Tuesday, August 18, 2015

लक्खे के सपनों की मौत

लक्खे एक आदिवासी लड़की है

लक्खे छत्तीसगढ़ के एड्समेट्टा गाँव मे रहती थी

लक्खे की तेरह साल की उम्र मे लखमा से शादी हुई

पुलिस वाले इनाम और के लालच मे आदिवासियों को जेल मे डालते रहते हैं

लक्खे जंगल मे लकडियाँ लेने गयी थी

पुलिस पार्टी उधर से गुज़र रही थी

पुलिस वाले लक्खे को पकड़ कर थाने ले गए

लक्खे को थाने मे बहुत बुरी तरह मारा

उसके बाद लक्खे को जेल मे डाल दिया गया

लक्खे पर पुलिस ने नक्सलवादी होने के चार फर्ज़ी मामले बनाए

तीन मामलों मे लक्खे को अदालत ने निर्दोष घोषित कर के बरी कर दिया है

लेकिन इस सब मे दस साल गुज़र गए

लक्खे अभी भी जगदलपुर जेल मे बंद है

शुरू के कुछ साल तक तो लक्खे को उम्मीद थी

कि मैं जेल से जल्द ही निकल कर घर चली जाऊंगी

जेल मे आने के चार साल तक लक्खे का पति जेल मे लक्खे से मिलने आता रहा

लेकिन चार साल बाद लक्खे ने अपने पति लखमा से जेल की सलाखों के पीछे से कहा

लखमा अब शायद मैं कभी भी बाहर ना निकल सकूं

जा तू किसी दूसरी लड़की से शादी कर ले

जेल से अपने पति के वापिस जाने के बाद

उस रात लक्खे बहुत रोई

सोनी सोरी भी तब जेल मे ही थी

लक्खे का रोना सुन कर

जेल मे दूसरी महिलाओं को लगा शायद लक्खे के परिवार मे किसी की मौत हो गयी है

इसलिए लक्खे रो रही है

लेकिन असल मे उस रात लक्खे के सपनों और उम्मीदों की मौत हुई थी

लक्खे अभी भी जगदलपुर जेल मे है

पूरी उम्मीद है लक्खे आख़िरी मुकदमे मे भी बरी हो जायेगी

लेकिन लक्खे के जीवन के इतने साल कौन वापिस देगा ?

लक्खे के सपनों की मौत भारत के लोकतंत्र की मौत नहीं है क्या ?

Sunday, August 9, 2015

आज दो दिवस हैं


आज दो दिवस हैं
पहला भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू होने का अगस्त क्रांति दिवस
दूसरा विश्व आदिवासी दिवस
मेरा दोनों के साथ कुछ करीब का सा रिश्ता है
भारत छोड़ो आन्दोलन में मेरे पिता ने मुज़फ्फर नगर रेलवे स्टेशन में आग लगा दी थी
और फिर पुलिस की दबिश घर पर पड़ने के बाद फरार हो गए थे
बाद में गांधी जी ने मेरे पिताजी को अपने आश्रम में बुला लिया था
पिताजी ने उसके बाद सारा जीवन ग्राम स्वराज्य के लिए लगाया ,
दूसरा आज विश्व आदिवासी दिवस है
मैं और मेरी पत्नी शादी के एक महीने बाद दिल्ली छोड़ कर बस्तर चले गए थे
हम अट्ठारह साल आदिवासियों के साथ रहे
फिर सरकार ने आदिवासियों की ज़मीन उद्योगपतियों को देने के लिए
आदिवासियों के गाँव जलाने शुरू किये
तब हमने सरकार के इस कदम का विरोध किया
तो सरकार ने हमारे आश्रम पर बुलडोजर चला दिया
अब मेरे छत्तीसगढ़ में प्रवेश पर बंदिश है
सुना है वहाँ मेरे ऊपर करीब एक सौ के करीब नक्सली मामलों के वारंट हैं
मैं बस्तर में आदिवासियों पर होने वाले ज़ुल्मों के खिलाफ़ हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमे लड़ रहा हूँ
लेकिन वहाँ अब सुनवाइयां भी होनी बंद सी हो चुकी हैं
मैं इन मामलों पर बात करने संयुक्त राष्ट्र संघ भी गया
वहाँ उन्होंने कहा कि भारत सरकार किसी को भी आदिवासी नहीं मानती
भारत सरकार इन्हें कबीलाई मानती है .
दो शब्द हैं इंडीजनस और ट्राइबल
इंडीजनस का अर्थ है
मूल निवासी
ट्राइबल का अर्थ है किसी कबीले का सदस्य ,
भारत सरकार ने भारत के आदिवासियों के लिए इंडीजनस शब्द का इस्तेमाल जान बूझ कर नहीं किया
भारत सरकार आदिवासियों को आदिवासी मानती ही नहीं है
संविधान में ऐसा ही लिखा है

विश्व आदिवासी दिवस

विश्व आदिवासी दिवस की बधाई
आज विश्व आदिवासी दिवस पर आप मान लीजिए
कि भारत के ऋषि मुनी ही भारत के सबसे पुराने निवासी हैं
मान लीजिए कि वेद तब ही आ चुके थे जब मनुष्य का जन्म भी नहीं हुआ था
मान लीजिए वेद ईश्वर द्वारा रचित हैं
मान लीजिए कि प्राचीन भारत में ऋषी मुनी जब तप करते थे
तो आदिवासियों के पूर्वज उनके लिए जंगल से कंद मूल फल लाने का काम करते थे
मान लीजिए कि आपके पूर्वज राजा के नाव पार करते समय राजा के पाँव धो कर पीते थे
आप नहीं मानेगे ?
कोई बात नहीं आपकी आने वाली संतानें मानेगी
वो इतिहास लिखने वाली संस्थाओं में अपने लोगों को बिठा रहे हैं
वो यही इतिहास लिख देंगे
आपका बच्चा स्कूल कालेज में उनका लिखा हुआ इतिहास पढ़ेगा
वो ऐसी फ़िल्में बनायेगे जिसमे यही दिखाया जायेगा कि
आपके पूर्वज जंगली थे
और आर्यों ने आपको सभ्यता सिखाई
उन्होंने फिल्म बनाने वाली और फिल्मों को सेंसर प्रमाण पत्र देने वाली संस्थाओं में भी अपने लोगों को बैठा दिया है
हर साल वो आपकी बेईज्ज़ती करते हैं
ताड़ी पीने वाले असुर यानी
ताड़कासुर को सार्वजनिक रूप से मारते हैं
वो नाटक नहीं करते
आपके मन में उनकी संस्कृति
के लिए इज्ज़त
और आपकी अपनी संस्कृति
के लिए अपमान और हीन भाव
भरने का काम करते हैं
आने वाले समय में आपका बच्चा यह कहने में शर्मायेगा
कि वो इन जंगली लोगों के परिवार का सदस्य है
वो कहेगा कि नहीं मैं भी
आर्य राजा
राम का वंशज हूँ
ताड़ी पीने वाले असुरों
यानी ताड़कासुर का वंशज नहीं
वो आपको ट्राइबल यानि
कबीले वाला कहेंगे
लेकिन वो आपको इंडीजनस यानी मूल निवासी
कभी नहीं कहेंगे
वो संविधान में व्यवस्था करके
रखे हुए हैं कि
आप कभी खुद को
मूल निवासी ना कह सकें
भारत का इतिहास बदलने का काम जारी है

Saturday, August 1, 2015

राष्ट्रवाद

सोशल मीडिया पर भारतीय नागरिक इस समय दो खेमे में बंटे हुए दिखाई दे रहे हैं .
एक तरफ वो हैं जो याकूब की फांसी के विरोध में हैं
और दूसरे जो याकूब की फांसी के समर्थन में हैं .
जो याकूब की फांसी के समर्थन में हैं उनमे भी दो तरह के लोग हैं.
पहले वो लोग हैं जो कहते हैं कि याकूब को जो फांसी हुई है वह कोई साम्प्रदायिक निर्णय नहीं है
उनका कहना है की इसलिए इस फांसी को लेकर जो लोग हल्ला मचा रहे हैं वह गलत कर रहे हैं और साम्प्रदायिक आधार पर भारतीय न्याय व्यवस्था पर हमला कर रहे हैं .
फांसी के समर्थन में दूसरा तबका मोदी भक्त वर्ग का है जो इस फांसी के बहाने फिर से मुसलमानों को नीचा दिखाने की कोशिश में लगा हुआ है.
ये लोग अभद्र और भड़काऊ भाषा और जुमले इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि मुसलमानों को चिढ़ा सकें .
ये लोग हल्ला मचा रहे हैं कि जो भी फांसी का विरोध कर रहे हैं, वह सभी लोग आतंकवादियों के समर्थक हैं.
इसी तरह फांसी के विरोध में भी दो तरह के लोग हैं.
पहले वो लोग हैं जो किसी को भी फांसी देने के खिलाफ़ हैं.
ये लोग पहले से ही किसी भी मौत की सज़ा के खिलाफ़ लिखते रहे हैं.
लेकिन जब ये किसी भी मौत की सज़ा के खिलाफ़ लिखते हैं तो इन्हें भक्त जन तुरंत आतंकवादियों के एजेंट घोषित कर देते हैं .
फांसी के खिलाफ़ दूसरी तरह के जो लोग हैं जो मानते हैं कि याकूब को मुसलमान होने के कारण फांसी दी गयी है इसलिए हम इस बात का विरोध कर रहे हैं .
इनमे भी दो तरह के लोग हैं पहले वो लोग हैं, जो भारत में साम्प्रदायिक राजनीति, लोकतंत्र के नाम पर बहुसंख्यवाद, हिंदुत्व के नाम पर भारतीय जनता का साम्प्रदायिकरण और संघ कुनबे द्वारा जानबूझ कर मुसलमानों को नीचा दिखाने के विरोध में हैं .
फांसी का विरोध करने वाले बहुत सारे मुस्लिम भी हैं जो इस फांसी को मुसलमानों को डराने के कदम के रूप में देख रहे हैं .
ये लोग जो प्रतिक्रिया कर रहे हैं उसका आधार बस यही है कि अगर वह मुसलमान ना होता तो उसे फांसी ना होती और यह कदम मुसलमानों को डराने के लिए लिया गया है इसलिए हम इसके विरोध में हैं .
याकूब की फांसी के बाद मुसलमानों के मन में डर और गुस्सा बिलकुल स्वाभाविक बात है.
डर को ठीक से समझना ज़रूरी है.
डर याकूब के लिए नहीं है. याकूब तो मर गया उसके लिए अब क्या डर?
मुसलमानों का डर तो उनके खुद अपने लिए है.
मुसलमान डर कर सोच रहे हैं की क्या मुसलमान होने के कारण हमें भारत में अब डर कर रहना पड़ेगा?
इसलिए काफी सारे मुसलमान इस डर से निजात पाने के लिए इस फांसी के विरोध में आवाज़ उठा रहे हैं.
आपको खुद याद होगा कि आपने दिल्ली में दामिनी कांड के बाद किस तरह से बलात्कार के विरोध में प्रदर्शन किया था.
वह भी आपके अपने डर की ही परिणिति थी.
आप दामिनी के लिए नहीं बल्कि खुद अपनी या अपनी बहन बेटियों की सुरक्षा के लिए के लिए सड़कों पर उतरे थे.
इसी तरह भारतीय मुसलमान भी याकूब के लिए नहीं बल्कि खुद अपनी सुरक्षा के लिए आवाज़ उठा रहे हैं
और कह रहे हैं कि भारत में अगर किसी को मुसलमान होने के कारण फांसी दी जाती है तो वह गलत है .
इसलिए फांसी के विरोध में उठने वाली किसी भी तरह की आवाज़ को आतंकवादी समर्थक कहना गलत होगा .
पिछले दिनों मुझे युवा लड़के लड़कियों के एक प्रशिक्षण शिविर में बुलाया गया .
मुझे राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता पर बोलने के लिए कहा गया.
मैंने वहाँ मौजूद ग्रामीण शिक्षित युवाओं से पूछा कि बताइये कि दुनिया का सबसे अच्छा राष्ट्र कौन सा है ?
सबने एक स्वर में कहा कि भारत .
मैंने अगला सवाल पूछा कि अच्छा बताओ कि सबसे अच्छा धर्म कौन सा है ?
सबने कहा हिंदू धर्म,
मैंने पूछा कि अच्छा बताओ सबसे अच्छी भाषा कौन सी है ?
कुछ ने जवाब दिया की हिन्दी, कुछ युवाओं ने जवाब दिया कि संस्कृत सर्वश्रेष्ठ भाषा है .
मैंने उन युवाओं से अच्छा अब बताओ कि दुनिया का सबसे बुरा देश कौन सा है ?
सारे युवाओं ने कहा की पाकिस्तान,
मैंने पूछा सबसे बेकार धर्म कौन सा है ?
उन्होंने कहा इस्लाम ?
मैंने इन युवाओं से पूछा कि क्या उन्होंने जन्म लेने के लिए अपने माँ बाप का खुद चुने थे ?
सबने कहा नहीं .
मैंने पूछा कि क्या आपने जन्म के लिए भारत को या हिंदू धर्म को खुद चुना चुना था ?
सबने कहा नहीं .
मैंने कहा यानि आपका इस देश में या इस धर्म में या इस भाषा में जन्म महज़ एक इत्तिफाक है .
सबने कहा हाँ ये तो सच है .
मैंने अगला सवाल किया कि क्या आपका जन्म पाकिस्तान में किसी मुसलमान के घर में होता
और मैं आपसे यही वाले सवाल पूछता तो आप क्या जवाब देते ?
क्या आप तब भी हिंदू धर्म को सबसे अच्छा बताते ?
सभी युवाओं ने कहा नहीं इस्लाम को सबसे अच्छा बताते .
मैंने पूछा अगर पाकिस्तान में आपका जन्म होता और तब मैं आपसे पूछता कि सबसे अच्छा देश कौन सा है तब भी क्या आप भारत को सबसे अच्छा राष्ट्र कहते ?
सबने कहा नहीं तब तो हम पाकिस्तान को सबसे अच्छा देश कहते .
मैंने कहा इसका मतलब यह है कि हम ने जहां जन्म लिया है हम उसी धर्म और उसी देश को सबसे अच्छा मानते हैं .
लेकिन ज़रूरी नहीं है की वह असल में ही वो सबसे अच्छा हो.
सबने कहा हाँ ये तो सच है.
मैंने कहा तो अब हमारा फ़र्ज़ यह है कि हम ने जहां जन्म लिया है उस देश में और उस धर्म में जो बुराइयां हैं उन्हें खोजें और उन् बुराइयों को ठीक करने का काम करें .
सभी युवाओं ने कहा हाँ ये तो ठीक बात है .
इसके बाद मैंने उन्हें संघ द्वारा देश भर में फैलाए गए साम्प्रदायिक ज़हर और उसकी आड़ में भारत की सत्ता पर कब्ज़ा करने और फिर भारत के संसाधनों को अमीर उद्योगपतियों को सौपने की उनकी राजनीति के बारे में समझाया .
मैंने उन्हें राष्ट्रवाद के नाम पर भारत में अपने ही देशवासियों पर किये जा रहे अत्याचारों के बारे में बताया.
मैंने उन्हें आदिवासियों, पूर्वोत्तर के नागरिकों, कश्मीरियों पर किये जाने वाले हमारे अपने ही अत्याचारों के बारे में बताया.
मैंने उन्हें हिटलर द्वारा श्रेष्ठ नस्ल और राष्ट्रवाद के नाम पर किये गये लाखों कत्लों के बारे में बताया.
मैंने उन्हें यह भी बताया की किस तरह से संघ उस हत्यारे हिटलर को अपना आदर्श मानता है .
मैंने उन्हें बताया की असल में हमारी राजनीति का लक्ष्य सबको न्याय और समता हासिल करवाना होना चाहिए .
हमने भारत के संविधान की भी चर्चा करी .
इन युवाओं में काफी सारे मोदी के भक्त भी थे .
लेकिन इस प्रशिक्षण के बाद वे मेरे पास आये और उन्होंने कहा कि आज आपकी बातें सुनने के बाद हमारी आँखें खुल गयी हैं.
असल हमें इस तरह से सोचने के लिए ना तो हमारे घर में सिखाया गया था ना ही हमारे स्कूल या कालेज में इस तरह की बातें बताई गयी थीं.
मुझे लगता है की हमें युवाओं के बीच उनका दिमाग साफ़ करने का काम बड़े पैमाने पर करना चाहिए. क्योंकि उनका दिमाग खराब करने का काम भी बड़े पैमाने पर चल रहा है .

Saturday, May 2, 2015

इसे अपने मुल्क की कहानी मत समझना





ये वो समय था जब 
कंपनियों के लिए ज़मीनों पर कब्ज़े के सिलसिले में 
हज़ारों आदिवासी लडकियां बलात्कार के बाद जेलों में डाल दी गयी थीं 
आदिवासी लड़की के गुप्तांगों में पत्थर डालने का आदेश देने वाले 
एक बार फिर से फूल मालाएं पहन ढोल धमाके के साथ हुक्म देने वाली कुर्सी पर विराजमान हो गए थे . 

अमीर कंपनियों की लूट का विरोध करने वाले 
देशभक्तों को जेल में डालने और उनका क़त्ल करने के लिए उनकी सूचियाँ तैयार करने का काम 
अब सरकारी ख़ुफ़िया एजेंसियां कर रही थीं 
लोक तन्त्र का मतलब चुनाव में वोट डालना भर बताया जा रहा था 
अब चाय की पत्ती बेचने वाली टाटा नाम की एक कम्पनी नौजवानों को लोकतंत्र का असली मतलब बताती थी 
बराबरी और न्याय अब लोकतंत्र के ज़रूरी हिस्से नहीं माने जाते थे 

गाँव के ज़मीनों पर कंपनियों के गुर्गों के ज़ुल्मों की कहानियों से अब नौजवानों 
का खून नहीं खौलता था .
नौजवानों के पास बहुत ज़रूरी काम थे 
नौजवान नस्ल क्रिकेट देखती थी 
और वो उन्ही अमीरों ज़ालिम कंपनियों में नौकरियों के लिए 
बेसब्रे थे 

इसे अपने मुल्क की कहानी मत समझना 
ये कहानी तो दूर बसे किसी अफ्रीकी देश की है 

हम तो महान देश के सर्वश्रेष्ठ नागरिक हैं 



Thursday, April 2, 2015

आयता का इंतज़ार

आयता एक आदिवासी युवक है .
आयता अपने इलाके में बहुत लोकप्रिय है .
आयता छत्तीसगढ़ में रहता है .
छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासियों की ज़मीन छीनना चाहती है .
सरकार लोकप्रिय आदिवासियों से डरती है .
सरकार को लगता है कि जो लोकप्रिय आदिवासी है है वह आदिवासियों को संगठित कर सकता है
सरकार मानती है कि लोकप्रिय आदिवासी सरकार द्वारा ज़मीन छीनने का विरोध कर सकता है .
इसलिए सरकार लगातार लोकप्रिय आदिवासी नेताओं को जेलों में ठूंसने का काम करने में लगी हुई है .
इसी तरह बस्तर के आई जी कल्लूरी ने आयता को बुला कर कहा कि तुम बहुत आगे बढ़ रहे हो , तुम ज़रूर नक्सलियों से मिले हुए हो तो तुम हमारे सामने सरेंडर कर दो .
आयता ने कहा मैं तो अपनी खेती करता हूँ . और साहब मेरे खिलाफ़ पुलिस के पास कहीं कोई शिकायत है क्या ?
आई जी ने कहा बहुत बोल रहा है . तुझे एक हफ्ते का टाइम दे रहा हूँ . मेरे सामने सरेंडर कर देना .
एक हफ्ते बाद पुलिस का दल एक बोलेरो और दो मोटर साइकिलों पर सवार होकर आयता के घर उसे पकड़ने पहुँच गए .
आयता घर पर नहीं था . पुलिस ने आयता की पत्नी सुकड़ी को उठाया गाड़ी में डाला और चल दिए .
गाँव वालों ने पुलिस को आयता की पत्नी सुकड़ी का अपहरण करते हुए देख लिया .
आदिवासियों को इस घटना से अपना बहुत अपमान लगा .
अगले दिन आदिवासी जमा हुए और आदिवासियों ने सुकड़ी को छुड़ा कर लाने का फैसला किया .
पन्द्रह हज़ार आदिवासियों ने पुलिस थाने को घेर लिया .
घबरा कर पुलिस झूठ बोलने पर उतर आयी .
पुलिस ने कहा कि हमने सुकड़ी को नहीं उठाया . हो सकता है नक्सलवादियों ने सुकड़ी का अपहरण किया हो .
लेकिन आदिवासियों ने तो अपनी आँखों से पुलिस को सुकड़ी का अपहरण करते हुए देखा था .
आदिवासी थाने के सामने ही जमे रहे तीन दिन तीन रातों तक आदिवसियों ने थाने को घेरे रखा .
अब सरकार घबराने लगी .
तीसरे दिन सोनी सोरी ने जाकर प्रशासन से कहा कि अगर आज रात पुलिस ने सुकड़ी को वापिस नहीं किया तो कल से मैं और मेरे साथ आदिवासी उपवास शुरू करेंगे .
इस पत्र के दो घंटे बाद ही सरकार ने कहा कि हमें सुकड़ी मिल गयी है ,
सरकार ने झूठ बोलते हुए कहा कि उन्हें सुकड़ी एक गाँव में मिली है .
हांलाकि सुकड़ी ने बाद में बताया कि सुकड़ी को पुलिस ने थानों में और सुरक्षा बलों के कैम्पों में रखा था .
लेकिन सुकड़ी की अपहरण की रिपोर्ट पुलिस ने आज तक नहीं लिखी है .
आदिवासियों ने अपनी जीत की खुशी मनाई और सुकड़ी को निर्विरोध रूप से अपने गाँव का सरपंच चुन लिया .
पुलिस ने आदिवासियों को उनकी हिम्मत की सज़ा देने के लिए तीन दिन बाद गाँव पर हमला किया और आदिवासी बुजर्ग महिलानों तक को इतना मारा कि उनकी हड्डियां टूट गयीं .
पन्द्रह आदिवसियों को नक्सली कह कर जेल में डाल दिया .
सोनी सोरी आयता और सुकड़ी को लेकर प्रदेश की राजधानी रायपुर पहुँच गयी .
आयता और सुकड़ी ने पत्रकारों को सब कुछ बताया .
आयता सोनी सोरी के साथ छत्तीसगढ़ के डीजीपी से मिलने गए .
लेकिन डीजीपी आयता से नहीं मिले .
कुछ हफ़्तों बाद पुलिस ने एक और आदिवासी युवक को घर से उठा लिया .
फिर दस हज़ार आदिवासियों ने फिर से थाने का घेराव किया .
आदिवासियों की हिम्मत देख कर गुस्से में पुलिस और सुरक्षा बलों ने आदिवासियों पर वहशी हमला किया .
इस हमले के विरोध में आदिवासियों ने जिला मुख्यालय सुकमा तक अस्सी किलोमीटर तक पदयात्रा करने का फैसला किया .
इस बार सोनी सोरी के साथ आयता भी इस पदयात्रा में आगे आगे थे .
आदिवासी राजनैतिक नेताओं के आश्वासन के बाद सभी आदिवासी रैली स्थगित कर अपने अपने घर जा रहे थे .
गाँव के रास्ते में पुलिस ने आयता को घेर लिया और और थाने में ले आये .
पुलिस ने बयान दिया कि उन्होंने एक 'फरार नक्सली ' को पकड़ा है .
आयता को जेल में डाल दिया गया .
अब आयता जगदलपुर जेल में है .
आयता पर चार फर्ज़ी मुकदमे लगा दिए गए हैं .
आज़ादी की लड़ाई में भी जेल यात्रा से लोग आज़ादी की लड़ाई के नेता बनते थे
आज बस्तर में भी जेल से निकल कर अनेकों आदिवासी अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता बन रहे हैं .
आयता बस्तर के लोग बाहर तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं .

आयता का इंतज़ार

आयता एक आदिवासी युवक है .
आयता अपने इलाके में बहुत लोकप्रिय है .
आयता छत्तीसगढ़ में रहता है .
छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासियों की ज़मीन छीनना चाहती है .
सरकार लोकप्रिय आदिवासियों से डरती है .
सरकार को लगता है कि जो लोकप्रिय आदिवासी है है वह आदिवासियों को संगठित कर सकता है
सरकार मानती है कि लोकप्रिय आदिवासी सरकार द्वारा ज़मीन छीनने का विरोध कर सकता है .
इसलिए सरकार लगातार लोकप्रिय आदिवासी नेताओं को जेलों में ठूंसने का काम करने में लगी हुई है .
इसी तरह बस्तर के आई जी कल्लूरी ने आयता को बुला कर कहा कि तुम बहुत आगे बढ़ रहे हो , तुम ज़रूर नक्सलियों से मिले हुए हो तो तुम हमारे सामने सरेंडर कर दो .
आयता ने कहा मैं तो अपनी खेती करता हूँ . और साहब मेरे खिलाफ़ पुलिस के पास कहीं कोई शिकायत है क्या ?
आई जी ने कहा बहुत बोल रहा है . तुझे एक हफ्ते का टाइम दे रहा हूँ . मेरे सामने सरेंडर कर देना .
एक हफ्ते बाद पुलिस का दल एक बोलेरो और दो मोटर साइकिलों पर सवार होकर आयता के घर उसे पकड़ने पहुँच गए .
आयता घर पर नहीं था . पुलिस ने आयता की पत्नी सुकड़ी को उठाया गाड़ी में डाला और चल दिए .
गाँव वालों ने पुलिस को आयता की पत्नी सुकड़ी का अपहरण करते हुए देख लिया .
आदिवासियों को इस घटना से अपना बहुत अपमान लगा .
अगले दिन आदिवासी जमा हुए और आदिवासियों ने सुकड़ी को छुड़ा कर लाने का फैसला किया .
पन्द्रह हज़ार आदिवासियों ने पुलिस थाने को घेर लिया .
घबरा कर पुलिस झूठ बोलने पर उतर आयी .
पुलिस ने कहा कि हमने सुकड़ी को नहीं उठाया . हो सकता है नक्सलवादियों ने सुकड़ी का अपहरण किया हो .
लेकिन आदिवासियों ने तो अपनी आँखों से पुलिस को सुकड़ी का अपहरण करते हुए देखा था .
आदिवासी थाने के सामने ही जमे रहे तीन दिन तीन रातों तक आदिवसियों ने थाने को घेरे रखा .
अब सरकार घबराने लगी .
तीसरे दिन सोनी सोरी ने जाकर प्रशासन से कहा कि अगर आज रात पुलिस ने सुकड़ी को वापिस नहीं किया तो कल से मैं और मेरे साथ आदिवासी उपवास शुरू करेंगे .
इस पत्र के दो घंटे बाद ही सरकार ने कहा कि हमें सुकड़ी मिल गयी है ,
सरकार ने झूठ बोलते हुए कहा कि उन्हें सुकड़ी एक गाँव में मिली है .
हांलाकि सुकड़ी ने बाद में बताया कि सुकड़ी को पुलिस ने थानों में और सुरक्षा बलों के कैम्पों में रखा था .
लेकिन सुकड़ी की अपहरण की रिपोर्ट पुलिस ने आज तक नहीं लिखी है .
आदिवासियों ने अपनी जीत की खुशी मनाई और सुकड़ी को निर्विरोध रूप से अपने गाँव का सरपंच चुन लिया .
पुलिस ने आदिवासियों को उनकी हिम्मत की सज़ा देने के लिए तीन दिन बाद गाँव पर हमला किया और आदिवासी बुजर्ग महिलानों तक को इतना मारा कि उनकी हड्डियां टूट गयीं .
पन्द्रह आदिवसियों को नक्सली कह कर जेल में डाल दिया .
सोनी सोरी आयता और सुकड़ी को लेकर प्रदेश की राजधानी रायपुर पहुँच गयी .
आयता और सुकड़ी ने पत्रकारों को सब कुछ बताया .
आयता सोनी सोरी के साथ छत्तीसगढ़ के डीजीपी से मिलने गए .
लेकिन डीजीपी आयता से नहीं मिले .
कुछ हफ़्तों बाद पुलिस ने एक और आदिवासी युवक को घर से उठा लिया .
फिर दस हज़ार आदिवासियों ने फिर से थाने का घेराव किया .
आदिवासियों की हिम्मत देख कर गुस्से में पुलिस और सुरक्षा बलों ने आदिवासियों पर वहशी हमला किया .
इस हमले के विरोध में आदिवासियों ने जिला मुख्यालय सुकमा तक अस्सी किलोमीटर तक पदयात्रा करने का फैसला किया .
इस बार सोनी सोरी के साथ आयता भी इस पदयात्रा में आगे आगे थे .
आदिवासी राजनैतिक नेताओं के आश्वासन के बाद सभी आदिवासी रैली स्थगित कर अपने अपने घर जा रहे थे .
गाँव के रास्ते में पुलिस ने आयता को घेर लिया और और थाने में ले आये .
पुलिस ने बयान दिया कि उन्होंने एक 'फरार नक्सली ' को पकड़ा है .
आयता को जेल में डाल दिया गया .
अब आयता जगदलपुर जेल में है .
आयता पर चार फर्ज़ी मुकदमे लगा दिए गए हैं .
आज़ादी की लड़ाई में भी जेल यात्रा से लोग आज़ादी की लड़ाई के नेता बनते थे
आज बस्तर में भी जेल से निकल कर अनेकों आदिवासी अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता बन रहे हैं .
आयता बस्तर के लोग बाहर तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं 

Saturday, March 28, 2015

हिड़मे

कुछ देर पहले छत्तीसगढ़ के शहर जगदलपुर से सोनी सोरी का फोन आया कि गुरूजी हमने हिड़मे को जेल से ले लिया है , पुलिस के एसपी और आईजी वहाँ मौजूद थे . मुझे लगता है पुलिस कुछ और करने की योजना बना रही है . 

मैंने धड़कते दिल से सोनी को दिलासा दिया कि जाओ बेटी आराम से उसे अपने घर ले जाओ , जो होगा देखा जाएगा .

कौन है ये हिड़मे ? पुलिस क्यों इसकी रिहाई से इतनी चिंतित है ? 

आइये समय की रेखा पर कुछ पीछे को चलते हैं .

हिड़मे एक आदिवासी लड़की है . उस समय हिड़मे की उम्र उस समय करीब सोलह साल की थी . जिला सुकमा राज्य छत्तीसगढ़ के एक गाँव की रहने वाली . हिड़मे के माता पिता बीमारी से चल बसे . हिड़मे मौसी के घर में रहती थी . 

थोडी सी ज़मीन थी जिस पर हिड़मे और उसकी मौसी खेती करते थे . खाने के लिए चावल खेत से पूरा हो जाता था . मौसीऔर हिड़मे महुआ के मौसम में महुआ के फूल बेच कर पास के बाज़ार में बेच देती थीं उससे साल भर के लिए कपड़े साबुन आदि का खर्चा निकल आता था . 

सन दो हज़ार आठ की बात है .धान की फसल कट चुकी थी . अभी महुआ गिरने में थोडा और समय था . जनवरी का महीना था . हिड़मे के गाँव के पास के गाँव रामराम में मेला लगा था . हिड़मे भी अपनी मौसी और मौसेरी बहनों के साथ रामराम के मेले में पहुँच गयी .

मेले में हिड़मे ने रिबिन और चूड़ियाँ खरीदीं . इसके बाद आस पास से आये हुए लड़के लडकियां गोल घेरा बना कर नाच रहे थे . ढोल बज रहा था . हिड़मे ने भी घेरे में नाचने लगी . सभी लोग साथ में गा भी रहे थे . 

नाचते नाचते हिड़मे का गला सूखने लगा . हिड़मे नाचना छोड़ कर थोड़ी दूर लगे हैंड पम्प से पानी पीने के लिए चल दी . पानी पीने के लिए हिड़मे ने जैसे ही हैंड पम्प का हत्था पकड़ा किसी ने हिड़मे का हाथ जोर से पकड़ लिया .

हिड़मे ने गुस्से से नजर उठा कर अपना हाथ पकड़ने वाले की तरफ देखा . अरे ये तो पुलिस वाले थे . कई पुलिस वालों ने हिड़मे को चारों तरफ से पकड़ कर घसीट कर मेले से बाहर खींच लिया . बाहर पुलिस का ट्रक खड़ा था . पुलिस वालों ने हिड़मे के हाथ पैर बाँध दिए और हिड़मे को ट्रक में फर्श पर फेंक दिया .

ट्रक चल पड़ा . 

ट्रक जहां रुका वह पुलिस थाना था . 

इसके बाद हिड़मे के साथ दरिंदगी शुरू हुई . एक थाने वालों का जी भर जाने के बाद हिड़मे को दूसरे थाने भेज दिया गया . वहाँ से जी भर जाने पर हिड़मे को तीसरे थाने में भेज दिया गया .

भयानक यातनाओं से हिड़मे की हालत मरने जैसी हो गयी थी . पुलिस वालों ने कहा यह थाने में ही ना मर जाय इसलिए अब इसे भी जेल में डाल दो . इस इलाके में आदिवासी लड़कियों को महीनों इस तरह रौंद कर नक्सली कह कर जेल में डालने का धंधा जोर शोर से चल रहा था .

जेल में डालने से पहले हिड़मे को अदालत में पेश करने की औपचारिकता की भी ज़रूरत थी . 
लेकिन हिड़मे की हालत अदालत पहुँचने की नहीं थी . हिड़मे को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया . कुछ दिन बाद हिड़मे को अदालत में पेश किया गया . पुलिस ने कहा कि हिड़मे ने तेईस सीआरपीएफ के जवानों की हत्या करी है . अदालत ने हिड़मे को जेल में डालने का हुकुम दे दिया . हिड़मे को जगदलपुर जेल में डाल दिया गया . 

थाने में जो हिड़मे के साथ हुआ था वो हैवानियत की इन्तेहा थी . जेल पहुँचने पर हिड़मे का गर्भाशय बाहर निकल आया . हिड़मे जेल में किससे कहती ? उसे बस गोंडी भाषा आती थी . हिड़मे तो हिन्दी भी नहीं बोल सकती थी . 

हिड़मे ने अपने शरीर से बाहर निकले हुए उस मांस के लोथड़े को दांत भींच कर फिर से शरीर के भीतर धकेल दिया .

हिड़मे के शरीर से लगातार खून बहता रहता था . 

हिड़मे के शरीर से वो मांस का लोथड़ा बार बार बाहर आ जाता था . 

एक दिन हिड़मे ने जेल में एक लड़की से कहा कि उसे कहीं से एक ब्लेड का टुकड़ा मिल सकता है क्या ?

अगले दिन उस लड़की ने हिड़मे को एक ब्लेड लाकर दे दिया .

हिड़मे के शरीर से गर्भाशय फिर से बाहर निकल आया था . हिड़में ने मॉस के उस लोथड़े को अपने शरीर से अलग करने का फैसला किया . सभी लडकियां बैरक से बाहर जा चुकी थीं . हिड़मे ने ब्लेड से गर्भाशय को काटने की तैयारी करी . तभी एक लड़की बैरक के भीतर आ गयी और हिड़मे की हालत देख कर जोर से चिल्लाई . बाकी की महिलायें भी जमा हो गयीं . हिड़मे से ब्लेड ले लिया गया . कुछ महिलाओं ने शोर मचा कर जेलर को बुला लिया . जेलर ने सोचा मेरी जेल में कोई औरत मर जायेगी तो खामखाँ मीडिया वाले शोर मचाएंगे . हिड़मे को सरकारी अस्पताल भिजवा दिया गया .

हिड़मे का आपरेशन किया गया . हिड़मे को नौ टाँके आये .

आपरेशन के बाद हिड़मे को फिर से जेल भेज दिया गया .

इधर हिड़मे के खिलाफ़ पुलिस द्वारा बनाया गया फर्ज़ी मुकदमा आगे ही नहीं बढ़ रहा था .

पुलिस ने हिड़मे के खिलाफ़ दो औरतों और दो पुलिस वालों को गवाह बताया था . लेकिन वो दोनों औरतें कभी अदालत के सामने नहीं पेश करी गयीं . दोनों पुलिस वालों ने हिड़मे का किसी मामले में हाथ होने की जानकारी से इनकार कर दिया .

इसी बीच जेल में सोनी सोरी को भी डाल दिया गया था .

सोनी सोरी के साथ भी पुलिस वालों ने थाने में अत्याचार किया था .

खुद पुलिस अधीक्षक ने सोनी को बिजली के झटके दिए थे और सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर ठूंस दिए थे .

हिड़मे की हालत के बारे में सोनी सोरी ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को बताया .

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ओर वकीलों ने हिड़मे के लिए आवाज़ उठानी शुरू कर दी .

लेकिन सरकार और अदालत आदिवासियों के मामलों में तो बिलकुल बेपरवाह रहती है .

क्योंकि देश भर में सभी मानते हैं कि आदिवासियों को तो आधुनिक विकास के लिए मार ही डाला जाना है .

मानवाधिकार वकील ने कहा कि अब तो सारी गवाहियां भी पूरी हो चुकी हैं अब तो हिड़मे की रिहाई का हुक्म दे दीजिए मी लार्ड 

जज साहब ने कहा भी कि जहाँ सात साल जेल में रही है कुछ और महीने रह लेगी तो क्या हो जाएगा ? 

हिड़मे कई और महीने जेल में पड़ी रही .

अंत में हिड़मे को जेल से रिहा करने का आदेश देना ही पड़ा .

आज सुबह हिड़मे जगदलपुर जेल से रिहा हो गई .

सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी हिड़मे को लेने जगदलपुर जेल पहुंचे .

हिड़मे का कोई अपराध नहीं था . सिवाय इसके कि वह एक लड़की थी , और बस्तर में वहाँ पैदा हुई थी जहां की ज़मीनों को सरकार अमीर कंपनियों के लालच के लिए छीनना चाहती है . 

जब मैं यह सब लिख रहा हूँ और मैं हिड़मे का चेहरा अपनी आँखों के सामने लाने की कोशिश करता हूँ तो मेरे सामने मेरी अपनी बेटी का चेहरा आ जाता है .

और मैं घबरा कर बिना चेहरे वाली हिड़मे के बारे में लिखने लगता हूँ .

अभी इतना साहस हममे कहाँ है कि हम अपनी बेटी को हिड़मे की जगह रख कर सोच सकें ?

Friday, March 20, 2015

सरकार शांति और लोकतंत्र से ही डरती है

छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा जिला .
सरकार आदिवासियों की ज़मीनें छीनने के लिए भारी तादात में सैन्य बलों को तैनात कर रही है .
इन सैन्य बलों को आदिवासी गाँव में तैनात किया जाता है .
देश भर में जहां भी सरकार उद्योगपतियों के लिए ज़मीनें छीनती हैं वहाँ सरकार पहले सैन्य बलों को ही तैनात करती है .
चाहे उस इलाके में नक्सलवादी हों चाहे ना हों .
इस देश में आज़ादी के बाद से आज तक अमीर कंपनियों के लिए कोई भी ज़मीन बिना सरकारी बंदूकों के इस्तेमाल के हड़पी ही नहीं गयी है .
यहाँ तक की दिल्ली के पास नौएडा तक में भारी पुलिस बल तैनात करके गांव वालों को पीट कर औरतों को घसीट कर घरों में घुस कर तोड़ फोड करने के बाद ज़मीन छीनी गयी थी जबकि नौएडा में तो कोई भी नक्सलवादी नहीं था .
आदिवासी इलाकों में यह सैन्य बल आदिवासी महिलाओं से बलात्कार करते हैं . युवकों को फर्ज़ी मामलों में फंसा कर जेलों में डालते हैं .
सैन्य बलों के सिपाही आदिवासियों को पीटते हैं .
आदिवासियों के घरों में घुस कर लूटपाट करते हैं .
ताकि आदिवासी डर जाएँ और सरकार जब ज़मीन छीने तो कोई सरकार के विरुद्ध आवाज़ ना उठा सके
इस तरह की सैंकडों घटनाओं की सूचना हम सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दे चुके हैं .
अनेकों बार सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग सरकार को फटकार भी लगा चुका है .
आज दंतेवाड़ा में फिर से इसी तरह की एक नयी घटना घट रही है .
दंतेवाड़ा ज़िले के अनेकों आदिवासी गावों के सरपंचों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने परसों कलेक्टर से मिल कर कलेक्टर को एक ज्ञापन दिया .
इन जनप्रतिनिधियों ने कलेक्टर को सूचना दी कि हमारे गाँव में नए सीआरपीएफ कैम्प खोले जा रहे हैं जिनके बारे में इस इलाके के आदिवासियों से कोई राय मशविरा नहीं किया गया है ,
सरकार की इस मनमानी के विरोध में आदिवासी इक्कीस मार्च को एक शांतिपूर्ण रैली करेंगे जिसकी सूचना हम आपको दे रहे हैं .
इस पत्र में जिन सरपंचों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किये थे उन में से लगभग सभी को आज पुलिस ने घर में घुस कर उठा लिया है .
इन जनप्रतिनिधियों में बड़े बेडमा गाँव के सरपंच शंकर कुंजाम , फूलपाड़ गाँव के सरपंच राहुल वेट्टी, कोरीरास गाँव के सरपंच जोगा , पालनार गाँव के सरपंच सुकालू ,और जनपद पंचायत के सदस्य नंदलाल को पुलिस ने पकड़ लिया है .
सुनने में आया है कि सरकार मानती है कि यह रैली नक्सलियों के कहने से करी जा रही है .
अगर थोड़ी देर के लिए सरकार के दावे को सच मान भी लिया जाय तो भी सरकार का यह कदम मूर्खता से भरा हुआ है .
एक तरफ तो सरकार कहती है कि नक्सली बंदूक छोड़ें और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में शामिल हो जाएँ .
तो रैली करना तो लोकतान्त्रिक प्रक्रिया ही है .
अगर नक्सली रैली कर रहे हैं तो सरकार को तो खुश होना चाहिये कि चलो नक्सली लोकतान्त्रिक तरीकों में विश्वास कर रहे हैं और शांतिपूर्वक अपनी बात रख रहे हैं .
लेकिन अगर सरकार आदिवासियों को शांतिपूर्वक और लोकतान्त्रिक तरीकों से अपनी बात भी नहीं रखने देगी तो उसका क्या नतीजा होगा ?
सरकार को खुद ही सोचना चाहिये .
अगर आप आदिवासियों को शांतिपूर्ण तरीके से रैली नहीं करने देंगे तो उस इलाके में आपको शांति लाने में मदद मिलेगी या आप अशांती को और भड़का रहे हैं .
असली बात यही है .
सरकार कभी शांती नहीं चाहती .
सरकार शांति और लोकतंत्र से ही डरती है .
सरकार के पास तो सिर्फ बंदूक है ,लाठी है पुलिस है दमन है ताकत है .
सरकार बंदूक का सामना तो बहुत अच्छे से कर लेती है .
लेकिन जब आदिवासी लोकतान्त्रिक और शांतिपूर्ण विरोध करते हैं तो सरकार बेबस हो जाती है
आदिवासियों के शांतिपूर्ण विरोध से सरकार घबरा जाती है .
तब सरकार की सारी दुनिया के सामने पोल खुल जाती है .
इसलिए सरकार आदिवासियों के निहत्थे विद्रोह को कुचलने में लग गयी है .
तो सरकार बहादुर आप आदिवासियों का दमन कीजिये जितनी भी आपकी ताकत है .
आदिवासी उस दमन का जवाब अपनी हिम्मत और एकजुटता से देंगे .
सरकार बहदुर इस दुनिया में आपसे पहले भी बड़े बड़े ज़ालिम आये थे .
लेकिन उन जालिमों का नामो निशान मिट गया .
लेकिन जिन लोगों ने ज़ुल्म के मुखालिफ आवाज़ उठाई वो इतिहास में अमर हो गए .
सरकार बहदुर तुम करो दमन .
दुनिया तुम्हे देख रही है .
दंतेवाडा में दमन करोगे तो सारी दुनिया में उसके खिलाफ़ आवाज़ उठेगी .
देखते हैं इस लड़ाई में जीत किसकी होती है ?
दमन की या आदिवासियों की हिम्मत और न्याय की ?

Tuesday, March 17, 2015

पदमा

पदमा आंध्र प्रदेश में कम्प्युटर आपरेटर का काम करती थी .

उसका पति काम के सिलसिले में अक्सर बाहर ही रहता था . 

एक दिन सुबह सुबह दरवाजे पर दस्तक हुई पदमा ने दरवाजा खोला 

सामने छत्तीसगढ़ पुलिस वाले खड़े हुए थे . पदमा को छत्तीसगढ़ लाया गया .

पुलिस वालों ने थाने में पदमा से पूछा कि क्या तुम्हारे पति का नाम बालकिशन है? 

पदमा ने कहा हाँ है .

पुलिस ने कहा कि तुम्हारा पति नक्सलवादी है .

पदमा ने कहा तो अपने किस कानून के तहत मुझे पकड़ा है ? 

अगर मेरा पति नक्सली है तो मेरे पति को पकडिये .

पदमा का कहना सही था 

भारत के कानून के मुताबिक किसी के अपराध के लिए किसी दूसरे को सज़ा नहीं दी जा सकती.

खुद को फंसता देख पुलिस ने पदमा के ऊपर हत्या के तीन फर्ज़ी मामले बना दिए और पदमा को 2007 में जगदलपुर जेल में डाल दिया .

पदमा पर जगदलपुर कोर्ट में मुकदमा चला . पदमा के खिलाफ़ कोई गवाह या कोई भी सबूत तो था ही नहीं . 

जगदलपुर की जिला अदालत ने पदमा को सभी आरोपों से बरी कर दिया.

कोर्ट ने 10 अगस्त 2009 को पदमा को जेल से रिहा करने का आदेश दे दिया .

पदमा का वकील जेल के बाहर पदमा का इंतज़ार करता रहा कि पदमा जेल से बाहर आयेगी . 

लेकिन पदमा शाम तक जेल से बाहर नहीं आयी . 

पदमा अगले दिन भी जेल से बाहर नहीं आयी . 

पदमा तीसरे दिन भी जेल से बाहर नहीं आयी .

पदमा के वकील ने जेल अधिकारियों से पदमा के बारे में पूछा तो जेल अधिकारीयों ने बताया कि पदमा अब जेल में नहीं है . 

पदमा को तो दो दिन पहले ही पुलिस वाले कहीं ले गए .

पुलिस वालों ने कोर्ट का रिहाई आदेश मिलने के बाद पदमा को जेल से गायब कर दिया 

पदमा के वकील ने फिर से कोर्ट में पदमा को हाज़िर करने के लिए हेबियस कार्पस का मामला दायर किया .

पुलिस ने अदालत को बताया कि पदमा को पुलिस ने दो और मामलों में फिर से पकड़ लिया है .

लेकिन इस बार पदमा को पदमा पत्नी राजन के नाम पर पकड़ कर जेल में डाला गया था .

इस बार पुलिस ने पदमा पर दो हत्याओं का फर्ज़ी मुकदमा लगाया .

पदमा के वकील ने जब मुकदमे में पुलिस द्वारा अदालत में पेश किये गए कागज़ देखे तो पता चला कि बहुत साल पहले कभी पदमा नाम की कोई नक्सली नेता थी जो पुलिस रिकार्ड में भी सन दो हज़ार छह में मारी जा चुकी है .

इस बार उस मर चुकी पदमा के नाम पर इस पदमा को पुलिस ने बदमाशी पूर्वक जेल में बंद किया है .

पदमा के वकील ने मर चुकी पदमा पत्नी राजन के पति और उसके बेटे को अदालत के सामने पेश किया .

पदमा को अदालत ने फिर से रिहा करने का हुकुम दिया .

लेकिन तब तक पुलिस ने पदमा पर तीन और मामले बना दिए .

2014 में इस बार पुलिस ने होशियारी दिखाई इस बार पदमा के पति का नाम लिखा नामालूम और लिखा पता नामालूम .

तो अब पदमा तीन मामलों में पदमा पत्नी बालकिशन और दो मामलों में पदमा पत्नी राजन के रूप में जेल में बंद है .

अगर आपमें से किसी का यह दावा हो कि भारत में पुलिस सरकार न्याय सभी के लिए बराबर है तो वह जगदलपुर जेल में जाकर पदमा से मिल सकता है .

अगर मेरी एक भी बात झूठ पायी जाय तो सरकार मुझे बड़े शौक से तुरंत जेल में डाल दे .

इस कड़ी में कुछ और भी मामले देश के सामने रखूंगा .

Saturday, March 14, 2015

बजावें हाय पांडे जी सीटी


'थाने में बैठे आन ड्यूटी
बजावें हाय पांडे जी सीटी'
हमारे पैसे से चलने वाली आकशवाणी से यह गाना बजता है .
पुलिस वाला ताकतवर है .
पांडे जी बड़ी जात वाले हैं
पुरुष है
इसलिए यह स्तिथी भारतीय संस्कारों में मज़ा देने वाली हालत पैदा करती है
भारत के संस्कारों में अगर इस तरह की बात के लिए स्वीकार भाव ना होता तो इस तरह का गाना भारत में ना तो बन सकता था ना ही सरकारी रेडियो पर बज सकता था ना जनता द्वारा इसे स्वीकार किया जा सकता था .
इसी सोच वाले भारत में बड़ी जाति का एक पुलिस अधिकारी एक कमज़ोर सामाजिक वर्ग आदिवासी लड़की के गुप्तांगों में पत्थर ठूंसता है तो भारत का राष्ट्रपति खुश होकर बख्शीश में उस अधिकारी को वीरता का तमगा देता है और देश तालियाँ बजाता है .
हमारे समाज का जो सार्वजनिक स्थान है वह किसके द्वारा भरा गया है ?
आप खुद ही देखिये कि किसी भी सार्वजनिक स्कूल कालेज , आई आई टी , आई आई एम् , मेडिकल कालेज , पुलिस , प्रशासन , राजनीति में जो स्पेस है उसे किसके द्वारा भरा गया है ?
कभी अचानक ध्यान दीजियेगा .
उस सार्वजनिक स्पेस में
कितने पुरुष हैं ,और महिलायें कितनी हैं ?
बड़ी जाति के लोग कितने हैं और कमज़ोर आर्थिक समूहों के लोग कितने हैं ?
बहुसंख्यक धार्मिक समूह के लोग कितने हैं , अल्पसंख्यक कितने हैं ?
आप देख्नेगे कि ज्यादातर सार्वजानिक स्थान पर बहुसंख्य , उच्च जाति के पुरुषों का कब्ज़ा है .
इस तरह जागरूक होकर देखने से आप पता लगा सकते हैं कि समाज पर कब्ज़ा किसका है और बेदखल किसे किया गया है
अगर सार्वजनिक जीवन से महिलायें , दलित , आदिवासी अल्पसंख्यक गायब हैं तो आप निश्चित मानिए वह समाज पुरुषवादी सवर्ण मानसिकता के दमनकारी विचारों से ग्रस्त शासन प्रशासन राजनीति और न्याय व्यवस्था से ही पीड़ित रहेगा
तभी तो भारत का सर्वोच्च न्यायालय किसी को सिर्फ इसलिए फांसी पर चढ़ा देता है क्योंकि भारत के स्वर्ण पुरुषों के वर्चस्व वाली सामूहिक अन्तश्चेतना ऐसा चाहती है .
ये जो समाज का कामन स्पेस है
उसमे महिला
पीढ़ियों से दबाये गए दलित
जंगलों में रहने वाले आदिवासी
बराबर का स्पेस पा सकें इसकी जिम्मेदारी
किसकी है ?
हम सभी की है ना ?
लेकिन अगर हम इसकी तरफ ध्यान ही नहीं देंगे
तो समाज के इस कामन स्पेस में सभी की बराबर भागीदारी बनायेगे कैसे ?
समाज आज जहां है उसे वहाँ से आगे ले जाना
इसी पीढ़ी की जिम्मेदारी है
इसे ही असली विकास कहते हैं
नकली विकास नहीं असली विकास कीजिये
समाज में सभी के लिए जगह बनाइये .