाफ़ लड़ने वाले ज्यादातर नेता भी अंग्रेजों जैसे कपड़े पहन कर अंग्रजों जैसी साहबी से रहते हुए अंग्रेजों का विरोध करते थे .
शुरुआती कांग्रेसी नेता भी अपने घरों में नौकरों से काम करवाते और साहबों जैसा जीवन जीना आदर्श समझते थे .
गांधी जब राजनीति में आये
तो गांधी ने कहा कि अगर हम अंग्रेजों का विरोध करते हैं तो हमें अंग्रेजों के तौर तरीके भी छोड़ने पड़ेंगे .
गांधी ने कहा कि भारत के लोग गोरे शासकों को अपने सर से उतार कर भारतीय साहबों को अपना शासक क्यों बनाएंगे ?
इसलिए अगर हमें इस देश के सच्चे प्रतिनिधि बनना है तो हमें गाँव में गरीबों के साथ जाकर उनके खेतों में खड़ा होना पड़ेगा .
गांधी ने खुद ऐसे कपड़े पहनने शुरू किये जिससे इस देश का गरीब भी यह मानता था कि यही आदमी मेरी तकलीफ समझ सकता है .
गांधी के असर से सारे नेताओं ने अंग्रेज़ी कपड़े , और सूट बूट पहनना छोड़ दिया और खादी और भारतीय कुरता पाजामा इस देश के नेताओं की जैसे यूनिफार्म ही बन गयी .
गांधी ने भारत की राजनीति का भारतीयकरण किया .
परसों भारतीय प्रधान मंत्री मोदी साहब ने एक सूट पहना था .
जिस सूट पर सोने के तारों से मोदी साहब के नाम की हजारों बार कशीदेकारी करी हुई थी .
इस तरह की कशीदेकारी एक विदेशी कंपनी करती है .
इस कंपनी ने मिस्र के तानाशाह होस्नी मुबारक के लिए भी मोदी साहब जैसा ही सूट बनाया था .
चार साल पहले उस वख्त उस सूट की कढाई में करीब सात लाख रूपये का खर्च आया था .
अब महंगाई कुछ बढ़ गयी है तो खर्च करीब दस लाख रुपया आया होगा .
भारत की गरीब जनता का प्रतिनिधी दस लाख रूपये का सूट पहनेगा .
यह दस लाख रूपये मोदी साहब ने अपनी तनख्वाह से तो सिलवाया नहीं होगा .
भारत सरकार ने भी इस सूट का भुगतान नहीं किया होगा .
तो इस सूट को किसी अमीर उद्योगपति ने ही मोदी साहब को खरीद कर दिया होगा .
उस अमीर उद्योगपति ने भी यह पैसा अपनी कंपनी में रसीद काट कर खर्च नहीं किया होगा .
यानी यह सूट ब्लैक मनी से खरीदा गया होगा .
उस उद्योगपति ने यह सूट मोदी साहब से अपने प्यार की वजह से नहीं दिया होगा .
वह उद्योगपति ज़रूर दस लाख का सूट देने के बाद बदले में भारत के प्रधानमंत्री से अपना कुछ फायदा भी चाहेगा .
सूट देने वाला उद्योगपति चाहेगा कि भारत का प्रधानमंत्री उसे खनिजों के लिए ज़मीन छीन कर दे दे जिससे वह उद्योगपति मुनाफा कमा सके
भारत का प्रधानमंत्री भारत के अर्ध सैनिक बलों को भेजेगा कि जाओ आदिवासियों को मार कर भगाओ और ज़मीने खाली कराओ .
इस सब में आदिवासी औरतों के साथ बलात्कार होंगे बच्चे मारे जायेंगे
इस सब में आदिवासी भी मारे जायेंगे और सीआरपीएफ के सिपाही भी मारे जायेंगे .
दोनों ही गरीब नागरिक हैं
गरीब नागरिकों को आपस में लड़वा कर अपना मुनाफा बनाने में मदद देने का काम भारत का प्रधानमंत्री करवाएगा ?
इतना कीमती सूट पहनना आपका अपना शौक नहीं माना जा सकता
यह एक सार्वजानिक अपराध है
यह सूट रिश्वतखोरी का एक गन्दा मामला है
भारत का प्रधानमंत्री रिश्वत के पैसे से बनाए गए सूट का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं कर सकता
इस आदमी के खिलाफ एफआईआर दर्ज़ होनी चाहिये
और इससे पूछा जाना चाहिये कि दस लाख रूपये का यह सूट किसने दिया है ?
कोर्ट मेरे इस लेख का संज्ञान ले और मुक़दमा शुरू करे .
यह एक व्यक्ति के शौक का नहीं इस देश की करोड़ों गरीब जनता के भविष्य का मामला है .

आप अपने ही समाज के लोगों को लूटने मारने के लिए सहमत हैं

अमरीका बहुत अमीर है 
अमरीका की सेना भी सबसे बड़ी है 
सेना और अमीरी का सीधा सीधा नाता है 
जब गरीबी और मंदी आती है तो अमरीकी सेना किसी ना किसी देश पर हमला कर देती है 
अमरीकी सरकार की नीतियों पर इन्ही अमीरों का कब्ज़ा है .
ये अमीर तय करते हैं कि अब हमें कहाँ सेना भेजनी है .
सेना अमीरों के मुनाफे के लिए युद्ध लड़ती है
जिसमे हजारों लोग मारे जाते हैं
भारत भी उसी रास्ते पर है
भारत के अमीरों पर जब गरीबी आती है तब वो उड़ीसा , छत्तीसगढ़ ,झारखंड के जंगलों में खदानों और नदियों पर कब्ज़े के लिए भारत के अर्ध सैनिक बलों को भेज देते हैं .
जैसे अमेरिकी सेना हमला करने के लिए उस देश के लोगों की आज़ादी , और लोकतंत्र की रक्षा का बहाना बनाता है
उसी तरह भारत की सरकारें देश की रक्षा , आंतरिक सुरक्षा का बहाना बनाती है
बंदूक और अमीरी का बड़ा पुराना नाता है
प्रकृति की सौगात सबके लिए है .
हवा सबके लिए है
पानी सबके लिए है
ज़मीन भी सबके लिए है
हर बच्चा जो पैदा होता है
उसका प्रकृति की इन नेमतों पर बराबर का ह्क़ है
लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है
दुनिया की सत्तर प्रतिशत दौलत एक प्रतिशत लोगों के हाथ में है
दौलत तब इकट्ठी होती है जब आपके साथ ताकत होती है
आज के अमीर सरकार की ताकत के दम पर ही अमीर बनते हैं
टाटा अदाणी और अम्बानी को अगर सरकार मदद ना करे तो ये लोग देश के खनिजों और ज़मीनों पर कभी कब्ज़ा नहीं कर पायेंगे , और ना ही दौलत कमा पाएंगे .
टाटा अदाणी और अम्बानी को दौलतमन्द बनाने के लिए भारत की पुलिस, अर्ध सैनिक बल और सेना की मदद ली जाती है
इन अमीरों को और भी अमीर बनाने के लिए पुलिस, अर्ध सैनिक बल और सेना गाँव वालों को , आदिवासियों को मार मार कर उनकी ज़मीनों से भगाती है , उनकी बस्तियां जलाती है , औरतों के साथ बलात्कार करती है .
लेकिन समस्या टाटा अदाणी और अम्बानी नहीं हैं
वह अपराध कर रहे हैं . खुले आम कर रहे हैं .
समस्या आप हैं .
आप अम्बानी , अदाणी टाटा , पुलिस , अर्ध सैनिक बलों और सेना के भक्त बने हुए हैं .
आप इन अमीरों की सेवा करने वाली राजनीतिक विचारधारा को मानने वाली पार्टियों के वोटर बने हुए हैं
आप मानते हैं कि अमीर अपनी मेहनत से अमीर बने हुए हैं
आप अपने बच्चों के सामने इन अमीरों को आदर्श की तरह पेश करते हैं और कहते हैं कि अच्छे से पढ़ाई करो तो तुम भी इनकी तरह अमीर बन जाओगे .
कोई भी अमीर दूसरे की मेहनत और दूसरे के हिस्से की प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा किये बिना अमीर नहीं बन सकता
फिर भी अमीरी आपका आदर्श है
आपको अमीर बनाने का झांसा देकर कोई भी हत्यारा आपके देश का शासक बन सकता है
हमें शिकायत उस हत्यारे शासक से नहीं है
शिकायत उस समाज से है जो हत्यारों को अपना आदर्श मानता है
ऐसा समाज हत्याओं में मज़े लेने लगता है
अभी एनडीटीवी के एक सर्वे में भारत के अधिकाँश युवाओं ने कहा है कि वे चाहते हैं कि भारत में सैनिक शासन लग जाए .
आपके बच्चे सिर्फ अपनी अमीरी के लिए लोकतंत्र , बराबरी , न्याय को छोड़ने के लिए तैयार हो गए हैं और सेना को अपना समाज चलाने देने के लिए तैयार हैं .
आप अपने ही समाज के लोगों को लूटने मारने के लिए सहमत हैं
आपको अपनी गलती का कोई अंदाज़ भी है ?

दामोदर नायर

आपात काल के बाद हुए चुनावों में भारतीय जनसंघ पहली बार जनता पार्टी में शामिल होकर भारत की सत्ता का हिस्सा बना
अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के कोटे से उस सरकार में विदेश मंत्री बनाए गए.
दिल्ली में जहां गांधी जी को गोली मारी गयी . उस जगह का नाम गांधी स्मृति है .
गांधी स्मृति देखने आने वालों को उस जगह और उस घटना की जानकारी देने के लिए दामोदर नायर नामक सज्जन गाइड का काम करते थे .
दामोदर नायर दर्शकों को बताते थे कि गांधी जी की हत्या नाथूराम गोडसे ने करी थी . और नाथूराम गोडसे राष्ट्रीय सेवक संघ का सदस्य था .
वह यह तथ्य कई वर्षों से लोगों को बताते थे .
लेकिन जनसंघ के सरकार में आने के कुछ ही दिनों के बाद दामोदर नायक पर हमला हो गया .
उन्हें पीटा गया और धमकी दी गयी कि आज के बाद तुम यह नहीं कहोगे कि गोडसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का सदस्य था .
दामोदर नायक नहीं माने . सरकारी ट्रस्ट गांधी स्मृति से दामोदर नायक को निकाल दिया गया .
दामोदर नायक मेरे पिता के मित्र थे .
वे अक्सर हमारे घर आते थे . वे मुझे अंग्रेज़ी सीखने में मदद करते थे .
उनकी एक किताब थी जिसमे संघ के समाज विरोधी कारनामों का व्यापक वर्णन था .
पता नहीं इतने वर्षों बाद अब दामोदर नायर साहब कहाँ होंगे ?
संघ का गुंडागर्दी का पुराना इतिहास है .

आपको जो सही लगता है उस के हक़ में आवाज़ उठाइये

एक वख्त था जब अमेरिका और ब्रिटेन में औरतों को वोट देने का हक़ नहीं था .
पूरा समाज मानता था कि औरतों को घर के बाहर के मामलों में राय देने की अक्ल ही नहीं है
आज हम उस समाज की उस वख्त की समझ पर हँसते हैं .
बच्चे जब किताबों में इन बातों को पढते हैं तो वो हैरानी से पूछते हैं कि क्या वाकई में कभी ये लोग औरतों के बारे में इस तरह सोचते थे ?
हम लोग आज भी मानते हैं कि औरतों को परदे में रहना चाहिये .
भारत में बहुत सारे लोग मानते हैं कि भारत हिंदुओं का है . भारत की राजनीति का लक्ष्य भी हिंदुओं की सत्ता बना कर रखना होना चाहिये .
बहुत सारे मुसलमान भी इसी तरह से सोचते हैं .
.
वे मानते हैं कि जो उनके जैसे नहीं सोचता वह मज़हब के खिलाफ़ सोच रहा है .
लेकिन असल में तो हमारे हिंदू या मुसलमान होने का अर्थ इतना ही है कि हमारी ईश्वर के बारे में क्या कल्पनाएँ हैं ?
क्या आप आज सच में मानते हैं कि हम अच्छे या बुरे नागरिक सिर्फ इस बात के आधार पर बन सकते हैं कि हम ईश्वर के बारे में क्या कल्पना करते हैं ?
लेकिन जब हम लोग कुछ सालों बाद अपनी जिंदगी पूरी कर के मर जायेंगे .
धीरे धीरे समाज की सोच बदलती जायेगी .
समाज एक एक कदम आगे बढ़ता जाएगा .
आने वाले समय में बच्चे इस वख्त की हमारी सोच के बारे में किताबों में पढेंगे .
बच्चे हैरान रह जायेंगे कि कभी उनके पुरखे ऐसी मूर्खता पूर्ण सोच रखते थे और इतने जाहिल थे ?
आज जो लोग सबकी बराबरी की बातें करते हैं असल में वे समाज को इस वख्त से धीरे धीरे आगे ले जा रहे हैं .
इसलिए आज ऐसे लोगों को गालियाँ मिल रही हैं .
जैसे सन उन्नीस सौ बीस से पहले अमेरिका और ब्रिटेन में औरतों को वोट देने के सामान अधिकारों की बात करने वाले लोगों को समाज गालियाँ देता था .
अपनी सोच पर नज़र डालिए .
इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके मजहब के लोग किस बात को सही मानते हैं और किस बात की इजाज़त नहीं देते हैं .
आपको जो सही लगता है उस के हक़ में आवाज़ उठाइये .
आज अगर कोई भाजपाई नेता कहती है कि मुसलमान चालीस पिल्ले पैदा करते हैं तो भाजपा के खिलाफ़ आवाज़ उठाइये .
हो सकता है आपको यह सब आज अच्छा लग रहा हो .
लेकिन आने वाले वख्त में आपके बच्चे आपकी इन्ही बातों के लिए हंसी उड़ायेंगे .
खुद को मूर्ख साबित कर के मत मरिये

आज़ादी की लड़ाई का काम अभी अधूरा है

आज़ादी के आन्दोलन में ही तय हो गया था कि आज़ादी के बाद भारत कैसा बनाया जायेगा ?
गांधी भगत सिंह नेहरु पटेल अम्बेडकर सब अपनी अपनी तरह से आज़ादी के बाद के भारत के लिए आदर्श तय करने में लगे हुए थे .
आज़ाद भारत के लिए सबके सपनों में मामूली से फर्क होने के बावजूद कुछ बातें एक जैसी थीं .
सभी लोग बराबरी और न्याय को आज़ाद भारत का आधार मानते हुए जाति धरम से मुक्त गाँव , गरीब मजदूरों की हालत बदलने को आज़ादी के बाद सबसे पहला काम मानते थे .
लेकिन उस वख्त भी एक कौम ऐसी थी जो आज़ादी की लड़ाई में तो शामिल नहीं थी .
लेकिन शातिर बिल्ली की तरह आज़ादी मिलने के बाद सत्ता पर कब्ज़ा करने के मंसूबे बना रही थी .
यह थी राष्ट्रीय स्वयम सेवक संघ ,और हिंदू महासभा .
यह उन लोगों की जमात थी जो सदियों से भारत में सत्ता के नज़दीक रहे थे , व्यापारी थे , बड़ी जात के अमीर थे , ज़मींदार थे और सत्ता के दलाल थे .
ये लोग डर रहे थे कि कहीं ऐसा ना हो कि आज़ादी के बाद बराबरी आ जाय और कुचले दबे नीच जात के गरीब गुरबे भी हमारे बराबर हो जाएँ .
इसलिए इन सत्ता के दलालों ने आज़ादी मिलते ही भारत की राजनीति को समानता की ओर से मोड़ कर साम्प्रदायिकता की तरफ करने के लिए पूरी ताकत लगा दी.
आज़ादी मिलते ही सवयम सेवक संघ ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी और बाबरी मस्जिद में राम की मूर्ती रख दी .
इन लोगों ने पूरी ताकत से इस बात को प्रचारित किया कि आज़ाद भारत की राजनीती का लक्ष्य सबकी समानता नहीं बल्कि यह होना चाहिये कि राम का मंदिर बनेगा या नहीं .
तब से ये लोग भारत की राजनीति को आर्थिक और सामाजिक समानता की पटरी से उतार कर साम्प्रदायिकता की पटरी पर लाने का प्रयत्न करते रहे और अंत में सफल भी हो गए .
आप देखेंगे कि इन संघियों को समानता और न्याय का नाम सुनते ही बुखार चढ़ जाता है
और ये आपको कम्युनिस्ट और विदेशी एजेंट कहने लगते हैं .
लेकिन आज़ादी की लड़ाई का काम अभी अधूरा है .
ये लोग धोखा देकर भले ही कुछ समय के लिए सत्ता पर काबिज हो गए हैं .
लेकिन भारत में सभी नागरिकों की बराबरी और सबको न्याय का बड़ा काम अभी बाकी है .
हम हारे नहीं हैं .

राजनैतिक परिवर्तन का सन्देश

कल दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत हुई .
मोदी और उसकी पार्टी की शर्मनाक हार हुई .
इसका असर क्या क्या हो सकता है 
कल बिनायक सेन से भी इस बाबत मेरी बात हुई 
बिनायक का भी मानना है कि यह बस एक पार्टी की जीत से भी ज़्यादा बड़ी घटना है 

मोदी बस एक आदमी नहीं है 
वह एक पूरी विचारधारा है 
बस्तर में मोदी की जीत से ज़रा पहले 
सुरक्षा बलों के अधिकारी गाँव में जाकर आदिवासी नेताओं को धमकाते थे कि मोदी को आने दो उसके बाद तुम सब को हम गोली से उड़ा देंगे 
मोदी की जीत के बाद बस्तर में  निर्दोष आदिवासियों को नक्सलवादी कह कर फर्ज़ी आत्मसमर्पण और जेलों में डाल देने का भयानक दौर शुरू कर दिया गया 
मोदी सरकार ने अमीर उद्योगपतियों के पैसों से ही चुनाव जीता था .
मोदी ने आते ही गुंडागर्दी करते हुए खनन और उद्योग लगाने से पहले पर्यावरण की मंजूरी वाला कानून बदल दिया 
मोदी ने कानून की धज्जियां उड़ाते हुए ज़मीने छीन कर अमीर उद्योगपतियों को देने के लिए गाँव वालों की सहमति लेने का कानून ही खतम कर दिया 
भारत को लूटने के सभी रास्ते खोल दिए गए 
इस लूट में सहयोग करने वाले क्रूर पुलिस अधिकारी सबसे बड़े राष्ट्रभक्त बन गए 

लेकिन अब मोदी की इस हार से सब जगह दूसरे सन्देश जायेंगे 
गाँव देहातों में काम करने वाले सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी जैसे छोटे छोटे कार्यकर्ता का जोश बढ़ेगा 
क्रूर पुलिस अधिकारी भी कुछ डरेंगे 
अभी तक  उन्हें लग रहा था कि मोदी अजेय है खुल कर बदमाशी करो 
कोई हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा 
लेकिन अब उन सब को डर लगेगा कि हालत बदल भी सकती है 
हो सकता है यह छोटा कार्यकर्ता ही कभी सत्ता में आ जाए ?

मोदी की बदमाशी और लूट 
ज़मीनी स्तर पर पुलिस का दमन 
कुछ समय के लिए कमज़ोर हो सकता है 
गाँव देहात में काम करने वाले ज़मीनी कार्यकर्ताओं में नया जोश आया है 

एक नया अवसर है कि कार्यकर्ता अपने बढे जोश के साथ और आगे बढ़ जाएँ .

भारत के गाँव तक इस राजनैतिक परिवर्तन का सन्देश ले जाना 
इस समय एक ज़रूर काम है