Monday, July 28, 2014

मैं तैयार हूँ

सुना है छत्तीसगढ़ सरकार ने मेरे छत्तीसगढ़ से निकलने के बाद मेरे नक्सलवादी होने के बहुत सारे मुकदमे बना दिए हैं . 

अभी हाल में ही एक सामाजिक कार्यकर्ता जब एक अदालत में छत्तीसगढ़ पुलिस के खिलाफ बयान दर्ज करवा रहे थे और जब उन्होंने अदालत को बताया कि पुलिस की बदमाशियों की जानकारी उन्हें हिमांशु कुमार से मिली थी ,और जब वो उन घटनाओं की जांच करने और पीड़ित आदिवासियों से मिलने गए तो पुलिस ने ही उन पर हमला कर दिया .

इस पर सरकारी वकील ने अदालत में कहा कि हिमांशु कुमार तो फरार अपराधी है .

सरकार द्वारा आदिवासियों के गाँव जलाने , आदिवासी बूढों और बच्चों की हत्याओं ,आदिवासी लड़कियों के साथ पुलिस द्वारा बलात्कार के अनेकों मामले मैंने अदालत में दायर किये हुए हैं .

मुझे डराने के लिए सरकार ने मेरे अनेकों आदिवासी कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया . सोनी सोरी को प्रताड़ित कर के मेरे नक्सलवादी होने के कबूलनामे पर हस्ताक्षर करवाने की कोशिश करी , लेकिन जब सोनी नहीं मानी तो उसे बिजली के झटके दिए और सज़ा के तौर पर उसके गुप्तांगों में पत्थर भर दिए .

छत्तीसगढ़ से निकलने के बाद से आज तक मैं एक दिन के लिए भी कहीं छिपा नहीं . टीवी की चर्चाओं में आता हूँ . सर्वोच्च न्यायालय में छत्तीसगढ़ पुलिस के सामने मौजूद रहता हूँ . पत्र पत्रिकाओं में लिखता हूँ . सभाओं और रैलियों में शामिल होता हूँ . 

फिर भी छत्तीसगढ़ सरकार का यह कहना कि मैं फरार हूँ . यह सरकार की बदमाशी के अलावा कुछ नहीं है .

मैं चाहता हूँ कि सरकार जब चाहे मुझे गिरफ्तार करे , मुझे भी अन्य आदिवासियों की तरह जेल में सताए . चाहे तो जेल में मुझे मार डाले .

सत्य के इस रास्ते पर चलना शुरू करने से पहले मुझे अपने इस तरह के अंत  की उम्मीद थी .

मैं तैयार हूँ .

Thursday, July 24, 2014

भूले से भी इस गलतफहमी में न रहना कि ये बेईज्ज़ती मुसलमान की है

मेरे दोस्त तुम्हारी बनायी हुई रोटी को उसने तुम्हारे मुंह में ठूंस दिया 
उसका इरादा तुम्हारा पेट भरना नहीं बल्कि तुम्हे तुम्हारी औकात बताने का था 

मायूस ना होना साथी 
इस मुल्क में तुम जैसे मेहनत कशों के साथ 
सदियों से यही सब तो हो रहा है 

ये वो मुल्क है जहां औरतों के मुंह में डायन बता कर 
इंसान की टट्टी भर दी जाती है 

ये वो मुल्क है जहां बड़ी ज़ात वालों के घर के सामने से
निकलते समय मेहनतकश जात के लोगों को अपने जूते अपने सर पर रख कर गुज़रना पड़ता है

असल में तुम्हारे मुंह में बेईज्ज़ती की ये रोटी सत्ता ने भरी है
तुम्हारी लड़ाई इस सत्ता से है मेरे मेहनतकश दोस्त

तुम्हारी बेईज्ज़ती का बदला बेशक लिया जाएगा साथी ,तैयारी शुरू करो ,
हर बेईज्ज़ती का बदला लिया जाएगा
सदियों की बेईज्ज़ती का बदला अभी बाकी है दोस्त

भूले से भी इस गलतफहमी में न रहना कि ये बेईज्ज़ती मुसलमान की है
इस गलतफहमी से तो ये लड़ाई रास्ता भटक जायेगी
ये लड़ाई करोड़ों मेहनत कशों की है

मेहनत की लूट में हिंदू भी शामिल हैं और मुसलमान भी
लेकिन हम मेहनत कशों की बस एक ही ज़ात है
वो है हमारा मेहनत करने के बाद भी गरीब होना

हम इस सत्ता और पैसे की ताकत के इस किले को जल्द ही गिराएंगे दोस्त
फिर हर मुंह में इज्ज़त का निवाला होगा बेईज्ज़ती की रोटी नहीं

Wednesday, July 23, 2014

पिछले जनम के पापों का फल भुगतो

पिछले जनम में मैंने ज़रूर पुण्य करे होंगे 
कि मेरा जनम फिलिस्तीन में नहीं हुआ 
और मुझ पर कोई बम नहीं गिराया गया 

मेरे पूर्व जनम के पुण्यों के कारण ही 
मेरा जनम दंतेवाड़ा में नहीं हुआ 
और मैं इस जनम में सोनी सोरी नहीं बना

अपने पूर्व जन्म के सद्कर्मों के कारण ही इस जनम में
मेरा जनम किसी नीच जात में नहीं हुआ
इस लिए काम से मना करने पर मेरा हाथ भी नहीं काटा गया

मैं खुस नसीब हूँ कि मेरा जनम किसी गंदी बस्ती
की किसी दलित माँ के पेट से नहीं हुआ
और मैं शीतल साठे बनने से बच गया
वरना मुझे भी परिवर्तन के गीत गाने के
अपराध में गर्भावस्था में जेल में डाल दिया जाता .

मेरे पिछले जन्मों के पुण्यों का ही परताप है
कि मैं इस जनम में मैं आरती मांझी नहीं बना ,
वरना किसी और के धोखे में मुझे थाने ले जाते
समय पुलिस वाले रास्ते में मेरे साथ करते
सामूहिक बलात्कार और फिर तीन साल के लिए
फेंक दिया जाता मुझे जेल की सलाखों के पीछे ,
अंत में जहां से मुझे भगा दिया जाता यह कह कर
तीन साल बाद कि अब घर जा तुझे तो गलती से पकड़ लिया गया था .

मैंने पिछले जनम में पुन्य करे होंगे तभी
मेरा जनम आमिर की माँ के पेट से नहीं हुआ ,
वरना मुझे भी आमिर की तरह चौदह साल
तक जेल में रखने के बाद कह दिया
जाता कि जाओ तुम तो बेगुनाह हो .

मेरे पूर्व जनम के पुण्यों के कारण इस जनम में पुरुष हूँ
भारत में रहता हूँ और बहुसंख्यक हूँ
मैं बड़ी ज़ात का हूँ .
मैं शहर में रहता हूँ
मेरा देश अमरीका का दोस्त है
मेरे पास कम्प्युटर है
और फेसबुक के लिए इंटरनेट के पैसे भी हैं .
ये सब मेरे पिछले जनम के पुण्यों का फल है .

तो जाओ सब लोग पुन्य करो
पंडतों को जिमाओ
रोज़ मंदिर जाओ
मंदिर में दान करो
धर्म पर तर्क मत करो
आँख बंद कर धर्म को मानों
गाय की सेवा करो
निर्मल बाबा के दरबार में जाया करो

इससे अगले जनम में तुम्हारा जनम भी एक
धनवान सवर्ण भारतीय शहरी बहुसंख्यक पुरुष के रूप में होगा .

तब तक अपने पिछले जनम के पापों का फल भुगतो

Saturday, July 19, 2014

अंत में आपके पास जलाने के लिए कुछ नहीं बचेगा

साहेब ,महात्मा गांधी की हत्या आपके गुरु ने करी 

इस पाप को छुपाने के लिए आपने सबूत की फाइलें जलवा दी हैं 

लेकिन अभी तो बहुत कुछ ऐसा है जिसे आप को जलाना पड़ेगा 

वो चिट्ठियाँ भी जलवा दीजिए जो आपके संघ के गुरुओं ने अंग्रेजों को माफी नामे के तौर पर भेजी थीं .

क्योंकि इससे आपकी गद्दारी की परम्परा की पोल खुल जाने का भय है

आपको वो बयान भी जलाने हैं जो आपके दल के अटल साहब ने अंग्रेजों के सामने दिए थे ,जिसमे उन्होंने उस दौर के क्रांतिकारियों के खिलाफ मुखबिरी करी थी .

आपको वो इतिहास भी जलाना पड़ेगा जिसमे बताया गया है कि किन बौद्ध मठों को तोड़ कर मंदिर बनाये गए .

आपको इतिहास की वो सारी किताबें जलानी पड़ेंगी जिनमे दलितों की बस्तियों को जलाने की तफसीलें दर्ज़ हैं .

अट्ठारह सौ सत्तावन में हिंदुओं और मुसलमानों की एकता और मिल कर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का पूरा विवरण भी तो अभी जलाना बाकी है .

आज़ादी की लड़ाई में जहां जहां भी मुसलमानों के नाम दर्ज़ है उन सब किताबों को जलाना भी बाकी है .

इसके बाद जलाने का हुक्म दीजियेगा उन सभी बस्तियों को जहां मुसलमान और ईसाई रहते हैं .

फिर इस देश की सांझी संस्कृति को जला दीजियेगा .

फिर इस देश को जला दीजियेगा .

आग कम पड़े तो कुछ अपने आदर्श हिटलर से और कुछ इस्राईल से ले लीजियेगा .

अंत में आपके पास जलाने के लिए कुछ नहीं बचेगा .

तब आप आराम करियेगा .

अपने विरोधी के स्थान पर

आप का जनम हिंदू घर में हुआ 
तो आप हिंदू हित की बात करेंगे 

आपका जनम मुस्लिम घर में हो गया 
तो आप मुसलमानों के मुद्दों पर बोलेंगे 

आप ऊंची जात वाले घर में पैदा हुए तो आप 
दलितों के मुद्दों पर अविचलित रहेंगे 

अगर आपका जनम दलित परिवार में हुआ तो आप 
दलित समस्याओं पर बोलेंगे

आपका जनम किसी बड़े शहर में हुआ तो आप दंतेवाड़ा के आदिवासियों की ज़मीनें छीने जाने को विकास के लिए ज़रूरी बताएँगे

और अगर आपका जनम दंतेवाड़ा के आदिवासी के घर में हुआ तो आप नक्सलवादी कहलायेंगे .

किसी खास जगह पैदा होने की वजह से आप एक खास तरीके से सोचते हैं

आपका चिंतन स्थान सापेक्ष है
स्थान बदलते ही आपके विचार बदल जायेंगे

लेकिन सत्य तो स्थान बदलने से नहीं बदलता

सत्य हिंदू या मुसलमान ,सवर्ण या दलित के, घर में या भारत या पाकिस्तान में भी नहीं बदलता

अब देखिये आपके विचार अपने जनम के स्थान के कारण बने हैं या उन विचारों में हर स्थान में सही सिद्ध होने का गुण है .

कभी अपने ही मन में अपना स्थान बदल कर फिर सोचिये .

कल्पना में खुद को अपने विरोधी के स्थान पर रख कर सोचने की कोशिश कीजिये .

क्या आप हर जगह के सत्य को देख पा रहे हैं ?

क्या अब भी आपको लगता है आप सही थे ?

देखिये आपका कट्टर नजरिया अब हल्का होने लगा है .

यही मुक्ति है .

यही आपके जानवरपन से मनुष्त्व की यात्रा की शुरुआत है .

अब आप जीवन का आनंद लेने के लिए तैयार हैं .

आपके प्रतिद्वंदी धरम वाला भी यही सब चाहता

क्या चाहता है दिल आपका 
यही ना कि आपके धरम के अलावा दूसरे धरम वाले या तो खत्म हो जाएँ या 
फिर आपके पैरों में गिर कर गिडगिडायें 
और मान लें कि आप ही सबसे श्रेष्ठ हैं 
और अब तक के अपने घमंड के लिए आपसे माफी मांगें 

आपका दिल यह भी चाहता है ना 
कि आप ही हों दुनिया के सबसे अमीर आदमी 
और बाकी के सब आपके मुकाबले गरीब हों 
और सब आपके सामने बेचारे दिखाई दें 

आप यह भी चाहते हैं कि आप ही माने जाएँ
सबसे अधिक सम्माननीय
सब आपको बैठाएं मंच पर
और सब नीचे बैठें
और मुग्ध होकर सुनें
आपकी बातों को

आप यह भी चाहते हैं कि
युगों युगों तक आपको याद रखे दुनिया
सबके दिमागों में छाये रहें आप ही
सदैव

लेकिन मुश्किल यह है कि आपके प्रतिद्वंदी धरम वाला भी यही सब चाहता है

इसलिए आप और वो न चैन से खुद जी पाते हैं

न दूसरे को जीने देते हैं

आपके लिए भी दुनिया में पर्याप्त जगह और सम्मान है
आपके विरोधी के लिए भी पर्याप्त जगह और सम्मान है

अगर आप चैन से रहें तो आप और आपका विरोधी दोनों आराम से बिना लड़े जी सकते हैं .

चेतन भगत

चेतन भगत नामक यह लेखक कह रहा है कि गाज़ा में जो हो रहा है वह सही नही है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि आतंकवादीयों और उनके समर्थकों को सही सबक सिखाने का यही तरीका है 

यह तो इस्राइली हमलों का समर्थन ही हुआ .

क्या चेतन भगत को मालूम है कि किसी की ज़मीन पर हथियारों के दम पर कब्ज़ा करना आतंकवाद है जो कि इस्राईल ने किया है .

क्या इस लेखक को पता है कि अपने जिंदा रहने के लिए अपनी ज़मीन को आज़ाद कराने के लिए इस तरह के कब्ज़े का विरोध करना लोगों का जन्मसिद्ध अधिकार और कर्तव्य भी है ?

क्या इस लेखक को पता है कि इन निहत्थे लोगों के के जीवन पर होने वाले इस्राइली हमलों से इन फिलिस्तीनियों को बचाने के लिए अमरीकी और यूरोपीय नौजवान लड़के लडकियां आकर मानव कवच के रूप में इन निहत्थे लोगों के साथ रहते हैं ?

क्या इस लेखक को मालूम है कि इस तरह के अहिंसक सत्याग्रह करने वाले दसियों आदर्शवादी नौजवानों की हत्या इस्राईल कर चुका है ?

क्या यह लेखक यह जानता है कि किसी दूसरे की गलती की सज़ा किसी दूसरे को नही दी जा सकती . इसलिए हमास के लड़ाकों का बदला लेने के लिए इस्राईल फिलीस्तीनी बच्चों की हत्या नही कर सकता ,और इस तरह निर्दोषों को किसी दूसरे के अपराधों की सज़ा देने को किसी भी तर्क द्वारा सही सिद्ध नही किया जा सकता .

यह तो बिलकुल ऐसा ही होगा जैसे कि नक्सलियों से बदला लेने के लिए भारतीय सिपाही सोनी सोरी के शरीर में पत्थर भर देते हैं , आरती मांझी के साथ बलात्कार करते हैं , मणिपुर में मनोरमा के गुप्तांगों में छत्तीस गोलियाँ दाग देते हैं कश्मीर में लड़कियों से बलात्कार करते हैं और फिर इस लेखक जैसे लोग इन बलात्कारों का समर्थन करते हैं और कहते हैं कि नक्सलवाद से निपटने के लिए तो हमें ऐसा करना ही पड़ेगा .

क्योंकि इस तरह के मूर्खता पूर्ण क्रूर तरीकों से आप कभी भी सहमति, शांति और सामान्य अवस्था तक नही पहुँच सकते .

विकास का माडल शैतानी माडल

किसे किसे वो सब साथी याद हैं जिन्हें हमारे ही दौर में इसलिए जेलों में डाल दिया गया है क्योंकि उन्होंने गरीबों की ज़मीन जंगल और पानी की लूट के खिलाफ आवाज़ उठाई .

प्रशांत राही , हेम मिश्रा और सैंकडों दलित और आदिवासी परिचित और अनाम साथी आज भी जेलों में पड़े हैं .

सत्ता पर पैसे वाले लुटेरों का कब्ज़ा है . इन लुटेरों की लूट का विरोध करने वालों को जेल में डाला जा रहा है .

जो काम ईस्ट इण्डिया करती थी , व्यापार का संरक्षण और जनता पर हमला , वही काम अब हमारी सरकार खुले आम कर रही है .

आप जानते हैं आज हमारे ज्यादातर सिपाही कहाँ हैं ?

हमारे सिपाही आदिवासी इलाकों में भेज दिए गए हैं .

क्या हमारे सिपाही जंगलों में आदिवासियों की रक्षा करने के लिए गए हैं ?

नहीं सिपाही अमीरों की कंपनियों के लिए जंगल की खदानों , पहाड़ों , नदियों पर कब्ज़ा करने गए हैं .

और ये सिपाही जंगल में रहने वालों के साथ क्या कर रहे हैं उसका नमूना बीच बीच में आप सोनी सोरी ,आरती मांझी और सरकेगुडा में बच्चों के संहार के रूप में देख ही लेते हैं .

हमें बताया गया है कि विकास के लिए यह दमन ज़रूरी है .

गांधी ने कहा था कि अगर भारत अंग्रेजों का विकास का माडल अपनाएगा तो भारत को एक दिन अपनी ही जनता से युद्ध करना पड़ेगा .

कहा जाता है कि अंग्रेज़ी राज में कभी सूरज नही डूबता था .

लेकिन एक अँगरेज़ ने ही लिखा था कि अंग्रेज़ी राज में कभी खून भी नही सूखता .

अँगरेज़ सारी दुनिया के संसाधन लूटते थे और उसके लिए अपने सिपाहियों का प्रयोग करते थे .

गांधी ने कहा कि अंग्रेजों ने तो अपने इस तरह के विकास के लिए सारी दुनिया पर हमला किया .

गांधी ने कहा अंग्रेजों का यह विकास का माडल शैतानी माडल है .

यह विकास का माडल ज़्यादा उपभोग और दूसरे के संसाधनों को छीनने पर आधारित है .

लेकिन अगर भारत भी अंग्रेजों के विकास का माडल अपनाएगा तो भारत किसके संसाधन छीनेगा ,और भारत किस पर हमला करेगा .

गांधी ने कहा कि एक दिन आप अपने ही गरीब देशवासियों पर हमला कर बैठेंगे .

गांधी ने कहा इस विकास के माडल में से सिर्फ युद्ध निकलेगा .

आज हमारी सेना आदिवासी इलाकों में पहुँच चुकी है .

भारत के अमीर लोग भारत के गरीब इलाकों में सेना भेज रहे हैं और आपको अभी भी नही लगता कि हम गृह युद्ध की तरफ बढ़ रहे हैं ?

सोचिये आज ही सोचिये कि क्या भारत को अपने विकास की दिशा के बारे में फिर से नही सोचना चाहिए ?

जो विकास देश में हिंसा बढाए हमें वैसा विकास चाहिए या जो शांति बढाए वो विकास अपनाना चाहिए ?

Monday, July 14, 2014

कुछ लोग मारे गए


कुछ लोग मारे गए क्योंकि उनकी दाढ़ियाँ लंबी थीं .

और दूसरे कुछ इसलिए मारे गए क्योंकि उनकी खाल का रंग हमारी खाल के रंग से ज़रा ज़्यादा काला था .

कुछ लोगों की हत्या की वाजिब वजह यह थी कि वो एक ऐसी किताब पढते थे जिसके कुछ पन्नों में हमारी किताब के कुछ पन्नों से अलग बातें लिखी हुई थीं .

कुछ लोग इसलिए मारे गए क्योंकि वो हमारी भाषा नहीं बोलते थे .

कुछ को इसलिए मरना पड़ा क्योंकि वो हमारे देश में नहीं पैदा हुए थे .

कुछ लोगों की हत्या की वजह ये थी कि उनके कुर्ते लंबे थे .

कुछ को अपने पजामे ऊंचे होने के कारण मरना पड़ा .

कुछ के प्रार्थना का तरीका हमारे प्रार्थना के तरीके से अलग था इसलिए उन्हें भी मार डाला गया .

कुछ दूसरों की कल्पना ईश्वर के बारे में हमसे बिकुल अलग थी इसलिए उन्हें भी जिंदा नहीं रहने दिया गया .

लेकिन हमारे द्वारा करी गयी सारी हत्याएं दुनिया की भलाई के लिए थीं .

हमारे पास सभी हत्याओं के वाजिब कारण हैं .

आखिर हम इन सब को ना मारते तो हमारा राष्ट्र, संस्कृति और धर्म कैसे बचता ?

Friday, July 11, 2014

फिलीस्तीनी बच्चों की लाशें



हैरान हो क्या फिलीस्तीनी बच्चों की लाशें देख कर 
लेकिन तुम्हारा राष्ट्र नायक समर्थन करता है इन बच्चों की हत्याओं का 
और तुम अपने राष्ट्र नायक का समर्थन करते हो 

तुम सभी हत्याओं का समर्थन करते हो 
चाहे वो 
अतीत में दानव संहार के नाम पर हुई हों या वर्तमान में 
देश की आंतरिक सुरक्षा के फर्ज़ी आवरण में 

आपने हमेशा हत्याओं की हिमायत की है 

एक युद्ध जारी है
आप भी एक पक्ष हैं उस युद्ध में
आप जिंदा है क्यों कि आप अभी मारने वाले के पक्ष में हैं

लेकिन मैं जानता था मर जाने वालों को करीब से
इसलिए हत्यारों द्वारा धर्म भ्रष्ट घोषित कर दिया गया हूँ

Saturday, July 5, 2014

दीदी कांट्रेक्टर




दीदी कांट्रेक्टर की उम्र अब लगभग पिच्चासी साल है . वो हिमाचल में सिद्धबाड़ी नामके गाँव में एक मिट्टी के छोटे घर में रहती हैं .
दीदी के पिता जर्मन और माँ अमेरिकी थीं . दीदी की शादी एक गुजराती कांट्रेक्टर से हुई .
दीदी ने हिमाचल में आकर अपने मिट्टी के मकान का नक्शा खुद ही बनाया . उसके बाद अनेकों लोगों ने अपने घर का नक्शा भी दीदी से बनवाया .
दीदी के मकान प्रसिद्ध होने लगे .
आज दीदी के पास अनेकों वास्तुशिल्प विश्वविद्यालय अपने छात्रों को काम सीखने के लिए भेजते हैं .
लेकिन दीदी के पास खुद वास्तुशिप की डिग्री नहीं है .
दीदी अपने मकान में सिर्फ स्थानीय सामान ही इस्तेमाल करती है .
उनके बनाए मकानों में मिट्टी , बांस ,पत्थर और स्थानीय मिलने वाली लकड़ी का ही इस्तेमाल होता है .
अगर आप उनसे एक बड़ा मकान बनवाने के लिए नक्शा बना कर देने के लिए कहेंगे तो वो आपसे आपके परिवार के सदस्यों के बारे में पूछेंगी और फिर सिर्फ ज़रूरी आकार का नक्शा बना कर देंगी .
दीदी गांधीवादी हैं .उनके घर में सारे कपड़े खादी के हैं . उनका रहन सहन बिलकुल सादा है .
गांधी कहते थे हमारी सारी ज़रूरतें आस पास के पांच गाँव से ही पूरी होनी चाहियें .
इसे ही गांधी स्वदेशी कहते थे .
कंक्रीट के मकान में लगने वाली सामग्री को दूर से, डीज़ल जला कर ,सीमेंट और स्टील बनाने के लिए लोगों को विस्थापित कर के प्रदूषण फैला कर सारे देश में एक जैसे मकान बनाए जा रहे हैं .
मकान की सामग्री दूर से लेकर आने और सारे देश में एक जैसे कांक्रीट के मकान बनाना मुनाफे की अर्थव्यवस्था और उसे समर्थन देने वाली राजनीति का प्रतीक है .
अभी आप जो मकान बनाते है उसमे से अस्सी प्रतिशत पैसा पूंजीपति की जेब में जाता है .लेकिन मिट्टी के मकान में अस्सी प्रतिशत पैसा मजदूर के घर में जाता है .
दीदी कहती हैं कि मकान मेरे लिए मेरा राजनैतिक वक्तव्य है .
दीदी के मिट्टी के मकान इसके विरुद्ध ज़मीन पर मिट्टी से लिखा गया एक राजनैतिक वक्तव्य है .

Saturday, June 14, 2014

विकास का माडल



विकास का मतलब ?

और भी अमीर हो जाना ?

अमीर हो जाना मतलब ? 

मतलब हमारे पास हर चीज़ का ज़्यादा हो जाना ? 

मतलब पैसा ज़्यादा ,ज़मीन ज़्यादा, मकान ज़्यादा हो जाना ? 

हाँ जी ? 

आपका विकास हो जाएगा तो आपके पास ज़्यादा पैसा आ जाएगा जिससे आप ज़्यादा गेहूं , सब्जियां , ज़मीन वगैरह खरीद सकते हैं .

हाँ जी . 

क्या आपके लिए प्रकृति ने ज़्यादा ज़मीन बनाई है ?

नहीं जी सबके लिए बराबर बनाई है ? 

आप ज़्यादा ज़मीन लेंगे तो वो ज़मीन तो किसी दूसरे के हिस्से की होगी ना ?

हाँ बिलकुल .

यानी आपका विकास दूसरे के हिस्से का सामान हड़प कर ही हो सकता है .

हाँ जी . 

तो आपका विकास प्रकृति के नियम के विरुद्ध हुआ ना ?

हाँ बिलकुल ?

जो लोग बहुत मेहनत करते हैं जैसे किसान मजदूर क्या वो भी अमीर बन जाते हैं ?

नहीं वो अमीर नहीं बन पाते .

यानी अमीर बनने के लिए मेहनती होना ज़रूरी नहीं है ?

हाँ उसके लिए दिमाग की ज़रूरत होती है .

आप मानते हैं कि खेती और मजदूरी के लिए बुद्धि  की ज़रूरत नहीं है ?

हाँ नहीं है .

आपने कभी खेती या मजदूरी करी है .

नहीं करी .

फिर आपको कैसे मालूम कि खेती और मजदूरी के लिए बुद्धि की ज़रूरत नहीं है ?

वो मजदूर किसान लोग पढ़े हुए नहीं होते ना .

अच्छा वो क्यों नहीं पढ़े हुए होते ?

क्योंकि उनके गाँव में अच्छे स्कूल नहीं होते और उन्हें काम करना पड़ता है इसलिए वो स्कूल नहीं जा पाते .

यानि उनका ना पढ़ पाना अपने स्थान और जनम के कारण होता है ?

हाँ जी .

तो इसमें उन किसान मजदूरों का दोष है क्या ?

नहीं उनका दोष नहीं है .

अगर उनका दोष नहीं है तो उनका आप जैसा विकास क्यों नहीं होना चाहिए ?

क्योंकि वो मेरे जैसा काम ही नहीं कर सकते .

आप क्या काम कर सकते हैं जो किसान मजदूर नहीं कर सकता ?

मैं कम्प्युटर पर काम कर सकता हूँ .

आप घर पर कम्प्यूटर पर काम करेंगे तो आप अमीर हो जायेंगे ?

नहीं घर पर अपना काम करने से अमीर नहीं होंगे उसके लिए हमें कहीं कम्पनी वगैरह में काम करना पड़ेगा .

अच्छा तो कम्पनी आपको पैसा देगी तब आप अमीर बनेंगे ?

हाँ  कम्पनी के पैसे से मेरा विकास होगा ?

कम्पनी के पास पैसा कहाँ से आता है ? 

कम्पनी माल का उत्पादन करती है उसमे से पैसा हमें देती है .

कम्पनी माल बनाती है तो उसके लिए ज़मीन पानी वगैरह कहाँ से आता है .

ज़मीन पानी तो कम्पनी को सरकार देती है .

सरकार ने ज़मीन पानी बनाया है क्या ? 

नहीं सरकार लोगों से ज़मीन पानी ले कर कम्पनी को देती है .

क्या सरकार को लोग प्रेम से अपनी ज़मीन और पानी दे देते हैं ?

नहीं लोग प्यार से सरकार को ज़मीन और पानी नहीं देते सरकार पुलिस भेज कर लोगों से ज़मीन और पानी छीन लेती है ?

अच्छा जिनकी ज़मीन और पानी सरकार छीन कर कम्पनी को देती है वो बहुत अमीर लोग होते होंगे ?

अरे नहीं सरकार तो गरीबों का पानी और ज़मीन छीन कर कम्पनी को देती है .

अच्छा मतलब आपका विकास तब होता है जब गरीबों की ज़मीन छीनी जाय ?

हाँ जी बिलकुल .

मतलब आपके विकास के लिए आपको गरीब की ज़मीन चाहिए ?

हाँ जी .

ज़मीन छीनने के लिए पुलिस भी चाहिए ?

हां जी पुलिस तो चाहिए .

निहत्थी पुलिस या हथियारबंद पुलिस ?

निहत्थी पुलिस किस काम की हथियारबंद पुलिस चाहिए .

यानी आपके विकास के लिए बंदूकें भी चाहियें ?

हाँ जी बंदूकें भी चाहियें .

मतलब आप सरकारी हिंसा के बिना विकास नहीं कर सकते ?

हाँ जी नहीं कर सकते ?

यानी आपका ये विकास हिंसा के बिना नहीं हो सकता ? 

हाँ नहीं हो सकता .

तो आप इस सरकारी हिंसा का समर्थन करते हैं ? 

हाँ विकास करना है तो हिंसा तो होगी .

अच्छा अगर आपकी इस हिंसा के कारण अगर गरीब लोग भी आप की पुलिस से लड़ने लगें तो आप क्या करेंगे .

हम और भी ज़्यादा पुलिस भेजेंगे .

अगर गरीब और भी ज्यादा जोर से लड़ने लगें तो ?

तो हम सेना भेज देंगे .

यानी आप अपने ही देश के गरीबों के खिलाफ देश की सेना का इस्तेमाल करेंगे ?

क्यों नहीं करेंगे . विकास के लिए हम सेना का इस्तेमाल ज़रूर करेंगे .

देश की सेना देश के गरीबों को ही मारेगी तो क्या उसे गृह युद्ध नहीं माना जाएगा ?

हाँ हम विकास के लिए कोई भी युद्ध लड़ सकते हैं . 
हमारे प्रधानमंत्री ने कहा है कि  जो हमारे विकास में बाधा पहुंचाता है वह आतंकवादी है .

ओह तो आप अपने विकास के लिए देशवासियों के विरुद्ध सेना का उपयोग करेंगे ?

हाँ ज़रूर करेंगे .

क्या इस दिन के लिए देश आज़ाद हुआ था की एक दिन इस देश के विकसित लोग अपने देश के गरीबों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल करेंगे ?

हाँ विकास के लिए हम कुछ भी करेंगे .

गरीब जनता के विरुद्ध सेना का इस्तेमाल करेंगे ?

हाँ ज़रूर करेंगे .

(तो दोस्तों यही है विकास का हमारा माडल .
बधाई हो )

Wednesday, June 11, 2014

भीड़ का न्याय



गांधी नीचे ज़मीन पर गिर चुका है

मारने वाला अभी भी गर्व से तना खड़ा है 
लगता है गांधी हार गया 

राजा के सिपाहियों ने 
जीसस के कंधे पर सलीब रख दिया है 
और काँटों का घेरा उसके सर पर लपेट दिया है 
जिन सूदखोरों को जीसस ने कोड़े मार कर मंदिर के अहाते से भगाया था 
वो सारे सूदखोर हँसते हुए राजा के साथ खड़े हैं 
भीड़ तालियाँ बजा रही है 
यह भीड़ का न्याय है 

राजा ने सुकरात को ज़हर पीने की सज़ा दी है 
जो पाखंडी पुरोहित सुकरात की सच्ची बातों से घबराए हुए थे 
उस सड़ चुके पुराने धर्म के पुरोहित आज हंस रहे हैं 
सुकरात अकेला है 
भीड़ राजा के साथ हैं 
यह भीड़ का न्याय है 

गैलीलियो के सच से 
पादरी घबराए हुए हैं 
उनका धर्मग्रंथ अब सवालों के घेरे में है 
इसलिए गैलीलियो पर धर्मग्रंथ के विरुद्ध बोलने का 
फतवा दे दिया गया है 
गैलीलियो सही होते हुए भी खामोश है 
भीड़ उन्माद से चिल्ला रही है 

भीड़ कभी न्याय नहीं करती 
कुछ लोग अपने समय में हारते हैं 
लेकिन इतिहास अपना काम चुपचाप करता है 
उस समय के हारे हुए लोग बाद में विजेता के रूप में चमकते हैं 
तत्कालीन सत्ताधीश कूड़ेदान में जा चुके होते हैं 
उन्हें कोई याद नहीं करता ,
वो विस्मृत कर दिए जाते हैं 

इसलिए मेरी बच्ची सोनी सोरी तुम ज़रा भी निराश ना होना 
भीड़ का साथ न मिला ना सही 
तुमने ढहा दिया उनके ज़ुल्म का किला 
उनके ज़िल्ले इलाही होने का मुलम्मा 
उतारा है तुमने 

चाटुकार कलम घसीटू 
मलाई चाटते हैं 
सत्य की हंसी उड़ाते हैं 
पर वो भीड़ का ही हिस्सा होते हैं 
बेकार भीड़ का 
तुमने उस दौर में आवाज़ उठाई जब हार रही थी तुम्हारी पूरी कौम 
ज़ुल्मतों के सामने कलम घसीटू लोग 
मलाई के दोने के लिए सत्ता के सामने सर झुकाए बैठे थे 

अभी हैं मुकाम कई 
अभी है रास्ता बहुत लंबा 
फिर लड़ेंगे 
फिर जीतेंगे 
हम अभी हारे नहीं हैं

Monday, June 9, 2014

ये देश

अम्बेडकर ने इसे अ नेशन इन मेकिंग कहा था यानी एक देश जो अभी बन ही रहा है . किसी को ये यकीन ही नहीं था कि जिस समाज में एक जाति के लोग दूसरी जातियों के लोगों को छूते भी न हों . वो एक देश के रूप में लंबे समय तक टिक भी पायेगा .
जिस समाज में हिंदू मुसलमान एक साथ रहने में परेशानी महसूस कर रहे थे . उस समय गांधी , नेहरु और अम्बेडकर ने इस देश को एक सच्चाई बनाया .
ठीक उसी समय लीग और हिंदू महा सभा आपसी नफरत को भड़का रहे थे और भारत को धार्मिक कट्टरपंथी राष्ट्र बना देने की कोशिशें कर रहे थे .
अब ये देश तभी तक एक राष्ट्र के रूप में बचा रहेगा जब तक यह सभी धर्मों के लोगों को बराबर मानेगा .सभी जातियों के लोगों की बराबरी के लिए कोशिश करता रहेगा . सभी जगह के लोगों को एक बराबर मानेगा .
लेकिन याद रखियेगा इस बराबरी की नीति का विरोध करने वाले आज भी कुछ जातियों को नीचा , कुछ धर्मों के लोगों को देशद्रोही कह कर देश में अपनी राजनीति चला रहे हैं .
फैसला आप को करना है कि आपको एक लड़ने और नफ़रत करने वाला समाज चाहिए या खुशहाल समाज ?
बाकी आगे आपकी मर्जी है .

Wednesday, May 14, 2014

श्रद्धांजलि

ये वो दौर था 
जब रामभक्त बजरंगी 
सीता की योनी में पत्थर भरते हुए पकड़ लिए गए थे 
और धर्म सेना द्वारा हाथ कटे लव कुश 
का चित्र जन सामान्य के सम्मुख उजागर हो चूका था 

क्रांतिकारी कामरेडों की भद्द पिट चुकी थी
कामरेड अपने बच्चों की शादियों में जन्मपत्री मिलवाने
और उन्हें अमरीकी कंपनियों में नौकरियां दिलवाने के
काम में लगे हुए पाए गए .
कुछ कामरेड बलात्कारी कामरेडों की तरफदारी के आन्दोलन चलाते हुए मिले
और जनता द्वारा पूरी तरह देख लिए गए थे .

समाजवादी इतने परिवारवादी हो चुके थे कि समाज ने
उन्हें अपनी स्मृति से भी मिटा दिया था
अब वे बस नौजवानों को क्रांतिकारी आंदोलन न करने हेतु गरियाते रहते थे
लेकिन खुद कोई आन्दोलन नहीं करते थे .

गांधी की नेमप्लेट वाली पार्टी
अय्याशियों और क्रूरता की सारी हदों को पार कर चुकी थी
और अब वो बजरंगियों के विरोध के नाम पर
अपने वजूद को सलामत रखने की आख़िरी कोशिश कर रही थी

इसी बीच नयी पीढ़ी आ चुकी थी
ये पीढ़ी बेपरवाह थी
और किसी भी विचारधारा की गुलाम नहीं थी ,
ये नौजवान रोज़ ही अपने मुख्यालय को ध्वस्त करते
चलते थे

लेकिन इन लड़के लड़कियों के पास
पुरानी समस्याओं को चुटकियों में सुलझा लेने की गज़ब की शिफत थी
ये तो मसलों को जैसे खेल समझते थे

पुराने थके हुए बूढ़े विचारक
इसी लिए इस पीढ़ी से बहुत कुढते थे

Wednesday, April 16, 2014

न आप कभी मरे न मैं कभी मरा

मैं आपके ईश्वर से नाराज़ नही हूँ 
आपके नेता से भी मेरी कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं है 
ना ही आपकी राजनैतिक और धार्मिक आस्थाएं मेरी चिढ़ की वजह हैं 
असल में तो मैं आपसे नाराज़ हूँ .

आप जब अपने सामने भूख से मरते बच्चे की भूख पर सवाल नहीं उठाते 
और ईश्वर की पूजा का बहाना कर आँखें बंद कर लेते हैं 
उस समय मुझे आपका ईश्वर दुनिया की सबसे धूर्त चीज़ लगता है .
असल में मैं आपके ईश्वर के नहीं आपकी चालाकी के खिलाफ हूँ

आपका नेता क्रूर है
वो अपने लालच के लिए लाखों लोगों की जान लेने के लिए प्रसिद्ध है
जब आप उसे अपना प्रिय नेता कहते हैं
तब आपके सामने मैं पूरी ताकत से उसके खिलाफ बोलने लगता हूँ .
असल में मैं आपके नेता के नहीं आपके लालच के खिलाफ हूँ .

जब आपकी सेना कुचलती है निर्दोष औरतों और बच्चों को
और आप गुण गाते हैं अपनी सेना के
तब मुझे सेना पर नहीं
आप पर चिल्लाने का मन करता है
इसलिए जब मैं सेना के खिलाफ बोलता हूँ
तो दरअसल मैं आपकी क्रूरता के विरुद्ध बोल रहा होता हूँ .

मेरी लड़ाई आप सब से है
मुझे पता है
आप फिर एक स्वार्थी ईश्वर
फिर एक लालची नेता
और फिर से एक क्रूर सेना बना लेंगे
क्योंकि ये सब आप ही की पैदाइश हैं
इसलिए मैं हमेशा आप से लड़ता रहूँगा .

आप भी हमेशा से थे
मैं भी हमेशा से था .
न आप कभी मरे
न मैं कभी मरा .

- हिमांशु

Thursday, March 13, 2014

भाइयों और बहनों ये मूर्खता अभी ही बंद कर दो

भारत के हिंदुओं तुम जो मोदी को अपना प्रिय नेता बनाने की बात भी बोल रहे हो उसका मतलब समझते हो ? 

इस तरह तुम आपने साथ रहने वाले करोड़ों मुसलमानों को सन्देश दे रहे हो कि तुम मुसलमानों को मारने वाले नेता को अपना बहुत प्यारा समझते हो . 

विकास वगैरह का बहाना मत बनाओ . उस झूठ की पोल कभी की खुल चुकी है .

अरे पागलों, एक ही देश में रह कर कोई एक समुदाय अगर खुद को दुसरे समुदाय से ज़्यादा ताकतवर दिखाने की कोई भी हरकत करेगा ,

तो दूसरा समुदाय या तो डर जाएगा या वो भी खुद को तुम्हारे बराबर शक्तिशाली दिखाने की कोशिश करेगा .

इस तरह समाज में विभिन्न समुदायों में होड़, अविश्वास और घृणा बढ़ेगी .

उसमे से हिंसा और अशांति और टूटन निकलेगी .

अंत में समाज के टूटने से राष्ट्र भी टूट जाएगा .

इसलिए भाइयों और बहनों ये मूर्खता अभी ही बंद कर दो .

तुम्हारा हिंदू या मुसलमान होना महज इत्तिफाक की बात है .

तुम्हारा जन्म दुसरे धर्म में भी हो सकता था .

इसलिए अपने धर्म पर इतराओ मत .

राजनीति को लोगों के स्वास्थ्य , शिक्षा , सम्मान , और बराबरी के लिए काम करने का साधन बनाने की ज़ोरदार कोशिश करो .

आजादी का मतलब है देश में सबके अधिकार बराबर हैं , सबकी गरिमा और सम्मान एक सामान हैं .

लेकिन अगर देश में सब बराबर नहीं हैं .

और किसी समुदाय को खुद को छोटा मानने के लिए मजबूर किया जाता है तो

इसका अर्थ है वह समुदाय आज़ाद नहीं बल्कि अभी भी गुलाम है .

क्या आप देश के भीतर एक समुदाय पर दुसरे समुदाय का शासन चलाना चाहते हैं ?

देश के भीतर दूसरी गुलामी की कोशिश मत कीजिये ये आपको भयानक परिणाम तक पहुंचा सकता है .

हमें मालूम है आपको इस तरह की गुलामी दूसरों से करवाने में मज़ा आता है .

लेकिन अब आप एक आज़ाद देश में रहते हैं .

पुराने भारत में नहीं जहां ऊंची जातियों का राज चला करता था और करोड़ों लोगों को धर्म के नाम पर गुलामों की तरह रहने पर मजबूर कर दिया गया था .

समझोगे तो ठीक है .

नहीं तो आपकी मर्जी .

फिर जो होगा खुद ही भुगतोगे .

शांति अहिंसा और सौंदर्य

आप हमें गरिया रहे हैं कि सिपाहियों के मरने पर अब मानवाधिकार वाले क्यों चुप हैं . 

ये अब क्यों नहीं बोलते ?

लेकिन भाई अब आप बोलिए . 

जब गरीब की ज़मीन छीन कर अमीर को दी गयी तब आप चुप रहे . 

क्या ये हिंसा नहीं थी ? 

लेकिन आप इस हिंसक कार्यवाही के समय चुप रहे .

लेकिन तब हम बोले थे .

लेकिन हमें विकास विरोधी कह कर आपने हम पर डंडे चलवाए थे .

जब गरीब की ज़मीन छीनने के लिए सरकारी हथियारबंद सिपाहियों का इस्तेमाल निहत्थी औरतों और बूढों के खिलाफ किया गया तब आप चुप रहे .

क्या वो हिंसा नहीं थी .

हम तब भी उस हिंसा के खिलाफ बोले लेकिन आपने हमें नक्सली कह कर दुत्कार दिया .

और हमें जेलों में सड़ने के लिए डाल दिया .

जब सिपाहियों द्वारा लड़कियों के साथ बलात्कार किया गया और निर्दोष लोगों को पीटा गया आप चुप रहे .

क्या वो हिंसा नहीं थी .

पर हम तब भी बोले .

लेकिन आपने हमें विदेशी एजेंट कह कर हमारा मजाक उड़ाया .

आपने अपनी पूरी ताकत लगा कर हमें पीड़ित जनता के बीच से हटा दिया .

लोगों के लिए न्याय पाने के सभी रास्तों को जान बूझ कर बंद कर दिया .

अब जब हिंसा होती है तो आप चिल्ला कर हम से कहते हैं कि अब बोलो .

लेकिन हम तो अब तक बोल ही रहे थे .

अब आपकी बारी है अब आप बोलिए .

बोलिए और सोचिये कि आपकी चुप्पी और आपका लालच कितनी हिंसा को जन्म दे सकता है .

ये सिपाही भी गरीब के बच्चे हैं .

इन्हें गरीबों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है . किसके फायदे के लिए .

टाटा , अम्बानी और जिंदल के लिए ज़मीने हडपने के लिए ना ?

और आप इसलिए चुप हैं क्योंकि आपके बच्चों को इन्ही अमीरों की कंपनियों में नौकरी करनी है .

इसलिए अब आप बोलिए .

कि इस हिंसा का ज़िम्मेदार कौन है ?

हमें गाली देने से क्या होगा ?

आपका स्वकेंद्रित विकास , आपका लुटेरा अर्थशास्त्र , हथियारों के दम पर चलती हुई आपकी राजनीति

सिर्फ हिंसा को ही जन्म देगी .

इसमें से शांति अहिंसा और सौंदर्य निकल ही नहीं सकता .

गोमपाड़




एक अक्टूबर सन दो हज़ार नौ को छत्तीसगढ़ के गाँव गोमपाड़ में सोलह आदिवासियों को सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन ने तलवारों से काट कर मार दिया . 

इन मारे गए लोगों में डेढ़ साल के बच्चे की माँ थी नाना था , नानी थी , आठ साल की मौसी भी थी . सीआरपीएफ द्वारा इस बच्चे की तीन उंगलियां भी काट डाली गयीं थीं .

इसके अलावा एक बुज़ुर्ग जो नेत्रहीन थे उनका पेट फाड़ दिया गया , एक बूढ़ी महिला के वक्ष काट डाले गए .
इस तरह कुल सोलह लोगों को मार डाला गया .

मैं इन मारे गए लोगों के परिवार के सदस्यों को लेकर दिल्ली आया .

दिल्ली के कांसटीट्युशन क्लब में प्रेस के सामने इन आदिवासियों के परिवार जनों को पेश किया .

बहुत बड़ी संख्या में मीडिया आया .

लेकिन सरकार के निर्देश पर अगले दिन मीडिया ने इस पूरी खबर को ब्लैक आउट कर दिया .

कहीं कोई खबर नहीं आयी .

मैं इन लोगों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय आया . पेटिशन दायर करी .

मैं पेटिशनर नम्बर एक बना मेरे साथ बारह आदिवासी सह पेटिशनर बने .

दंतेवाड़ा लौटने के बाद पुलिस ने इन आदिवासियों का अपहरण कर लिया .

मैंने दंतेवाड़ा छोड़ दिया .

इस मामले में अब मैं अकेला पेटिशनर बचा हुआ हूँ .

दंतेवाड़ा के एसपी अमरेश मिश्रा ने ने सर्वोच्च न्यायालय के डर से लाशों को खोद कर उनके हाथ काट लिए ताकि फोरेंसिक जांच में ये साबित न हो सके कि ये लोग निहत्थे थे और इन्होने कोई फायर नहीं किया था .

सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर छत्तीसगढ़ शासन को फटकार लगाई.

हमने कोर्ट से कहा कि अगर मारे गए लोग नक्सली थे तो सरकार ने किसी को बताया क्यों नहीं कि उसने सोलह नक्सलियों को वीरतापूर्वक मार डाला है ?

अगर मारे गए लोग निर्दोष आदिवासी थे और इन्हें नक्सलवादियों ने मारा था तो भी सरकार को सबको बताना चाहिए था कि देखिये नक्सलियों ने सोलह निर्दोष आदिवासियों को मार डाला है ?

और वैसे भी कानून कहता है कि अगर कोई नागरिक मरता है तो उसकी पुलिस रिपोर्ट तो होनी ही चाहिए .

तो कोर्ट बस इन सोलह आदिवासियों के मरने की एफआईआर लिखने का आदेश छत्तीसगढ़ सरकार को दे दे . और इसकी जांच एक विशेष जांच दल से करवा दे .

आज चार साल हो चुके हैं . मैं इस मुकदमे में करीब सौ बार कोर्ट के चक्कर काट चूका हूँ . लेकिन अभी तक फैसला नहीं आया .

मेरे परिवार वाले कहते हैं कि मुझे भी मार डाला जाएगा .

आज भी ये मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है .

और मैं अभी तक इन्साफ का इंतज़ार ही कर रहा हूँ .

Tuesday, February 25, 2014

मेरे पिता श्री प्रकाश भाई ने विद्यार्थी काल में मुज़फ्फर नगर के रेलवे रिकार्ड रूम में आग लगाई और पुलिस की घर में बार बार दबिश पड़ने पर फरार हो गए .

बाद में गांधी जी से पत्र व्यवहार हुआ . उन्होंने अपने आश्रम सेवाग्राम में बुला लिया . पिताजी को बुनियादी तालीम के काम में लगा दिया .

आजादी के बाद विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन शुरू किया . पिताजी उस आंदोलन में शामिल हो गए . वर्षों तक अमीरों से ज़मीने मांग कर गाँव के गरीबों में बांटने का काम किया . कभी छह महीने में एक दो दिन के लिए ही घर आते थे .

भूदान आन्दोलन से प्रेरित होकर सरकार ने सीलिंग कानून लागू किया . सरकार के पास बड़े ज़मीदारों की लाखों एकड़ ज़मीन आ गयी . इस ज़मीन को भूमिहीन गरीबों को बांटने का फैसला लिया गया .

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा विनोबा जी के पास गए और कहा कि इस सरकारी ज़मीन को बांटने का काम करने के लिए मेरे पास राजनीति में कोई ईमानदार आदमी नहीं है .आप कोई आदमी दीजिए .

विनोबा जी ने मेरे पिता का नाम बहुगुणा जी को दिया .

बहुगुणा जी ने मेरे पिताजी को केबिनेट मिनिस्टर का दर्ज़ा दिया और ज़मीन बाटने की जिम्मेदारी दी.

पिताजी ने अपने सामाजिक कार्यकर्त्ता साथियों को बुलाया और आन्दोलन के तरीके से बीस लाख सरकारी ज़मीन भूमिहीन किसानों में बांटी .

पिताजी आज भी खुद भूमिहीन हैं .

उनका इकलौता बेटा मैं भी भूमिहीन हूँ .

न कोई मकान न बैंक में हज़ार रूपये से ज़्यादा का कभी बैंक बैलेंस .

अट्ठारह साल बस्तर में संस्था चलाई . संस्था में करीब एक हज़ार कार्यकर्ता थे .

लेकिन जब बस्तर छोड़ कर निकला तो मेरे पास सिर्फ तीस हज़ार रूपये थे .

आज भी अगले महीने के मकान किराये की जुगाड हर महीने किसी से कह सुन कर करनी पड़ती है .

लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार कहती है कि मेरे दिल्ली में कई मकान हैं . और मुझे विदेशों से अकूत पैसा मिलता है .

अलबत्ता अपने वो मकान कभी मैंने भी नहीं देखे . सिर्फ रमन सिंह ने देखे हैं .

लेकिन पिता से मिले इस फक्कडपन ने मुझे ताकत बहुत दी है .

मेरी आवाज़ में दम है क्योंकि मेरी ज़रूरतें कम हैं .