Wednesday, April 16, 2014

न आप कभी मरे न मैं कभी मरा

मैं आपके ईश्वर से नाराज़ नही हूँ 
आपके नेता से भी मेरी कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं है 
ना ही आपकी राजनैतिक और धार्मिक आस्थाएं मेरी चिढ़ की वजह हैं 
असल में तो मैं आपसे नाराज़ हूँ .

आप जब अपने सामने भूख से मरते बच्चे की भूख पर सवाल नहीं उठाते 
और ईश्वर की पूजा का बहाना कर आँखें बंद कर लेते हैं 
उस समय मुझे आपका ईश्वर दुनिया की सबसे धूर्त चीज़ लगता है .
असल में मैं आपके ईश्वर के नहीं आपकी चालाकी के खिलाफ हूँ

आपका नेता क्रूर है
वो अपने लालच के लिए लाखों लोगों की जान लेने के लिए प्रसिद्ध है
जब आप उसे अपना प्रिय नेता कहते हैं
तब आपके सामने मैं पूरी ताकत से उसके खिलाफ बोलने लगता हूँ .
असल में मैं आपके नेता के नहीं आपके लालच के खिलाफ हूँ .

जब आपकी सेना कुचलती है निर्दोष औरतों और बच्चों को
और आप गुण गाते हैं अपनी सेना के
तब मुझे सेना पर नहीं
आप पर चिल्लाने का मन करता है
इसलिए जब मैं सेना के खिलाफ बोलता हूँ
तो दरअसल मैं आपकी क्रूरता के विरुद्ध बोल रहा होता हूँ .

मेरी लड़ाई आप सब से है
मुझे पता है
आप फिर एक स्वार्थी ईश्वर
फिर एक लालची नेता
और फिर से एक क्रूर सेना बना लेंगे
क्योंकि ये सब आप ही की पैदाइश हैं
इसलिए मैं हमेशा आप से लड़ता रहूँगा .

आप भी हमेशा से थे
मैं भी हमेशा से था .
न आप कभी मरे
न मैं कभी मरा .

- हिमांशु

Thursday, March 13, 2014

पच्चीसगढ़ की कहानी


पच्चीसगढ़ राज्य में दमन सिंह का शासन था . दमन सिंह सुदूर उत्तर प्रान्त से आये हुए क्षत्रिय कुल के दस्यु वंश का था . दमन सिंह ने अन्य प्रान्तों से आये हुए वणिकों को अपने मंत्री मंडल में स्थान दे दिया था . 

वणिक वर्ग से मिले धन के बल पर दमन सिंह अपना राज्य निशंक होकर चला रहा था .

राज्य में बाहर से आने वाले सभी व्यापारियों को दमन सिंह की रानी को एक पेटी भर मुद्राएं देनी पड़ती थी . इन मुद्राओं के मिलने के बाद रानी दमन सिंह को संकेत कर देती थी . इसके उपरांत दमन सिंह पच्चीसगढ़ के वनों में मिलने वाली बहुमूल्य धातुओं के खनन की अनुमति प्रदान कर देता था .

ये धातु के व्यपारी वनों में रहने वाले ग्रामीणों को सताया करते थे . इससे वनों में रहने वाले वनवासी युवा बेहद उत्तेजित हो चले थे . अब ये वनवासी युवा इन व्यापारियों को वन प्रान्त में प्रवेश करने से रोकने का उपक्रम करने लगे थे .

वनों में इन धातु के व्यापारियों को संरक्षण देने के लिए दमन सिंह ने अपने सैनिकों को वन में भेज दिया . दमन सिंह के ये सैनिक वनवासियों पर भयानक अत्याचार करने लगे . राज्य का एक वनवासी युवक जिसका नाम लिंगराज कडोपी था इन अत्याचारों से व्यथित हो गया और वह वनवासियों को सैनिकों के अत्याचारों से मुक्त कराने के लिए संगठित करने लगा .

इस युवक के साहस से कुपित होकर सेना नायक ने उस युवक को कारागार में डाल दिया . सैनिकों ने लिंगराज कडोपी का अश्व भी छीन लिया .

इस युवक की पिता की बहन जिसका नाम सोना था , ने न्यायाधिपति के सम्मुख जाकर आर्तनाद किया . इस पर न्यायाधिपति ने वनवासी युवक लिंगराज कडोपी को मुक्त करने का निर्णय दिया .

इस पर सेना नायक और भी कुपित हो गया और उसने लिंगराज कडोपी की बुआ को ही कारागार में डाल दिया और उसे निवस्त्र कर उसका अपमान भी किया .

परन्तु राज्य के कतिपय सज्जन व्यक्ति न्यायाधिपति के सम्मुख सम्पूर्ण प्रकरण को लेकर गए . न्यायाधिपति ने वनवासी युवा लिंगराज कडोपी व उसकी बुआ सोना को मुक्त करने का आदेश दिया .

कुछ समय शांति से व्यतीत हुआ .

एक बार सेना के कतिपय सैनिक एक वनवासी गाँव में पहुंचे और उन्होंने ग्रामीणों से बहुमूल्य वृक्षों को काट कर बहुमूल्य काष्ठ को सेना नायक के घर भिजवाने के लिए कहा . परन्तु ग्रामीण वनरक्षक से डरते थे . उन्होंने ऐसा करने से मना किया . परन्तु सेना की टुकड़ी ने ग्रामीणों को विद्रोही कह कर कारागार में डाल देने का भय दिखाया और कुछ दिवस पश्चात फिर से आने की बात कही .

ग्रामीणों के इस सैन्य उत्पीडन का समाचार विद्रोही युवाओं के दल को मिला .

दमन सिंह की सैन्य टुकड़ी जब बहुमूल्य काष्ठ लेने ग्रामीणों के पास आ रही थी , तब विद्रोही युवकों ने दमन सिंह के सैनिकों पर घात लगा कर हमला कर दिया और छह सैनिकों और उनके अश्वों को मार डाला .

इन मारे गए अश्वों में से एक अश्व लिंगराज कडोपी का भी था .

लिंगराज कडोपी के हिमालय में समाधिस्थ सलाहकार सुधांशु ने लिंगराज कडोपी को सलाह दी कि तुम अपने अश्व के मारे जाने की फ़रियाद न्यायाधिपति के सम्मुख करो . नियमानुसार प्रजा के राजसात किये गए अश्व का प्रयोग सैनिकों द्वारा किया जाना नियम विरुद्ध था .

आज ही लिंगराज कडोपी ने न्यायाधिपति के सम्मुख अपनी प्रार्थना प्रस्तुत करी है तथा अपना अश्व सैनिकों से वापिस दिलवाने की मांग करी है .

अब सबकी उत्सुकता यही है कि सैनिकों के नियमविरुद्ध आचरण से लिंगराज कडोपी के अश्व की मृत्यु के लिए दंड का भागी कौन बनेगा ?

न्यायाधिपति के निर्णय के उपरान्त हमारी यह कथा आगे बढ़ेगी .

भाइयों और बहनों ये मूर्खता अभी ही बंद कर दो

भारत के हिंदुओं तुम जो मोदी को अपना प्रिय नेता बनाने की बात भी बोल रहे हो उसका मतलब समझते हो ? 

इस तरह तुम आपने साथ रहने वाले करोड़ों मुसलमानों को सन्देश दे रहे हो कि तुम मुसलमानों को मारने वाले नेता को अपना बहुत प्यारा समझते हो . 

विकास वगैरह का बहाना मत बनाओ . उस झूठ की पोल कभी की खुल चुकी है .

अरे पागलों, एक ही देश में रह कर कोई एक समुदाय अगर खुद को दुसरे समुदाय से ज़्यादा ताकतवर दिखाने की कोई भी हरकत करेगा ,

तो दूसरा समुदाय या तो डर जाएगा या वो भी खुद को तुम्हारे बराबर शक्तिशाली दिखाने की कोशिश करेगा .

इस तरह समाज में विभिन्न समुदायों में होड़, अविश्वास और घृणा बढ़ेगी .

उसमे से हिंसा और अशांति और टूटन निकलेगी .

अंत में समाज के टूटने से राष्ट्र भी टूट जाएगा .

इसलिए भाइयों और बहनों ये मूर्खता अभी ही बंद कर दो .

तुम्हारा हिंदू या मुसलमान होना महज इत्तिफाक की बात है .

तुम्हारा जन्म दुसरे धर्म में भी हो सकता था .

इसलिए अपने धर्म पर इतराओ मत .

राजनीति को लोगों के स्वास्थ्य , शिक्षा , सम्मान , और बराबरी के लिए काम करने का साधन बनाने की ज़ोरदार कोशिश करो .

आजादी का मतलब है देश में सबके अधिकार बराबर हैं , सबकी गरिमा और सम्मान एक सामान हैं .

लेकिन अगर देश में सब बराबर नहीं हैं .

और किसी समुदाय को खुद को छोटा मानने के लिए मजबूर किया जाता है तो

इसका अर्थ है वह समुदाय आज़ाद नहीं बल्कि अभी भी गुलाम है .

क्या आप देश के भीतर एक समुदाय पर दुसरे समुदाय का शासन चलाना चाहते हैं ?

देश के भीतर दूसरी गुलामी की कोशिश मत कीजिये ये आपको भयानक परिणाम तक पहुंचा सकता है .

हमें मालूम है आपको इस तरह की गुलामी दूसरों से करवाने में मज़ा आता है .

लेकिन अब आप एक आज़ाद देश में रहते हैं .

पुराने भारत में नहीं जहां ऊंची जातियों का राज चला करता था और करोड़ों लोगों को धर्म के नाम पर गुलामों की तरह रहने पर मजबूर कर दिया गया था .

समझोगे तो ठीक है .

नहीं तो आपकी मर्जी .

फिर जो होगा खुद ही भुगतोगे .

शांति अहिंसा और सौंदर्य

आप हमें गरिया रहे हैं कि सिपाहियों के मरने पर अब मानवाधिकार वाले क्यों चुप हैं . 

ये अब क्यों नहीं बोलते ?

लेकिन भाई अब आप बोलिए . 

जब गरीब की ज़मीन छीन कर अमीर को दी गयी तब आप चुप रहे . 

क्या ये हिंसा नहीं थी ? 

लेकिन आप इस हिंसक कार्यवाही के समय चुप रहे .

लेकिन तब हम बोले थे .

लेकिन हमें विकास विरोधी कह कर आपने हम पर डंडे चलवाए थे .

जब गरीब की ज़मीन छीनने के लिए सरकारी हथियारबंद सिपाहियों का इस्तेमाल निहत्थी औरतों और बूढों के खिलाफ किया गया तब आप चुप रहे .

क्या वो हिंसा नहीं थी .

हम तब भी उस हिंसा के खिलाफ बोले लेकिन आपने हमें नक्सली कह कर दुत्कार दिया .

और हमें जेलों में सड़ने के लिए डाल दिया .

जब सिपाहियों द्वारा लड़कियों के साथ बलात्कार किया गया और निर्दोष लोगों को पीटा गया आप चुप रहे .

क्या वो हिंसा नहीं थी .

पर हम तब भी बोले .

लेकिन आपने हमें विदेशी एजेंट कह कर हमारा मजाक उड़ाया .

आपने अपनी पूरी ताकत लगा कर हमें पीड़ित जनता के बीच से हटा दिया .

लोगों के लिए न्याय पाने के सभी रास्तों को जान बूझ कर बंद कर दिया .

अब जब हिंसा होती है तो आप चिल्ला कर हम से कहते हैं कि अब बोलो .

लेकिन हम तो अब तक बोल ही रहे थे .

अब आपकी बारी है अब आप बोलिए .

बोलिए और सोचिये कि आपकी चुप्पी और आपका लालच कितनी हिंसा को जन्म दे सकता है .

ये सिपाही भी गरीब के बच्चे हैं .

इन्हें गरीबों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है . किसके फायदे के लिए .

टाटा , अम्बानी और जिंदल के लिए ज़मीने हडपने के लिए ना ?

और आप इसलिए चुप हैं क्योंकि आपके बच्चों को इन्ही अमीरों की कंपनियों में नौकरी करनी है .

इसलिए अब आप बोलिए .

कि इस हिंसा का ज़िम्मेदार कौन है ?

हमें गाली देने से क्या होगा ?

आपका स्वकेंद्रित विकास , आपका लुटेरा अर्थशास्त्र , हथियारों के दम पर चलती हुई आपकी राजनीति

सिर्फ हिंसा को ही जन्म देगी .

इसमें से शांति अहिंसा और सौंदर्य निकल ही नहीं सकता .

गोमपाड़




एक अक्टूबर सन दो हज़ार नौ को छत्तीसगढ़ के गाँव गोमपाड़ में सोलह आदिवासियों को सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन ने तलवारों से काट कर मार दिया . 

इन मारे गए लोगों में डेढ़ साल के बच्चे की माँ थी नाना था , नानी थी , आठ साल की मौसी भी थी . सीआरपीएफ द्वारा इस बच्चे की तीन उंगलियां भी काट डाली गयीं थीं .

इसके अलावा एक बुज़ुर्ग जो नेत्रहीन थे उनका पेट फाड़ दिया गया , एक बूढ़ी महिला के वक्ष काट डाले गए .
इस तरह कुल सोलह लोगों को मार डाला गया .

मैं इन मारे गए लोगों के परिवार के सदस्यों को लेकर दिल्ली आया .

दिल्ली के कांसटीट्युशन क्लब में प्रेस के सामने इन आदिवासियों के परिवार जनों को पेश किया .

बहुत बड़ी संख्या में मीडिया आया .

लेकिन सरकार के निर्देश पर अगले दिन मीडिया ने इस पूरी खबर को ब्लैक आउट कर दिया .

कहीं कोई खबर नहीं आयी .

मैं इन लोगों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय आया . पेटिशन दायर करी .

मैं पेटिशनर नम्बर एक बना मेरे साथ बारह आदिवासी सह पेटिशनर बने .

दंतेवाड़ा लौटने के बाद पुलिस ने इन आदिवासियों का अपहरण कर लिया .

मैंने दंतेवाड़ा छोड़ दिया .

इस मामले में अब मैं अकेला पेटिशनर बचा हुआ हूँ .

दंतेवाड़ा के एसपी अमरेश मिश्रा ने ने सर्वोच्च न्यायालय के डर से लाशों को खोद कर उनके हाथ काट लिए ताकि फोरेंसिक जांच में ये साबित न हो सके कि ये लोग निहत्थे थे और इन्होने कोई फायर नहीं किया था .

सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर छत्तीसगढ़ शासन को फटकार लगाई.

हमने कोर्ट से कहा कि अगर मारे गए लोग नक्सली थे तो सरकार ने किसी को बताया क्यों नहीं कि उसने सोलह नक्सलियों को वीरतापूर्वक मार डाला है ?

अगर मारे गए लोग निर्दोष आदिवासी थे और इन्हें नक्सलवादियों ने मारा था तो भी सरकार को सबको बताना चाहिए था कि देखिये नक्सलियों ने सोलह निर्दोष आदिवासियों को मार डाला है ?

और वैसे भी कानून कहता है कि अगर कोई नागरिक मरता है तो उसकी पुलिस रिपोर्ट तो होनी ही चाहिए .

तो कोर्ट बस इन सोलह आदिवासियों के मरने की एफआईआर लिखने का आदेश छत्तीसगढ़ सरकार को दे दे . और इसकी जांच एक विशेष जांच दल से करवा दे .

आज चार साल हो चुके हैं . मैं इस मुकदमे में करीब सौ बार कोर्ट के चक्कर काट चूका हूँ . लेकिन अभी तक फैसला नहीं आया .

मेरे परिवार वाले कहते हैं कि मुझे भी मार डाला जाएगा .

आज भी ये मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है .

और मैं अभी तक इन्साफ का इंतज़ार ही कर रहा हूँ .

Tuesday, February 25, 2014

मेरे पिता श्री प्रकाश भाई ने विद्यार्थी काल में मुज़फ्फर नगर के रेलवे रिकार्ड रूम में आग लगाई और पुलिस की घर में बार बार दबिश पड़ने पर फरार हो गए .

बाद में गांधी जी से पत्र व्यवहार हुआ . उन्होंने अपने आश्रम सेवाग्राम में बुला लिया . पिताजी को बुनियादी तालीम के काम में लगा दिया .

आजादी के बाद विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन शुरू किया . पिताजी उस आंदोलन में शामिल हो गए . वर्षों तक अमीरों से ज़मीने मांग कर गाँव के गरीबों में बांटने का काम किया . कभी छह महीने में एक दो दिन के लिए ही घर आते थे .

भूदान आन्दोलन से प्रेरित होकर सरकार ने सीलिंग कानून लागू किया . सरकार के पास बड़े ज़मीदारों की लाखों एकड़ ज़मीन आ गयी . इस ज़मीन को भूमिहीन गरीबों को बांटने का फैसला लिया गया .

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा विनोबा जी के पास गए और कहा कि इस सरकारी ज़मीन को बांटने का काम करने के लिए मेरे पास राजनीति में कोई ईमानदार आदमी नहीं है .आप कोई आदमी दीजिए .

विनोबा जी ने मेरे पिता का नाम बहुगुणा जी को दिया .

बहुगुणा जी ने मेरे पिताजी को केबिनेट मिनिस्टर का दर्ज़ा दिया और ज़मीन बाटने की जिम्मेदारी दी.

पिताजी ने अपने सामाजिक कार्यकर्त्ता साथियों को बुलाया और आन्दोलन के तरीके से बीस लाख सरकारी ज़मीन भूमिहीन किसानों में बांटी .

पिताजी आज भी खुद भूमिहीन हैं .

उनका इकलौता बेटा मैं भी भूमिहीन हूँ .

न कोई मकान न बैंक में हज़ार रूपये से ज़्यादा का कभी बैंक बैलेंस .

अट्ठारह साल बस्तर में संस्था चलाई . संस्था में करीब एक हज़ार कार्यकर्ता थे .

लेकिन जब बस्तर छोड़ कर निकला तो मेरे पास सिर्फ तीस हज़ार रूपये थे .

आज भी अगले महीने के मकान किराये की जुगाड हर महीने किसी से कह सुन कर करनी पड़ती है .

लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार कहती है कि मेरे दिल्ली में कई मकान हैं . और मुझे विदेशों से अकूत पैसा मिलता है .

अलबत्ता अपने वो मकान कभी मैंने भी नहीं देखे . सिर्फ रमन सिंह ने देखे हैं .

लेकिन पिता से मिले इस फक्कडपन ने मुझे ताकत बहुत दी है .

मेरी आवाज़ में दम है क्योंकि मेरी ज़रूरतें कम हैं .

Tuesday, February 11, 2014

कवाल का शाह्नावाज़


मुज़फ्फर नगर में एक कवाल गाँव है . ये वो गाँव है जहां से मुज़फ्फर नगर दंगा शुरू हुआ था . आपको अखबारों और टीवी पर बताया गया था कि कवाल में एक मुसलमान लड़के शाहनवाज़ ने एक हिंदू लड़की के साथ छेड़खानी करी जिसके बाद उसके भाई मुसलमान लड़के को समझाने गए तो हिंदू लड़कों की हत्या कर दी गयी .

लेकिन सच्ची बात कुछ और ही है

शाहनवाज़ चौबीस साल का एक खूबसूरत नौजवान था . शाहनावाज़ कुल आठ भाई थे . ये सारे भाई चेन्नई के सेन्ट्रल रेलवे स्टेशन के पास पेरियामेट में रह कर लेडीज़ सूटों की फेरी लगाते थे . सारे भाई कई महीने बाद अपने गाँव आये थे .

अपनी हत्या के एक दिन पहले यानी छब्बीस अगस्त को शाहनवाज़ ने अपने सातों भाइयों को मुज़फ्फर नागर से चेन्नई जाने वाली ट्रेनमें बैठा दिया और खुद एक दो दिन के बाद चेन्नई आने के लिए कहा .

सत्ताईस अगस्त की दोपहर करीब बारह बजे शाहनवाज़ किसी काम से बाज़ार की तरफ गया वहाँ उसकी मोटर साईकिल की टक्कर गौरव की साईकिल से हो गयी . दोनों में कहा सुनी हुई . शाह्नावाज़ अपने घर आ गया .

करीब दो बजे शाहनवाज़ नमाज़ पढ़ने मस्जिद जाने के लिए निकला . सड़क पर गौरव तीन मोटर साइकिलों पर अपने पिता और मामाओं और मामा के बेटे सचिन के साथ खड़ा था .
इन लोगों ने शाहनवाज़ पर गुप्ती चाकू और पंच से हमला कर दिया . शाहनवाज़ सड़क पर चिल्लाते हुए गिर गया .

हत्यारे दो मोटर साइकिलों पर नगली गाँव की तरफ भाग खडे हुए . लेकिन सचिन और गौरव मलिकपुर की तरफ भागे . भीड़ ने सचिन और गौरव को पकड़ लिया और पीट पीट कर मार डाला .भीड़ को यह नहीं पता था कि हमलावर हिंदू थे या मुसलमान . लेकिन गाँव में घुस कर गाँव के लड़के को मारने पर क्रोधित होकर भीड़ ने कातिलों को मार डाला .

यह घटना दोपहर करीब ढाई बजे की है . कुछ ही देर में एसपी और कलेक्टर वहाँ पहुँच गए .

इसके बाद गाँव के पूर्व प्रधान विक्रम सैनी की अगुआई में पुलिस की मौजूदगी में मुसलमानों की दुकानों के शटर तोड़ डाले गए . फज़ल , मुन्ना , अफज़ल और अन्य लोगों की दुकानें लूट ली गयी . सरफराज़ की कार जला दी गयी . और लोगों को घरों में घुस कर पीटा गया .

इन हमलावरों का नेता विक्रम सैनी जो कवाल का पूर्व प्रधान है अब जेल में है इस पर रासुका लगा दिया गया है .

एसपी मंजिल सैनी का ट्रांसफर भी इसी वजह से किया गया था . क्योंकि उसने अपनी मौजूदगी में मुसलमानों पर हमले हुए थे . जबकि भाजपा ने झूठा प्रचार किया कि मुसलमानों को गिरफ्तार करने के कारण एस पी और कलेक्टर को आज़म खान ने हटवा दिया था .

एस पी का ट्रांसफर उसी रात को हो गया था जबकि निर्दोष मुसलमान जिनका कि नाम एफ आई आर में नहीं था को अगले दिन छोड़ा गया . इस लिए मुसलमानों को छोड़ने के कारण एस पी के ट्रांसफर की बात भी फर्ज़ी है .

पुलिस ने आनन् फानन में थोक में मुसलमानों को हवालात में ठूंस दिया .लेकिन शाहनवाज़ के एक भी हत्यारे को नहीं पकड़ा .

साढ़े चार बजे गौरव के पिता ने एफआईआर करवाई उसमे किसी लड़की के साथ छेड़खानी का कोई ज़िक्र नहीं था .उसमे भी साईकिल और मोटर साईकिल की टक्कर के कारण झगडे की बात ही कही गयी .

दैनिक भास्कर और एन डी टी वी को अपने इंटरव्यू में गौरव की बहन ने स्वीकार भी किया कि उसे कभी शाहनवाज़ ने परेशान नहीं किया था . वह किसी शाहनवाज़ को नहीं जानती . उसने शाहनवाज़ को कभी देखा तक नहीं .

लेकिन भाजपा नेताओं ने ज़बरदस्ती प्रचार किया कि यह झगड़ा गौरव की बहन के साथ छेड़खानी के कारण हुआ .

शाहनवाज़ के दो भाइयों का नाम भी एफ आई आर में लिखवा दिया गया . जबकि सच यह है कि ये सातों भाई चेन्नई जाने वाली देहरादून एक्सप्रेस में बैठे हुए थे . यह ट्रेन हर सोमवार को मुज़फ्फर नगर से चलती है और छब्बीस अगस्त को सोमवार ही था . ,मेरे पास इन सातों भाइयों के ट्रेन की टिकिट मौजूद है .

इन सातों भाइयों को रस्ते में खबर मिली कि गाँव में आपके भाई शाहनवाज़ को जाटों ने मार दिया है . ये भाई बल्लारशाह स्टेशन पर उतरे और वापिस आने वाली ट्रेन में बैठ गए . मेरे पास इनकी वापिसी के भी सातों टिकिट मौजूद हैं .


अगले दिन सचिन और गौरव का अंतिम संस्कार करने के बाद . पीएसी की मौजूदगी में कवाल गाँव की मुस्लिम बस्ती पर जाटों ने कहर बरपा किया . घरों के दरवाजे तोड़ डाले गए . सामान लूट लिया , मस्जिद का सारा सामान , पंखे इन्वर्टर , लूट कर ले गए . पथराव किया . पीएसी ने मुसलमानों की तरफ पूरे समय बंदूक ताने रखीं ताकि वे अपने सामान की रक्षा न कर सकें .

गौरव के पिता ने एफ आई आर में जिन मुसलमानों के नाम लिखवाए उन्हें बेक़सूर होते हुए भी डर के मारे घर वालों ने पुलिस को सौंप दिया .

जांच अधिकारी सम्पूर्ण तिवारी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि यह सच है कि पहले शाहनवाज़ की हत्या करी गयी और फिर भीड़ ने सचिन और गौरव को मार डाला .

शाहनवाज़ की हत्या की जो एफ आई आर हुई उस पर पुलिस ने आज तक कोई कार्यवाही नहीं करी .
जैसे की शहनावाज की हत्या ही ना हुई हो .

जबकि सच तो यह है कि इन हत्यारों ने निर्दोष शाहनवाज़ को गाँव में आ कर हमला कर के मारा . और उस दौरान भीड़ के हाथ पड कर इनमे से दो हत्यारे मारे गए .

लेकिन आज तक शाहनवाज़ के हत्यारे खुले आम मंचों पर सम्मानित किये जा रहे हैं .

शाहनवाज़ के पिता मुलायम सिंह यादव से भी मिल कर आये लेकिन उन्होंने कोई कार्यवाही नहीं करी

क्या इस देश में अलग अलग समुदाय के लिए अलग अलग कानून हम स्वीकार कर सकते हैं .

याद रखिये अगर आप देश के एक भी नागरिक के साथ भेदभाव स्वीकार करते हैं तो फिर आप सभी के लिए भेदभाव को एक नीति के रूप में स्वीकार कर रहे हैं .

हम इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर जायेंगे .

शाहनवाज़ निर्दोष था . उस के चरित्र पर लगाए हुए फर्ज़ी इलज़ाम का पर्दाफाश किया जाएगा . जेलों में बंद बेकसूरों को ज़मानत दिलवाई जायेगी और शाहनवाज़ के कसूरवारों की गिरफ्तारी की कार्यवाही के लिए सुप्रीम कोर्ट जाया जाएगा .



Sunday, January 26, 2014

मुल्ला जी की छब्बीस जनवरी

कल मुज़फ्फर नगर में अपने एक संबंधी के साथ बैठा था . पूछने लगे कि क्या कर रहे हो आजकल ? मैंने बताया कि मुज़फ्फर नगर दंगा पीड़ितों को मुफ्त कानूनी सहायता देने के लिए एक केन्द्र शुरू किया है .

कहने लगे कि कुछ भी कहो ये मुसलमान गद्दार ही रहेंगे . ये कभी इस देश के नहीं हो सकते .

अब मैं अचकचाया कि बात को शुरू कहाँ से करूँ . जो मेरे सामने थे वो रिश्ते में आदरणीय हैं इसलिए तुर्शी दिखाने की मुझे यहाँ छूट नहीं थी .

मैंने आहिस्ता से कहना शुरू किया कि यहाँ जो एक राहत शिविर है 'जौला 'गाँव में उसमे करीब हज़ार लोग रह रहे हैं . ये लांक बहवडी लिसाढ़ अदि गाँव के लोग हैं . इन्होने जौला में इसलिए आकर शरण ली है क्योंकि जौला पूर्णतः मुस्लिम गाँव है .

मेरे आदरणीय की पेशानी पर अभी भी तनाव था .

मैंने कहना जारी रखा .

मैंने कहा कि सन अट्ठारह सौ सत्तावन में जौला गांव की आबादी करीब पांच सौ लोगों की थी . और भारत के उस पहले स्वतंत्रता संग्राम में जौला के ढाई सौ मुसलामानों को अंग्रेजों ने मार डाला था .

मेरे आदरणीय के चेहरे का भाव अब बदलने लगा था . उनकी पत्नी भी कमर पर हाथ रख कर मेरी पराजय की प्रतीक्षा में सन्नद्धः खड़ी थीं . लेकिन अब उन्होंने भी अपनी कमर से हाथ नीचे कर लिए .

मुझे लगा कि मौका अच्छा है अब अगला कारतूस दाग दो . मैंने आगे कहा कि भारत के ख़ुफ़िया राज़ विदेशों को बेचने के जितने भी मामले पकडे गए हैं उनमे पकड़ गए नब्बे फीसदी आरोपी हिंदू हैं . मैंने राजनयिक महिला जासूस माधुरी गुप्ता और सब्बरवाल का नाम बताया .

अब मेरे आदरणीय के चेहरे का भाव एकदम बदल गया . बोले नहीं सभी मुसलमान खराब नहीं होते . लेकिन कुछ तो इनमे से बदमाश हैं ही . मैंने कहा कि जी यूं तो कुछ हिंदू भी बदमाश होते हैं .

अब मेरे आदरणीय पूरी तरह अपने हथियार डाल चुके थे . मैंने अच्छा मौका भांप कर कहा कि देखिये हम न तो इस देश की के इंच ज़मीन को इधर से उधर कर सकते हैं न किसी एक भी नागरिक को भारत से बाहर भगा सकते हैं . हमें इन्ही मुसलमानों के साथ ही रहना है . अब फैसला ये ही करना है कि मिल कर रहना है या लड़ते लड़ते रहना है .

अब वे योद्धा की भूमिका छोड़ शिष्त्त्व मुद्रा में आ चुके थे . बोले हाँ सही कह रहे हो तुम्हारा काम बहुत ज़रूरी है . हमारी किसी मदद की ज़रूरत हो तो बताना .

आज सुबह मुज़फ्फर नगर की पुलिस लाइन में पहुंचा तो साईकिल पर एक टिपिकल मुल्ला जी दाढ़ी और गले में फिलीस्तीनी काले चेक वाला रुमाला लपेटे अपने सात एक साल के बच्चे को साईकिल पर आगे बिठा कर छब्बीस जनवरी की परेड में शामिल होने की लिए आ रहे थे .बच्चे के हाथ में छोटा सा प्लास्टिक का तिरंगा था जिसे वो जोर जोर से हवा में डुला रहा था .

भारतीय मुसलमानों के बारे में मेरे सभी दावों को इस दृश्य ने पुख्ता कर दिया था .

मैं भी मुस्कुराता हुआ छब्बीस जनवरी की उस भीड़ में मुल्ला जी और उनके बच्चे के साथ साथ शामिल हो गया .

Sunday, January 19, 2014

मुज़फ्फर नगर का सच

मुज़फ्फर नगर दंगा पीड़ित शिविर में पानी भर गया है . जवान और छोटे बच्चों की मौतें जारी हैं . ये ठण्ड से मर रहे हैं .

कल्पना करने की कोशिश कर रहा हूँ कि अगर ठीक इसी तरह मेरा घर इसलिए जला दिया जाता क्योंकि मैं एक हिंदू हूँ और फिर मुझे अपने बच्चों के साथ सर्दी में खुले में रहना पड़ता , और मेरी बात कोई भी न सुनता तो मुझे इस देश के लोकतंत्र और हमलावरों के धर्म के बारे में किस तरह के ख़याल आते ?

मुज़फ्फर नगर दंगों के बारे में भाजपा ने झूठ फैलाया है कि ये दंगा कवाल गाँव में एक लड़की के साथ छेड़खानी के कारण हुआ . मैंने कवाल की एफआईआर हासिल कर ली है . इस में किसी छेड़खानी का कोई ज़िक्र नहीं है . सिर्फ साईकिल और मोटरसाइकिल की टक्कर का मामला था . लेकिन भाजपाइयों ने ज़बरदस्ती इसे लड़की के साथ छेड़खानी का मामला बनाया .और दंगे करवाए ताकि हिंदू वोटों इकठ्ठा कर  भाजपा की झोली में डाला जा सके .

शाहनवाज़  को मारने छह लोग गए थे . हत्या करने के बाद दो हत्यारे मारे गए और चार हत्यारे भाग निकले . भाग खड़े हुए चार हत्यारे आज भी खुलेआम घूम रहे हैं . इस एफ आई में गौरव के पिता ने स्वयं कबूला है कि वह भी घटना स्थल पर मौजूद था . इसके बावजूद भी आज तक मुजस्सिम उर्फ शाहनवाज़ की हत्या करने पर किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया गया है .

एफ आई आर की प्रतिलिपि नीचे दी गयी है


एफ आई आर नम्बर ४०३/ १३
धारा १४७- १४८ -१४९ -३०२ , ५०६ भारतीय दंड संहिता व ७ क्रिमिनल ला एक्ट
थाना जानसठ , जिला मुज़फ्फर नगर दिनांक २७- ०८ २०१३ , समय ४ : ४५
वादी का नाम - रविन्द्र पुत्र तिलक राम निवासी मलिकपुरा माजरा कवाल थाना जानसठ जिला मुज़फ्फर नगर
९५५७८७८६८३
प्रतिवादी के नाम
मुजस्सिम S/O नसीम उर्फ कल्लू कुरैशी
बिल्ला S/O नसीम
फुरकान S/O फज़ल कुरैशी
जहांगीर S/O सलीम उर्फ मेघा
कलवा S/O सलीम
अफजाल S/O इकबाल
नदीम S/O सलीम

असल तहरीर हिन्दी कापी
सेवा में
श्रीमान प्रभारी निरीक्षक
थाना जानसठ

निवेदन है कि प्रार्थी रविन्द्र पुत्र तिलकराम गाँव मलिकपुरा माजरा कवाल थाना जानसठ में ज़मीन खरीद कर खेती करता है . वह यहीं का निवासी है . मेरा लड़का गौरव कुमार कक्षा बारह, जनता इंटर कालेज का विद्यार्थी था . वह रोज स्कूल कवाल से होकर जाता था . एक दिन पहले मेरे लड़के के साथ कवाल के मुजस्सिम के साथ साइकिल टकराने पर कहा सुनी हो गयी थी . इस बात को मेरे बेटे गौरव ने मुझे आकर बताया था . आज दिनांक २७ / ०८ / २०१३ को मैं अपने बेटे गौरव और उसके मामा के बेटे सचिन को स्कूल से लेकर गाँव वापिस जा रहा था . जब हम लोग करीब एक बजे दिन गाँव कवाल में चौराहे पर पहुंचे वहाँ पहले से मुजस्सिम पुत्र नसीम उर्फ कल्लू कुरैशी व बिल्ला S/O नसीम उर्फ कल्लू कुरैशी फुरकान पुत्र फज़ल निवासी कवाल अपने हाथों में सरिया डंडे व चाकू लिए खड़े मिले और गौरव को गाली देते हुए कहा कि साले तू कल बहुत अकड़ रहा था ,आज तुझे इसका मज़ा चखाते हैं  हैं . और मेरे लड़के गौरव व सचिन पर लाठी सरिया चाकू से जान से मारने की नियत से हमला कर दिया . मैं गौरव व सचिन भागे तो सामने से जहांगीर पुत्र सलीम उर्फ मेघा ने घेर लिया और उन्होंने सरिया आदि से मारपीट की . मैं बच कर भागा व शोर मचाया तो शोर पर जगदीश S/O सतवीर निवासी नंगला मुबारिकपुर , सोमपाल सिंह S/O जगदीश निवासी सिखेड़ा व सर्वेंदर उर्फ कालू S/O इलम सिंह निवासी सिखेड़ा गवाहान आ गये जिन्होंने यह घटना देखी है . ये लोग इन लोगों को मारते रहे जब तक वह मर नहीं गए , और हम गवाहान को मारने की धमकी दी .
इस दौरान कलवा पुत्र मेघा की उसी के साथियों के हथियारों से चोट आयी थी जिसे वह उठा कर ले गए . उन लोगों के भय व डर के कारण जनता के लोगों ने अपने दरवाजे बंद कर लिए दुकानदारों ने अपने शटर व दुकाने बंद कर लिए राहगीर भी भाग खड़े हुए . दोनों लाश मौके पर पड़ी हैं . रिपोर्ट दर्ज़ कर कार्यवाही करने की कृपा करें .
प्रार्थी
रविन्द्र कुमार S/O तिलकराम जाति जाट
निवासी मलिकपुरा माजरा कवाल थाना जानसठ जिला मुज़फ्फर नगर
फोन ९९५५१८२८६८३
लेखक -अमित कुमार निवासी सिखेड़ा थाना




Wednesday, October 30, 2013

हॉलोकास्ट



साम्प्रदायिकता और मूर्खता कितनी खतरनाक हो सकती है , इसका एक उदहारण पिछली शताब्दी में हुए जनसंहार से देखा जा सकता है।

हिटलर ने एक करोड़ से भी  ज़यादा अपने ही देश के निर्दोष लोगों का क़त्ल करवाया। 

हिटलर ने कत्लों का जो सिलसिला चलाया था उसे हॉलोकास्ट का नाम दिया गया था जिसका अर्थ होता है सेक्रीफाइस बाय फायर ,अर्थात ''अग्नि में आहुति''   . 

चुनाव जीतने के बाद हिटलर ने अपने ही देश के यहूदियों , जिप्सी आदिवासियों , समलैंगिकों और अल्पसंख्यक ईसाई समूह के सदस्यों की हत्याएं करनी शुरू कर दीं। 

ये हत्याकांड सन उन्नीस सौ तेंतीस से उन्नीस सौ पैंतालीस तक चलता रहा। 

इस जनसंहार को हिटलर की  नाज़ी पार्टी के लोग ''अंतिम उपाय '' के नाम से बुलाते थे। 

भारत में भी इस खूनी हिटलर को अपना आदर्श मानने वाला धर्मांध समूह है , जिसका नाम ''राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है।'' 

हिटलर की तरह ही ये संघी गिरोह  भी मानता है कि भारत के उच्च वर्णीय ब्राह्मण पुरुष ही भारत पर शाषन कर सकते हैं ।  इसके अलावा बाकी लोग अशुद्ध और हीन या मलेच्छ हैं।  

ये संघी  गिरोह भी इस इंतज़ार में है कि ये कब सत्ता पर पूरा कब्ज़ा हासिल करें ताकि सेना की मदद से अशुद्ध रक्त वाले करोड़ों लोगों की हत्या करी जा सके। 

अब इस संघी गिरोह ने नरेंद्र मोदी को सत्ता प्राप्ति का औज़ार बनाया है। 

हिटलर ने जिस तरह नारा दिया था कि ये यहूदी हमारी नौकरियां खा रहे हैं , इसी तरह अब मोदी विकास के नारे के बहाने से सत्ता प्राप्ति की कोशिश में लगा हुआ है। 

लेकिन याद रखिये अवैज्ञानिक और क्रूर मानसिकता के साथ यदि सत्ता भी साथ में आ जाय तो बात कितनी खतरनाक हो सकती है ?


Tuesday, October 29, 2013

इन्साफ मांगने वाले पर ही हमला कर दिया


सोनी सोरी पर सरकार ने आठ फर्जी मुकदमे बनाए थे . जिनमे से पांच मामलों में सोनी सोरी को कोर्ट ने निर्दोष घोषित कर दिया है .एक मामले में सोनी सोरी को कोर्ट ने ज़मानत दे दी है . एक मामले को दाखिल दफ्तर किया जा चूका है . अब एक ही मामले में सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी जेल में कैद हैं .

सरकार ने एक राजपूत कांग्रेसी नेता के घर पर हमला करने के में फंसा कर सोनी सोनी सोरी , लिंगा कोडोपी और सोनी सोरी के पति अनिल फुटाने को जेल में डाल दिया .

लेकिन बाद में कोर्ट ने इन तीनों को निर्दोष मान कर इस मामले में भी बरी कर दिया .

सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी पर अब बचा हुआ आख़िरी मामला इतना हास्यापद है कि सरकार पर हंसी आती है . 

पुलिस के मुताबिक़ ''एस्सार कम्पनी का एक ठेकेदार बीके लाला बाज़ार में पन्द्रह लाख रूपये लेकर पहुंचा . बाज़ार में सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी पहुंचे और ठेकेदार बीके लाला ने सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी को पन्द्रह लाख रूपये दिए तभी पुलिस ने बीके लाला और लिंगा कोडोपी को पकड़ लिया और सोनी सोरी भाग गयी .''

बाद में फोन पर पुलिस अधिकार ने स्वीकार किया कि असल में ये पूरा मामला फर्जी है और पुलिस का ही बनाया हुआ है . पुलिस अधिकारी के इस फोन की स्वारोक्ति का का पूरा वीडियो तहलका की वेबसाईट पर मौजूद है . 

लेकिन अगर यहाँ कुछ देर के लिए पुलिस की कहानी को सच भी मान लिया जाय तो भी कोई पुलिस की इस फर्जी कहानी को कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता .

१- पुलिस का कहना है कि ठेकेदार बीके लाला ने लिंगा कोडोपी और सोनी सोरी को पन्द्रह लाख रूपये दिए 
- लेकिन पुलिस की चार्ज शीट में नगदी लिंगा कोडोपी के पास से ज़ब्त नहीं हुई है . सीजर मेमो में नगदी ठेकेदार बीके लाला के पास से ज़ब्त दिखाई गयी है .
- पुलिस भी मानती है कि पैसा बीके लाला का अपना था .
- पुलिस भी मानती है कि पैसा बीके लाला के पास से ही ज़ब्त हुआ .
- तो अपना पैसा अपने पास से ही ज़ब्त होने में कौन सा जुर्म हुआ ?
- पुलिस की कहानी को सच मान भी लें तो भी कोई जुर्म तो हुआ ही नहीं .
- इस कहानी के समर्थन में पुलिस में सिपाहियों को गवाह के रूप में पेश किया है . इन सिपाहियों के बयान में भी घटना स्थल पर सोनी सोरी के मौजूद होने की बात नहीं लिखी हुई है .
- असल में महीने भर बाद जब पुलिस ने सोनी सोरी को दिल्ली में आकर पकड़ा था , उसके बाद इस मामले में सोनी सोरी का नाम जोड़ा गया . 
- पुलिस के सिपाहियों से एक महीने भर बाद सिपाहियों से एक दूसरा बयान लिखवाया गया जिसमे इन पुलिस वालों से लिखवाया गया कि घटना स्थल पर सोनी सोरी भी मौजूद थी .

- हांलाकि इस तरह से पुलिस वालों का दो बार बयान बदलना गैर कानूनी है .

इस तरह के पूरे फर्जी मामले में फर्जी तरीके से सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी को जेल में बंद कर के रखा हुआ है .

इस पूरे फर्जी मामले में फंसा कर सोनी सोरी को थाने में प्रतारणा दी गयी , सोनी सोरी के पति को जेल में पीट पीट कर अधमरा कर के जेल से बाहर किया गया जिससे सोनी सोरी के पति की मौत हो गयी .

सोनी सोरी के पूरे परिवार को तबाह कर दिया गया .

ये सब इसलिए हुआ क्योंकि सोनी सोरी ने इन्साफ के लिए अपनी आवाज़ उठाई थी .

इन्साफ तो मिला नहीं . बदले में सरकार ने इन्साफ मांगने वाले पर ही हमला कर दिया .

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शुक्रवार को इस मामले में ही सोनी सोरी और लिंगा कोडोपी की ज़मानत पर जेल से रिहाई के लिए सुनवाई की जानी है .





Friday, October 25, 2013

I have seen many burnt villages in my life




There was not even a tinge of rancor as these folks recounted the horrors visited on them matter-of-factly. While talking to them, I felt embarrassed of being a Hindu. The police, the media, and the administration, all of them despise these poor Muslims. I was sitting in a relief camp of Muslim victims of communal violence. Their houses were burnt. Their parents were put to the sword, and then burnt. After the attack, they had to flee their village. Some Muslim organizations have given them shelter. That is why they are still alive. It is hard to believe that all this happened in the "Shining India" of 2013. 

Temporary camps for poor Muslim laborers are ubiquitous. These people are forced to live in abominable conditions, right next to pits of polluted water whose stench is unbearable. Their houses have been burnt. As if this was not punishment enough for being a Muslim, the Government has filed a case against them for daring to live in these camps (?).

I have seen quite a few burnt villages in my life. I have seen burnt Adivasi villages. I have seen burnt Dalit villages. I have seen burnt villages of poor lower caste Muslims. Why is it that after Independence, we have been mercilessly attacking Dalits, Adivasis, and Muslims? If you visit Muzaffarnagar and talk to people there, it becomes transparent that these riots were planned. Hundreds of thousands of innocent lives were destroyed. When you talk to people, it becomes obvious that the riots were engineered by Narendra Modi and his henchman Amit Shah. Around 6 months ago, Modi had sent an erstwhile Home Minister of his Government, Amit Shah, to Uttar Pradesh. Ironically this very Home Minister was imprisoned at the time for having incited riots in Gujarat. This very Minister was freed on bail, and unleashed on the unsuspecting population of Uttar Pradesh. His mission: to stoke the embers of hate, and to help Modi win the upcoming elections. With the help of three MLAs (Members of Legislative Assembly), Amit Shah started his opening gambit by distributing swords in Western Uttar Pradesh. As a result, armed with these swords and full of swagger, Hindu youths would start frequenting Muslim neighborhoods. They would also enter the mosques, terrorize the muezzin, and stop theazaan (the Islamic call to prayer). The three Bharatiya Janata Party (BJP) MLAs would start demonstrations against Muslims on the flimsiest of pretexts. Muslim men would be constantly harassed and insulted during these BJP-engineered demonstrations. An atmosphere of extreme hatred against Muslims was and is being created. Rumors were being deliberately spread that Muslims had been luring Hindu girls into marrying them. But when you ask people to give examples, they can only come up with a two-year-old case. That is, the reason the poor Muslims must suffer is because one Muslim had married a Hindu girl two years ago. 

In Western Uttar Pradesh, the Hindu vote is divided among five parties, Ajit Singh's party, Congress, Bahujan Samaj Party (BSP), Samajwadi Party (SP), and BJP. BJP's calculation is that in order to consolidate this Hindu vote in favor of the BJP, Hindus must be incited against Muslims. The plan was put into action with extreme cunning. The riots happened exactly according to this plan. Innocent Muslims were killed. These Muslims were sacrificed at the altar so that Modi could become the Prime Minister. Modi and his gang have tried to replicate what Hitler did. Hitler killed six million Jews because according to him Jews were the root of all evil and the reason that Germany was in the doldrums. That is, the victim is the culprit. In India, BJP folks kill Muslims, and then accuse them of causing trouble. If the BJP and its acolytes do not stop this dangerous and dirty game, then I am afraid they will pose a big danger to the unity of this country. 

Sunday, October 20, 2013

Bhuttu


Bhuttoo is thirty years old. He is a resident of the village of Lisad,  Muzaffarnagar. He awoke to some commotion early morning one day, and went outside to find that Muslim neighborhoods were being set ablaze. Everyone was running in panic. Bhuttoo yelled out to his wife and exhorted her to flee. Bhuttoo's wife cuddled their one-year-old daughter, carried her in her lap and readied herself. Bhuttoo took their four-year-old son in his arms, and along with his wife ran towards the fields. Using the sugarcane crop as their cover, they hid themselves in the fields. Running from one field to another, they were trying to escape the grim predicament they found themselves in. They exhausted themselves after running incessantly. Bhuttoo's daughter was crying inconsolably from acute hunger. Bhuttoo volunteered to venture outside to look for milk for their children. However, his wife insisted that she would also come along. With trepidation writ large on their faces, Bhuttoo and his wife came out of the field. No sooner had they come out than someone yelled out loud, "Look! The mullahs [pejorative for Muslims] are hiding here!" Bhuttoo and his wife quickly retreated into the field again. 

Their retreat was in vain, however. They heard approaching footsteps from all directions. Surrounded by all sides, they had no escape route. The attackers were armed with swords, axes, and sticks. Bhuttoo and his wife were trembling with fear. Rioters forced them out of the field, and then one of them attacked Bhuttoo's son Zuber with his sword. Since Bhuttoo was trying to shield his son, the sword landed first on Bhuttoo's hand, and then on Zuber's ear. Zuber's face was covered with blood. Another stick-wielding attacker hit Bhuttoo's wife Ayesha on her back. She fell down and was knocked unconscious. Her daughter was flung from her lap, and landed some distance away. Bhuttoo ran to save his wife and daughter. Right then, he found himself being attacked from all sides. Someone assaulted him from behind with an ax. Then he was struck on the head. Someone else hit his leg with an iron rod. Bhuttoo fell down unconscious. Thinking Bhuttoo and his family were all dead, the attackers left. 

After an hour or so, when Bhuttoo came to, he saw his wife, with their daughter in her lap, crying inconsolably. Zuber was still unconscious. Bhuttoo was afraid his son might die soon. He instructed his wife to run. He took his son in his lap, and holding his wife's hand, again using the sugarcane crop in the fields as cover, he started advancing. It was getting dark. After ensconcing his family in the field, Bhuttoo went foraging for food. At one end of the field was a watering hole. He plucked a leaf, made a little cup, and caught some water in it, and went back to his family. He sprinkled some water on his son's face. Zuber whimpered a little, and opened his eyes. Bhuttoo helped his daughter drink some water. Bhuttoo and his wife then walked all night, while holding their children in their laps. At the break of dawn, they saw the lights of the town of  Kandhla. Bhuttoo was familiar with Kandhla. He called his college-going relative from the bus station, who came to pick them up on his motorcycle, and brought them to the relief camp at the Idgah [an open place in the front of a mosque]. When I last went to Kandhla, I visited Bhuttoo. I was impressed by his fortitude, and took an immediate liking to him. He was simply adorable. I asked him how his son was doing. Bhuttoo said his son still has nightmares, and mumbles in his sleep, "Daddy! Thieves are attacking me." Bhuttoo also said that he would never return to his village, since the people who attacked him and his family know them well.
(Translation Sanjeev Mahajan- San Francisco)

Three members of my family including horse


Yesterday we were sanctimonious about the cruelty of Muslims who butcher goats during Eid Al Adha. We were boasting how, by contrast, ours was a religion of tolerance and non-violence.
But in the light of the following incident, let us reevaluate how tolerant and kind we are.

Baro is fifty years old. He hails from Lisadh in the district of Muzaffarnagar. Baro told me that three family members were killed. One of them was his ninety-year-old mother-in-law, Chhoti. Another was his seventy-year-old brother-in-law, Hakeemo. And the third was his horse, Dhaula.

Baro's mother-in-law and brother-in-law were killed by sword-wielding attackers, who then burnt them. They then knifed the horse who died right there. Then they burnt the house.

When I heard this, I thought that Muslims kill animals to eat them, but the killers of Baro's horse did not even eat it. If they did not wish to eat, why did they kill it?

But we are being told that this is religion. Hindus of India are eager to anoint the doyen of this mindless violence [Narendra Modi] the Prime Minister of India. To acquiesce in such insanity would itself be insane. Thus I have no choice but to raise my voice against such madness.
(Translation Sanjeev Mahajan- San Francisco)

Thursday, October 17, 2013

बकरों की भी शिकायत

गुलाब की मां का नाम ज़रीफो था। मुज़फ्फर नगर के  लिसाढ़ गाँव में आठ सितम्बर को दंगा शुरू हुआ. भीड़ ने बस्ती पर हमला किया।  साढ़े तीन सौ घर जला दिए गए। तेरह लोगों का क़त्ल कर दिया गया।

गुलाब की मां भी दंगों में गायब हो गयी।  दंगे के अगले दिन पड़ोस के गाँव मीमला के बाहर , नहर के पास , एक बाग़ में पांच लोगों की लाशें मिलीं।  गाँव वालों ने थाने को सूचना दी।  थानेदार साहब सिपाहियों को लेकर आये।  लाशों को देखा और कहा की सब लोग अपने अपने घर जाओ अब शाम हो गयी है।  कार्यवाही कल होगी।  गाँव वालों ने सुबह उठकर देखा तो पाँचों लाशें गायब थीं।

दो दिन बाद बडौत के पास दो लाशें बड़ी नहर में मिलीं। लोगों ने नज़दीकी थाने को सूचित किया। दोनों लाशों का पोस्ट मार्टम करवा कर दफना दिया गया।

किसी ने गुलाब को बताया कि बडौत थाने  में दो लाशें हुई हैं।  गुलाब ने अपने दोस्त गुलशेर को साथ लिया।  गुलशेर के बूढ़े पिता सुक्कन भी दंगों में गुम हो गए थे।

थाने वालों ने बताया की हाँ एक बूढ़े मर्द और एक बूढ़ी औरत की लाश मिली थी।  हमने उनके कपड़े शिनाख्त के लिए रखे हुए हैं।

कपड़े गुलाब की मां और गुलशेर के पिता के ही थे।

गुलाब कुल छह भाई हैं। सब मिल कर घोड़ों का धंधा करते थे।  जलालाबाद में कुछ दिनों बाद मेला होने वाला था।  मेले में बेचने के लिए भाइयों ने मिल कर चौदह घोड़े खरीदे थे।
दंगों में घोड़े भी गायब हो गए।  घोड़ों की कीमत करीब दस लाख थी।  तीन भैंसें थीं और पांच बकरे थे। कई बुग्गियां भी जला दी गयीं।

मैं ये सब सुन रहा था।  मेरा दिमाग बस्तर के आदिवासियों के बारे में सोचने लगा।  वो आदिवासी भी जब अपने ऊपर हुए पुलिसिया हमले के बारे में बताते थे तो आदिवासी भी मुझे अपनी लूट ली गयीं गायों , बकरियों , मुर्गियों और अण्डों की संख्या बताते थे।

मैं पुलिस को भेजी जाने वाली चिट्ठी में ये सब लिख देता था।  मेरी हंसी उड़ाते हुए एक बार दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक राहुल शर्मा ने अरुंधती रॉय से कहा था की हिमांशु जी तो बकरों की भी शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से करते हैं।

अब आप ही मुझे बताइये घोड़ों और बकरों के मारे जाने की शिकायत मैं किससे करूँ ?

खैर यहाँ तो इंसानों की लाशों को ही इधर से उधर फेंका जा रहा है।

जागो भारत जागो। 

घोड़े समेत घर के तीन लोग



कल बकरा ईद पर हम मुसलमानों द्वारा बकरे काटे जाने को क्रूरता बता रहे थे।  हम अपने धर्म को बड़ा सहिष्णु और अहिंसक बता रहे हैं। 

लेकिन ज़रा इस घटना के प्रकाश में अपनी दयालुता को फिर से परखिये। 

बारो पचास साल की है।  गाँव का नाम लिसाढ़ , ज़िला मुज़फ्फर नगर। बारो ने मुझे बताया की मेरे परिवार के तीन लोगों को मार दिया।  एक मेरी सास जिसका नाम छोटी था और उसकी उम्र नब्बे साल थी। दूसरा मेरा जेठ था जिसका नाम हकीमू और उम्र सत्तर साल थी। और तीसरा मेरा घोडा था जिसका नाम धौला था। 

बारो की सास और जेठ को तलवार से मार कर घोडा बुग्गी  पर डाल कर जला दिया गया । घोड़े को छुरा मार दिया वो वहीं बंधे बंधे मर गया।  फिर घर में आग लगा दी गयी।  

मैं ये सब सुनते हुए सोच रहा था कि मुसलमान तो खाने के लिए जानवरों को मारते हैं लेकिन बारो के घोड़े को तो मारने वालों ने खाया भी नहीं। अगर खाना नहीं था फिर घोड़े को क्यों मारा ?

लेकिन हमें बताया जा रहा है कि यही धर्म है।  इस बेदिमाग हिंसा के सरदार को भारत के हिन्दू अपना अगला प्रधानमंत्री बनाने को आतुर हैं। 

मुझे पता है कि इस पागलपन और हिंसा के पक्ष में खड़े होने के लिए मुझे कितना पागल बनना पड़ेगा। 

लेकिन अगर मैं अपने दिमाग का इस्तेमाल करता हूँ तो इस पागलपन के खिलाफ आवाज़ उठाने के अलावा मेरे सामने कोई रास्ता नहीं है। 
 

धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो

धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो 

अभी खबर आयी है की भारत का स्थान दुनिया भर में  भुखमरी में सबसे नीचे है।  देश के लोगों के भूखे मरने के मामले में पकिस्तान भी हमसे आगे निकल गया है।  यानी पकिस्तान में कम लोग भूख से मरते हैं और भारत के ज्यादा लोग भूख से मरते हैं। 

आज़ादी के बाद भारत का क्या धर्म होना चाहिए था। क्या ये कि किसी जगह पर राम मन्दिर बनेगा या बाबरी मस्जिद ?

या कि भारत के लोगों का पहला धर्म यह होना चाहिए था आजादी के बाद इस भूभाग में सबको कम से कम खाने को तो मिले।  

इसे ठीक से समझिये। 

हम एक समाज हैं।  हम इसलिए ही सुख से हैं और जिंदा हैं क्योंकि हम समाज में हैं।  अकेले हमें जंगल में छोड़ दिया जाय तो ना तो आप अपने लिए स्वादिष्ट भोजन की व्यवस्था कर पायेंगे न आरामदेह आवास की ना कपडे की ना शिक्षा की।  

इसलिए हमारा पहला धर्म यही है कि यह समाज बना रहे।और  समाज के बचे रहने की पहली शर्त यह है कि इसमें किसी को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उसके साथ किसी कारण अन्याय हो रहा है। लेकिन अगर हम समाज के लोगों को इसलिए सताएं क्योंकि वो किसी ख़ास मजहब के हैं और संख्या में कम हैं।  गर हम समझते हैं कि हम किसी ख़ास जाति के लोगों की इसलिए हत्याएं कर सकते हैं क्योंकि यह जाति तो राजनैतिक तौर पर कमज़ोर है और अदालतें तो हमारे मजबूत राजनैतिक हैसियत के कारण हमारा कुछ बिगाड़ नहीं सकती।  तो फिर जब हम समाज के लोगों से अन्याय करते हैं तो उससे समाज में असंतोष पैदा होता है। 

अभी दो खबरें हमारे सामने हैं।  मुज़फ्फर नगर में दंगा और बिहार में अट्ठावन दलितों के हत्यारों को उच्च न्यायालय द्वारा छोड़ दिया जाना। 

इन दोनों घटनाओं में से किसमें धर्म है?  इन दोनों घटनाओं में से किस से इस भारत भूभाग का लाभ होगा। 

अगर भारत की अदालतें समाज के कमज़ोर लोगों की हत्याओं पर न्याय नहीं देंगी।  अगर हमारे साथ रहने वाले किसी ख़ास अल्पसंख्या के नागरिकों की बस्तियां जलाई जाती हैं।  तो यह हमारे राष्ट्रीय धर्म से मेल खाता है क्या ? 

क्या धर्म का अर्थ अपने से अलग विश्वास के व्यक्ति को जिंदा ही ना रहने देने का नाम है ? 

धर्म के बिना मनुष्य जानवर से भी गया बीता है।  इसलिए अपना धर्म पहचानिए , एक नागरिक के नाते आपका क्या धर्म है , एक व्यक्ति की नाते आपका क्या धर्म है ? 

अधर्म को धर्म मत कहिये वरना आप मिट जायेंगे। 

असत्य मिट जाता है सत्य बचा रहता है। 

धर्म को पहचानिए धर्म का पालन कीजिये।
 
अधर्म से मूंह मोड़िये। 


Wednesday, October 16, 2013

भुट्टू


भुट्टू तीस साल का है . गाँव लिसाड जिला मुज़फ्फर नगर में रहता है  . गाँव में सुबह सुबह हल्ला शुरू हुआ तो भुट्टू ने घर से बाहर निकल कर देखा कि मुसलमानों की बस्ती में घरों में आग लगाईं जा रही है . सब लोग भाग रहे थे . भुट्टू ने अपनी पत्नी से चिल्ला कर कहा जल्दी से भाग चल . भुट्टू की पत्नी ने साल भर की सोई हुई बेटी को छाती से लगाया और भुट्टू के साथ आकर खड़ी हो गयी .भुट्टू ने अपने चार साल के बेटे को उठाया . और पत्नी का हाथ पकड़ कर खेतों की तरफ भागा .
गन्ने की फसल खेतों में खड़ी थी . भुट्टू और उसकी पत्नी गन्ने के खेतों में घुस गए . वे दोनों एक खेत से दुसरे खेत से होते हुए उस इलाके से निकलने की कोशिश कर रहे थे . 
काफी देर खेतों में भागने के बाद पति पत्नी की सांस फूल गयी . भुट्टू की एक साल की बेटी भूख से रो रही थी . भुट्टू ने पत्नी से कहा कि मैं बाहर निकल कर देखता हूँ , शायद आस पास कहीं दूध मिल जाय .दोनों बच्चों को पिला देंगे .
भुट्टू की पत्नी ने भुट्टू का हाथ पकड़ लिया . उसने कहा मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगी . भुट्टू और उसकी पत्नी डरते डरते गन्ने के खेत से बाहर निकले . तभी कोई जोर से चिल्लाया ' ओ देखो मुल्ले लोग यहाँ छिपे हुए हैं '' भुट्टू और उसकी पत्नी बचने के लिए भाग कर वापिस गन्ने के खेत में घुस गए . 
लेकिन चारों तरफ से लोगों के पैरों की आवाजें आने लगीं थी . किसी ने चिल्ला कर कहा 'ये रहे वो लोग '. उन लोगों के हाथों में तलवारें , फरसे और लाठियां थीं . 
भुट्टू और उसकी पत्नी डर कर काँप रहे थे . दंगाइयों ने भुट्टू और उसकी पत्नी को खेत से बाहर निकाला . खेत से बाहर निकलते ही एक आदमी ने भुट्टू के चार साल के बेटे जुबेर पर तलवार चला दी . तलवार भुट्टू के हाथ पर लगी . लेकिन तलवार का अगला हिस्सा भुट्टू की गोद में पकडे हुए बेटे के कान में लगा . चार साल के के जुबेर का चेहरा लहुलुहान हो गया . एक आदमी ने भुट्टू की बीबी की पीठ पर जोर से लाठी मारी .भुट्टू की पत्नी आयशा बिना आवाज़ किये ज़मीन पर गिर गयी . आयशा की गोद की एक साल की बेटी दूर जा गिरी . भुट्टू अपनी पत्नी को बचने के लिए दौड़ा . तभी भुट्टू के सर पे पीछे से किसी ने फरसे से वार किया . भुट्टू लहुलुहान हो गया . भुट्टू के सर पर एक वार और हुआ . किसी ने भुट्टू के पाँव में जोर से लोहे की राड से हमला किया . भुट्टू बेहोश होकर ज़मीन पर गिर गया .
दंगाइयों को लगा कि भुट्टू का पूरा परिवार मर गया है . वे लोग भुट्टू के परिवार को वहीं छोड़ कर चले गए . करीब एक घंटे बाद .भुट्टू को होश आया . उसने देखा उसकी पत्नी बेटी को गोद में लेकर पास में बैठ कर रो रही है . चार साल का जुबेर अभी भी बेहोश था . भुट्टू को डर लगा कि शायद उसका बेटा मर जायेगा .
भुट्टू ने अपनी पत्नी से कहा चल भाग . भुट्टू ने बेहोश बेटे को गोद में लिया पत्नी का हाथ पकड़ा और फिर से गन्ने के खेतों में छिप कर आगे बढ़ने लगा  . अब शाम का अधेंरा होने लगा था . भुट्टू ने अपनी पत्नी और बच्चों को खेत में बैठाया और बच्चों के लिए कुछ खाने के लिए खेत से बाहर निकला .
खेत के कोने में एक गड्ढे में कुछ पानी था .भुट्टू ने उसमे से पत्ते के दोने में पानी लिया और पत्नी और बच्चों के पास आया . बेटे के मुंह पर पानी छिड़का . बेटा जुबेर कुनमुनाया और उसने आँखें खोल दीं . बच्ची को पानी पिलाया . अब भुट्टू ने सारी रात चलने का फैसला किया . भुट्टू और उसकी पत्नी सारी रात बच्चों को गोद में लेकर खेतों में छिपते हुए आगे बढते रहे . सुबह होने को थी . अब उन्हें कांधला कसबे की लाइटें दिखाई देने लगीं . भुट्टू कांधला से परिचित था . उसने बस अड्डे की एक दूकान से अपनी जान पहचान के कालेज में पढ़ने वाले एक रिश्तेदार को फोन किया . वो मोटर साइकिल लेकर आया . उस लड़के के साथ भुट्टू सपरिवार कांधला में ईदगाह में बनाये गए राहत शिविर में आ गया . 
मैं पिछली बार कांधला गया तो भुट्टू से मिला . वो मुझे बड़ा प्यारा सा इंसान लगा . मैंने पूछा आपका बेटा अब कैसा है . भुट्टू ने कहा कि वो अभी भी नींद में कहता है कि "अब्बा जी चोर मार रहे हैं ".
भुट्टू कहता है अब मैं कभी अपने गाँव वापिस नहीं जाऊँगा . मुझे उन्होंने मारा जो मुझे अच्छी तरह जानते थे .
  

Monday, October 14, 2013

राक्षस


आज हम सब जानते हैं की राक्षस असुर और दानव आदिवासी दलित और भारत के मूल निवासी थे ।  जिन्हें आर्यों ने मारा था।

लेकिन आपको क्या बताया गया है ?

यही ना कि राक्षसों, दानवों और असुरों  को इसलिए मारा गया क्योंकि वो काले होते थे , उनके सींग होते थे , उनके बड़े बड़े दांत होते थे।  वो क्रूर होते थे , वो पवित्र यज्ञ की अग्नि को बुझा देते थे।राक्षस दानव और असुर मांस खाते थे शराब पीते थे और हाहाहा कर के हँसते थे। इसलिए हमारे देवता इन असुरों , दानवों और राक्षसों को मार देते थे।

और हमारे देवता गोरे होते थे , वो बिलकुल हमारी तरह शांत , सुंदर पवित्र होते थे।  देवता हमारी तरह सिर्फ मोहक ढंग से मंद मंद मुस्कुराते थे।  देवता हमारी यज्ञ की अग्नि की रक्षा करते थे। देवता सुगन्धित ,फूलों पर चलने वाले, स्वर्ण आभूषण पहने, फल खाने वाले , सुंदर संगीत प्रेमी मधुर सौम्य और रमणीय होते थे।  

कुछ समय बाद जब मैं मर जाऊंगा।  और आपको सोनी सोरी के ऊपर हुए अत्याचारों और हमारी अपनी पुलिस की क्रूरता के बारे में बताने वाला कोई नहीं होगा।  तब पुलिस की मालिक सरकार अपने इतिहास में लिखेगी की ''सोनी सोरी एक क्रूर और हत्यारी नक्सली आतंकवादी थी।  वह छोटे बच्चों को भी मारती थी।  वह हत्याएं करने के बाद हाहाहा कर के हंसती थी।  इसलिए हमारे एक बहादुर पुलिस के देवता जैसे आफिसर अंकित गर्ग ने अपनी जान हथेली पर रख कर उस राक्षसनी सोनी सोरी को दंड दिया जिससे सोनी सोरी के क्रूर कर्म रुक गए और प्रजा शांती से रहने लगी।  पवित्र आत्मा अंकित गर्ग को इस वीर कर्म के लिए भारत पुण्य भूमि के तत्कालीन राष्ट्रपति ने वीरता पदक देकर सम्मानित किया।''

असल में आपकी स्मृति में हमेशा विजेताओं की कहानियाँ डाली जाती हैं , इसलिए आपका मस्तिष्क खुद को विजेता प्रजाति का मानने लगता है।

हारी हुई प्रजाति की कहानियों में निराशा , ग्लानी और शोक होता है .

इसलिए आप खुद को हार की कहानियों वाली प्रजाति से जोड़ना नहीं चाहते।

यही कारण है की आज भी करोड़ों दलित और आदिवासी भी खुद को भारत की आक्रामक और हत्यारी परम्परा से जोड़ने में फक्र महसूस करते हैं।  ताकि वे भी एक गर्व भाव से जी सकें।

खुद सोचिये आपके दिमाग में कितना सच ज्ञान है और कितना कचरा है ?

और क्या आप सच में सत्य जानना चाहते हैं ? या आप झूठे गर्व भाव से भरे रहना चाहते हैं और सच बोलने वाला आपको अपना शत्रु लगता है ?

आपका झूठा गर्व भाव आपकी प्रगति में बाधा है। इससे मुक्त हुए बिना आप एक समता युक्त सुखी संसार बना ही नहीं सकते।



Thursday, October 10, 2013

शहनाज़


मुज़फ्फर नगर में दंगा पीड़ित मुसलमानों के कैम्प में घूम रहा हूं . 

कहा जा रहा है कि ये हिंदु मुस्लिम दंगे हैं , लेकिन सारे कैम्प सिर्फ मुसलमानों के ही क्यों हैं ? 

एक भी हिंदु दंगा पीड़ित शिविर नहीं है . 

ये बदमाशी ठीक नहीं है .

फुगाना गाँव की पांच मुसलमान लड़कियों से मिला . 

इनके साथ पिछले महीने दंगों में बलात्कार किया गया . 

इन्होने नामज़द रिपोर्ट लिखाई है . लेकिन बलात्कारी खुलेआम घूम रहे हैं .

कोई गिरफ्तारी अभी तक नहीं हुई है .

फुगाना गाँव के ही अल्ताफ की पांच साल की बेटी सानिया दंगों में गुम हो गयी है . 

अल्ताफ ने मुझे एक तरफ ले जाकर पूछा कि क्या मैं उसकी खो चुकी बेटी को वापिस दिलवा सकता हूँ ?
मैं ही जानता हूँ कि अल्ताफ के सामने मैंने अपनी रुलाई कैसे रोकी थी .

हडौली गाँव की बूढ़ी हफीज़न का अट्ठारह साल का बेटा आसमुह्म्मद भी दंगों के बाद से नहीं मिल रहा है.

हफीज़न ने भी कहा है कि उसके बेटे को खोजने में मैं भी मदद करूँ .

फुगाना गाँव के दिलशाद का बीस साल का जवान भाई शफीक भी दंगे में गुम हो गया है .

आठ सितम्बर को फुगाना गाँव में मुसलामानों के तीन सौ घर जलाए गए . दो लोग क़त्ल किये गए .

पांच सौ मुसलमान परिवार फुगाना गाँव से जान बचा कर निकले और अपने ही देश में शरणार्थी बना दिए गए.

कैम्प में रहने को मजबूर मुसलमान क्रोधित नहीं है . मैंने इनकी आँखों में कोई गुस्सा या बदले का कोई भाव नहीं देखा .

लेकिन ये लोग हैरान ज़रूर हैं . हैरानी इस बात पर कि हमने तो कोई गुनाह नहीं किया . फिर हम पर ये ज़ुल्म क्यों किया गया ?

इन्हें बेचारे गाँव के मुसलमानों को क्या पता कि मोदी को प्रधान मंत्री बनाने के लिए मुसलमानों की जिंदगी पर हमले कितने ज़रूरी हैं

वख्त निकाल कर एक बार आप लोग भी इन लोगों से मिलने आइये .

आपके सोचने का तरीका बदल जायेगा .


मुज़फ्फर नगर के गाँव 'लाख' में आठ सितम्बर को मुसलमानों की बस्ती में आग लगा दी गयी . ग्यारह मुसलमानों को मार दिया गया .
फुगाना गाँव में दंगाइयों द्वारा मुकीम के घर के दरवाज़े धम धम पीटे जाने लगे .

मुकीम अपनी तीन बेटियों और अपनी पत्नी के साथ घर में ही था .

जान बचाने के लिए मुकीम और उसकी पत्नी अपनी तीनों बेटियों को लेकर घर के पिछले दरवाज़े से निकल कर खेतों की तरफ भागे .

दो बेटियों को मुकीम और उसकी पत्नी ने गोद में उठाया हुआ था .

चौदह साल की बड़ी बेटी शहनाज़ सबसे पीछे थी .

पूरा परिवार तेज़ी से भाग रहा था .

तभी बड़ी बेटी शहनाज़ गिर पड़ी .

मुकीम और उसकी पत्नी ने देखा शहनाज़ के पास तलवारें लेकर गाँव के लड़के पीछा करते हुए पहुँच चुके थे .

उन्होंने शहनाज़ के कपडे फाड़ने शुरू कर दिए थे .

मुकीम जानता था कि रुकने का मतलब पूरे परिवार की मौत है .

मुकीम ने अपनी पत्नी से कहा भाग .

शहनाज़ चिल्लाती रही अब्बा मुझे बचा लो मुझे छोड़ कर न जाओ .

लेकिन मुकीम नहीं रुका .

शहनाज़ फिर कभी नहीं मिली .

आज मुझे मुकीम मिला था .

वह मुझे पुलिस में की गयी शिकायत दिखा रहा था .

उसने पुलिस को दंगाइयों के नाम भी लिखवाये हैं .

आज तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है .


नूरदीन की उम्र नब्बे साल है .

वो कह रहे थे मैंने बंटवारा देखा था .

अब ये पागलपन फिर से जाग गया .

नूरदीन अपने परिवार के साथ नहीं भाग पाये .

फुगाना गाँव की मुसलमानों की पूरी बस्ती वीरान हो गयी थी .

नूरदीन घर में अकेले रह गये थे .

दंगाइयों में से किसी ने कहा कि इसे क्या मारना ये तो भूख से ऐसे ही मर जायेगा .

नूरदीन बारह दिन अपने घर में अकेला बंद रहे .

नूरदीन को घर में पोते के थैले में भुने हुए चने मिले.

नूरदीन के दांत नहीं हैं इसलिए वह चनों को सील पर पीस कर खाते रहे . बारह दिन के बाद उनके घर वाले सीआरपीएफ के साथ आकर नूरदीन को निकाल कर लाये .

फुगाना गाँव का आसिफ लोई कैम्प में रहता है. आसिफ चार अक्टूबर को फुगाना गाँव में अपने जले हुए मकानों से अपना बचा हुआ सामान लेने गया था .

सीआरपीएफ और पुलिस वाले भी साथ में थे . गाँव के हिंदू जमा हो गए . आसिफ से कहा गया कि इस कोरे कागज पर दस्तखत कर तब तुझे सामान ले जाने देंगे .

आसिफ ने कहा कि कोरे कागज पर दस्तखत कैसे करूँ ? इस पर कुछ लिखिए तो सही .

आसिफ को पुलिस के सामने ही हिंदुओं ने इतना मारा कि उसका दांत टूट गया .

बच्चों के स्कूल के सब कागजात घरों में जल गए हैं . स्कूल जाना बंद है .

करीब अस्सी हज़ार मुसलमान राहत कैम्पों में और रिश्तेदारों के यहाँ पड़े हुए हैं . इनके वापिस जाने की अभी कोई सूरत नज़र नहीं आ रही है .

Sunday, October 6, 2013

मैंने अपनी जिंदगी में कई बार जले हुए गाँव देखे हैं


बिना किसी गुस्से या उत्तेजना के ये लोग ऐसी बातें बता रहे थे जिन्हें सुन कर दिल खराब होने लगता है .

ये लोग अपनी तकलीफें बता रहे थे . मुझे बात करते समय खुद के हिंदु होने पर शर्म आ रही थी . 

पुलिस मीडिया और प्रशासन भी इन गरीब मुसलमानों के बारे में नफरत दिखा रहा है .

मैं मुज्ज़फ्फर नगर में साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार पीड़ित मुसलामानों के राहत शिविर में बैठा था .

इन लोगों के घर जला दिये गये . इनके माता पिता तलवारों से काट कर जला दिये गये . 

इन्हें हमलों के बाद इन्हें अपना गाँव छोड़ कर भागना पड़ा .

कुछ मुस्लिम संगठनों ने इनके सिर छुपाने के लिये मदद करी है . इसी लिये ये सब अभी तक जिंदा हैं .

आप को विश्वास करना मुश्किल होगा कि क्या ये दो हज़ार तेरह का भारत है ?

गरीब मज़दूर मुसलमानों के अस्थाई शिविर आपके सामने फैले हुए हैं . 

गंदे पानी के गड्ढों के किनारे बदबू में हज़ारों लोग रहने के लिये मजबूर किये गये हैं .


इनके घर जला दिये गये हैं . अब इन पर सरकार ने इस जगह आकर बसने का मुकदमा बना दिया है .

मैंने अपनी जिंदगी में कई बार जले हुए गाँव देखे हैं .

मैंने आदिवासियों के जले हुए गाँव देखे हैं  .

मैंने दलितों के जले हुए गाँव देखे  हैं .

मैंने छोटी जाति के गरीब मुसलमानों के जले हुए गाँव देखे हैं .

क्या बात है कि आजादी के बाद हम दलितों , आदिवासियों और मुसलमानों पर हमला कर रहे हैं ?

अगर आप मुज़फ्फर नगर जाएँ . और लोगों से बात करें . तो आपके सामने एक बात साफ़ हो जाती है . कि इस बार दंगा बिल्कुल बनी बनायी योजना के मुताबिक ही हुआ .

बिना किसी गलती के लाखों जिंदगियों को तबाह किया गया है .

लोगों से बात करते समय आपके दिल में अमित शाह और मोदी की शातिर कारस्तानियाँ बिल्कुल साफ़ होती जायेंगी .

करीब छह महीने पहले मोदी ने अपनी सरकार के भूतपूर्व गृह मंत्री अमित शाह को उत्तर प्रदेश भेजा .
ये गृह मंत्री अपने ही राज्य में दंगा कराने के लिये जेल में पड़ा हुआ था . 

इस दंगाई मंत्री को  ज़मानत पर रिहा कराया गया . 

इस दंगाई मंत्री को मोदी के चुनाव जीतने के लिये माहौल बनाने के लिये यूपी भेजा गया .

अमित शाह ने मुज़फ्फर नगर में अपने तीन विधायकों की मार्फ़त अपना खेल शुरू किया .

अमित शाह ने यूपी पहुँचते ही . पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तलवारें बटवाई. 

अब हिंदु लड़के तलवारें लेकर मुसलमानों की बस्तियों में घूमने लगे .

ये तलवारधारी लड़के मस्जिदों में घुस कर अजान बंद करवाने लगे .

छोटी छोटी बातों पर ये तीनों भाजपाई विधायक मुसलमानों के खिलाफ धरने प्रदर्शन करने लगे .

अब भाजपा के धरनों के दौरान मुसलमानों की दाढ़ी नोचने और टोपी उतार कर फेंकी जाने लगीं .
 
पूरे माहौल में मुसलमानों के लिये नफरत पैदा की जाने लगी .

प्रचार किया जाने लगा कि मुसलमान हिदू लड़कियों को भगा कर शादियां का रहे हैं .

लेकिन किसी से पूछो कि अच्छा बताइये कि कितनी हिदू लड़कियों से मुसलमानों ने शादी करी तो दो साल पुराना एक ही उदहारण दे पाते हैं .

यानी दो साल पहले किसी एक मुसलमान ने किसी एक हिंदु लड़की से शादी करी थी तो उसे दंगा करने के लिये वजह बनाया जाने लगा .

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हिंदुपांच मुख्य पार्टियों में बंटे हुए थे .अजीत सिंह की पार्टी , कांग्रेस , बीएसपी , समाजवादी पार्टी और भाजपा. .

भाजपा ने योजना बनाई कि इन सारे हिंदुओं को भाजपा के साथ जोड़ने के लिये सारे हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ भडकाया जाए .

बहुत शातिर तरीके से भाजपा ने अपनी योजना को अंजाम दिया . 
बिल्कुल योजना के मुताबिक दंगे हुए .

मुसलमानों को बेवजह मारा गया .

इन मुसलमानों का कोई कसूर नहीं था .

इन मुसलमानों को तो मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की बलिवेदी पर बलि चढाया गया है .

मोदी के गिरोह ने हिटलर वाली चाल ही यहाँ भी चली है .

हिटलर ने सत्तर लाख यहूदियों को मार डाला .

लेकिन हिटलर कहता था कि यहूदी ही बुरे हैं .

यानि जो पीडित है उसे ही दोषी बताओ .

भारत में भी ये भाजपाई मुसलमानों को मारते हैं और मुसलमाओं को ही दोषी भी बताते हैं . 

अगर भाजपा ने अपना ये गन्दा खेल बंद नहीं किया तो मुझे डर है कि ये भाजपाई इस देश की एकता के लिये बड़ा खतरा सिद्ध होंगे .

कल फिर मुज़फ्फर नगर जा रहा हूं .